Osho World Online Hindi Magazine :: April 2012
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उपवास और अनशन में भेद

और उपवास को फास्टिंग मत कहो, अनशन मत कहो; उपवास को कहो आत्मा के निकट होना।

जैसी महावीर के पास सुंदर काया है। जितना सुंदर स्वस्थ शरीर महावीर के पास है, ऐसी काया किसी के पास नहीं था। और मेरा अपना मानना है कि इतने सुंदर होने की वजह से वे नग्न खड़े हो सके। असल में नग्नता को छिपाना कुरूपता को छिपाना है। हम सिर्फ उन्हीं अंगों को छिपाते हैं, जो कुरूप हैं। इतने परम सुंदर हैं वे कि छिपाने को कुछ भी नहीं है, वे नग्न खड़े हो सके। नग्न खड़े होने में भी वे परम सुंदर हैं। और उनकी परंपरा को पकड़ने वाला जो शब्द पकड़े हुए है काया-क्लेश का कि वे शरीर को सता रहे हैं, वे बिलकुल पागल हैं, क्योंकि सताने वाला शरीर ऐसा नहीं होता, जैसा महावीर का है।

हां, इधर दिगंबर जैन मुनि को देखें तो पता चलता है कि हां, यह शरीर को सता रहा है। एक दिगंबर मुनि अब तक महावीर जैसा शरीर खड़ा करके नहीं बता सका।

तो कहीं कोई भूल हो गई है। महावीर काया-क्लेश किसी और ही बात को कहते हैं। एक आदमी जो सुबह घंटे भर व्यायाम करता है, वह भी काया-क्लेश कर रहा है। आप समझ रहे हैं न? काया-क्लेश वह भी कर रहा है, जो घंटे भर व्यायाम करता है, पसीना-पसीना हो जाता है, शरीर को थका डालता है। और एक आदमी वह भी काया-क्लेश कर रहा है, जो एक कोने में बिना खाए-पीए, बिना नहाए-धोए पड़ा है। वह भी काया-क्लेश कर रहा है। लेकिन पहला आदमी काया के लिए ही काया-क्लेश कर रहा है, और दूसरा आदमी काया की दुश्मनी में काया-क्लेश कर रहा है। दोनों का अगर दस वर्ष ऐसा ही क्रम चला तो दोनों को खड़ा करेंगे तो नंबर एक का तो एक अदभुत सुंदर शरीर वाला व्यक्ति निकल आएगा और दूसरा एक दीन-हीन, मरा हुआ व्यक्ति हो जाएगा।

काया-क्लेश किसलिए? महावीर कहते हैं कि काया का श्रम काया के लिए ही। काया कभी भी वैसी नहीं बन सकती, जैसी बन सकती है; उसके लिए श्रम उठाना ही पड़ेगा।

तो क्लेश जो अब शब्द है, वह अब घातक और दुश्मनीपूर्ण मालूम पड़ता है। वह महावीर के लिए नहीं है घातक और दुश्मनीपूर्ण। उस शब्द को पकड़ कर हम महावीर की पूरी वृत्ति को ही नष्ट कर देंगे। उस शब्द को बदलना ही पड़ेगा।

अब महावीर उपवास शब्द का प्रयोग करते हैं। उपवास का मतलब होता है--अपने पास रहना, टु बी नियर वनसेल्फ। और कोई मतलब ही नहीं होता। आत्मा के पास निवास करना--उपवास। जैसे उपनिषद--गुरु के पास बैठना। ऐसे उपवास--अपने पास होना। लेकिन उपवास का फास्टिंग, अनशन अर्थ हो गया। उपवास का मतलब हो रहा है, अनशन, न खाना।

अब यह उपवास नहीं चल सकता, न खाने वाला। और न खाने पर जोर दिया, तो वह दमन और काया-क्लेश वाली बात है। चार-चार महीने तक कोई आदमी बिना खाए रह सकता है? लेकिन उपवास में रह सकता है। उपवास का मतलब ही और है। उपवास का मतलब है कि एक व्यक्ति अपनी आत्मा में इतना लीन हो गया कि शरीर का उसे पता ही नहीं है, तो भोजन भी नहीं करता है, क्योंकि शरीर का पता हो तो भोजन करे। अपने भीतर ऐसा लीन हो गया है कि शरीर का पता नहीं चलता--दिन बीत जाते हैं, रातें बीत जाती हैं, उसे शरीर का पता नहीं।

एक संन्यासी मेरे पास आए और उन्होंने मुझसे...मेरे पास सामने ही रुके थे तो आए मुझसे मिलने तो मैंने कहा, आप खाना खाकर जाएं। तो उन्होंने कहा, आज तो मेरा उपवास है। तो मैंने कहा, कैसा उपवास करते हैं? उन्होंने कहा कि इसमें क्या बात है, आप यह भी नहीं जानते कि कैसा उपवास करते हैं? खाना नहीं लेते दिन भर। तो मैंने कहा, इसको आप उपवास समझते हैं? अनशन क्या है फिर? तो उन्होंने कहा, दोंनो एक चीज हैं। नाम से कोई फर्क पड़ता है? तो मैंने कहा, फिर आप अनशन करते हैं, अभी उपवास का आपको पता नहीं।

और जब आप अनशन करेंगे तो ध्यान रहे, पूरा वास शरीर के पास होगा, आत्मा के पास होने वाला ही नहीं है। अनशन का मतलब ही यही है कि नहीं खाया; खाने का खयाल है, नहीं खाया, छोड़ा। तो दिन भर शरीर के पास ही मन घूमेगा। भूख लगी, प्यास लगी, कल का खयाल कि कल क्या खाएंगे, परसों क्या खाएंगे--पूरे वक्त एक। तो मैंने उनसे कहा कि यह तो उपवास से अनशन बिलकुल उलटा है। दोनों में भोजन नहीं खाया जाता, लेकिन दोनों उलटी ही बातें हैं, क्योंकि अनशन में आदमी शरीर के पास रहता है--चैबीस घंटे, जितना कि खाना खाने वाला भी नहीं रहता। दो दफे खा लिया और बात खतम हो गई है। और अनशन वाला दिन भर खाता रहता है, मन ही मन में खाना चलता है।

उपवास का मतलब है कि किसी दिन ऐसे मौज में आ गए हो तुम अपने भीतर कि अब शरीर की कोई याद ही न रही। और महावीर की जो शरीर की तैयारी है, वह इसलिए है कि जब शरीर की याद न रहे तो शरीर इतना समर्थ हो कि दस-पांच दिन, महीने दो महीने झेल जाए। नहीं तो झेलेगा कैसे? तो यह मुनि का तो झेल ही नहीं सकता।

अगर यह, अगर यह भीतर चला जाए तो यह तो मर ही जाए। क्योंकि इसके पास तो शरीर में जो अतिरिक्त होना चाहिए झेलने के लिए, वह है ही नहीं। इसके पास स्टोरेज ही नहीं है कोई। अगर बहुत बलिष्ठ शरीर हो, तो वह तीन महीने तक तो बिलकुल आसानी से बिना खाए बच सकता है, नष्ट नहीं होगा।

तो महावीर अगर चार-चार महीने का उपवास किए हैं तो इस बात का सबूत है कि उस आदमी के पास भारी बलिष्ठ शरीर था--साधारण नहीं--असाधारण रूप से, कि चार-चार महीने तक उसने नहीं खाया है तो शरीर बचा है, शरीर मिट नहीं गया है इससे कुछ।

यह काया-क्लेश करने वाला तो कभी चार दिन नहीं कर सकता, वह तो चार दिन में मर जाएगा अगर उपवास इसका हो जाए। उपवास का मतलब इसकी आत्मा और चेतना एकदम भीतर चली जाए कि बाहर का इसे खयाल ही न रहे, तो इसका शरीर तो साथ छोड़ देगा फौरन।

लेकिन शब्दों ने जान ले ली है। तो उस संन्यासी को मैंने कहा कि तुम कभी जिस दिन ध्यान करो और किसी दिन ध्यान में ऐसे डूब जाओ कि उठने का मन न हो तो उठना ही मत तुम। जब उठने का मन हो उठ आना, न हो तो मत उठना। तो उसे मैं ध्यान कुछ दो-तीन महीने कराता था। उसके साथ एक युवक रहता था। उसने एक दिन सुबह आकर मुझे खबर दी कि आज चार बजे से वे ध्यान में गए हैं तो नौ बज गया अभी तक उठे नहीं हैं और उन्होंने कह दिया है कि कभी न उठ आऊं तो उठाना मत। लेकिन मुझे बहुत डर लग रहा है, वे पड़े हैं। मैंने कहा, उन्हें पड़ा रहने दो।

वह युवक दो बजे फिर दोपहर में आया कि...तब तो जरा घबड़ाहट होने लगी, क्योंकि वे पड़े ही हैं--न करवट लेते, न हाथ हिलाते। कहीं कुछ नुकसान तो नहीं हो जाएगा? मैंने कहा, तुम डरो मत, आज उपवास हो गया, तुम हो जाने दो। रात नौ बजे वह फिर आया और उसने कहा, अब हिम्मत के बाहर हो गया मामला, आप चलिए। मैंने कहा, वहां कोई जाने की जरूरत नहीं है, तुम रहने दो।

ग्यारह बजे रात वह आदमी उठा और भागा हुआ मेरे पास आया। और उसने कहा कि आज समझा कि उपवास और अनशन का क्या अर्थ है! कितना भेद है! हो गया उपवास आज। हद का हुआ है। कभी कल्पना ही न की थी कि ऐसा भी उपवास का अर्थ हो सकता है।

जब आप भीतर चले जाते हैं तो बाहर का स्मरण छूट जाता है। उस स्मरण के छूटने में पानी भी छूट जाता है। और शरीर इतना अदभुत यंत्र है कि जब आप भीतर होते हैं तो शरीर आटोमैटिक हो जाता है, अपनी व्यवस्था पूरी करने लगता है, आपको कोई चिंता लेने की जरूरत नहीं रहती। और शरीर की साधना का मतलब यह है कि शरीर ऐसा हो कि जब आप भीतर चलें जाएं तो उसे आपकी कोई जरूरत न हो, वह अपनी व्यवस्था कर ले, वह स्वचालित यंत्र की तरह अपना काम करता रहे, और आपकी प्रतीक्षा करे कि जब आप बाहर आएंगे, तब वह आपको खबर देगा कि मुझे भूख लगी, कि मुझे प्यास लगी, नहीं तो वह चुपचाप झेलेगा और आपको खबर भी नहीं देगा।

तो काया-क्लेश का मतलब है, काया की ऐसी साधना कि काया बाधा न रह जाए, साधक हो जाए, सीढ़ी बन जाए। लेकिन शब्द बड़े खतरनाक हैं, इसलिए इसको काया-क्लेश मत कहो, इसको काया-साधना कहो तो समझ में आ सकता है। इसको क्लेश कहा, तो क्लेश शब्द ऐसा बेहूदा है कि उससे ऐसा लगता है कि सता रहे हो, टार्चर कर रहे हो, तब तो नुकसान होगा।

और उपवास को फास्टिंग मत कहो, अनशन मत कहो; उपवास को कहो आत्मा के निकट होना। निश्चित ही, आत्मा के निकट होकर शरीर भूल जाता है। वह दूसरी बात है, वह गौण बात है, अनशन हो जाएगा, लेकिन वह दूसरी बात है। अनशन करने से उपवास नहीं होता, उपवास करने से अनशन हो जाता है।

-ओशो
महावीर: मेरी दृष्टि में
प्रवचन नं. 2 से संकलित
(पूरा प्रवचन एम. पी. थ्री. पर भी उपलब्ध है।)