Osho World Online Magazine :: December 2011
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स्वास्थ्य

प्यारे ओशो, मुझे भोजन से तृप्ति क्यों नहीं होती?

हर रोज भोजन लेने से पहले चुपचाप ध्यान में बैठ जाओ। आंखें बंद कर लो और महसूस करो कि तुम्हारे शरीर को क्या चाहिए—जो भी जरूरत हो! तुमने अभी भोजन देखा नहीं, भोजन सामने भी नहीं है; तुम बस अपने प्राणों में महसूस करो कि तुम्हारे शरीर को क्या जरूरत है, तुम्हें क्या खाने जैसा लग रहा है।

डाक्टर लियोनार्ड पिअरसन इसे ‘हमिंग फूड’ कहते हैं—वह भोजन जो तुम्हारे भीतर से आवाज देता है। ऐसा भोजन तुम चाहे जितना खाओ, लेकिन वही खाओ। दूसरी तरह के भोजन को वह ‘बैकनिंग फूड’ कहते हैं—वह भोजन, जो तुम्हारे सामने हो तो तुम उसमें उत्सुक हो जाओ। फिर वह दिमागी बात हो गई, तुम्हारी जरूरत न रही। अगर तुम अपने ‘हमिंग फूड’ की आवाज को सुनते हो तो वह तुम चाहे जितना खाओ लेकिन तुम्हें कोई तकलीफ नहीं होगी, क्योंकि वह तुम्हें तृप्त कर देगा। शरीर उसी चीज की मांग करता है जिस चीज की उसे जरूरत होती है। और किसी चीज की मांग शरीर नहीं करता। वह भोजन तृप्त करता है, और तृप्ति हो जाए तो व्यक्ति जरूरत से ज्यादा कभी भी नहीं खाता।

मुश्किल तभी होती है जब तुम वे चीजें खाते हो जो तुम्हें बाहर से आकर्षित करती हैं: तुम्हें दिखाई दी और तुमने खा ली। ऐसा भोजन तुम्हें तृप्त नहीं करेगा क्योंकि शरीर को उसकी जरूरत नहीं है। तुम अतृप्त रह जाते हो। अतृप्त रह जाने के कारण तुम ज्यादा खा लेते हो, लेकिन ऐसा भोजन तुम भले ही कितना भी खाते चले जाओ तुम्हें तृप्त नहीं करेगा, क्योंकि उसकी जरूरत ही नहीं है। यह एक बड़ी समस्या बन गई है। क्योंकि तुम यह भूल ही गए हो कि तुम्हें अपनी भीतरी इच्छा को सुनना है। बल्कि लोगों को सिखाया जाता है कि वे भीतर की आवाज को न सुनें। लोग कहते हैं, ‘यह खाओ, वह मत खाओ’--जैसे बंधे हुए नियम हों। शरीर कोई बंधे हुए नियम नहीं जानता।

मनस्विद कहते हैं अगर बच्चों को भोजन के साथ अकेला छोड़ दिया जाए तो वे वही खाएंगे जिस चीज की उनके शरीर को जरूरत है। कई अध्ययन किए गए और बड़े हैरानी के परिणाम आए हैं। अगर कोई बच्चा किसी बीमारी से पीडि़त है और उस बीमारी के लिए सेब अच्छा है तो बच्चा सेब को चुन लेगा। खाने की चाहे और कितनी चीजें पड़ी हों, लेकिन बच्चा सेब को ही चुनेगा।

जानवर भी ऐसा करते हैं। सिर्फ आदमी यह भाषा भूल गया है। तुम एक भैंस को लाकर बगीचे में छोड़ दो। पूरा बगीचा पड़ा है, पूरी हरियाली मौजूद है लेकिन वह कोई परवाह नहीं करेगी। फूल और पेड़ कितना ही लुभाएं, लेकिन वह उनकी ओर देखेगी भी नहीं। वह खाने को वही घास चुनेगी जिसकी उसे जरूरत है। तुम भैंस को धोखा नहीं दे सकते, सिर्फ आदमी को ही धोखा दिया जा सकता है।

तो तुम्हारा शरीर जो कहता है उसे सुनने की कला सीखनी शुरू करो। जब तुम नाश्ता करने लगो तो आंखें बंद कर लो और देखो कि तुम क्या चाहते हो; तुम्हारी वास्तविक इच्छा क्या है। क्या उपलब्ध है, यह मत सोचो। सिर्फ यह सोचो कि इच्छा किस चीज की उठ रही है, फिर जाकर वह चीज खोजो और खाओ। कुछ दिन ऐसा करो। धीरे-धीरे तुम पाओगे कि अब तुम बेकार के खाने में उत्सुक नहीं होते।

दूसरी बात: जब तुम खाओ तो अच्छी तरह से चबा कर खाओ। भोजन को जल्दी-जल्दी निगलो मत। मुंह में उसका पूरा स्वाद लो। अच्छी तरह से चबाओ, क्योंकि स्वाद तो सारा गले से ऊपर ही है। गले से नीचे कोई स्वाद नहीं है। इसलिए जल्दी मत करो। भोजन को ज्यादा चबाओ ताकि ज्यादा स्वाद आए। और इस स्वाद को सघन करने के लिए जो कर सकते हो करो। जब तुम कुछ खाने लगो तो पहले उसे सूंघो। उसकी गंध का मजा लो क्योंकि आधा स्वाद तो गंध में ही है।

कई प्रयोग किए गए हैं। अगर तुम्हारी नाक पूरी तरह बंद हो और तुम्हें कुछ खाने को दिया जाए तो तुम उसका स्वाद नहीं ले सकते। तब तुम्हें समझ आएगा कि स्वाद से ज्यादा गंध के कारण तुम स्वाद ले सकते हो। अगर तुम्हारी आंखें बंद हों तो तुम उतना भी स्वाद नहीं ले पाओगे, क्योंकि अब तुम आंखों को आकर्षित करने वाले रंग को महसूस नहीं कर सकते। कई प्रयोग किए गए हैं जिनमें नाक और आंख पूरी तरह बंद करके कुछ खाने को दिया जाता है तो तुम यह भी नहीं बता सकते कि तुम क्या खा रहे हो। यही कारण है कि जुकाम में तुम खाने का मजा नहीं ले सकते क्योंकि तुम उसे सूंघ नहीं पाते। जब लोगों को जुकाम होता है तो वे तीखे मसालेदार भोजन खाना शुरू कर देते हैं क्योंकि उससे उन्हें थोड़े से स्वाद का पता चलता है।

तो भोजन करते हुए भोजन को अच्छे से देखो, सूंघो। कोई जल्दी नहीं है, पूरा समय लो। इसे एक ध्यान बना लो। अगर लोगों को लगे कि तुम पागल हो गए हो, तो भी कोई चिंता न लो। भोजन को सब ओर से उलट-पुलटकर देखो। आंखें बंद करके उसे छुओ, गालों से छुआओ। हर तरह से महसूस करो; बार-बार सूंघो। फिर थोड़ा सा भोजन भी पर्याप्त होगा और तुम्हें बहुत तृप्ति देगा।

-ओशो
शैडो आफ दी व्हिप