Osho World Online Hindi Magazine :: August 2012
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साधना और उपासना के बीच में अंतर

साधक में कुछ खोना नहीं है, पाना है और उपासक में सिवाय खोने के कुछ भी नहीं है

कृष्ण के व्यक्तित्व में साधना जैसा कुछ भी नहीं है। हो नहीं सकता। साधना में जो मौलिक तत्व है, वह प्रयास है, इफर्ट है। बिना प्रयास के साधना नहीं हो सकती। दूसरा जो अनिवार्य तत्व है, वह अस्मिता है, अहंकार है। बिना 'मैं' के साधना नहीं हो सकती। करेगा कौन? कर्ता के बिना साधना कैसे होगी, कोई करेगा तभी होगी। साधना शब्द, जिनके लिए कोई परमात्मा नहीं है, आत्मा ही है, साधना शब्द उनका है। आत्मा साधेगी और पाएगी।

उपासना शब्द बिल्कुल उलटे लोगों का है। आमतौर से हम दोनों को एक साथ चलाए जाते हैं। उपासना शब्द उनका है, जो कहते हैं कि आत्मा नहीं, परमात्मा है। सिर्फ उसके पास जाना, पास बैठना—उप-आसन, निकट होते जाना, निकट होते जाना। और निकट होने का अर्थ है, खुद मिटते जाना, और कोई अर्थ नहीं है। हम उससे उतने ही दूर हैं, जितने हम हैं। जीवन के परम सत्य से हमारी दूरी, हमारी डिस्टेंस उतना ही है, जितने हम हैं। जितना हमारा होना है, जितना हमारा मैं है, जितना हमारा ईगो है, जितनी हमारी आत्मा है, उतने ही हम दूर हैं। जितने हम खोते हैं और विगलित होते हैं, पिघलते हैं और बहते हैं, उतने ही हम पास होते हैं। जिस दिन हम बिलकुल नहीं रह जाते, उस दिन उपासना पूरी हो जाती है और हम परमात्मा हो जाते हैं। जैसे बर्फ पानी बन रहा हो, बस उपासना ऐसी है कि बर्फ पिघल रहा है, पिघल रहा है...

साधना क्या कर रहा है बर्फ? साधना करेगा तो और सख्त होता चला जाएगा। क्योंकि साधना का मतलब होगा कि बर्फ अपने को बचाए। साधना का मतलब होगा कि बर्फ अपने को सख्त करे। साधना का मतलब होगा कि बर्फ और क्रिस्टलाइज्ड हो जाए। साधना का मतलब होगा कि बर्फ और आत्मवान बने। साधना का मतलब होगा कि बर्फ अपने को बचाए और खोए न।

साधना का अर्थ अंततः आत्मा हो सकता है। उपासना का अर्थ अंततः परमात्मा है। इसलिए जो लोग साधना से जाएंगे, उनकी आखिरी मंजिल आत्मा पर रुक जाएगी। उसके आगे की बात वे न कर सकेंगे। वे कहेंगे, अंततः हमने अपने को पा लिया। उपासक कहेगा, अंततः हमने अपने को खो दिया। ये दोनों बातें बड़ी उलटी हैं। बर्फ की तरह पिघलेगा। उपासक और पानी की तरह खो जाएगा। साधक तो मजबूत होता चला जाएगा।

इसलिए कृष्ण के जीवन में साधना का कोई तत्व नहीं है। साधना का कोई अर्थ नहीं है। अर्थ है तो उपासना का है। उपासना की यात्रा ही उलटी हैं। उपासना का मतलब ही यह है कि हमने अपने को पा लिया, यही भूल है। हम हैं, यही गलती है। टू बी इज़ दि ओनली बांडेज। होना ही एकमात्र बंधन है। न होना ही एकमात्र मुक्ति है। साधक जब कहेगा तो वह कहेगा, मै मुक्त होना चाहता हूं। उपासक जब कहेगा तो वह कहेगा, मैं 'मैं' से मुक्त होना चाहता हूं। साधक कहेगा, मैं मुक्त होना चाहता हूं। मैं मोक्ष पाना चाहता हूं । लेकिन 'मैं' मौजूद रहेगा। उपासक कहेगा, 'मै' से मुक्त होना है। 'मैं' से मुक्ति पानी है। उपासक के मोक्ष का अर्थ है, 'ना-मैं' की स्थिति। साधक के मोक्ष का मतलब है, 'मैं' की परम स्थिति। इसलिए कृष्ण की भाषा में साधना के लिए कोई जगह नहीं है; उपासना के लिए जगह है।

अब यह उपासना क्या है, इसे थोड़ा समझें।

पहली तो यह बात समझ लें कि उपासना साधना नहीं है, इससे समझने में आसानी बनेगी। अन्यथा भ्रांति निरंतर होती रहती है। और उपासक हममें से बहुत कम लोग होना चाहेंगे, यह भी ख्याल में ले लें। साधक हममें से सब होना चाहेंगे। क्योंकि साधक में कुछ खोना नहीं है, पाना है। और उपासक में सिवाय खोने के कुछ भी नहीं है, पाना कुछ भी नहीं है। खोना ही पाना है, बस। उपासक कौन होना चाहेगा? इसलिए कृष्ण को मानने वाले भी साधक हो जाते हैं। कृष्ण के मानने वाले भी साधना की भाषा बोलने लगते हैं। क्योंकि वह भीतर जो अहंकार है, वह साधना की भाषा बुलवाता है। वह कहता है, साधो! पाओ! पहुंचो! उपासना बड़ी कठिन बात है, आरडुअस। इससे ज्यादा कठिन कोई बात नहीं है—पिघलो, मिटो, खो जाओ।

-ओशो
पुस्तकः कृष्ण स्मृति
प्रवचन नं.12 से संकलित
(पूरा प्रवचन एम.पी.थ्री. पर भी उपलब्ध है।)