Osho World Online Magazine :: December 2011
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पुस्तक परिचय
सर्वसार उपनिषद
स्वर्ण मंदिर उभर आए जो लौट कर पीछे देखा कभी

‘‘उपनिषद शब्द का अर्थ होता है: गुरु के पास बैठ कर जो मिला--सिर्फ पास बैठ कर—उसकी सन्निकटता में, उसके सामीप्य में, उसके प्रति समर्पण में, उसके प्रेम में, उसके पास मिट कर, उसके पास अपने को भूल कर जो मिला।’’

‘‘सर्वसार उपनिषद का अर्थ है: जो भी आज तक जाना गया गुह्य ज्ञान है, इसोटेरिक नालेज  है, उसमें भी जो सारभूत है—जिसमें से रत्ती भर भी छोड़ा नहीं जा सकता, वैसा यह उपनिषद है।’’

‘‘इस एक उपनिषद को जान लेने से मनुष्य की प्रतिभा ने जो भी गहनतम जाना है, उस सबके द्वार खुल जाते हैं। इसलिए इसका नाम है: ‘सर्वसार’—दि सिक्रेट आफ दि सिक्रेट्स; गुह्य में भी जो गुह्य है और सार में भी जो सार है।’’

-ओशो

पुस्तक के कुछ मुख्य विषय-बिंदु:

1: प्रार्थना और समर्पण

2: जिज्ञासा: प्रार्थना के बाद

3: जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय--ये चार अवस्थाएं क्या हैं?

4: अन्नमय, प्राणायाम, मनोमय, विज्ञानमय, आनंदमय—ये पांच कोष क्या हैं?

5: शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध—ये पांच विषय सुख-दुख के कारण हैं।

6: क्या है सौंदर्य?

7: वासना और साक्षीभाव

ऋतु आये फल होय

जेन फकीरों पर ओशो द्वारा फरवरी, 1975 में अंग्रेजी में दिए गए 8 प्रवचनों (The Grass Grows By Itself) का हिंदी अनुवाद है यह पुस्तक।
अंग्रेजी से हिंदी में इस पुस्तक को अनुवाद किया है स्वामी ज्ञानभेद ने।
पुस्तक के प्रथम प्रवचन ‘जेन का महत्व क्या है?’ में ओशो समझाते हैं: ‘‘जेन है एक बहुत असाधारण विकास। बहुत थोड़े से असाधारण लोग ही ऐसी संभावना को यथार्थ में बदल पाते हैं।
क्योंकि इसमें बहुत से खतरे और उलझनें आती हैं। बहुत समय पूर्व जो एक संभावना अस्तित्व में थी, सौभाग्य से उसका आध्यात्मिक विकास हो सका--और जेन जैसी अनूठी चीज का जन्म हुआ। लेकिन कभी भी उसे समग्रता से समझा नहीं गया। मनुष्य की चेतना के पूरे इतिहास में केवल एक बाहर ही जे़न जैसी कोई चीज अस्तित्व में आई। ऐसा होना अति असाधारण है।
इसलिए पहले मैं तुम्हें यह समझाना चाहूंगा कि जेन है क्या? क्योंकि यदि तुम इसे समझे ही नहीं, तो यह प्रसंग अधिक सहायक न होंगे, तुम्हें इनकी पूरी पृष्ठभूमि जानना आवश्यक है।’’
ओशो की इस आनंदमयी दृष्टि के साथ हम आपको इन अमृत-वचनों की गंगा में डूबने का निमंत्रण देते हैं।