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कृष्ण और अर्जुन के बीच का संबंध

कृष्ण और अर्जुन के बीच जो संबंध है, वह गुरु और शिष्य का नहीं, दो मित्रों का है

इस संबंध में पहली तो यह बात जान लेनी जरूरी है कि जिन मार्गो पर आपको नहीं चलना है, उन पर भी चलने का झुकाव आपके भीतर हो सकता है। और वह झुकाव खतरनाक है। और वह झुकाव आपके जीवन, आपकी शक्ति को, अवसर को खराब कर सकता है।

तो कृष्ण उन सभी मार्गों की बात कर रहे हैं अर्जुन से, जिन पर चलने के लिए किसी भी मनुष्य के मन मे झुकाव हो सकता है। मनुष्य मात्र जिन मार्गों पर चलने के लिए उत्सुक हो सकता है, उन सभी की बात कर रहे हैं।

इस बात के करने का फायदा है। इन सारे मार्गों को अर्जुन समझ ले, तो उसे खयाल में आना कठिन न रह जाएगा कि कौन-सा मार्ग उसके सर्वाधिक अनुकूल है। और जिसे आप नहीं जानते, उससे खतरा है; और जिसे आप जान लेते हैं, उससे खतरा समाप्त हो जाता है।

सभी रास्तों के संबंध में जान लेने के बाद जो निर्णय होगा, वह ज्यादा सम्यक होगा। इसलिए कृष्ण सभी रास्तों की बात कर रहे हैं। इस अर्थ में, कृष्ण का वक्तव्य, उनका उपदेश बुद्ध, महावीर, मोहम्मद और जीसस के वक्तव्य से बहुत भिन्न है।

जीसस एक ही मार्ग की बात कर रहे हैं। महावीर एक ही मार्ग की बात कर रहे हैं। बुद्ध एक ही मार्ग की बात कर रहे हैं। कृष्ण सभी मार्गों की बात कर रहे हैं। और यह सभी मार्गो की बात जान लेने के बाद कोई चुनाव करता है, तो चुनाव ज्यादा सार्थक, ज्यादा अभिप्रायपूर्ण होगा। और उस मार्ग पर सफलता भी ज्यादा आसान होगी।

बहुत बार तो कोई मार्ग शुरु में आकर्षक मालूम होता है, लेकिन पूरे मार्ग के संबंध में जान लेने पर उसका आकर्षण खो जाता है। बहुत बार कोई मार्ग शुरु में बहुत कंटकाकीर्ण और कठिन मालूम पड़ता है, लेकिन मार्ग के संबंध में पूरी बात समझ लेने पर सुगम हो जाता है।

इसलिए कृष्ण सारी बातें खोलकर रख दे रहे हैं। अर्जुन के माध्यम से जैसे वे पूरी मनुष्यता से ही बात कह रहे हैं।

मनुष्य जिस-जिस मार्ग से परमात्मा तक पहुंच सकता है, वे सभी मार्ग अर्जुन के सामने कृष्ण खोलकर रख रहे हैं। इन सभी मार्गों पर अर्जुन चलेगा नहीं। चलने की कोई जरूरत भी नहीं है। लेकिन सभी को जानकर जो मार्ग वह चुनेगा, वह मार्ग उसके लिए सर्वाधिक अनुकूल होगा।

दूसरी बात, कृष्ण और अर्जुन के बीच जो संबंध है, वह गुरु और शिष्य का नहीं, दो मित्रों का है। दो मित्रों का संबंध और गुरु शिष्य के संबंध में बड़े फर्क हैं। और इसीलिए कृष्ण गुरु की भाषा में नहीं बोल रहे हैं, जैसे वे अर्जुन को परसुएड कर रहे हैं। नहीं, दो मित्रों का संबंध और गुरु-शिष्य के संबंध में बड़े फर्क हैं। और इसीलिए कृष्ण गुरु की भाषा में नहीं बोल रहे हैं, एक मित्र की भाषा में बोल रहे हैं। वे सभी बातें अर्जुन को कह रहे हैं, जैसे वे अर्जुन को परसुएड कर रहे हैं, फुसला रहे हैं, राजी कर रहे हैं। उसमें आदेश नहीं है, उसमें आज्ञा नहीं है। एक मित्र एक दूसरे मित्र को राजी कर रहा है, समझा रहा है। उसमें कृष्ण ऊपर खड़े होकर अर्जुन को आज्ञा नहीं दे रहे हैं, साथ खड़े होकर अर्जुन से चर्चा कर रहे हैं। यह दो गहरे मित्रों के बीच संवाद है।

निश्चित ही, कृष्ण गुरु हैं और अर्जुन शिष्य है, लेकिन उनके बीच संबंध दो मित्रों का है। इस मित्रता के संबंध के कारण गीता में जो वार्तालाप है, जो डायलाग है, वह न कुरान में है, न बाइबिल में है; वह न धम्मपद में है, न जेन्दअवेस्ता में है

डायलाग, वार्तालाप, दो मित्र निकट से बातें कर रहे हैं। न अर्जुन को भयभीत होने की जरूरत है कि वह गुरु से बोल रहा है, न गुरु को जल्दी है कि वह मार्ग पर लगा दे अर्जुन को। दो मित्रों की चर्चा है। इस मित्रता की चर्चा से जो नवनीत निकलेगा, उसका बड़ा मूल्य हैं।

गहरे में तो अर्जुन शिष्य है, उसे इसका कोई पता नहीं। वह पूछ रहा है, प्रश्न कर रहा है, जिज्ञासा कर रहा है, वे शिष्य के लक्षण हैं। लेकिन वे लक्षण अचेतन हैं।

अर्जुन ऐसे ही पूछ रहा है, जैसे एक मित्र से मुसीबत में सलाह ले रहा है। उसे पता नहीं कि वह शिष्य होने के रास्ते पर चल पड़ा। सच तो यह है कि जो उसने पूछा था, उसने कभी सोचा भी न होगा कि उसके परिणाम में जो कृष्ण ने कहा, वह कहा जाएगा।

अर्जुन ने तो इतना ही पूछा था कि मेरे प्रियजन हैं, संबंधी है, मित्र है, नाते-रिश्तेदार है, सभी मेरे परिवार के लोग हैं, इस तरफ भी, उस तरफ भी। हम सब बंटकर खड़े हैं, एक बड़ा कुटुंब। उस तरफ मेरे गुरु हैं, पूज्य भीष्म हैं। यह सब संघर्ष पारिवारिक है; यह हत्या अकारण मालूम पड़ती है। ऐसे राज्य को पाकर भी मैं क्या करूंगा, जिसमें मेरे सभी संबंधी और मित्र नष्ट हो जाएं? तो ऐसा राज्य तो त्याग देने योग्य लगता है।

अर्जुन के मन में वैराग्य का उदय हुआ है। वह उदय भी मोह के कारण ही हुआ है। अगर वह वैराग्य मोह के कारण न होता, तो कृष्ण को गीता कहने की जरूरत न होती; अर्जुन विरागी हो गया होता। जो वैराग्य मोह के कारण पैदा होता है, वह वैराग्य है ही नहीं। वह केवल वैराग्य की भाषा बोल रहा है। इस दुविधा के कारण गीता का जन्म हुआ।

-ओशो
पुस्तकः गीता दर्शन भाग 6
प्रवचन नं 12 से संकलित
(पूरा प्रवचन एम.पी.थ्री. पर भी उपलब्ध है।)