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कला का इतिहास

"बचपन स्वर्ग जैसा क्यों होता है? क्योंकि बच्चा रहस्य के जगत में जीता है। उसके लिए हर बात रहस्यपूर्ण है। यहां तक कि सूर्य के प्रकाश में झूमते वृक्ष कि छाया भी रहस्यपूर्ण है। काव्यात्मक है। एक साधारण सा फूल, एक घास का फूल भी इतना रहस्यपूर्ण होता है क्योंकि यह पूरे जीवन को अभिव्यक्त करता है। वृक्षों में बहती हवा, उसके गीत, घाटियों का संगीत, पानी में बनने वाले अक्स, हर बात बच्चे के लिए रहस्यपूर्ण है, अज्ञात है। वह प्रसन्न होता है। इसे स्मरण रखो-तुम्हारी प्रसन्नता तुम्हारे रहस्य के अनुपात में होती है। कम रहस्य, कम प्रसन्नता। ज्यादा रहस्य, ज्यादा प्रसन्नता।"

ओशो
शिक्षा ओशो की दृष्टि में

कला मानव मन की ऐसी रचनात्मक अभिव्यक्ति है जिसके माध्यम से वास्तविक और काल्पनिक स्थितियों को चित्रित किया जाता है। उसकी सुदंरता को कैनवास, पेपर, पत्थर और दीवारों पर उकेरा जाता है। आमतौर पर जब हम कला की बात करते हैं तब उसका अभिप्राय, वास्तुकला, मूर्तिकला और चित्रकला से होता है। कला विश्व की ऐसी कलात्मक और अनूठी पहचान है जिससे किसी भी देश की संस्कृति और सभ्यता का अंदाजा लगाया जा सकता है। कला का कलात्मकता इससे परलक्षित होती है कि कलाकार और हस्तशिल्पी अपनी रचनात्मक अंगुलियों से वही दिखाता है जो वास्तव में सच होता है।

कला की उत्पत्ति के चिन्ह हमें गुफाओं और शिलाखण्डों पर बनी विशेष आकृति में देखने को मिले। कला को वास्तविक और मूर्त रूप कलाकारों की कल्पना ने दिया। जिन्होंने इसको दुनिया के कोने-कोने में पहुंचा दिया। आधुनिक कला को हम मनुष्य की कलापूर्ण प्रवृत्ति का साक्षात् प्रमाण मानते है। जिसकी सुंदरता दुनिया के विभिन्न चित्रकारों ने अपनी कला से प्रकट की है। प्रकृति और कला का नाता बहुत ही प्राचीन है। इनका अस्तित्व ही मनुष्य को जीवंत बनायें हुए है।

कला की शुरुआत कब, कहां और कैसे हुई। इसकी सही और सटीक जानकारी इतिहास के पन्नों पर अंकित नहीं है। लेकिन ऐसा माना जाता है कि कला, पेंटिग और चित्रकला का विकास लगभग एक सौ हजार साल पुराना है।



आधुनिक कला की शुरुआत विन्सेन्ट वैन गॉग, पॉल सिजैन, पॉल गॉगुइन, जॉर्जेस श्योरा और हेनरी डी टूलूज लॉट्रेक जैसे ऐतिहासिक चित्रकारों ने की। ये सभी आधुनिक कला के विकास को महत्वपूर्ण मानते थे. 20वीं सदी की शुरुआत में हेनरी मैटिस और कई युवा कलाकारों, जिनमें पूर्व-घनवादी जॉर्जेस ब्रैक्यू, आंद्रे डेरैन, रॉल डफी और मौरिस डी व्लामिंक शामिल थे। इनके जीवंत बहु-रंगी, भावनात्मक परिदृश्य और आकार चित्रकला जिसे आलोचकों ने फॉविज्म का नाम दिया। हेनरी मैटिस के द डांस के दो संस्करणों ने उनके करियर और आधुनिक चित्रकला के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह मैटिस के परिलक्षित कला के साथ प्रारंभिक आकर्षण को दर्शाता है। नीले-हरे रंग की पृष्ठभूमि पर आकृतियों में उपयोग किए गए बेहतरीन उग्र रंग और नृत्य कलाओं की तालबद्ध प्रस्तुति भावनात्मक और हेडोनिजम की भावनाओं को व्यक्त करता

प्रारंभ में टुलुज लॉट्रेक, गॉगुइन और 19वीं सदी के अन्य नवकलाकारों से प्रभावित पैब्लों पिकासो ने अपने पहले घनवादी पेंटिंग को सीजैन के इस विचार के आधार पर बनाया था कि प्रकृति की सभी कलाकृतियां तीन ठोस आकार घन, गोला और शंकु में समाहित किए जा सकते हैं। लेस डेमोइसेलस डेएविगनन 1907 पेंटिंग के साथ, पिकासो ने नाटकीय रूप से एक नया और स्वाभाविक चित्र बनाया। विश्लेषणात्मक घनवाद को पिकासो और जॉर्जेस ब्राक्यू ने मिलकर विकसित किया था, जिसका उदाहरण हमें 1908 से 1912 के मध्य वायलिन और कैंडलस्टिकग, पेरिस में देखने को मिला।

विश्लेषणात्मक घनवाद, ब्राक्यू, पिकासो, फर्नार्ड लेगर, जुएन ग्रिस, मार्शल डुचैम्प और 1920 के कई अन्य कलाकारों द्वारा किए जाने वाले कृत्रिम घनवाद की पहली स्पष्ट अभिव्यक्ति थी। कृत्रिम घनवाद भिन्न आकृतियों, सतहों, कॉलेज तत्वों, पेपर कॉले और कई मिश्रित विषयों को प्रस्तुत करके चित्रित किया जाता है। आधुनिक कलाकारों ने देखने के नए तरीकों और सामग्रियों और कला के कार्यों की प्रवृति पर नए विचारों के साथ नये और आधुनिकतम प्रयोग किए। साथ ही कल्पनात्मकता की ओर झुकाव आधुनिक कला की विशेष विशेषता रही है।



कला के इतिहास और विकास की यात्राः

32,000 ईसा पूर्व अफ्रीका में पत्थरों पर नक्काशी की कला की शुरुआत हुई। वही इस कला का प्रारंभ भी माना जाता है। इसके अलावा पेन्टिंग कला करने के प्रतीक अफ्रीका और यूरोप की गुफाओं में बड़ी मात्रा में देखने को मिले। आज भी इन देशों की गुफाओं और पहाड़ों में चित्रकला और नक्काशी के अवशेष जीवित हैं। हालांकि उस समय की पेंटिंग में उतना आकर्षण नहीं था जितना आधुनिक युग में होता है। लेकिन उन कलाकारों की कार्यक्षमता के अनुसार यह कला उनके दक्षता और अनुभव को प्रकट करती थी। पेन्टिंग में यह भी साफ झलकता था कि उस समय के जानवर वास्तविकता में कैसे प्रतीत होते थे।

9000 ईसा पूर्व जब लोग खानाबदोश रहने की बजाय गांवों और समूहों में रहने लगे। तब उनके जीवनशैली में आये इस बदलाव ने कला के क्षेत्र में भी चार चांद लगा दिये। एक स्थान पर रहने के कारण उन्होंने अपनी कला से बड़ी-बडी स्थाई मूर्तिया बनानी शुरू कर दिया। जिससे उन्हें बड़ी आकार की मूर्तियां बनाने में भी आसानी होने लगी। पश्चिमी एशिया और इजिप्ट में सबसे पहले मिट्टी और धातु की विशाल मूर्ति बनाई गई। कला में आये इस बदलाव ने मिट्टी के बर्तनों को भी सजावटी आकार प्रदान कर दिया।

3000 ईसा पूर्व के आस-पास लोगों ने धातु की वस्तुओं पर काम करना सीख लिया था। जिसके कारण भारत में पहली धात्विक और सूक्ष्म मूर्ति बनायी गयी। इसी काल में भारत और और ग्रीस के लोगों ने इस क्षेत्र में हाथ अजमाने शुरू कर दिये। उनके बनाये नमूने सुदंरता के कारण जीवंत प्रतीत होते थे।

1100 ईसा पूर्व पश्चिमी एशिया और भूमध्यसागरीय क्षेत्र में ऐसा समय आया जब कला का चमकता सितारा धूमिल होने लगा कारण साफ था कि उस समय लोग कला में इतना माहिर नहीं थे। जिसका सीधा असर कला पर पड़ा और वह अपने अस्तित्व से डगमगाने लगी। कला के इस काले अध्याय के बाद कलाप्रेमियों ने अपने कार्य रूचि से पेन्टिंग में नयी जान फूंक दी।

ग्रीस में प्राचीन और पारंपरिक मूर्तियां बननी शुरू हुई और फूलों के गुलदानों पर लाल और काले रंग की चित्रकारी होने लगी। इटली में, इट्रस्केन लोग पत्थरों और मिट्टी की मूर्तियां बनाने लगे। साथ ही स्वयं के मिट्टी के बर्तनों पर भी चित्रकारी करने लगे। पश्चिमी एशिया के महाराजा ने नक्काशी को अपने महल की दीवारों पर बनवाई थी। ताकि इन कलाओं से उसका महल सुदंरता का आकार ले ले।

325 ईसा पूर्व में जब सिकंदर महान ने पश्चिम एशिया को जीता, तब एक देश से दूसरे देश के बीच में कलात्मक विचारों और कला का विनिमय हुआ। लोगों पूरे साम्राज्य में घूम-घूमकर अपने विचारों और कलाओं का आदान प्रदान किया।

इसका लाभ भारत में दिखा जब आदान-प्रदान के कारण देश में पहली ग्रीक मूर्ति का निर्माण हुआ। ग्रीक की इस तकनीकि का इस्तेमाल करके भारतीय मूर्तिकारों ने बुद्ध की प्रतिमा को बनाया। जिससे बौद्ध धर्म को भी प्रचार के क्षेत्र में एक बल मिला। इसके कुछ समय बाद बौद्धधर्मियों ने चीन की यात्रा शुरू की और वहां से पत्थर की मूर्तियों को अपने साथ ले आये। चीन के कलाकारों ने भी पत्थरों की यथार्थ आकार की मूर्तियों को तराशना शुरू कर दिया। इस तरह से कला के विस्तार ने पूरे विश्व में फैलने की रफ्तार पकड़ ली।

200 ईसा के बाद रोमन चित्रकारों ने अपने काम में नए-नए प्रयोग करने आरंभ कर दिए। मूर्तियों को इस तरह से तराशने लगे कि वास्तविक और काल्पनिक कला में फर्क करना कठिन हो जाता था। मूर्तियों में बड़े आकार की आंखे होती थी। जो उनकी शक्ति और उर्जा को दर्शाती थी।

450 ईसा में कला के क्षेत्र में एक और काला अध्याय उस समय जुड़ गया जब रोम और सेसेशियन साम्राज्य का पतन होने लगा। लोगों में गरीबी और भुखमरी की स्थिति उत्पन्न हो गयी जिसका सीधा प्रभाव मूर्तिकारों और चित्रकारों पर भी पड़ा। वो अपनी कला की गाड़ी का पहिया आगे खींचनें में असमर्थ हो गये। कुछ सालों तक इस क्षेत्र में कोई उन्नति देखने को नहीं मिली। लेकिन दूसरी तरफ चीन में कला ने तेजी से अपनी जड़े फैलानी शुरू कर दी, कलाकरों ने अपनी चित्रकारी और पेंटिग का हुनर, नये आविष्कार हुए कागजों पर करना प्रारंभ कर करने लगे थे।

जब पश्चिमी कलाकारों ने दोबारा कला में हाथ अजमाने शुरू किये। तब उन्होंने अपने काम में नित नये प्रयोग किये। मध्यकालीन कला में इस्लाम और ईसाई धर्मों का अहम योगदान देखने को मिला।

शुरुआत में मध्यकालीन या रोम के पुराने कलाकारों को लोगों और मकानों की आकृतियों के प्रतीकात्मक और साहसिक भावनाओं वाले चित्र बनाना अधिक पसंद था। लेकिन इस युग के बाद के कलाकार गिओटटो और डोनाटेल्लो ने नवीन मध्यकालीन पेंटिंग कला को प्राचीन ग्रीक और रोमन सभ्यता के साथ मिलाकर बनाने लगे। जिसे हम प्रत्येक देश की संस्कृति कला और सभ्यता में देख सकते है।

पेटिंग का इतिहास अगले अंक में....