Osho World Online Magazine :: December 2011
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समन्वय का संगीत: विज्ञान और धर्म

मैं मौलिक रूपांतरण की बात कर रहा हूं। और सिर्फ बात ही नहीं कर रहा हूं, उस नये आदमी को पैदा करने की चेष्टा में लगा हूं। यह कोई शास्त्रार्थ नहीं है जो मैं चला रहा हूं। शास्त्रार्थ में मेरा रस ही नहीं है। मैं तो नया आदमी पैदा करने में लगा हूं। वही सबूत होगा, वही गवाह होगा कि मैं जो कहता हूं वह हो सकता है या नहीं? क्या एक ऐसा व्यक्ति पैदा किया जा सकता है, जो हिंदू न हो, मुसलमान न हो, ईसाई न हो, भारतीय न हो, पाकिस्तानी न हो, जापानी न हो, चीनी न हो?

किया जा सकता है! उसी का प्रयोग चल रहा है। मेरा संन्यासी विश्व का नागरिक है। उसकी कोई और राष्ट्रीय मान्यता नहीं है। उसका कोई चर्च नहीं है, कोई संप्रदाय नहीं है। वह समस्त चर्चों और संप्रदायों से मुक्त व्यक्ति है। और मेरा संन्यासी जीवन को दंड नहीं मानता है, अनुग्रह मानता है। और मेरा संन्यासी आवागमन से मुक्त नहीं हो जाना चाहता है।

मेरा संन्यासी अपनी कोई चाह नहीं रखता है; परमात्मा जैसे जिलाए उसमें राजी है-जो उसकी मर्जी!

और मेरा संन्यासी जीवन के किन्हीं भी अंगों का तिरस्कार नहीं करता है। मेरा संन्यासी जीवन की समग्रता को स्वीकार करता है और उस समग्रता को जीने की चेष्टा करता है। मेरा संन्यासी चेष्टा में संलग्न है कि उसके भीतर कोई भी अंग निषिद्ध न हो। क्योंकि जो भी अंग हम निषिद्ध करते हैं, वह अंग बदला लेता है। अगर कामवासना का निषेध करोगे, तो कामवासना बदला लेगी, तुम्हारे चित्त को कामवासना ही कामवासना से भर देगी। अगर तुम क्रोध को दबाओगे, तो तुम्हारे भीतर क्रोध रोएं-रोएं में समा जाएगा। अगर तुम शरीर का दमन करोगे, तो तुम यह मत सोचना कि तुम आत्मवादी हो जाओगे; तुमसे ज्यादा शरीरवादी खोजना मुश्किल हो जाएगा। अगर तुम बाहर के जगत को इनकार करके हिमालय की गुफा में भाग जाना चाहोगे, तो हिमालय की गुफा में बैठा कर भी तुम बाहर के जगत का ही चिंतन-मनन करोगे। मैं पूरे मनुष्य में भरोसा करता हूं। बाहर भी अपना है, भीतर भी अपना है। बाजार भी अपना है और मंदिर भी अपना है। धन भी अपना है और ध्यान भी अपना है। प्रेम में भी डूबो और समाधि को भी मत भूलो। दोनों पंखों को एक साथ सम्हाल लेना है।

और जीवन में जो भी परमात्मा ने दिया है-क्रोध हो, कि लोभ हो, कि काम हो, कि अहंकार हो-इन सभी का रूपांतरण हो सकता है। क्रोध का जब रूपांतरण होता है तो करुणा निर्मित होती है। और अहंकार का जब रूपांतरण होता है तो आत्मभाव पैदा होता है। और काम का जब रूपांतरण होता है तो ब्रह्मचर्य का जन्म होता है। इनमें से कोई भी ऊर्जा निषेध करने के लिए नहीं है। ये सारी ऊर्जाएं शुद्ध करने के लिए हैं। इनका इनकार नहीं, इनका परिष्कार।

तो निश्चित ही, तुम्हारी चिंता ठीक है। ऐसा हो सकता है। लेकिन उससे हमें कोई चिंता नहीं है। न होगा तो समझना कि चमत्कार हुआ! न होगा तो ही हम चकित होंगे। होना तो सुनिश्चित ही है, देर-अबेर!

लेकिन फिर भी हम मनुष्य-जाति के लिए एक नये प्रयोग की संभावना को वास्तविक करके छोड़ जाएंगे। एक प्रयोग को प्राण दे जाएंगे। और यह प्रयोग अगर थोड़े से लोगों में भी सफल हो गया तो मनुष्य के भविष्य का इतिहास एकदम भिन्न होगा। अब तक का धर्म अधूरा-अधूरा था, अंतमुर्खी था। इसलिए जिन देशों ने धार्मिक होने की चेष्टा की, वहां विज्ञान पैदा नहीं हुआ। अंर्तमुर्खी व्यक्ति कैसे विज्ञान को जन्म दे? तुम अगर गरीब हो, तो तुम्हारे धर्म के कारण गरीब हो। यह देश अगर भूखा मर रहा है, तो धन्यवाद दो तुम्हारे साधु-संतों-महात्माओं को! उनकी कृपा से! क्योंकि विज्ञान जन्मे कैसे? विज्ञान के लिए बहिर्मुखी होना जरूरी है। विज्ञान का अर्थ ही होता है-बाहर जो है उसका निरीक्षण, गहरा निरीक्षण, गहरा अवलोकन-पदार्थ का अवलोकन। और तुम्हारे साधु-संत कहते रहे: भइया, पदार्थ तो माया है। माया का कहीं कोई निरीक्षण करता है? है ही नहीं। ब्रह्म सत्य, जगत मिथ्या। जगत है ही नहीं। जो है ही नहीं, उसका विज्ञान कैसे बनेगा? और जो है ही नहीं, उसमें उत्सुकता क्या लेनी?

पश्चिम के लोगों ने कहा कि ब्रह्म मिथ्या, जगत सत्य। तो उन्होंने विज्ञान तो निर्मित कर लिया, लेकिन ध्यान खो गया। विज्ञान तो खूब फला; धन का अंबार लग गया; लेकिन भीतर आदमी बिलकुल दरिद्र हो गया।

मैं तुमसे क्या कहता हूं? मैं कहता हूं: ब्रह्म सत्य, जगत सत्य। मैं कहता हूं: दोनों सत्य हैं। दोनों एक ही सत्य के दो पहलू हैं। एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। उनमें कोई भी असत्य नहीं है। न तो मैं कार्ल माक्र्स से राजी हूं, जो कहता है कि जगत सत्य, ब्रह्म मिथ्या; न मैं शंकराचार्य से राजी हूं, जो कहते हैं कि ब्रह्म सत्य, जगत मिथ्या। मेरी उदघोषणा तो है: दोनों सत्य हैं। जगत भी सत्य, ब्रह्म भी सत्य। जगत है ब्रह्म की देह, ब्रह्म है जगत का प्राण। दोनों साथ-साथ हैं। और दोनों हैं, इसलिए जीवन अति सुंदर है! भविष्य का मनुष्य वैज्ञानिक और धार्मिक साथ-साथ होगा, धार्मिक और वैज्ञानिक साथ-साथ होगा। उस धर्म और विज्ञान के समन्वय को मैं पैदा करने की कोशिश कर रहा हूं। इसलिए और भी आश्चर्य की बात: धार्मिक ही मेरा विरोध नहीं करेंगे, अधार्मिक भी मेरा विरोध करेंगे। अध्यात्मवादी ही विरोध नहीं करेंगे, पदार्थवादी भी विरोध करेंगे। क्यों? क्योंकि उनको लगता है कि मैं परमात्मा को बीच में ला रहा हूं-जो नहीं लाना चाहिए, पदार्थ पर्याप्त है। अध्यात्मवादी को लगता है कि मैं पदार्थ को क्यों बीच में ला रहा हूं? परमात्मा पर्याप्त है। और मैं कहता हूं: तुम निर्णय न करो कि क्या पर्याप्त है; सिर्फ निरीक्षण करो। दोनों मौजूद हैं। दोनों जरूरी हैं। दोनों अपरिहार्य अंग हैं। और दोनों की मौजूदगी से अस्तित्व में वैविध्य है, सौंदर्य है, गरिमा है, महिमा है।

थोड़े से फूल बो जाना है। जितनी देर मौका मिले, थोड़े से फूल बो जाना है। फूल लोग बो ही नहीं पाते। जिनको तुम बहुत अच्छे-अच्छे लोग कहते हो, वे भी ज्यादा से ज्यादा इतना ही कर पाते हैं कि कांटे न बोएं, बस। तुम्हारा संत जो है वह कांटे नहीं बोता। मेरे संत की जो धारणा है वह फूल बोने की धारणा है। कांटे नहीं बोना नकारात्मक है; पर्याप्त नहीं। तुमने बगीचे में कांटे नहीं बोए, इससे मत सोचना कि फूल खिलेंगे। कांटे तो नहीं बोने हैं निश्चित; फूल बोने हैं।

मेरा किसी से कुछ विरोध नहीं है। इसलिए सारे धर्मों के शास्त्रों पर बोल रहा हूं, ताकि उनमें जो भी सुंदर है, नया मनुष्य उसे आत्मसात कर ले। जो भी सुंदर है, जो भी श्रेष्ठ है, वह नये मनुष्य की श्वासों में समा जाए! मेरा संन्यासी हिंदू नहीं, मुसलमान नहीं, ईसाई नहीं। लेकिन मैं बाइबिल पर बोल रहा हूं, ताकि बाइबिल में जो भी श्रेष्ठ है, जो भी सुंदर है...और सभी सुंदर नहीं है, सभी श्रेष्ठ नहीं है। वेद में जो भी सुंदर है, श्रेष्ठ है...और ध्यान रखना, सभी सुंदर नहीं है, सभी श्रेष्ठ नहीं है। क्योंकि वेद किसी एक व्यक्ति के लिखे हुए नहीं हैं, न बाइबिल किसी एक व्यक्ति की लिखी हुई है; न मालूम कितने लोगों ने लिखे हैं, न मालूम कितने लोगों के हाथ लगे हैं! ऐसे लोगों की भी पंक्तियां उनमें हैं जो परमज्ञान को उपलब्ध हुए थे और ऐसे लोगों की भी जो कोरे पंडित थे। इसलिए छांट रहा हूं। उसमें जो भी सुंदर है, फिर किसी दिशा से आता हो-फिर जरथुस्त्र से आता हो कि लाओत्सु से, कि चीन से आता हो कि ईरान से-जहां से भी आता हो, सारी मनुष्य-जाति की संपदा हमारी है। उसमें जो-जो फूल हैं, चुन लेने हैं-और एक गुलदस्ता तुम्हें दे जा रहा हूं।

-ओशो
बिरहिनी मंदिर दियना बार