Osho World Online Hindi Magazine :: April 2012
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जीवन का रूपांतरण
ओशो ने मुझे जीना सिखाया - मा आनंद सहजो

Ma Anand Sahjoजीवन में ऐसी कुछ घटनाएं घट जाती हैं जिनके साथ हम जीवन भर के लिए जुड़ जाते हैं। और ऐसे संस्मरणों को सुनाना और बताना अपने आप में एक आनंद का स्रोत बन जाता है।

ओशो वर्ल्ड की हिंदी पत्रिका में ‘ओशो ने मेरा जीवन कैसे रूपांतरित किया’, स्तंभ को देख ‘मा आनन्द सहजो’ को अपने बीते दिनों की याद ताज़ा हो गई जब वह ओशो राजयोग ध्यान केंद्र से पहली बार जुड़ीं। अपने भावों को प्रकट करते हुए उन्होंने ‘ओशो वर्ल्ड’ के नाम एक पत्र लिखा। जिसमें मा ने बताया है कि ‘‘सन् 1996 में मेरे पति ने दक्षिणी दिल्ली के एक अस्पताल में अपनी आंख का आपरेशन करवाया। उसी दौरान मुझे एक सप्ताह के लिए ‘ओशो राजयोग ध्यान केंद्र’ में रहने का अवसर मिला। मैं खाली समय में ‘ओशो वर्ल्ड (तब ओशो टाइम्स)’ पढ़ती थी। वह पत्रिका मेरी प्रिय पत्रिका बन गई जिसे मैं बराबर पढ़ने लगी। वहीं मुझे ओशो के प्रवचन भी सुनने को मिले। उस समय कैसेट्स पर ओशो के प्रवचनों को सभी मित्र सुना करते थे।

करीब एक सप्ताह के बाद जब मैं वापस घर जाने लगी, उस समय कुछ कैसेट्स स्वामीजी ने उपहार के रूप में मुझे भेंट किया।

ओशो वर्ल्ड (ओशो टाइम्स) पत्रिका में प्रकाशित ध्यान के मनोहारी चित्र मुझे ओशोधाम जाकर ध्यान करने के लिए लालायित करने लगे।

पति के अस्वस्थ रहने और उनके नापसंद करने के कारण उनके निधन के बाद मुझे ओशोधाम जाने का सुअवसर मिला। मैं सन् 2004 से कभी-कभी ओशोधाम जाकर ध्यान करने लगी। धीरे-धीरे मेरे जीवन में परिवर्तन आने लगा। क्रोध की जगह रोना आने लगा।

2006 के सितम्बर माह में जब ओशोधाम के बुद्धाहॉल में मैं पहुंची तो अचानक मुझे संन्यास लेने की तीव्र इच्छा हुई और मैं मा धर्म ज्योति के पास गई। उनके पास जाकर मैंने कहा कि मुझे ओशो के नव-संन्यास में प्रवेश होना है। उन्होंने मुझे बड़ी आश्चर्यचकित मुद्रा से देखा और बोलीं, ‘आप स्वामी नरेन्द्र बोधिसत्व के पास जाइए और अपना नाम वहां पर लिखवा दीजिए।’ और उसके बाद 9 तारीख को मैंने ओशो नव-संन्यास में दीक्षा ग्रहण की तथा मुझे एक नया नाम मिला ‘मा आनन्द सहजो।’

उसी दौरान नई दिल्ली स्थित ओशो बुक शॉप का शुभारंभ हुआ। और मैंने वहीं रह कर ओशो का कार्य करने का मन बना लिया। मैंने स्वामीजी से आग्रह किया कि मुझे ओशो बुक शॉप में कार्य ध्यान करने दिया जाए और स्वामीजी ने बड़ी ही सहजता के साथ उसे स्वीकार भी कर लिया। अब मैं अपना अधिकांश समय ओशो-पुस्तकों के साथ व्यतीत करती हूं और सद्गुरु के प्रवचनों को पढ़कर आनंद का अनुभव करती हूं।

लगभग चार-पांच वर्ष पूर्व मेरे घुटने में काफी दर्द हो गया और मैं पूरे समय बिस्तर पर ही पड़ी रहती थी। उन दिनों मैं कल्पना में ही नृत्य-ध्यान करती थी जिसका मेरे जीवन में बड़ा अच्छा प्रभाव पड़ा और मैं धीरे-धीरे चलने लगी। उपचार के साथ-साथ मेरा नृत्य-ध्यान भी चलता रहा। ओशो के आशीर्वाद से आज मैं बुढ़ापे का आनन्द ले रही हूं। अभी तक किसी पर निर्भर नहीं हूं। समय-समय पर ओशोधाम भी जाती हूं। ओशो बुक शॉप मेरे लिए वरदान है और वहीं मेरा समय शांति, प्रेम व आनंद से बीत रहा है।

ओशो के चरणों में शत्-शत् प्रणाम।

मा आनन्द सहजो
जवाहर नगर, दिल्ली