Osho World Online Magazine :: December 2011
www.oshoworld.com
 
विशेष रिपोर्ट

आज से अस्सी वर्ष पूर्व 11 दिसंबर 1931 को ओशो देह रूप में प्रकट हुए। अजन्मा और निराकार आकार में रूपायित हुआ। 11 दिसंबर का दिन इस बात की खबर है कि पृथ्वी पर जब ऐसी घटना होती है तो यह पूरी पृथ्वी के लिए महोत्सव की घड़ी है, क्योंकि सैकड़ों-हजारों वर्षों के अंतराल में अस्तित्व को ऐसा अहोभाग्य उपलब्ध होता है जिससे समूचा विश्व पुनः धन्य होता है। मानव-देह में अभिव्यक्त संबुद्ध चैतन्य को हम रहस्यदर्शी सद्गुरु का संबोधन देते हैं।

स्मरण आता है 11 दिसंबर 1981 का, आज से तीस वर्ष जब हमने ओशो का स्वार्णिम जन्म दिवस महोत्सव अमेरिका स्थित रजनीशपुरम् कम्यून में मनाया था। आज के बुद्ध की उपस्थिति में एक विशाल संघ अपने उद्दाम वेग में विकसित हो रहा था। धीरे-धीरे वहां विश्व भर से 20 हजार लोग महोत्सव में सम्मिलित होने लगे। न्यस्त स्वार्थी तत्वों के लिए यह असह्य होने लगा। और पांच साल के भीतर रीगन-सरकार तथा वर्तमान पोप रात्जिंगर की रची सांठ-गांठ और साजिश से अमेरिका में ओशो का महासंघ रजनीशपुरम् बिखर गया। इसे हम कोई दुर्भाग्य की भांति नहीं देखते-बुद्धपुरुषों तथा ध्यानियों के लिए दुर्भाग्य जैसा कुछ भी नहीं होता। वे विध्वंस और विनाश में अपूर्व विकास को जन्म देने की कला जानते हैं। जिसे अपने अहंकार को विनष्ट करके अपने चैतन्य को विकसित करने की कला आ गयी, अब वह किसी भी प्रकार के विनाश का भी सदुपयोग कर लेता है।

सद्गुरु के सान्निध्य में रजनीशपुरम् के अपूर्व प्रयोग से ओशो के शिष्यों को कम्यून निर्माण की कला आ गयी। वे रजनीशपुरम् से बिखर कर पूरे विश्व में अनेक देशों में छोटे-बड़े कम्यून, ध्यान-केंद्र खोलने में संलग्न हो गए-ऐसे अनूठे स्थल जहां भौतिकता और विज्ञान की बाह्य समृद्धि हो तथा भीतर बुद्धत्व की सुगंध हो, भीतर-बाहर से समृद्ध नए मनुष्य का पोषण हो। ओशो ने अपने इस मनुष्य को ज़ोरबा दि बुद्धा की संज्ञा दी है।

1987 के प्रारंभ में ओशो पुनः पूना आ गए और वह कम्यून फिर खिल उठा। 19 जनवरी 1990 को ओशो देह-मुक्त होकर महापरिनिर्वाण को उपलब्ध हुए और उनकी चेतना पृथ्वी के कोने-कोने में व्याप्त हो गयी। ऐसी मुक्त-स्वतंत्र चेतना की तरंगों पर सवार उनके शिष्यों की चेतना नए-नए ध्यान केंद्र और कम्यून खोलने में संलग्न हो गयी। उनके 80वें जन्म-दिवस के अवसर पर यह सूचित करते हुए आनंद होता है कि आज भारत में पूना के अतिरिक्त अन्य स्थानों पर भी बहुत सुंदर-सुंदर ध्यान केंद्र तथा कम्यून सक्रिय हो गए हैं और हर वर्ष नए-नए केंद्र उभरते आ रहे हैं। इनमें कुछ उल्लेखनीय हैं-धर्मशाला, हिमाचल में ओशो निसर्ग, देहरादून में ओशो ओम बोधिसत्वा कम्यून, नयी दिल्ली में ओशोधाम, ओशा ध्यान मंदिर, जबलपुर में ओशो अमृतधाम कम्यून, ओशो के जन्मस्थान कुचवाड़ा में ओशो तीर्थ, वाराणसी में ओशो मंदाकिनी आश्रम, ऋषिकेश में ओशो गंगाधाम तथा नेपाल में ओशो तपोवन। और भी स्थान हैं जिन्हें आप ओशो वल्र्ड पत्रिका के आगामी ध्यान शिविरों की सूची में हर महीने देखते हैं-जैसे भीमताल, करनाल, पंचकूला, भीलवाड़ा, भिलाई, हथियारी, बरौनी, लहान (नेपाल) तथा अन्य।

ओशो का मूल संदेश है: ध्यान। नए मनुष्य और नव-संन्यास की यह आधारशिला है जिस पर जीवन के बहु-आयामी सृजन के फूल खिलते हैं। इसलिए यह और भी आनंद की खबर है कि पिछले कुछ वर्षों में देश भर में ओशो ध्यान शिविरों की बाढ़ आ गयी है। ध्यान केंद्रों पर तो ये ध्यान-कार्यक्रम होते हैं, लेकिन जिन शहरों व गांवों में ध्यान केंद्र नहीं हैं वहां भी ओशो मित्र छोटे-बड़े आयोजन करते हैं। अब समय आ गया है कि हम अपने नए-पुराने ध्यान केंद्रों को और अधिक ऊर्जा दें और ध्यान-शिविरों के आयोजन के लिए इन्हें प्राथमिकता दें। इन स्थानों की ऊर्जस्विता में निरंतर अभिवृद्धि होती रहे। ओशोवर्ल्ड ध्यान के इस अनूठे अभियान में आप सबका स्वागत करता है। सब सीमाओं से मुक्त ओशो के इस असीम आकाश में ध्यान और प्रेम के पंखों के सहारे उड़ने वाले उन्मुक्त पक्षी ही ओशो के नव-संन्यासी हैं।

-स्वामी चैतन्य कीर्ति