Osho World Online Magazine :: December 2011
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नया मनुष्य: नयी मनुष्यता

प्रश्न: प्यारे सद्गुरु! आपके विद्रोह का संबंध ‘जोरबा-बुद्ध’ के साथ किस तरह से है?

मेरा विद्रोही नया मनुष्य ही ‘जोरबा-बुद्ध’ है। मनुष्यता अभी तक यह विश्वास करते हुए जीती आई है कि या तो आत्मा ही एकमात्र वास्तविकता है तथा संसार और पदार्थ एक भ्रम हैं अथवा पदार्थ ही वास्तविक है और आत्मा मात्र एक भ्रम है।

तुम अतीत की मनुष्यता को, अध्यात्मवादियों और पदार्थवादियों में विभाजित कर सकते हो, लेकिन किसी ने भी मनुष्य की वास्तविकता की ओर देखने की फिक्र ही नहीं की। वे दोनों एक साथ हैं। वे न तो केवल आध्यात्मिक हैं—वे केवल मात्र चेतना ही नहीं है और न वे केवल पदार्थ हैं। वह चेतना और पदार्थ के मध्य एक बहुत बड़ी लयबद्धता है अथवा पदार्थ और चेतना दो अलग चीजें न होकर एक ही वास्तविकता के दो पहलू हैं। पदार्थ चेतना के बाहर का भाग है और पदार्थ का आंतरिक भाग है चेतना। लेकिन अतीत में ऐसा एक भी दार्शनिक, ऋषि अथवा विद्रोही रहस्यदर्शी नहीं हुआ, जिसने इस एकता की घोषणा की हो: वे सभी मनुष्य को विभाजित करन के पक्ष में थे, जो एक भाग को सच्चा और दूसरे भाग को झूठा कहते थे। इसने पूरी पृथ्वी में एक ऐसा वातावरण उत्पन्न कर दिया, जहां मनुष्य के विचारों, भावों और कार्यों में कोई तारतम्य नहीं रह गया।

तुम केवल एक शरीर बनकर ही नहीं जी सकते। जीसस के कहने का भी यही अर्थ है, जब वह कहते हैं-‘मनुष्य अकेला रोटी से ही नहीं जी सकता।’ तुम अकेली चेतना बनकर भी नहीं जी सकते और न ही तुम बिना रोटी के जीवित रह सकते हो। तुम्हारे होने के दो आयाम हैं और दोनों आयामों को विकास का समान अवसर देकर दोनों को परिपूर्ण बनाना है। लेकिन अतीत एक आयाम के पक्ष में और दूसरे के विरोध में अथवा दूसरे के पक्ष में और पहले के विरोध में रहा है।

मनुष्य को उसकी समग्रता में स्वीकार नहीं किया गया है और इसने दुख और वेदना के घने अंधेरे की, हजारों वर्षों से, एक ऐसी रात उत्पन्न कर दी है जिसका लगता है जैसे कोई अंत है ही नहीं। यदि तुम शरीर की बात सुनते हो तो तुम स्वयं अपने को ही बुरा कहते हो और यदि तुम शरीर की बात नहीं सुनते हो तो तुम दुख भोगते हो क्योंकि तुम्हें भूख लगती है, प्यास लगती है और तुम्हें गरीबी के अभाव झेलने होते हैं। यदि तुम केवल चेतना की बात सुनते हो तो तुम्हारे विकास का संतुलन गड़बड़ा जाएगा: तुम्हारी चेतना का तो विकास होगा, लेकिन शरीर सिकुड़ जाएगा और संतुलन खो जाएगा और संतुलन में ही तुम्हारा स्वास्थ्य है, संतुलन में ही तुम्हारी समग्रता है, संतुलन में ही तुम्हारा आनंद, गीत और नृत्य है।

पश्चिम ने शरीर की बात सुनने का चुनाव किया और जहां तक चेतना की वास्तविकता का संबंध है, वह पूरी तरह बहरा बन गया। इसका अंतिम परिणाम है-विज्ञान और तकनीकी ज्ञान की अभूतपूर्व प्रगति और तुच्छ सांसारिक वस्तुओं से समृद्ध एक स्वतंत्र और उन्मुक्त समाज। इस प्रचुर समृद्धि के बीच, बिना आत्मा का गरीब मनुष्य पूरी तरह खो गया है-कोई जानता ही नहीं कि वह है कौन, वह है भी या नहीं है और कोई नहीं जानता कि वह है क्यों और किसी दुर्घटनावश कभी यह ख्याल आ जाता है कि ऐसी दुर्लभ किस्म का कोई मनुष्य होता भी है।

जब तक चेतना का विकास भौतिक जगत की समृद्धि के साथ-साथ नहीं होता, शरीर और पदार्थ बहुत अधिक भारयुक्त हो जाते हैं और आत्मा बहुत कमजोर बन जाती है। अपने ही आविष्कारों और खोजों के कारण तुम्हारे ऊपर बहुत अधिक भार है। वस्तुतः तुम्हारे लिए एक सुंदर जीवन निर्मित करने के स्थान पर वे एक ऐसा जीवन निर्मित करते हैं जिसे पश्चिम के सभी बुद्धिजीवियों द्वारा जीवन के अयोग्य अनुभव किया गया है।

पूरब ने चेतना का चुनाव किया है और पदार्थ की निन्दा की है। उनके अनुसार प्रत्येक भौतिक वस्तु जिसमें शरीर भी सम्मिलित है, एक माया है। एक भ्रम है, वह मरुस्थल में एक मृगतृष्णा के समान दिखाई देती है और जिसकी कोई वास्तविकता नहीं है। पूरब ने गौतम बुद्ध, महावीर, पतंजलि, कबीर, फरीद और रैदास जैसे लोग उत्पन्न किए और पूरी तरह होश से भरे हुए इन महान चेतना-पुरुषों की लम्बी शृंखला है। पर इसी ने उत्पन्न किया उन लाखों करोड़ों गरीबों को, जिनके पास न खाने को पर्याप्त अन्न, न पर्याप्त वस्त्र और न सिर छिपाने को छत है और जो कुत्तों की तरह भूखों मर रहे हैं।

बड़ी अजीब स्थिति है-पश्चिम में वे हर छः महीनों बाद अरबों डालर कीमत के दुग्ध उत्पाद और अन्य भोजन सामग्री आवश्कता से अधिक होने के कारण समुद्र में डुबो देते हैं। वे यह नहीं चाहते कि उनके गोदामों पर अतिरिक्त भार हो और वे अपने आर्थिक ढांचे को सुदृढ़ रखने के लिए उनकी कीमतें भी नहीं घटाना चाहते। एक ओर इथोपिया में एक हजार मनुष्य प्रतिदिन की दर से भूखों मर रहे हैं तो दूसरी ओर इसी वक्त यूरोप का साझा बाजार करोड़ों डालर का भोजन नष्ट कर रहा है। यह राशि भी उस भोजन सामग्री का मूल्य नहीं है, यह वह लगता है जो भोजन सामग्री को समुद्र तक ले जाने और उसे डुबोने में खर्च होती है। इस स्थिति के लिए जिम्मेदार कौन है?

पश्चिम का सबसे अधिक धनी व्यक्ति आत्मा की खोज कर रहा है और अपने को खाली पा रहा है। क्योंकि उसके पास केवल वासना है जिसमें प्रेम की कहीं कोई सुवास नहीं और उसके पास रविवारीय स्कूल में सीखे गए वे शब्द हैं जिन्हें वह तोते की तरह दोहराता है पर उस प्रार्थना में हृदय की पुकार और श्रद्धा नहीं। उसके पास कोई धार्मिकता नहीं, मनुष्य जाति की भलाई के लिए कोई भावना नहीं; पक्षियों, वृक्षों और पशुओं के प्रति, समस्त जीवन के प्रति कोई श्रद्धा नहीं और तभी विनाश इतना अधिक सरल है।

यदि मनुष्यों को पदार्थ मात्र ही न माना गया होता तो हिरोशिमा और नागासाकी में यह विनाश हुआ ही न होता। यदि ख्याल होता कि प्रत्येक मनुष्य में परमात्मा ही छिपा है तो इतने अधिक आणविक अस्त्र-शस्त्रों का ढेर इकट्ठा ही न किया गया होता और मनुष्य में छिपी परमात्मा की आभा को नष्ट करके, उसके शरीर को परमात्मा का मंदिर मानते हुए उसे प्रकाश में लाया जाता, लेकिन यदि मनुष्य केवल एक पदार्थ या वस्तु है, केवल भौतिक या रसायन शास्त्र ही है और वह यदि खाल से मढ़ा एक हड्डियों का ढांचा मात्र है, तब मृत्यु के साथ प्रत्येक वस्तु मर जाती है और कुछ भी शेष नहीं रह जाता। इसी वजह से यह संभव हो पाता है कि बिना किसी हिचक के एडोल्फ हिटलर साठ लाख व्यक्तियों की हत्या कर दे। यदि सभी व्यक्ति केवल पदार्थ ही हैं तो इस बारे में दोबारा सोचने का प्रश्न ही कहां उठता है?

पश्चिम ने अपनी आत्मा खो दी है, अपने आंतरिक स्वभाव को खो दिया है। अर्थहीनता, ऊब और वेदना से घिरे हुए वह स्वयं को ही नहीं खोज पा रहा है। विज्ञान की सभी सफलताएं अनुपयोगी सिद्ध हो रही हैं, क्योंकि घर प्रत्येक वस्तु से भरा हुआ है, लेकिन घर का मालिक ही खोया हुआ है। यहां पूरब में मालिक जो जीवित है, लेकिन घर पूरी तरह खाली है। भूखे पेटों और बीमार शरीरों के साथ जहां तुम्हारे चारों ओर मृत्यु घिरी हो, आनंद-उत्सव मनाते हुए ध्यान करना ही असंभव है। अनावश्यक रूप से इसीलिए हम लोगों ने इतना सब कुछ खो दिया है।

हमारे सभी संत, सभी दार्शनिक, अध्यात्मवादी और पदार्थवादी दोनों ही मनुष्य के विरुद्ध किए गए इस अपराध के प्रति उत्तरादायी हैं। जोरबा-बुद्ध होना ही इसका एकमात्र एकमात्र है। यह पदार्थ और आत्मा का संश्लेषण है। यह इस बात की घोषणा है कि अब पदार्थ और चेतना के बीच कोई संघर्ष ही नहीं है और हम दोनों तरह से समृद्ध बन सकते हैं। हमारे पास प्रत्येक वह वस्तु हो सकती है जो संसार हमें उपलब्ध करा सकता है, विज्ञान और तकनीकी ज्ञान से जिसे हम उत्पन्न कर सकते हैं और इसके साथ-साथ हमारे पास वह भी प्रत्येक चीज हो सकती है, जिसे कोई एक बुद्ध, कोई नानक और कोई एक कबीर अपने अंदर अस्तित्व में अनुभव करता है, जिसके अंदर परमानंद की खिलावट होती है, भगवत्ता की सुवास चारों ओर फैल जाती है और सर्वोच्च स्वतंत्रता से उड़ान भरने के लिए जिसे पंख मिलते हैं।

जोरबा-बुद्ध होना ही नया मनुष्य होना है और यही होता है-विद्रोही। उसका विद्रोह नष्ट करता है मनुष्य की वह मानसिकता जिसमें उसके विचारों, भावों और कार्यों मंे तारतम्यता नहीं होती, वह नष्ट करता है उसके अंदर का विभाजन और नष्ट करता है वह आध्यात्मिकता, जो पदार्थवाद के विरुद्ध है और इसके ही साथ उस भौतिकता को भी नष्ट करता है जो आध्यत्मिकता के विरुद्ध है।

उसका घोषणा पत्र है कि शरीर और आत्मा दोनों साथ-साथ हैं और पूरा अस्तित्व आध्यात्मिकता से आपूरित है, यहां तक कि पर्वत भी जीवंत हैं और वृक्ष भी संवेदनशील हैं और पूरे अस्तित्व में पदार्थ और चेतना दोनों एक साथ हैं अथवा केवल एक ऊर्जा ही है, जो दो रूपों में अभिव्यक्त हो रही है। जब ऊर्जा शुद्ध होती है वह अपने आपको चेतना के रूप में अभिव्यक्त करती है और जब वह अशुद्ध कच्चे रूप में सघन हो जाती है वह पदार्थ के रूप में दिखाई देती है, लेकिन पूरा अस्तित्व और कुछ भी नहीं, वरन् बस एक ऊर्जा-क्षेत्र है।

यह कोई तत्वज्ञान न होकर मेरा अपना अनुभव है और अब भौतिकशास्त्र और उसकी खोजों से भी इस बात की पुष्टि होती है कि अस्तित्व केवल एक ऊर्जा है।

हम मनुष्य को दोनों संसारों में साथ-साथ रहने की अनुमति दे सकते हैं। उसे दूसरा संसार पाने के लिए इस संसार को छोड़ने की जरूरत नहीं है और न उसे इस संसार का आनंद उठाने के लिए दूसरे संसार से इन्कार करना है। वास्तव में जब तुम दोनों संसारों को एक साथ पाने में समर्थ हो तो फिर केवल एक संसार के साथ अनावश्यक रूप से गरीब बनकर क्यों रहा जाए?

जोरबा-बुद्ध होना ही समृद्धतम संभावना है। वह सर्वाधिक अपने स्वभाव के अनुसार जीएगा और वह इस पृथ्वी के गीत भी गाएगा। न तो वह पृथ्वी को धोखा देगा और न आकाश के ही साथ दगा करेगा। इस पृथ्वी पर जो कुछ भी सुंदर और आनंददायक है, जैसे विविध रंगों के सुवासित फूल, वह उन सभी पर अपने अधिकार की घोषणा करेगा और साथ-ही-साथ आकाश में चमकते सितारे भी उसके ही होंगे। वह दावा करेगा कि यह पूरा अस्तित्व ही उसका अपना घर ही है।

अतीत का मनुष्य बहुत निर्धन था, क्योंकि उसने अस्तित्व को विभाजित कर दिया था। नया मनुष्य, मेरा विद्रोही जोरबा दि बुद्धा पूरे संसार को अपना घर होने का दावा करता है। इसमें जो कुछ भी है वह हमारा है और हमें हर संभव तरीके से इसका उपयोग करना है-बिना किसी अपराध-भाव के, बिना किसी संघर्ष के और बिना किसी चुनाव के। बिना किसी चुनाव के जितनी तुम्हारी शक्ति और सामर्थ्य हो, सभी पदार्थों का उपयोग करो और जितनी तुम्हारी शक्ति और योग्यता हो, उस सभी का जो चेतना में हैं, आनंद लो।
-एक जोरबा बनो लेकिन वहां रुको मत।
-बुद्ध बनने की ओर गतिशील होते रहो।
-जोरबा आधा है और बुद्ध भी आधे हैं।

-ओशो
एक नई मनुष्यता का जन्म