Osho World Online Magazine :: December 2011
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ध्यान और सृजनात्मकता

प्रश्न: ध्यान की गहराई जैसे-जैसे बढ़ रही है, वैसे-वैसे प्राणों में जैसे अनेक गीत फूट पड़ने को मचल उठे हों! क्या करूं?

ध्यान की गहराई बढ़ेगी तो झरने फूटेंगे। ध्यान की गहराई बढ़ाते ही किसलिए हैं? इसीलिए कि झरने फूटें। ध्यान की गहराई की आकांक्षा ही क्यों है? ताकि भीतर छिपा हुआ गीत प्रकट हो। ताकि पैरों में अगर कोई नृत्य छिपा हो तो अभिव्यक्त हो जाए। ताकि प्राणों में अगर कोई सुवास सोई पड़ी हो तो जाग जाए। ताकि तुम जो होने को हो, हो जाओ। ताकि तुम ऐसे ही बीज की तरह बंद न रह जाओ, कमल की तरह खिल जाओ।

शुभ हो रहा है। अब यह मत पूछो कि क्या करूं? अब तो भीतर से ही आवाज आ रही है, तो गाओ, नाचो। जो भी रूप तुम्हारी सृजनात्मकता लेना चाहे, उसे लेने दो।

मेरे हिसाब में सृजनात्मकता ही सेवा हैं। कुछ करो, कुछ ऐसा, जिसमें तुम्हारे प्राण तृप्त हों। और जरूर तब औरों के भी प्राण तृप्त होंगे। अगर तुम्हारी परम संतुष्टि से कुछ निकलेगा, बहेगा, तो दूसरे के जीवन में भी संतोष की झलक आएगी, हवा आएगी, झोंका आएगा। तुम्हारे भीतर दीया फूट पड़ने को तैयार है, रोशनी फैलने को उत्सुक है, फैलने दो, कृपणता न करना, कंजूसी न करना!

चेतना, जरूर तेरे मन में कहीं कोई कंजूसी होगी!

हम जिंदगी भर कंजूसी सीखते हैं। कृपणता हमारे जीवन का अर्थशास्त्र है। कुछ भी हो, छिपा लो। जल्दी से जमीन में गाड़ दो, किसी को पता न चल जाए, कि कोई चुरा न ले, कि कोई छीन न ले, कि कोई मांगने ही न आ जाए, कि संकोचवशात किसी को देना ही न पड़े। हमारी आदतें चोरी की हैं, और हम चोरों के बीच रहते हैं। हमारी आदतें मागने की हैं, और हम मंगनों के बीच रहते हैं। और हमारी आदतें छिपाने की हैं, क्योंकि चारों तरफ संकट ही संकट है। ये आदतें, जब भीतर के जगत का द्वार खुलता है, तब भी एकदम से छूट नहीं जाती, कई दिन तक पीछा करती हैं। भीतर के आनंद का अर्थशास्त्र अलग है-बांटो तो बढ़ता है, रोको तो घटता है। लेकिन पुरानी आदतें ये हैं कि रोको! बचाओ! सम्हाल कर रखो! कुछ बिखर न जाए, कुछ खो न जाए!

इसलिए प्रश्न उठा है कि क्या करूं? नहीं तो प्रश्न की बात ही कहां? नाचने की मौज आ गई, नाचो! वृक्ष तो नहीं पूछते। जब हवाएं आती हैं, वृक्ष नाचते हैं। और फूल तो नहीं पूछते। जब खिलते हैं, तो सुवास उड़ती है। और तारे तो नहीं पूछते। रात होती है और रोशनी बरसती है।

ध्यान की गहराई बढ़ेगी तो अभिव्यंजना की शक्ति भी बढ़ेगी। ध्यान की गहराई का सबूत ही एक है कि तुम्हारे भीतर सृजनात्मकता पैदा हो। तुम्हारे भीतर कुछ करने, कुछ प्रगट होने का एक प्रगाढ़ संकल्प उठे-ऐसा कि जिसे तुम रोक भी न पाओ।

आज बरसों बाद पीतम मिल गए जीवन डगर में।
मृत मनोरथ के सुमन ये खिल गए जीवन डगर में।

वे धुएं के तूल से छाए हुए थे सजन बादल,
झर रहा था गगन के हिय से मगन यौवन-लगन-जल;
      उन दुखद रिमझिम-क्षणों में
      शून्य पंकिल पथ-कणों में
हार से, मनुहार से पिय मिल गए जीवन डगर में।

भर गया आकंठ हिय-तल, ललक उमड़ा नयन का जल
कर उठा नर्तन हृदय का कमल विकसित मुदित पल-पल
      उस सिहरते नीम नीचे
      झुक दृगों ने चरण सींचे
नेह-रस-वश अधर उनके हिल गए जीवन डगर में
आज बरसों बाद पीतम मिल गए जीवन डगर में।

ध्यान गहरा होगा तो प्रीतम मिलेगा। ध्यान गहरा होगा तो प्यारा करीब आएगा। नाचोगे नहीं! गीत न गाओगे! वंदनावार न सजाओगे! दीपमालिका न बनाओगे! पूछना क्या है? ध्यान की गहराई प्यारे को करीब लाने लगी, उसकी पगध्वनि सुनाई पड़ने लगी, अब नाचे बिना न बनेगा! नाचना ही होगा! और नाचना कुछ सीखना नहीं है। यह कोई नाच नर्तकी का नाच नहीं है कि सीखने जाना पड़े। ये गीत जरूरी नहीं हैं कि मात्राओं और छंदों में आबद्ध हों।

मैं तुम्हें कोई कवि बनने को नहीं कह रहा हूं, मैं तुम्हें ऋषि बनने को कह रहा हूं। फूटने दो गीतों को। जैसे फूटना चाहें-सहज, नैसर्गिक। जरूरी नहीं है कि तुम मात्रा, छंद और व्याकरण बिठाओ, कि उसमें समय गंवाओ। उन व्यर्थ कामों में मत उलझ जाना। जब गीत भीतर पैदा होता है, तो अपना रास्ता खुद बना लेता है। तुम सिर्फ मार्ग दो, सहयोग दो, वह गा लेगा, वह अपने को गा लेगा। जब पानी खूब भर जाता है सरोवर में, तो बहेगा, ऊपर से बह लेगा और अपना रास्ता खोज लेगा सागर तक। किसी को रास्ता बनाना नहीं पडेगा।

तो तुम कुछ इस चिंता में मत पड़ना कि अब कैसे गीत गाया जाए? कैसे नाचा जाए? न मुझे संगीत आता, न कविता आती, न कभी छंद सीखे। फिकर छोड़ो! कोई पैरों में घूंघर बांधने की भी जरूरत नहीं है, जब आत्मा गीतों से भरी हो, तो मात्रा और छंद की कौन फिकर करता है?

लेकिन तुम्हारे प्राणों में कुछ रहा है, तो बहेगा।
आज मेरे प्राण में स्वर
भर गया कोई मनोहर।
क्षितिज के उस पार से वह मुस्कुराता पास आया
मधुर मोहक रूप में उस मूर्ति ने मुझको लुभाया
कौन सा सन्देश लेकर सजनि, वह आया अवनि पर?
आज मेरे प्राण में स्वर
भर गया कोई मनोहर।
घुल गई थी प्राण में अपमान की भीषण व्यथा
ले गया वह साथ अपने दुख भरी बीती कथा
आंख में आया सजनि, वह आज मेरे अश्रु बन कर।
आज मेरे प्राण में स्वर
भर गया कोई मनोहर।
कर गया अनुरोध मुझसे गीत गाऊं मैं मधुर सा
भूल जाऊं जन्म का दुख, मृत्यु को समझूं अमरता
यह अमर उपदेश उसका सजनि, कण-कण में गया भर!
आज मेरे प्राण में स्वर
भर गया कोई मनोहर।
स्वप्न से ही भर गया अलि, आज मेरा जीर्ण अंचल
वेदना की वह्नि में तप हो उठे हैं प्राण उज्जवल
दे गया वह सजनि मुझको जन्म का वरदान सुंदर!
आज मेरे प्राण में स्वर
भर गया कोई मनोहर।

तुम तो बांस की पोंगरी हो जाओ, चेतना! गाना है उसे तो गाएगा। नाचना है उसे तो नाचेगा। छोड़ दो उसकी मर्जी पर सब। मुझसे मत पूछो कि क्या करूं? यह प्रश्न करने का नहीं है। तुम्हारे किए से तो सब गड़बड़ हो जाएगा। तुमने कुछ किया, तो वह जो सहज स्वस्फूर्त है, कृत्रिम हो जाएगा। तुमने उसे मार्ग दिया, तुमने उसे राह सुझाई, तुमने काट-पीट की, तुमने हिसाब-किताब बिठाया--सब सौंदर्य नष्ट हो जाएगा।

एक ईसाई पादरी अपना प्रवचन तैयार कर रहा था। कल आने वाला रविवार है और कल रविवार को उसे प्रवचन देना है, बड़ा कोई धार्मिक उत्सव है, वह अपना प्रवचन तैयार करने में लगा था। उसका छोटा बेटा पास ही बैठा था। वह देख रहा था।

छोटे बच्चों के पास एक बुद्धिमत्ता होती है जो बूढो के पास भी खो जाती है। जिंदगी भर की धूल इतनी जम जाती है कि बुद्धिमत्ता खो जाती है। छोटे बच्चों के पास एक निखार होता है, एक दृष्टि होती है, एक भोलापन होता है, एक सरलता होती है, एक निष्कपटता होती है।

उस छोटे बच्चे ने कहा, पिताजी, एक बात उठती है मेरे मन में। आप हमेशा कहते हैं-पिछले रविवार को भी आपने कहा था चर्च में-कि मैं जो शब्द बोल रहा हूं ये मेरे नहीं हैं, ये परमात्मा के हैं।

तो पिता ने कहा, निश्चित। मैं उसके ही शब्द दोहराता हूं।

तो उस बेटे ने कहा, फिर एक सवाल उठता है आप जो प्रवचन लिख रहे हैं, इसमें इतनी काट-पीट क्यों कर रहे हैं? अगर ये शब्द उसके हैं, तो आप कौन हैं काट-पीट करने वाले? और अगर आप काट-पीट कर रहे हैं, तो ये शब्द उसके कैसे रहे?

यह बात मुझे प्रीतिकर लगी, उस छोटे से बच्चे ने बड़ा महत्वपूर्ण सवाल उठायाः आप काट-पीट करने वाले कौन हैं? उतरने दो उसे-जैसा उतरता हो, जिस भंगिमा में, जिस मुद्रा में; जैसी उसकी मर्जी।
चेतना, तू पूछती है: ‘मैं क्या करूं?’

तुझे कुछ नहीं करना है। तुझे बीच से हट जाना है। बस इतना ही करना है। बिलकुल हट जाना है। ध्यान की गहराई बढ़ रही है, और गहराई बढे़गी, तू बिलकुल बीच से हट जा! और जो होता हो, होने दो।

मगर नहीं, खोपड़ी लौट-लौट कर कहती है: कुछ करो! ऐसे छोड़ मत देना, उन्माद हो जाएगा, पागलपन हो जाएगा। बीच रास्ते पर समझो कि गीत उठ आया, कि बीच रास्ते पर नाच शुरू हो गया...वैसा हुआ है! तो बुद्धि कुछ एकदम गलत कहती है, ऐसा भी नहीं। मीरा ऐसे ही तो नाच उठी बीच रास्तों पर। सब लोकलाज खोई रे। मीरा भी सोच सकती थी कि कहां नाचना, कहां नहीं नाचना! बीच बाजारों में नहीं नाचना। मगर नहीं, छोड़ दिया उसकी मर्जी पर! फिर जहां उसने नचाया। फिर हम उसके हाथ की कठपुतली हो गए। अब वह बीच बाजार में नचाए, तो मीरा कैसे कहे नहीं? अब लोकलाज जाती हो तो जाए। लोकलाज बच-बच कर भी क्या बचता है हाथ में? एक दिन मौत आती है, मुंह में राख भर रह जाती है, सब मिट्टी में मिल जाता है। लोकलाज में रखा भी क्या है?

यह भी मत सोचना कि मेरे गीत पसंद के पूछने की बातें नहीं हैं। प्रशंसा मिलेगी या नहीं मिलगी?

ये सब बाते व्यर्थ हैं। ये संन्यासी के पूछने की बातें नहीं हैं। प्रशंसा मिले कि अपमान, और सिंहासन मिले कि सूली, संन्यासी का तो सीधा, साफ-सुथरा व्यवहार है। वह यह है कि जो वह करवाएगा, वही करेंगे। जहां ले जाएगा, वहीं जाएंगे। दुनिया पागल समझे तो पागल समझे। दुनिया बुद्धिमान समझे तो बुद्धिमान समझे। न तो दुनिया के बुद्धिमान समझने से तुम बुद्धिमान होते हो, न दुनिया के पागल समझने से तुम पागल होते हो। तुम जो हो उसका निर्णय, परमात्मा क्या समझता है, इस पर आधारित है। तुम्हारा अंतिम निर्णय उसके और तुम्हारे बीच होना है। वही होने दो निर्णय उसी को निर्णायक होने दो। वही एक मालिक निर्णय लेगा। कि तुम्हारे गीत गाने योग्य थे या नहीं। और अगर तुमने उसे ही गाने दिया, तो स्वभावतः वे गाने योग्य हैं ही।

ध्यान बढ़ता है तो सृजनात्मकता स्वभावतः बढ़ती है। मैं तो इसे कसौटी मानता हूं। अगर ध्यान बढ़ने से कोई बिलकुल सुस्त, काहिल, निष्क्रिय, अकर्मण्य बैठ जाए, तो समझना ध्यान नहीं बढ़ा। ध्यान के नाम से सिर्फ आलस्य को आरोपित कर लिया है। तो समझना यह ध्यान नहीं है, सिर्फ काहिली है, सुस्ती है, तामस है।

ध्यान होगा तो ऊर्जा प्रकट होगी। किस रंग में, किस ढंग में, इसका कोई निर्णय बाहर से नहीं हो सकता। मीरा नाचेगी, बुद्ध बोलेंगे, महावीर चुप खड़े रहेंगे। क्या होगा, क्या रूप होगा-कोई भी नहीं जानता। उस रूप की कोई भविष्यवाणी नहीं हो सकती है। पर एक बात सुनिश्चित है कि ध्यान गहरा होगा तो कुछ होगा-कुछ अपूर्व, कुछ अद्वितीय।

-ओशो
प्रेम पंथ ऐसो कठिन