Osho World Online Hindi Magazine :: April 2012
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हास्य-ध्यान

  • ढब्बू जी अपने मित्र चंदूलाल से कह रहे थे कि विवाह मैं इसलिए नहीं करना चाहता, क्योंकि मुझे स्त्रियों से बहुत डर लगता है।
    चंदूलाल ने उसे समझाया और कहा, यह बात है तब तो तुरंत विवाह कर डालो। मैं तुम्हें अनुभव से कहता हूं, क्योंकि विवाह के बाद एक ही स्त्री का भय रह जाता है।

  • मटकानाथ ब्रह्मचारी ने ढब्बू जी को समझाते हुए कहा, बेटा, अपनी पत्नी से लड़ना नहीं चाहिए, क्योंकि पति-पत्नी गृहस्थ जीवन रूपी गाड़ी के दो पहियों के समान हैं।
    ढब्बू जी बोले, गुरुदेव, यह बात तो ठीक है, परंतु जब एक पहिया साइकिल का हो और एक ट्रैक्टर का, तो आप ही बताइए गाड़ी कैसे चलेगी?

  • चंदूलाल को सरकारी काम से पंद्रह दिन के लिए बंबई जाना पड़ा। सरकारी भत्ते पर ही उन्हें एक आलीशान होटल में रहने को मिला। पांच-छह दिन में ही वे बहुत परेशान हो उठे। एक दिन झल्लाकर वेटर से गुस्से में बोले, सुनो मिस्टर, मेरे लिए जल्दी से दो जली हुई रोटियां, एक प्लेट कंकड़ों से भरी हुई दाल, एक प्लेट अधकच्चे चावल और बुरी तरह जली हुई मिर्चदार सब्जी लेकर आओ।
    वेटर ने बाइज्जत सिर झुकाकर पूछा: साहब, कुछ और?
    चंदूलाल बोले: हां, सब चीजें लाने के बाद तुम मेरे सामने की कुर्सी पर बैठकर घर-गृहस्थी का रोना रोओ, मेरा सिर चाटो, मुझे सताओ, क्योंकि मुझे घर की याद सता रही है!

  • मुल्ला नसरुद्दीन पर अदालत में मुकदमा था कि उसने दो शादियां कर लीं, जो कानून के खिलाफ है। उसके वकील ने सिद्ध किया कि यह बात गलत है। और मुल्ला ने कहा कि नहीं, मैंने दो शादी नहीं की, मेरी तो एक ही पत्नी है। वकील होशियार था, झूठ चल गया। उसने कानून की बड़ी बारीकियां निकालीं और सिद्ध हो गयी बात, और मजिस्ट्रेट ने कहा कि ठीक है नसरुद्दीन, यह सिद्ध हो गया कि तुम्हारी एक ही पत्नी है, तुम जुर्म से बरी किए जाते हो; अब तुम घर जा सकते हो।
    नसरुद्दीन ने कहा: हुजूर, एक बात और। मैं किस घर जाऊं? क्योंकि दोनों पत्नियां राह देख रही होंगी।


  • नसरुद्दीन प्रतिदिन अपने गधे को सरहद के पार ले जाता था। उस पर घास लदी होती थी। सरहद के सिपाहियों के सामने वह स्वीकार करता था कि वह तस्कर है, इसलिए वे लोग उसकी रोज तलाशी लेते थे। उसकी घास उछालते, कभी जला देते तो कभी पानी में डालते। इधर नसरुद्दीन धनी से धनी होता जा रहा था।
    फिर वह वहां से दूसरे देश में रहने गया। वर्षों बाद उसे सरहद की रक्षा करने वाले पुराने अफसरों में से एक मिला। उसने कुतूहलवश पुछा, ‘नसरुद्दीन, तुम ऐसी कौन सी चीज की तस्करी करते थे कि तुम्हें कभी पकड़ नहीं सके?’
    नसरुद्दीन ने कहा, ‘गधों की।’

  • एक मुशायरा चल रहा था और एक शायर ने गजल पढ़ी, जिसकी पहली लाइन थी: मैं ताज बना देता, मगर मुमताज नहीं मिलती।’ जैसे ही उसने यह पंक्ति पढ़ी, मुल्ला नसरुद्दीन एकदम खड़ा हो गया और गुस्से में बोला: ‘मियां, खुशकिस्मत हो कि कुछ लेट हो गए, अगर कुछ दिन पहले आप तशरीफ ले आते तो मुमताज मिल सकती थी। लेकिन अब तो दुर्भाग्यवश मेरी उससे शादी हो चुकी है’।

-ओशो की पुस्तकों से संकलित