Osho World Online Magazine :: December 2011
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मेरा संन्यास रूपांतरण है

प्रश्न: ओशो, संन्यास की पुरानी धारणा और आपके संन्यास में मौलिक भेद क्या है?

संन्यास की पुरानी धारणा जीवन-विरोधी थी। मेरा संन्यास जीवन के प्रति अनुग्रह, प्रेम और आनंद-उत्सव है। पुराना संन्यास निषेधात्मक था, नकारात्मक था। ठीक से कहूं तो पुराना संन्यास नास्तिक था। मेरा संन्यास आस्तिक है।

पुराना संन्यास अहंकारी था। त्याग जितना अहंकार देता है, मनुष्य को उतना कोई और चीज नहीं दे सकती। भयंकर अहंकार जन्म पाता है। लात मार दी लाखों रुपयों पर, पद पर, प्रतिष्ठा पर, सम्मान पर, सत्कार पर, संसार पर; मुंह फेर लिया सबसे; जहां सब भागे जा रहे हैं कीड़े-मकोड़ों की तरह, वहां से मैं हट आया हूं। पुराना संन्यास तुम्हें अहंकार का एक शिखर बना देता था।

छोड़ना कोई गुण नहीं है। निर्माण क्या किया? यह गुण होगा। उसने लाख रुपए छोड़े हों, तो भी मैं गुण नहीं मानता। और एक कविता बनाई हो या एक सुंदर चित्र रंगा हो या एक चित्र भी रंगा, या एक प्यारा बगीचा लगाया हो, दो फूल खिलाए हों, तो मेरे लिए ज्यादा मूल्य है। लाख रुपए छोड़ दिए, इससे क्या होता है। करोड़ों रुपए पैदा करने की कोई विधि निकाली हो, कोई तकनीक, कोई टेक्नालाजी खोजी हो, कोई विज्ञान दिया हो, तो मूल्य है।

पुराना संन्यास दमन था। मेरा संन्यास रूपांतरण है। पुराना संन्यास भगोड़ापन था। मेरा संन्यास जीवन को जीने की कला है। मैं चाहता हूं, तुम जहां हो वहीं इस ढंग से जिओ कि तुम्हारा जीवनकमल खिल सके। पुराना संन्यास सरल है। मेरा संन्यास कठिन है। हालांकि लोग तुमसे उल्टी ही बात कहेंगे, वे कहेंगे मैंने संन्यास को सरल बना दिया। उनके लिहाज से ठीक ही है, क्योंकि मैं तुमसे बाल नोंचने को नहीं कहता, मैं कहता हूं, बाल कटवाने हों तो जाकर नाई से कटवा लेना। अगर नाई से कटवाने में तुम्हें बहुत अड़चन होती हो कि इसमें परालंबन हो जाएगा, तो अपने घर ही रेज़र रखना, खुद ही बना लेना अपने हाथ से। इस लिहाज से लग सकता है मेरा संन्यास सरल है। लेकिन यह बात सरल नहीं है। मेरा संन्यास अति कठिन है। क्योंकि मैं तुमसे कह रहा हूं, बीच बाजार में शांत हो जाओ।

और जो बीच बाजार में शांत हो गया, वह कहीं भी शांत रहेगा। उसे तुम नरक में भी भेज दो तो वह स्वर्ग में रहेगा। उसे तुम नरक भेज ही नहीं सकते। मेरे संन्यासी के मन को डोलाया नहीं जा सकता। कोई अप्सरा उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकती। मेरे इतने संन्यासी हैं, एक लाख संन्यासी हैं, अनेक से मैं पूछता हूं कि भई, अप्सरा वगैरह आयीं? कहते हैं, अभी तक तो नहीं आयीं। वे आएंगी ही नहीं। उनके आने के लिए पहली बुनियादी बात चाहिएः दमित चित्त। मैं चूंकि दमन नहीं सिखा रहा हूं, इसलिए इस तरह की मूढ़तापूर्ण कल्पनाएं, रुग्ण, विक्षिप्त कल्पनाएं पैदा भी नहीं होंगी।

देख सहज श्रृंगार तुम्हारा,
संन्यासी मन डोल न जाए!
संन्यासी मन डोल न जाए!!
मैं वह सुख-सपना अनदेखा-
निखर गया जो दर्द-महल में,
मैं ऐसा सूरज अनजनमा-
डूब गया जो उदयाचल में;
अवरोधों की अंधी आंधी,
कांप रहा तिनकों जैसा मन;
देख अलक-भ्रम-जाल तुम्हारा,
पीर-पखेरू बोल न जाए!
संन्यासी मन डोल न जाए!!

रूप-रतन के सुख-सागर में-
मैं अरूण को खोज रहा हूं,
संयम की नौका में तिरकर-
मैं अनूप को खोज रहा हूं;
अनथाही सरिता जीवन की,
अभी बहुत बाकी गहराई;
उफनाती आकर्षण-धारा
बांध हृदय का खोल न जाए!
संन्यासी मन डोल न जाए!!

कुछ न रहेगा मेरे पीछे,
जल पर मेरा नाम लिखा है;
मुरझाऊं खिलने से पहले,
यह मेरा परिणाम लिखा है;
महामोह की शून्य परिधि से-
घिरा-घिरा-सा उन्मन-उन्मन,
सम्मोहक उपकार तुम्हारा,
जीवन में रस घोल न जाए!
संन्यासी मन डोल न जाए!!

ये पुराने संन्यासी के संबंध में सच हो सकता है, मेरे संन्यासी के संबंध में नहीं। उसका मन डोल नहीं सकता। जिन चीजों से उसका मन डोल सकता है, मैं उनसे कह रहा हूं कि उनसे गुजरो! उनसे भागो मत! उनसे मुक्त होने का एक ही उपाय है, उनको जिओ। उनको भरपूर जी लो। वासना की व्यर्थता को अनुभव से देख लो। कामना की असारता को तुम्हारे रोएं-रोएं में, अंग-अंग में समा जाने दो। फिर तुम्हें कुछ भी डोला न सकेगा।

-ओशो
झरत दसहुं दिस मोती