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जीवन ही परमात्मा...

जीवन ही परमात्मा है। सृष्टि के अतिरिक्त कोई स्रष्टा कहीं बैठा है, ऐसा नहीं, सृष्टि की प्रक्रिया, सृजन की शक्ति, क्रिएटिविटी इटसेल्फ परमात्मा है

इस पर तो बहुत लंबी बात करनी पड़े। वैसे उसकी ही बात कर रहे हैं इतने दिन से। दो तीन शब्द कहे जा सकते हैं। मनुष्य की सभ्यता कृष्ण की समझ से सहज हो सकेगी, क्षणजीवी हो सकेगी, आनंद समर्पित हो सकेगी, दुःखवादी नहीं रहेगी, समयवादी नहीं रहेगी, निषेधवादी नहीं रहेगी, त्यागवादी नहीं रहेगी। अनुग्रहपूर्वक जीवन को वरदान समझा जा सकेगा और जीवन और परमात्मा में भेद नहीं रहेगा। जीवन ही परमात्मा है, ऐसी प्रतिष्ठा धीरे-धीरे बढ़ती जाएगी। जीवन के विरोध में कोई परमात्मा कहीं बैठा है, ऐसा नहीं, जीवन ही परमात्मा है। सृष्टि के अतिरिक्त कोई स्रष्टा कहीं बैठा है, ऐसा नहीं, सृष्टि की प्रक्रिया, सृजन की शक्ति, क्रिएटिविटी इटसेल्फ परमात्मा है।

ये पूरी बातें जो मैंने इस बीच कही हैं, उनको ख्याल में लेंगे तो जो मैंने अंतिम बात कही, वह स्पष्ट हो जाएगी। इन दिनों में बहुत सी बातें मैंने आपसे कहीं, रुचिकर लगी होंगी। रुचिकर लगने से भी समझने में बाधा पड़ती है, अरुचिकर लगने से भी समझने में बाधा पड़ती है। जो रुचिकर लगती है उसे हम बिना समझे पी जाते हैं, जो अरुचिकर लगती है उसे हम बिना समझे द्वार बंद करके बाहर छोड़ देते हैं। मैंने जो बातें कहीं, वे इसलिए नहीं कहीं कि आप उनको पी जाएं या द्वार बाहर छोड़ दें, मैंने सिर्फ इसलिए कहीं कि आप उनको सहजता और सरलता से समझ पाएं। मेरी बातों को घर मत ले जाइये। उन बातों को समझने में जो समझ आपके पास आई हो, जो प्रज्ञा, जो विज़डम आई हो, उसको भर ले जाइये। फूलों को यहीं छोड़ जाइये, इत्र कुछ बचा हो आपके हाथ में, उसे ले जाइए। मेरी बातों को ले जाने की कोई भी जरूरत नहीं है। मेरी बातें वैसी ही बेकार हैं जैसी सब बातें बेकार होती हैं। लेकिन इन बातों के संदर्भ में, इन बातों के संघर्ष में, इन बातों के आमने-सामने एनकाउंटर में आपके भीतर कुछ पैदा हुआ हो--वह तभी पैदा हो सकता है जब आपने पक्षापात न लिए हों; वह तभी पैदा हो सकता है जब आपने ऐसा न कहा हो कि ठीक कह रहे हैं, ऐसा ही मैं मानता हूं; कि गलत कह रहे हैं, ऐसा मैं मानता नहीं हूं; तभी आपमें समझ, अंडरस्टैंडिंग पैदा हो सकती है।

अगर आपने समझा हो कि यह तो कृष्ण के पक्ष में बोल रहे हैं, हमारे महावीर के पक्ष में नहीं बोलते हैं, तो आप दुख ले जाएंगे, समझ नहीं ले जाएंगे। उसका जिम्मा मेरा नहीं होगा। जिम्मा महावीर का भी नहीं होगा। आपका ही होगा। आपने सोचा कि यह तो हमारे जीसस के पक्ष में नहीं बोले, तो आप समझ नहीं ले जाएंगे। या आपने ऐसा समझा कि यह तो हमारे कृष्ण के संबंध में बोल रहे हैं, तो आप नासमझ ही लौट जाएंगे। आपके कृष्ण से मुझे क्या लेना-देना? न रुचि, न अरुचि; न पक्ष, न विपक्ष; मुझे तो जो दिखाई पड़ता उसे सीधा मैंने आपकी आंखों के सामने फैला दिया है। और मैं खुद ही क्षणजीवी व्यक्ति हूं, इसलिए भरोसे का नहीं हूं। कल क्या कहूंगा, इससे आज कोई वादा वादा नहीं बनता है, इससे आज कोई आश्वासन नहीं है। आज जैसा मुझे दिखाई पड़ता था, वैसा मैंने कहा। आज जो आपकी समझ में आया हो—समझ में आया हो, उसका मूल्य नहीं है; जो समझ में आने में समझ बढ़ी हो, उसका मूल्य है।

मैं आशा करता हूँ, यह दस दिन में सबके पास थोड़ी न बहुत समझ का विकास हुआ होगा, थोड़ी न बहुत दृष्टि फैली होगी, द्वार थोड़े न बहुत खुले होंगे, सूरज को आने के लिए थोड़ी-बहुत जगह बनी होगी। मैं नहीं कहता हूं कि आपके भीतर जब सूरज आए तो आप उसे क्या नाम दें—कृष्ण कहें, कि बुद्ध कहें, कि राम कहें, यह आपकी मर्जी है, नाम आपके होंगे—मैं इतना ही कहता हूं कि दरवाजा आपके चित्त का खुला हो। तो सूरज आ जाएगा। नाम आप पर निर्भर होगा, क्योंकि सूरज अपना कोई नाम कहता नहीं कि मेरा नाम क्या है। वह अनाम है। नाम आप अपना दे लेंगे। लेकिन दरवाजा सिर्फ उनके ही चित्त का खुलता है, जो समझपूर्वक, समझ में, समझ के साथ जीते हैं, पक्षों और धारणाओं और सिद्धांतों के साथ नहीं। सिद्धांतों और धारणाओं और पक्षों के साथ वे ही लोग जीते हैं जिनको अपनी समझ का भरोसा नहीं है। तो वे पक्के, बंधे-बंधाए, सीमेंट-कांक्रीट के बाजार में बिकते हुए सिद्धांतो को ले आते हैं। समझ तो पानी की तरह तरल है। समझ तो बहाव है, एक फ्लो है। सिद्धांत, सिद्धांत कोई बहाव नहीं है।

-ओशो
पुस्तकः कृष्ण स्मृति
प्रवचन नं.21 से संकलित
(पूरा प्रवचन एम.पी.थ्री. पर भी उपलब्ध है।)