Osho World Online Magazine :: December 2011
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ध्यान-विधि
ध्यान: जब द्रष्टा ही दृश्य बन जाए

संसार भर में बहुत से यंत्र विक​िसत किए जा रहे हैं, जो दावा करते हैं कि वे तुम्हें ध्यान दे सकते हैं; तुम्हें बस इयरफोन लगाकर विश्राम करना है, और दस मिनट के भीतर तुम ध्यान की अवस्था में पहुंच जाओगे।

यह नितांत मूढ़ता है, परंतु तकनीकी लोगों के मन में यह विचार क्यों आया, इसके पीछे भी एक कारण है। जाग्रत अवस्था में मन एक विशेष आवृत्ति की तरंग में कार्य करता है। जब वह स्वप्न में होता है तो एक भिन्न तरंग-लंबान में कार्य करता है। लेकिन इनमें से कोई भी ध्यान नहीं है।

हजारों वर्षों से हमने ध्यान को तुरीय कहा है-‘‘चौथा’’। जब तुम गहनतम निद्रा के पार चले जाते हो और फिर भी जाग्रत होते हो, तो वह जागरण ध्यान है। वह कोई अनुभव नहीं है; वह तो तुम्हीं हो, तुम्हारा होना है।

लेकिन सही हाथों में ये उच्च तकनीक से बने यंत्र उपयोगी हो सकते हैं। वे तुम्हारे म​िस्तष्क में ऐसी तरंगें पैदा करने में मदद दे सकते हैं कि तुम विश्रांत अनुभव करने लगो, जैसे कि आधे सोए हो...विचार बिदा होने लगते हैं और एक क्षण आता है जब तुम्हारे भीतर सभी कुछ शांत हो जाता है। वही क्षण है जब वे तरंगें गहन निद्रा वाली तरंगें होती हैं। तुम्हें इस गहन निद्रा का बोध नहीं होगा, परंतु दस मिनट के बाद जब तुम्हें यंत्र से हटाया जाएगा तो तुम उसके प्रभाव देखोगे : कि तुम ​िस्थर, निश्चल और शांत हो गए हो; कोई चिंता नहीं रही, कोई तनाव नहीं रहा; जीवन अधिक प्रफुल्ल और आनंदमय लगने लगा है। व्यक्ति को ऐसा लगता है जैसे उसने कोई अंतर्स्नान कर लिया हो। तुम्हारा सारा अंतस शांत और शीतल हो जाता है। यंत्रों के साथ चीजें बहुत सुनिश्चित हो जाती हैं क्योंकि वे तुम्हारे किसी .त्य पर निभर नहीं करती। यह ऐसे ही है जैसे संगीत सुनना : तुम शांत और लयबद्ध अनुभव करते हो। वे यंत्र तुम्हें तीसरी अवस्था-गहन निद्रा, स्वप्नरहित निद्रा तक ले जाएंगे।

लेकिन यदि तुम सोचो कि यही ध्यान है, तो तुम गलत हो। मैं कहूंगा, यह एक अच्छा अनुभव है, और जब तुम गहन निद्रा के क्षण में पहुंचो, और जब मन अपनी तरंगें बदलना शुरू करे, तो यदि शुरू से ही तुम जाग्रत रह सको...तुम्हें अधिक सचेत, जागरूक और सजग होना होगा कि क्या हो रहा है, और तुम पाओगे कि मन धीरे-धीरे सोता जा रहा है। और यदि तुम मन को सोते हुए देख सको...जो मन को सोते हुए देख रहा है वह तुम्हारी स्व-सत्ता है, और वही हर प्रामाणिक ध्यान का लक्ष्य है।

ये यंत्र उस सजगता को पैदा नहीं कर सकते। वह सजगता तो तुम्हीं को निर्मित करनी होगी, परंतु ये यंत्र दस मिनट के भीतर एक ऐसी संभावना निश्चित ही निर्मित कर सकते हैं जो तुम वर्षों के प्रयास में भी निर्मित न कर पाते।

तो मैं इन तकनीकी यंत्रों के विरुद्ध नहीं हूं, मैं उनके पक्ष में हूं। मैं तो बस इतना ही चाहता हूं कि जो लोग संसार भर में उन यंत्रों का प्रसार कर रहे हैं, वे यह जान लें कि वे शुभ कार्य कर रहे हैं, परंतु वह अधूरा है। वह तभी पूरा होगा जब गहन मौन में उतरा हुआ व्यक्ति सजग भी हो, जैसे होश का छोटा-सा दीया जलता चला जाए। सब कुछ विलीन हो जाता है, सब ओर अंधकार, मौन और शांति है-लेकिन होश की एक अचल ज्योति जल रही है।

तो यदि वह यंत्र सही हाथों में हो और लोगों को ​िसखाया जा सके कि वास्तविक चीज यंत्र से नहीं आएगी, तो यंत्र वह अनिवार्य भूमि निर्मित कर सकते हैं जिस पर वह ज्योति विक​िसत हो सकती है। लेकिन ज्योति तुम पर निर्भर करती है, यंत्र पर नहीं।

तो, एक ओर तो मैं उन यंत्रों के पक्ष में हूं और दूसरी ओर मैं उनके बहुत विरोध में भी हूं, क्योंकि बहुत से लोग सोचेंगे, ‘‘यही ध्यान है,’’ और वे भ्रम में पड़ जाएंगे। ये यंत्र बहुत नुकसान पहुंचाएंगे, पर शीघ्र ही वे पूरे विश्व में फैल जाएंगे। और वे बहुत सरल हैं-उनमें बहुत कुछ नहीं है। बस एक विशेष प्रकार की तरंगें पैदा करने का प्रश्न है। संगीतज्ञ उन यंत्रों से सीख सकते हैं कि वे किस प्रकार की तरंगें लोगों में पैदा करते हैं, और उन तरंगों को वे अपने वाद्यों से निर्मित करना शुरू कर सकते हैं। उन यंत्रों की जरूरत नहीं है, संगीतज्ञ तुम्हारे लिए उन तरंगों को पैदा कर सकते हैं, और तुम निद्रा में उतरने लगोगे! परंतु यदि तुम गहनतम निद्रा में भी जाग्रत रह सको, जब तुम देखो कि बस एक और कदम और तुम अचेतन हो जाओगे, तो तुमने एक रहस्य जान लिया। उस यंत्र का बड़ा संुदर उपयोग हो सकता है।

और यही बात संसार के सब यंत्रों के विषय में सत्य है : सही हाथों में उन्हें मनुष्यता के अपार कल्याण के लिए उपयोग में लाया जा सकता है। गलत हाथों में वे अवरोध बन जाते हैं। और दुर्भाग्य से, बहुत से गलत हाथ हैं...।

लेकिन यह ध्यान नहीं है, यह तो मात्र उन तरंगों का परिवर्तन है जो तुम्हारे चारों ओर वातावरण में सतत प्रवाहित हो रही हैं। एक अनुभव की तरह यह निश्चित ही उपयोगी होगा; वरना बहुत से लोगों के लिए तो ध्यान केवल एक शब्द ही रहता है। वे सोचते हैं कि कभी ध्यान करेंगे। और यह संदेह भी बना रहता है कि कोई ध्यान करता भी है या नहीं?

लेकिन पश्चिम का मन यांत्रिक है, उनका .ष्टिकोण यांत्रिक है; वे हर चीज को यंत्र तक ले आना चाहते हैं-और इसमें वे सक्षम भी हैं। लेकिन कुछ ऐसी चीजें हैं जो यंत्रों की क्षमता के पार हैं। होश किसी भी यंत्र से पैदा नहीं किया जा सकता; वह किसी भी आधुनिक तकनीक की संभावना के पार है। लेकिन टेक्नालॉजी जो तुम्हें दे सकती उसे निश्चित रूप से उपयोग किया जा सकता है। ध्यान में छलांग लेने के एक सुंदर माध्यम की भांति उसका उपयोग हो सकता है।

और एक बार तुम्हें होश का स्वाद लग जाए, शायद कुछ बार और यंत्र सहयोगी हो सकता है ताकि तुम्हारा होश अधिकाधिक स्पष्ट हो जाए, कि तुम्हारा होश यंत्र-निर्मित मौन से अधिकाधिक विच्छिन्न हो जाए। और फिर तुम्हें यह प्रयोग यंत्र के बिना शुरू करना चाहिए। एक बार तुमने यंत्र के बिना करना सीख लिया, तो यंत्र तुम्हारे लिए परम सहयोगी हुआ।

तुम अनुभव नहीं हो

तुम्हारे द्वारा ही नहीं सबके द्वारा स्मरण रखने योग्य एक अत्यंत मूलभूत सूत्र यह है कि तुम्हारी अंतर्यात्रा में जो कुछ भी मार्ग में आए, वह तुम नहीं हो।

तुम तो वह हो जो इन सबका साक्षी है-चाहे वह शून्य हो, कि आनंद हो, कि मौन हो। लेकिन एक बात स्मरण रखने की है-कि कैसे भी सुंदर और विस्मयकारी अनुभव से तुम गुजरो, तुम वही नहीं हो। तुम तो वह हो जो उनका अनुभव कर रहा है, और यदि तुम बढ़ते चले जाओ, बढ़ते ही चले जाओ-तो यात्रा का परम बिंदु वह है जहां कोई अनुभव नहीं बचता-न तो मौन, न आनंद, न शून्य। तुम्हारे लिए विषय जैसा कुछ भी नहीं बचता, बस तुम ही अपने चैतन्य में बच रहते हो। दर्पण रिक्त हो गया। वह कुछ भी प्रतिबिंबित नहीं कर रहा। यह तुम हो।

अंतर्जगत के बड़े-बड़े साधक भी सुंदर अनुभवों में अटक गए हैं। वे यह सोचकर उन अनुभवों से तादात्म्य बना लिए हैं, ‘‘कि मैंने स्वयं को पा लिया।’’ वे उस अंतिम अवस्था पर पहुंचने से पहले ही रुक गए जहां सब अनुभव समाप्त हो जाते हैं।

संबोधि कोई अनुभव नहीं है। यह तो वह अवस्था है जहां तुम नितांत अकेले रह जाते हो, कुछ भी जानने को नहीं रहता। कोई भी विषय-कैसा ही सुंदर क्यों न हो-नहीं बचता। उसी क्षण में तुम्हारी चेतना, किसी भी विषय से निर्बाध होकर, मुड़ती है और स्रोत की ओर लौट जाती है। वह आत्मानुभूति बन जाती है। वह बुद्धत्व बन जाती है।

मैं तुम्हें ‘विषय’-आब्जेक्ट-शब्द के बारे में बताऊं। हर विषय का अर्थ है अवरोध। इस शब्द ही का अर्थ है-अवरोध, बाधा।

तो विषय तुमसे बाहर, पदार्थ जगत में भी हो सकता है, और तुम्हारे भीतर तुम्हारे मान​िसक जगत में भी हो सकता है; विषय तुम्हारे हृदय में, भावनाओं में, भावावेगों में, भावुकताओं में, भावदशाओं में भी हो सकता है। और विषय तुम्हारे आध्यात्मिक संसार में भी हो सकते हैं। और वे इतने आनंददायी होते हैं कि इससे अधिक कुछ हो सकता है, व्यक्ति इसकी कल्पना भी नहीं कर सकता। और संसार के बहुत से संत आनंद पर रुक गए हैं। भले ही वह दशा सुन्दर हो, मनोरम हो, परंतु वे अभी घर नहीं पहुंचे।

जब तुम ऐसे बिंदु पर पहुंचते हो जब सारे अनुभव विदा हो जाते हैं, कोई विषय नहीं रहता, तब चेतना निर्बाध हुई एक वर्तुल में गति करती है-अ​िस्तत्व में हर चीज, यदि निर्बाध हो तो, वर्तुल में ही गति करती है-वह तुम्हारी स्व-सत्ता के स्रोत से आती है, और चारों ओर फैल जाती है। कोई बाधा न पाकर-न कोई अनुभव, न विषय-वह वापस लौट आती है। और चेतना स्वयं विषय हो जाती है। यही तो जे. .ष्णमूर्ति अपने जीवन भर कहते रहे : जब द्रष्टा ही .श्य बन जाए तो जानना कि तुम पहुंच गए। उससे पहले मार्ग में हजारों चीजें आती हैं। शरीर अपने अनुभव देता है, जो कुंडलिनी के चक्रों के अनुभव की भांति जाने जाते हैं; सात केंद्र सात कमल बन जाते हैं। हर कमल पहले से विशाल और उच्चतर होता है, और उसकी सुरभि मादक होती है। मन तुम्हें गहन आयाम देता है-असीम और अनंत। लेकिन यह मूलभूत सूत्र याद रखना कि ‘घर’ अभी भी नहीं आया है।

यात्रा का आनंद लो और मार्ग में वृक्षों, पर्वतों, पुष्पों, सरिताओं, सूर्य, चांद और तारों के जो .श्य आएं उनका भी आनंद लो-लेकिन जब तक तुम्हारी चेतना ही अपना विषय न बन जाए, तब तक कहीं भी रुको मत। जब द्रष्टा ही .श्य बन जाता है, जब ज्ञाता ही ज्ञात हो जाता है, जब देखने वाला ही देखा गया बन जाता है, तो घर आ पहुंचा।

यही घर वह वास्तविक मंदिर है जिसकी हम जन्मों से खोज करते रहे हैं, पर हम भटक जाते हैं। हम सुंदर अनुभवों से संतुष्ट हो जाते हैं।

साहसी साधक को वे सभी सुंदर अनुभव पीछे छोड़ देने होंगे, और बढ़ते चले जाना होगा। जब सभी अनुभव समाप्त हो जाते हैं और वह अपने ही एकाकीपन में बच रहता है...तो कोई आनंद इससे बड़ा नहीं है, कोई आह्लाद इससे अधिक आहदमय नहीं है, कोई सत्य इससे अधिक सत्यतर नहीं है। तुम उसमें प्रवेश कर गए जिसे मैं भगवत्ता कहता हूं, तुम एक भगवान हो गए।

-ओशो
ध्यानयोग : प्रथम और अंतिम मुक्ति