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भारत एक सनातन यात्रा
जनसंख्या-विस्फोट

बुद्ध के जमाने में इस देश की आबादी दो करोड़ थी। लोग अगर खुशहाल थे तो कोई सतयुग के कारण नहीं। जमीन थी ज्यादा, लोग थे कम...

देश में लगातार बढ़ती जनसंख्या चिंता का विषय बनी हुई है। इसके आंकड़े दिन ब दिन छलांग लगाते ही जा रहे है। वर्तमान में पूरे विश्व की जनसंख्या 7 अरब के पार जा चुकी है। 2012 की रिपोर्ट के मुताबिक भारत की जनसंख्या 1.22 करोड़ है, जो पूरे वर्ल्ड की आबादी का लगभग 17.31 प्रतिशत हिस्सा है। देश में तकनीकि और चिकित्सा क्षेत्र में आये नित नये परिवर्तनों ने खतरनाक बीमारियों और मृत्युदर को घटाया है। लेकिन जन्मदर को रोकने के लिए कोई ठोस उपाय नहीं किये जिसका नतीजा देश में बढ़ती लोगों की भीड़ है।

गरीबी, अशिक्षा और जागरूकता की कमी के कारण जनंसख्या नियंत्रण के ठोस कदम प्रभावी नहीं हो पा रहे हैं। देश में जहां भी नज़र दौड़ाएं भीड़ ही भीड़ दिखायी पड़ती है। आबादी अधिक होने के कारण प्राकृतिक संसाधनों का भी निरंतर दोहन हो रहा है। जिससे संसाधनों की भविष्य में कम पड़ने की पूरी संभावना है। इनके कम या समाप्त होने पर पृथ्वी पर जीना असंभव हो जाएगा और हम अपने आने वाली पीढ़ी के साथ भी न्याय नहीं कर पाएंगे। क्योंकि उनके जीने के मूलस्रोत ही नहीं बच पाएंगे।

ओशो कहते है, मनुष्य-जाति फिर उस बिंदु के करीब आ रही है जहां वह अपने को बढ़ा कर समाप्त हो सकती है। बुद्ध के जमाने में इस देश की आबादी दो करोड़ थी। लोग अगर थोड़े खुशहाल थे तो कोई सतयुग के कारण नहीं। जमीन थी ज्यादा, लोग थे कम। अतीत की जो हम स्मृतियां लाए हैं खुशहाली की, वे खुशहाली की स्मृतियां नहीं है। वे स्मृतियां हैं जमीन के ज्यादा होने की, लोगों के कम होने की। भोजन ज्यादा था, लोग कम थे, इसलिए खुशहाली थी।

सारी मनुष्य-जाति की संख्या-और अगर हम दो हजार साल पीछे चले जाएं बुद्ध से-तो आज से पांच हजार साल पहले सारी पृथ्वी की संख्या ही दो करोड़ थी। पृथ्वी उतनी ही है, और हम प्रतिदिन उस संख्या को बढ़ा रहे हैं। वह संख्या हम इतनी तेजी से बढ़ा रहे हैं कि अंदाजन डेढ़ लाख लोग रोज बढ़ जाते हैं। जितनी देर मैं यहां घंटे भर बात करूंगा उतनी देर मनुष्यता शांत नहीं बैठी रहेगी। उस घंटे भर में हजारों लोग बढ़ चुके होंगे। यह सदी पूरी होते-होते, अगर दुर्भाग्य से आदमी को समझ न आई तो इस सदी के पूरे होते-होते यानी आज से तीस वर्ष बाद, जमीन पर कोहनी हिलाने की जगह न रह जाएगी। तब सभाएं करने की बिल्कुल जरूरत नहीं पड़ेगी। हम चौबीस घंटे सभाओं में होंगे।

यह हो नहीं पाएगा, कोई न कोई सौभाग्य, युद्ध, महामारी-कोई न कोई सौभाग्य मैं कह रहा हूं-इसे होने नहीं देगा। लेकिन अगर यह महामारी और युद्ध से हुआ तो मनुष्य की बुद्धि पर बड़ा कलंक लग जाएगा। जिन डायनासोर की मैंने बात की, जिन छिपकलियों की बात की जो हाथियों से बड़ी थीं, अब नहीं है, उनके पास कोई बुद्धि न थी, शरीर बहुत बड़ा था। वे कोई उपाय न कर सके, वे कुछ सोच न सके, वे मर गए।

हम सदा से ऐसा सोचते रहे हैं कि आदमी सोचने वाला प्राणी है, हालांकि आदमी सबूत नहीं देता है इस बात का। और अगर पचास सालों से आदमी को जितनी समझने की कोशिश की गई है, उतना ही पुराना विश्वास कमजोर हुआ है। वह जो रेशनल बीइंग का खयाल था, वह कमजोर हुआ है। आदमी भी विचारवान प्राणी नहीं मालूम पड़ता है, क्योंकि वह भी जो कर रहा है अत्यंत विचारहीन है। और सबसे बड़ी विचारहीनता जो हम कर सकते हैं आज, वह संख्या को बढ़ाए जाने की है। इस समय वह आदमी उतना बुरा नहीं है जो किसी की हत्या कर देता है; उतना बड़ा क्रिमनल नहीं है। बल्कि कौन जाने वह आदमी कुछ अच्छा ही काम कर रहा है मनुष्य के भविष्य को निर्मित करने के लिए! मैं नहीं कहता कि कोई हत्या करे। कोई हत्यारे को हत्या करने के लिए नहीं कह रहा हूं। लेकिन हत्या अब उतना बड़ा अपराध नहीं है जितना एक नए बच्चे को जन्म देना बड़ा अपराध है, क्योंकि हत्या से एक आदमी मरेगा और एक बच्चे को जन्म देने की प्रक्रिया अगर जारी रहती है तो पूरी मनुष्यता भी मर सकती है।

ओशो
पुस्तक: जनसंख्या-विस्फोट