Osho World Online Hindi Magazine :: September 2012
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  भारत एक सनातन यात्रा
 
 

क्या आध्यात्मिक क्रांति जरूरी है?

'क्या भारत में आध्यात्मिक क्रांति की आवश्यकता है?' इस संबंध में कुछ कहने के पहले, एक अत्यंत भ्रामक हमारी धारणा रही है, उस धारणा को समझ लेना जरूरी है...

सैकड़ों वर्षों से हम इस बात को मान कर बैठ गये हैं कि हमारा देश आध्यात्मिक है। और इस मान्यता ने हमें आध्यात्मिक होने से रोका है। अगर कोई बीमार आदमी यह समझ ले कि वह स्वस्थ है, तो उसके स्वस्थ होने की सारी संभावना समाप्त हो जाती है। बीमार आदमी को जानना जरूरी है कि वह बीमार है। इस जानने के द्वारा ही वह बीमारी से लड़ भी सकता है, बीमारी को बदल भी सकता है, स्वस्थ भी हो सकता है। लेकिन अभागा है वह बीमार आदमी जिसको यह भ्रम पैदा हो जाए कि मैं स्वस्थ हूं। क्योंकि यह भ्रम ही उसे बीमारी से मुक्त होने की कोई भी चेष्टा नहीं करने देगा।

भारत को यह भ्रम है कि हम आध्यात्मिक हैं। हम सारी बात, इस बात को मान कर ही आगे बढ़ते हैं कि हम आध्यात्मिक हैं। फिर हमें करने को कुछ भी शेष नहीं रह जाता। भारत के जीवन में आयी हुई सारी नैतिक पतन की कहानी, भारत के जीवन में आया हुआ सारा चारित्रक ह्रास, एक ही बुनियाद पर खड़ा हुआ है कि हमने यह मान लिया है कि हम आध्यात्मिक हैं। और हम आध्यात्मिक बिल्कुल भी नहीं है। अध्यात्म का हमारा दूर से भी कोई नाता है!

निश्चित ही हमने एक झूठा अध्यात्म खड़ा कर रखा है, जिससे हमारा नाता है। और उसी नाते के कारण हम अपने को यह विश्वास दिलाने में समर्थ हो गये हैं कि हम आध्यात्मिक हैं। हमने एक सूडो स्प्रिचुअलिटी, एक झूठा अध्यात्म खड़ा कर रखा है। झूठा अध्यात्म बड़ी सस्ती बात है। वस्तुतः आध्यात्मिक होना एक क्रांति से गुजर जाना है। वस्तुतः आध्यात्मिक होना एक नये जीवन को उपलब्ध कर लेना है। और झूठा अध्यात्म, अपने को विश्वास दिला लेना है कि हम आध्यात्मिक हैं। और हमने कई तरकीबें खोज ली हैं अपने को विश्वास दिला लेने की। इन तरकीबों के कारण पांच हजार वर्ष से हम एक धोखे में जी रहे हैं। न हम आध्यात्मिक हो पाते हैं और न हम ईमानदारी से भौतिक हो पाते हैं।

भौतिक हम हैं, मैटीरियलिस्टिक हमारा दिमाग है, लेकिन अध्यात्म का हम कपड़ा ओढे खड़े हुए हैं। पश्चिम के साथ कम से कम एक बात तो सच है कि वे भौतिकवादी हैं, और ऐसा वे जानते हैं कि वे भौतिकवादी हैं। हमारी स्थिति बेईमानी की है! हम भौतिकवादी हैं, और जानते है कि हम अध्यात्मवादी हैं। यह एक बहुत गहरी चालाकी और बहुत गहरा धोखा और पांखड है।

और जो आदमी इस बात को ठीक से समझता हो कि मैं भौतिकवादी हूं, वह बहुत दिन तक भौतिकवादी नहीं रह सकता है। जैसे जो आदमी समझता हो कि मैं बीमार हूं, वह बहुत दिन तक बीमार नहीं रह सकता! बीमारी की अपनी पीड़ा है, जो कहती है कि स्वस्थ हो जाओ! और भौतिकवाद का अपना दुख है, जो कहता है कि इसके ऊपर उठ जाओ! आने वाले भविष्य में इस बात की संभावना है कि पश्चिम आध्यात्मिक हो जाए, लेकिन हमारे आध्यात्मिक होने की वह संभावना भी बहुत कम मालूम होती है

इसलिए पहले तो यह समझ लेना जरूरी है कि हम आध्यात्मिक नहीं है। व्यक्ति हुए हैं आध्यात्मिक-महावीर हुए हैं, बुद्ध हुए हैं, कृष्ण हुए हैं, राम हुए हैं। लेकिन व्यक्तियों के आधार पर कोई देश आध्यात्मिक नहीं हो जाता। अभी गाँधी थे, चालीस करोड़ का मुल्क है, अगर एक आदमी आध्यात्मिक हो जाए तो चालीस करोड़ लोगों को यह भ्रम पैदा कर लेने की जरूरत नहीं है कि वे आध्यात्मिक हो गए हैं। एक संगीतज्ञ मुल्क में पैदा हो जाए तो पूरा मुल्क संगीतज्ञ नहीं हो जाता! और एक आध्यात्मिक आदमी के पैदा होने से भी पूरा मुल्क कैसे आध्यात्मिक हो सकता है! एक राममूर्ति पैदा हो जाए और जिसकी हड्डियां लोहे जैसा काम करें, और जिसकी छाती पर पत्थर तोड़े जा सकें और कार निकाली जा सके, लेकिन इससे हमको यह भ्रम नहीं पैदा होता कि हमारी छाती पर से पत्थर फोड़े जा सकते हैं और न हम यह चिल्ला कर कहते हैं कि हमारा पूरा मुल्क राममूर्ति हो गया।

लेकिन अध्यात्म के संबंध में हमने यही भ्रम पाल लिया है। व्यक्ति हुए हैं आध्यात्मिक, निश्चित हुए हैं। और उसमें भी यह सोचने की जरूरत नहीं है कि वे इसी जमीन पर हुए हैं। सारी दुनिया में हुए हैं। लेकिन उन व्यक्तियों के कारण दुनिया के किसी देश ने यह भ्रम नहीं पाला अपने मन में कि हम आध्यात्मिक हो गए। हमारी कौम ने यह भ्रम पाल लिया है।

राम होते हैं, कृष्ण होते हैं, क्राइस्ट होते है, बुद्ध-महावीर होते हैं। क्या कभी आपने सोचा कि बुद्ध और महावीर हमारे मुल्क के प्रतिनिधि नहीं थे, रिप्रेजेंटेटिव नहीं थे; अपवाद थे, एक्सेप्शन थे। अगर वे हमारे प्रतिनिधि होते तो शायद पच्चीस सौ वर्ष तक बुद्ध को याद रखने की जरूरत भी नहीं पड़ती। अगर बुद्ध जैसे बहुत से लोग होते तो हम बुद्ध को कभी का भूल गए होते। हम उन्हीं को भूल पाते जो अत्यंत न्यून हैं, अकेले हैं, दूर हिमालय की चोटियों जैसे दिखाई पड़ते हैं-उन लोगों को हम नहीं भूल पाते। पच्चीस सौ साल हो गए महावीर और बुद्ध को गए हुए, अब भी हम उनकी याद करते हैं। यह इस बात का सबूत है कि पच्चीस सौ साल हो गए महावीर और बुद्ध को गए हुए, अब भी हम उनकी याद करते हैं। यह इस बात का सबूत है कि पच्चीस सौ सालों में हम उस ऊंचाई के आदमी पैदा नहीं कर सके। अन्यथा महावीर-बुद्ध को हम कभी का भूल गए होते।

क्या यह संभव है कि एक मुल्क में बहुत अच्छे लोग हों, तो वहां एक अच्छे आदमी को हजारों साल तक याद रखना पड़े? याद रखना दूर है, उस अच्छे आदमी को खोजना भी मुश्किल होगा! अंधेरी रात में बिजली चमकती हुई दिखाई पड़ती है, सूरज उगा हो और बिजली चमके तो दिखाई नहीं पड़ती। स्कूल, यह जो स्कूल है, इसकी कक्षाओं में जाकर आप देख लें कि काले तख्ते लगे हुए हैं, उन काले तख्तों पर सफेद लकीर से शिक्षक लिखता है, सफेद दीवारों पर नहीं। क्योंकि सफेद दीवारों पर सफेद खड़िया से लिखे गए अक्षर दिखाई नहीं पडेंगे; वे काले तख्ते पर दिखाई पड़ते हैं।

महावीर और बुद्ध दिखाई पड़ते हैं, क्योंकि हम सब काले तख्ते की तरह हैं। वे चमकदार लकीरों की तरह हमारे ऊपर प्रकट होकर दिखाई पड़ने लगते हैं। अगर हम सब भी सफेद लोग होते, तो महावीर-बुद्ध को खोजना मुश्किल हो जाता है कि वे कहां हैं। ये दस-पांच नामों के आधार पर मुल्क यह जो भ्रम पाल लिया है कि हम आध्यात्मिक हो गए, यह धोखा टूट जाना चाहिए। और यह धोखा टूटे तो मुल्क में एक आध्यात्मिक क्रांति हो सकती है। और उसकी बहुत जरूरत है। क्योंकि जिस मुल्क का कोई आत्मिक जीवन नहीं है, उस मुल्क के पास कोई भी जीवन नहीं है। और जिस मुल्क के पास प्राणों की कोई उर्जा नहीं है, कोई पवित्रता नहीं है और प्राणों का कोई प्रेम नहीं है, उस मुल्क के पास सब दीन-हीन हो गया, दरिद्र हो गया, भिखमंगा हो गया, उस मुल्क का सब कुछ नष्ट हो गया!

लेकिन यह टूट नहीं सकेगी बात, जब तक हमें यह दिखाई न पड़ जाए कि व्यक्ति पैदा हुए हैं जो धार्मिक थे, राष्ट्र आज तक पृथ्वी पर कोई धार्मिक नहीं पैदा हुआ है, समाज कोई भी धार्मिक पैदा नहीं हुआ है। व्यक्ति पैदा हुए हैं अपवाद की तरह।

दो हजार साल बाद मेरा नाम लोग भूल जाएंगे और आपका नाम भी लोग भूल जाएंगे, गाँधी का नाम याद रह जाएगा। और दो हजार साल बाद लोग सोचेंगे कि कितने अच्छे थे गाँधी के जमाने के गाँधी जैसे लोग! कितने प्यारे लोग थे! और उनका सोचना बिलकुल ही गलत होगा, फैलॅसियस होगा, झूठ होगा। क्योंकि गाँधी हमारे प्रतिनिधि बिल्कुल नहीं हैं। हम गाँधी जैसे बिल्कुल भी नहीं हैं। गाँधी बिल्कुल अपवाद हैं। और उन्हीं गाँधी के आधार पर दो हजार साल बाद लोग सोचेंगे कितने अच्छे लोग थे! कैसा अच्छा जमाना था! सतयुग था! झूठ होगी उनकी धारणा। गाँधी के आधार पर पूरे जमाने, और पूरी कौम, और पूरे देश के संबंध में निर्णय नहीं लिया जा सकता।

लेकिन हम पिछले अतीत के संबंध में यही करते रहे हैं। हम कहते हैं, राम जहां पैदा हुए! राम का देश! बुद्ध का देश! महावीर का देश! धार्मिक देश है।

राम और बुद्ध और महावीर से कोई देश धार्मिक नहीं होता। देश धार्मिक होगा वृहत्तर मनुष्य के धार्मिक होने से। एक आदमी के धार्मिक होने से देश धार्मिक नहीं होता। बल्कि उस एक आदमी का धार्मिक दिखाई पड़ना इस बात का सबूत है कि बाकी लोग धार्मिक नहीं है।

जिस दिन पृथ्वी पर सारे लोग धार्मिक होंगे, उस दिन महात्माओं को कोई जगह नहीं रह जाएगी। महात्मा तभी तक जी सकते हैं, जब तक हीन आत्मा पृथ्वी पर बड़ी संख्या में हैं। नहीं तो महात्माओं को विदा हो जाना पड़ेगा। जिस दिन महा-मनुष्यता का जन्म होगा, उस दिन महापुरुषों के लिए कोई जगह नहीं है। महापुरुष एक तरह का शोषण कर रहे हैं-छोटा आदमी है इसलिए महापुरुष होने की सुविधा है। अगर महापुरुष होना हो तो आप जल्दी हो जाएं। हजार, दो हजार साल बाद महापुरुष होना बहुत मुश्किल है! जिस दिन सचमुच बड़ी मनुष्यता पैदा होगी, उस दिन बड़े मनुष्यों की जगह नहीं रह जाएगी।

यह तो आदमी छोटा है, हीन है, दीन है, पापी है, अंधेरे में खड़ा है, इसलिए एक आदमी एक हाथ में दीया लेकर खड़ा हो जाता है और महापुरुष दिखाई पड़ने लगता है। और हजारों साल तक हमें याद रखना पड़ता है कि एक आदमी था जिसके हाथ में दीया था।

यह दुख की कथा है, यह कोई बहुत आनंद की और गौरव की बात नहीं है। सिर्फ इससे हमने एक भ्रम पैदा कर लिया और हम मान कर बैठ गए कि कौम धार्मिक है, कि आध्यात्मिक हैं हम लोग।

और जब हम आध्यात्मिक हैं तो हमें करने को कुछ भी नहीं बचा, सिवाय इसके कि हम सारे जगत को उपदेश दें। स्वाभाविक, जो आदमी आध्यात्मिक हो गया और उसके लिए और क्या बच जाता है! और जब पूरा राष्ट्र ही आध्यात्मिक हो गया हो, पूरी जाति आध्यात्मिक हो गई, पूरा समाज, तो अब हमारे पास काम क्या है? अब हमारे पास एक काम है कि हम सारे जगत के गुरु हो जाएं और सारे जगत को उपदेश दें!

तो भारत हजारों साल से सिर्फ उपदेश देने का काम कर रहा है और इस बात को भूल गया है कि हमारे पास ही वह संपदा नहीं है जिस संपदा की हम बात करते हैं; हमारे पास ही वह सत्य नहीं है जिसका हम शोरगुल मचाते हैं; हमारे पास ही अनुभव नहीं है जिस अनुभव के लिए हम इतने जारे से चिल्लातें हैं कि हमारे पास है। हमारी मुटिठयां खाली हैं और हमारे प्राण खाली हैं। किताबें हैं हमारे पास, इतिहास है हमारे पास महापुरुषों का। लेकिन हम? हम धार्मिक नहीं हैं, हम आध्यात्मिक भी नहीं है। बल्कि हालतें उल्टी हो गई हैं। चूंकि हमने यह बुनियादी बेईमानी की है अपने साथ कि बिना अपने को आध्यात्मिक हुए हमने अपने आध्यात्मिक समझ लिया है, हम बहुत धोखे में पड़ गए हैं।

धोखा ऐसा है कि हमने हर चीज को झूठ शक्ल देने का उपाय कर लिया। हर चीज को, हर बात को हमने एक प्रवंचना और डिसेप्शन बना लिया। क्योंकि सीधे हम उसे स्वीकार नहीं कर सकते। हम सीधे उस बात को अंगीकर नहीं कर सकते कि हमारे भीतर है। हम धन भी इकट्ठा करते हैं, लेकिन धन को गाली देते हुए इकट्ठा करते हैं।

-ओशो
पुस्तकः नये समाज की खोज
प्रवचन नं. 13 से संकलित
पूरा प्रवचन एम.पी.थ्री. एवं पुस्तक में उपलब्ध है