Osho World Online Hindi Magazine :: September 2012
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  ओशो दर्शन
 
 

भक्ति और परमात्मा

भक्ति को समझने में, इस बात को जितना गहराई से समझ लो; उतना उपयोगी होगाः भक्ति परमात्मा की खोज नहीं हैः भक्ति परमात्मा के द्वारा मनुष्य की खोज है...

ज्ञान, कर्म, योग, उन सबका सार-सूत्र है प्रयास।

ज्ञान, कर्म, योग मनुष्य की चेष्टा पर निर्भर हैं; भक्ति परमात्मा के प्रसाद पर। स्वभावतः भक्ति अतुलनीय है। न कर्म छू सकता है उस ऊंचाई को, न ज्ञान, न योग।

मनुष्य का प्रयास ऊंचा भी जाए तो कितना? मनुष्य करेगा भी तो कितना? मनुष्य का किया हुआ मनुष्य से बड़ा नहीं हो सकता। मनुष्य जो भी करेगा, उस पर मनुष्य की छाप रहेगी। मनुष्य जो भी करेगा उस पर मनुष्य की सीमा का बंधन रहेगा।

भक्ति मनुष्य में भरोसा नहीं करती; भक्ति परमात्मा में भरोसा करती है। एक बहुत अनूठा भक्त हुआः बायजीद बिस्तामी। कहा है उसने, तीस साल तक निरंतर परमात्मा को खोजने के बाद, एक दिन सोचा तो दिखायी पड़ाः 'मेरे खोजे वह कैसे मिलेगा, जब तक वही मुझे न खोजता हो?' तब खोज छोड़ दी, और खोज छोड़कर ही उसे पा लिया।

तीस साल या तीस जन्मों की खोज से भी उसे पाया नहीं जा सकता, क्योंकि खोजेंगे तो हम-अंधे, अंधकार में डूबे, पापग्रस्त, सीमा में बंधे भूल चूकों का ढेर हैं हम। हम ही तो खोजेंगे उसे! रोशनी कहां है हमारे पास उसे खोजने को? हमारे पास हाथ कहां जो उसे टटोलें? कहां से लाएं हम वह दिल जो उसे पहचाने?

खोजी एक दिन पाता है कि नहीं, मेरे खोजे तू न मिलेगा, जब तक कि तू ही मुझे न खोजता हो। और बायजीद ने कहा है, जब उसे पा लिया तो जाना कि यह भी मेरी भ्रांति थी कि मैं उसे खोज रहा था। वही मुझे खोज रहा था।

जब तक परमात्मा ने ही तुम्हें खोजना शुरू न कर दिया हो, तुम्हारे मन में उसे खोजने की बात न उठेगी। यह बात बड़ी विरोधाभासी लगेगी, लेकिन बड़ा गहन सत्य है।

परमात्मा को केवल वे ही लोग खोजने निकलते हैं जिनको परमात्मा ने खोजना शुरू कर दिया। जो उसके द्वारा चुन ही लिये गये हैं, वे ही केवल उसे चुनते हैं। जो किसी भांति उनके हृदय में आ ही गया है, वे ही उसकी प्रार्थना में तत्पर होते हैं।

तुम्हारे भीतर से वही उसको खोजता है। सारा खेल उसका है। तुम जहां भी इस खेल में कर्ता बन जाते हो, वहीं बाधा खड़ी हो जाती है, वहीं दरवाजे बंद हो जाते हैं।

तुम खाली रहो, उसे खोजने दो तुम्हारे भीतर से, तो तत्क्षण इस क्षण भी उस महाक्रांति का आविर्भाव हो सकता है।

भक्ति को समझने में, इस बात को जितना गहराई से समझ लो; उतना उपयोगी होगाः भक्ति परमात्मा की खोज नहीं हैः भक्ति परमात्मा के द्वारा मनुष्य की खोज है।

मनुष्य हारकर समर्पण कर देता है, थककर समर्पण कर देता है, पराजित होकर झुक जाता है-कहता है, 'अब तू ही उठा तो उठा! अब तू ही सम्हाल तो सम्हाल! अब अपने से सम्हाला नहीं जाता! जो मै कर सकता था, किया; जो मैं हो सकता था, हुआ-लेकिन मेरे किये कुछ भी नहीं हो पाता! मेरा किया सब अनकिया हो जाता है। जितना सम्हालता हूं उतना ही गिरता हूं। जितनी कोशिश करता हूं कि ठीक राह पर आ जाऊं, उतना ही भटकता हूं। अब तू ही चल! जन्म तेरा है, जीवन तेरा है, मौत तेरी है-प्रार्थना मेरी कैसे होगी?

पहला सूत्र है आजः 'वह भक्ति, वह प्रेमरूपा भक्ति, कर्म, ज्ञान और योग से भी श्रेष्ठतर है।'

श्रेष्ठता यही है कि वह अनंत के द्वारा तुम्हारी खोज है।

गंगा सागर की तरफ जाती है, तो ज्ञान, तो योग, तो कर्म। जब सागर गंगा की तरफ आता है, तो भक्ति।

भक्ति ऐसे है जैसे छोटा बच्चा पुकारता है, रोता है, मां दौड़ी चली आती है।

भक्ति बस तुम्हारा रुदन है!

तुम्हारे हृदय से उठी आह है!

भक्ति तुम्हारे जीवन की सारी खोज की व्यर्थता का निवेदन है। भक्ति तुम्हारे आंसुओं की अभिव्यक्ति है। तुम कहीं जाते नहीं, तुम जहां हो वहीं ठिठककर रह जाते हो। एक सत्य तुम्हारी समझ में आ जाता है कि तुम ही बस गलत हो; तुम गलत करते हो, ऐसा नहीं।

कर्मयोग कहता हैः तुम गलत करते हो, ठीक करो तो पहुंच जाओगे।

ज्ञानयोग कहता हैः तुम गलत जानते हो, ठीक जान लो, पहुंच जाओगे।

योगशास्त्र कहता हैः तुम्हें विधियां पता नहीं है, मार्ग पता नहीं है। विधियां सीख लो, मार्ग सीख लो, तकनीकि की बात है, पहुंच जाओगे।

भक्ति कहती हैः तुम ही गलत हो। न ज्ञान से पहुंचोगे, न कर्म से पहुंचोगे, न योग से पहुंचोगे। तुम तुमसे छूट जाओ, तो पहुंचना हो जाएगा। तुम न बचो तो पहुंचना हो जाएगा।

पहले तुम अज्ञान में थे, फिर तुम ज्ञान में भी रहोगे-फर्क बहुत न पड़ेगा। फर्क तो पड़ेगा, बहुत न पड़ेगा। फर्क ऐसा ही होगा कि जंजीरे लोहे की थीं, उन पर सोना मढ़ लोगे! कारागृह कुरूप था दुर्गंधयुक्त था, तुम सुगंधे छिड़क लोगे, रंग रोगन कर लोगे, कारागृह को सजा लोगे!

-ओशो
पुस्तकः भक्ति-सूत्र
प्रवचन नं. 7 से संकलित
पूरा प्रवचन एम.पी.थ्री. एवं पुस्तक में उपलब्ध है।

अंधकार से प्रकाश की ओर...

आलोक के प्रति निराश होने का कोई कारण नहीं है। वस्तुतः अंधकार जितना घना होता है, प्रभात उतना ही निकट आ जाता है...

मैं मनुष्य को एक घने अंधकार में देख रहा हूं। जैसे अंधेरी रात में किसी घर का दीया बुझ जाये, ऐसा ही आज मनुष्य हो गया है। उसके भीतर कुछ बुझ गया है।

पर- जो बुझ गया है, उसे प्रज्वलित किया जा सकता है।

और, मैं मनुष्य को दिशाहीन हुआ देख रहा हूं। जैसे कोई नाव अनंत सागर में राह भूल जाती है, ऐसा ही आज मनुष्य हो गया है। वह भूल गया है कि उसे कहां जाना है और क्या होना है?

पर, जो विस्मृत हो गया है, उसकी स्मृति को उसमें पुनः जगाया जा सकता है।

इसलिए, अंधकार है, पर आलोक के प्रति निराश होने का कोई कारण नहीं है। वस्तुतः अंधकार जितना घना होता है, प्रभात उतना ही निकट आ जाता है।

मैं देख रहा हूं कि सारे जगत में एक आध्यात्मिक पुनरुत्थान निकट है और एक नये मनुष्य का जन्म होने के करीब है। हम उसकी ही प्रसव-पीड़ा से गुजर रहे हैं।

पर, यह पुनरुत्थान हम सबके सहयोग की अपेक्षा में है। वह हम से ही आने को है, और इसलिए हम केवल दर्शक ही नहीं हो सकते हैं। उसके लिए हम सब को अपने में राह देनी है।

हम सब अपने आपको आलोक से भरें तो ही प्रभात निकट आ सकता है। उसकी संभावना को वास्तविकता में परिणत करना हमारे हाथों में है।

हम सब भविष्य के उस भवन की ईंटे हैं। और, हम ही हैं वे किरणे जिनसे भविष्य के सूरज का जन्म होगा। हम दर्शन नहीं, स्रष्टा हैं।

और, इसलिए वह भविष्य का ही निर्माण नहीं, वर्तमान का भी निर्माण है। वह हमारा ही निर्माण है। मनुष्य स्वयं का ही सृजन करके मनुष्यता का सृजन करता है। व्यक्ति ही समष्टि की इकाई है। उसके द्वारा ही विकास है और क्रांति है।

वह इकाई आप हैं।

इसलिए, मैं आपको पुकारना चाहता हूं। मैं आपको निद्रा से जगाना चाहता हूं।

क्या आप नहीं देख रहे हैं कि आपका जीवन एक बिलकुल बेमानी, निरर्थक और उबा देने वाली घटना हो गया है? जीवन ने सारा अर्थ और अभिप्राय खो दिया है। मनुष्य के भीतर प्रकाश न हो तो उसके जीवन में अर्थ नहीं हो सकता है।

मनुष्य के अंतस में ज्योति न हो, तो जीवन में आनंद नहीं हो सकता है।

हमें जो आज व्यर्थ बोझ मालूम हो रहा है, उसका कारण यह नहीं है कि जीवन ही स्वयं में व्यर्थ है। जीवन तो अनंत सार्थकता है, पर हम उस सार्थकता और कृतार्थता तक जाने का मार्ग भूल गये हैं। वस्तुतः हम केवल जी रहे हैं, और जीवन से हमारा कोई संबंध नहीं है। यह जीवन नहीं है। यह केवल मृत्यु की प्रतीक्षा है

और, निश्चय ही मृत्यु की प्रतीक्षा केवल एक ऊब ही हो सकती है। वह आनंद कैसे हो सकती है?

मैं आपसे यही कहने का आया हूं कि इस दुःख-स्वप्न से बाहर होने का मार्ग है, जिसे कि आपने भूल से जीवन समझ रखा है।

वह मार्ग सदा से है। अंधकार से आलोक ले जाने वाला मार्ग शाश्वत है।

वह तो है, पर हम उससे विमुख हो गये हैं। मैं आपको उसके सन्मुख करना चाहता हूं।

वह मार्ग ही धर्म है। वह मनुष्य के भीतर दीया जलाने का उपाय है। वह मनुष्य की दिशाहीन नौका को दिशा देना है।

महावीर ने कहा हैः

जरामरण वेगेणं, बुज्झमाणाण पाणिणं।

धम्मो दीवो पइट्ठा य, गई सरणमुत्तमं।।

-संसार के जन्म और मरण के वेगवाले प्रवाह में बहते हुए जीवों के लिए धर्म ही एकमात्र द्वीप है, प्रतिष्ठा है, गति है और शरण है।',

क्या आप उस प्रकाश के लिए प्यासे हैं, जो जीवन को आनंद से भर देता है? और, क्या आप उस सत्य के लिए अभीप्सु हैं, जो अमृत से संयुक्त कर देता है?

मैं तब आपको आमंत्रित करता हूं-आलोक के लिए और आनंद के लिए और अमृत के लिए। मेरे आमंत्रण को स्वीकार करें! केवल आंख ही खोलने की बात है, और आप एक नये आलोक के लोक के सदस्य हो जाते हैं।

और कुछ नहीं करना है, केवल आंख ही खोलनी है। और कुछ नहीं करना है, केवल जागना है और देखना है।

मनुष्य के भीतर वस्तुतः कुछ बुझता नहीं है-और न ही दिशा खो सकती है। वह आंख बंद किये हो तो अंधकार हो जाता है और सब दिशाएं खो जाती है। आंख बंद होने से वह सर्वहारा है और आंख खुलते ही सम्राट हो जाता है।

मैं आपको सर्वहारा होने के स्वप्न से, सम्राट होने की जागृति के लिए बुलाता हूं। मै आपकी पराजय को विजय में परिणत करना चाहता हूं, और आपके अंधकार को आलोक में, और आपकी मृत्यु को अमृत में-लेकिन क्या आप भी मेरे साथ इस यात्रा पर चलने का राजी हैं?''

-ओशो
ओशो साहित्य के प्रथम सोपानः
'साधना पथ' से सकंलित

जीवन ही प्रभु है...

अगर जिदंगी में बड़ी यात्रा करनी हो और जीवन को उन महान रास्तों पर ले जाना हो कि जीवन में महानता का सूर्य निकले, तब तो फिर बहुत कुछ करना पड़ेगा। खुद को मिटाना पड़ेगा, नया करना पड़ेगा; खुद को बदलना पड़ेगा। मेहनत की बात होगी, श्रम लगेगा, साधना लगेगी...

'जीवन ही है प्रभु इस संबंध में एक मित्र ने पूछा है, कैसे दिखाई पड़े फिर हमें कि जीवन ही प्रभु है। क्योंकि हमें तो चारों ओर दोष ही दिखाई पड़ते हैं। सबमें दोष दिखाई पड़ते हैं। 'क्यों दिखाई पड़ते है सबमें दोष?' इस संबंध में उन्होंने पूछा है।

प्रभु की खोज में एक सूत्र यह भी है, इसलिए इसे समझ लेना जरूरी है। निश्चित ही दोष दिखायी पड़ते हैं दूसरों में। कारण क्या है? कारण है सिर्फ एक--अपने अहंकार की तृप्ति। दूसरे में दोष दिखायी पड़ता है। दूसरे में दोष की खोज चलती है। उसका राज छोटा-सा है।

शायद यह घटना सुनी होगी कि अकबर ने एक दिन अपने दरबार में एक लकीर खींच दी और अपने दरबारियों से कहा, इसे बिना छुए, बिना मिटाए छोटी कर दो। वे वे बहुत हार गये परेशान हो गये। बीरबल उठा और उसने एक बड़ी लकीर खींच दी। उसी छोटी लकीर के पास एक बड़ी लकीर खींच दी। वह लकीर उतनी ही रही, न मिटायी, न छोटी की, लेकिन छोटी हो गयी।

जब हम दूसरे में दोष की तलाश में निकल जाते हैं, तब हम दूसरे की लकीर छोटी कर रहे है; ताकि हमें अपनी लकीर बड़ी मालूम पड़ने लगे। अपने को बड़ा देखने का सरलतम रास्ता यही है कि हम दूसरे को छोटा करके देखना शुरू कर दें। दूसरा रास्ता अपने को बड़ा करने का बहुत कठिन है, कि हम सच में अपने को बड़ा करें। उसमें अपने को छूना पड़ेगा, बदलना पड़ेगा, मिटाना पड़ेगा, नया करना पड़ेगा। सरल रास्ता यह है कि अपने को छूना ही न पड़े। अपने में कुछ फर्क ही न करना पड़े। हम जैसे हैं वैसे ही रहें, और बड़े हो जायें। तो सरल रास्ता यह है कि हमारे पास जो भी आते हो, उनको हम छोटा करके देखें।

अगर जिदंगी में बड़ी यात्रा करनी हो और जीवन को उन महान रास्तों पर ले जाना हो कि जीवन में महानता का सूर्य निकले, तब तो फिर बहुत कुछ करना पड़ेगा। खुद को मिटाना पड़ेगा, नया करना पड़ेगा; खुद को बदलना पड़ेगा। मेहनत की बात होगी, श्रम लगेगा, साधना लगेगी। इतनी मेहनत में जाने को कोई आतुर नहीं है, उत्सुक नहीं है। तो सरल तरकीब, शार्ट कट, निकटतम का रास्ता-जिसमें बिना कुछ किये मुफ्त में हम बड़े हो जाते हैं, वह एक ही है कि जो भी हमारे निकट आता हो, उसे हम छोटा करके देख लें। और जब हम तय ही कर लें किसी को छोटा करके देखने का तो दुनिया की कोई ताकत हमें रोक नहीं सकती। क्योंकि हमारी मर्जी की बात है। हम छोटा करके देख ही सकते हैं। हम किसी को भी छोटा करके देख सकते हैं।

लेकिन इस भांति जो हमारे भीतर बड़ा हो जाता है, वह हमारी आत्मा नहीं है। इस भांति जो हमारे भीतर बड़ा हो जाता है, उसी का नाम अहंकार है। अगर हम अपने को बदलेंगे तो आत्मा बड़ी हो जायेगी। इतनी बड़ी हो सकती है कि पूरे परमात्मा के साथ एक हो जाये। अपने को बदलेंगे तो आत्मा बड़ी होगी और अपने को बिना बदले अगर बड़ा करना है तो अहंकार बड़ा होगा, मैं बड़ा हो जाऊंगा।

आत्मा तो और छोटी हो जायेगी।

और यह भी ध्यान रहे, अहंकार जितना बड़ा होगा, आत्मा उतनी छोटी हो जाएगी और अहंकार जितना छोटा होगा, आत्मा उतनी बड़ी हो जाएगी।

तो जो व्यक्ति भी अपने अहंकार को बड़ा करने में लगा है, वह जाने अनजाने बहुत गहरे अर्थों में नुकसान उठा रहा है। हां, ऊपर उसे फायदे दिखायी पड़ेंगे। अहंकार को बड़ा करके देखेगा, दूसरे छोटे दिखायी पडेंगे, खुद बड़ा दिखायी पड़ेगा। लेकिन जितना अहंकार बड़ा होगा, उतनी भीतर आत्मा छोटी होती चली जाएगी। और जितना अहंकार बड़ा होगा, परमात्मा से मिलन का रास्ता उतना ही मुश्किल होता चला जाएगा। क्योंकि मेरे 'मै' के अतिरिक्त मुझे और कोई भी रोके हुए नहीं है। और जब तक मैने जिद की है कि मैं 'मैं' रहूंगा तब तक मैं विराट से मिल नहीं सकता हूं। वही तो बाधा बनेगी। इसीलिए हम दूसरे में दोष देखने के लिए आतुर होते हैं।

इसका यह मतलब नहीं है कि दूसरों में दोष नहीं होते। इसका यह मतलब भी नहीं कि दूसरों में दोष हैं ही नहीं। दूसरों में दोष हों या न हो, यह सवाल गौण है महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या हम दूसरों में दोष देखकर अपने को बड़ा करने की चेष्टा में संलग्न हैं? अगर हम इस चेष्टा में सलंग्न हैं तो हम बहुत आत्मघाती हैं। हम अपने हाथ से अपने को नुकसान पहुंचा रहे हैं, किसी और को नहीं। जिसके हम दोष देख रहे हैं उसे तो फायदा भी हो सकता है, हमारे दोष देखने से। लेकिन हमें फायदा नहीं हो सकता। हो सकता है, हमारे दोष देखने से वह दोष को बदलने में लग जाये। वह अपनी कमियों को बदलने में लगे जाए, हमारे दोष देखने से। लेकिन अगर हमारा अहंकार तृप्ति होता हो तो हम बहुत खतरनाक ढंग से अपने ही हाथ-पैर काटने में लगे हैं। हमें कोई हित न होगा।

लेकिन एक इससे उल्टी भ्रांति भी चलती है। एक भ्रांति तो यह है कि हम सबमें दोष ही देखेंगे। इससे एक उल्टी भ्रांति भी है कि अगर दोष होंगे भी तो हम आंख बंद कर लेंगे, हम दोष न देखेंगे। वह उल्टी भ्रांती भी खतरनाक हो सकती है; और वह भी अहंकार को बढ़ाने वाली हो सकती है। अगर मैंने यह तय कर लिया है कि मैं किसी के दोष देखूंगा ही नहीं तो मेरे भीतर एक नये तरह का अहंकार बढ़ना शुरु होगा कि मैं ऐसा आदमी हूं जो किसी के दोष कभी नहीं देखता। चोर सामने चोरी करेगा तो मैं आंखें बंद कर लूंगा और चार गुंडे एक स्त्री पर हमला करेंगे तो मैं पीठ फेरकर अपने रास्ते पर चला जाऊंगा। मैं किसी के दोष नहीं देखता हूं। और चूंकि मैं दोष नहीं देखता हूं इसलिए मैं एक बहुत महान आदमी हूं।

पहली भूल में अहंकार तृप्त होता है, दूसरी भूल में भी तृप्त हो सकता है। इसलिए असली सवाल दोष देखने और न देखने का नहीं है। सवाल है कि देखने से, न देखने से अहंकार को तो नहीं भर रहे हैं हम अपने? लेकिन जो आदमी अहंकार नहीं भर रहा है, वह सिर्फ देखता है। उसे दोष दिखायी पड़ सकते है, निर्दोषता भी दिखायी पड़ सकती है। वह वही देखता है जो है, उसे जो है के देखने से अपने अहंकार को न भरता है, न छोटा करता है, न बड़ा करता है।

-ओशो
पुस्तकः जीवन ही है प्रभु
प्रवचन नं. 4 से संकलित

पाप और पुण्य

भीतर का दीया जला हो, तो वह जो भी करे वह पुण्य होगा। हो सकता है ऊपर से दिखाई पड़े की यह तो पुण्य नहीं, यह कर्म तो पुण्य नहीं; लेकिन वह पुण्य ही होगा। असंभव है कि उससे पाप हो जाए। क्योंकि जिसका बोध जाग्रत है उससे पाप कैसे हो सकता है? उससे पाप नहीं हो सकता...

भीतर दीया जला हो चैतन्य का, तो जो कर्म होते हैं वे पुण्य हैं। भीतर दीया बुझा हो, तो जो कर्म होते हैं वे पाप हैं। समझ लेना आप! कोई कर्म न तो पाप होता है, न पुण्य होता है। पुण्य और पाप करने वाले पर निर्भर होते हैं। कोई कर्म पाप और पुण्य नहीं होता। आमतौर से हम यही मानते हैं की कर्म पुण्य और पाप होते हैं। यह काम बुरा है और वह काम अच्छा है।

यह बात नहीं है। जिस आदमी के भीतर का दीया बुझा है वह कोई अच्छा काम कर ही नहीं सकता। यह असंभव है। दिख सकता है कि अच्छा काम कर रहा है। जिनके भीतर दीए जले रहे हैं उनके कर्मों का अनुकरण कर सकता है। लेकिन अनुकरण में भी वासना उसकी विपरीत होगी। अगर वह मंदिर बनाएगा, तो वह परमात्मा का नहीं होगा, अपने पिता का होगा, उनका लिखवा देगा। अगर वह किसी को दान देगा, तो फिकर में होगा कि अखबारनवीस, जर्नलिस्ट आस-पास हैं या नहीं। वे खबर छापते हैं या नहीं छापते। वह दान प्रेम और करुणा नहीं होगी, वह भी अहंकार का प्रकाशन होगा। अगर वह किसी की सेवा करेगा, तो वह सेवा सेवा नहीं होगी। वह सेवा के गुणगान भी करेगा, करवाना चाहेगा। वह कहेगा, मैं सेवक हूं! वह चाहेगा कि लोग मानें कि मैंने सेवा की है। वह जो भी करेगा, उसके करने के पीछे चूंकि दिया जला हुआ नहीं है, इसलिए काम अच्छे दिखाई पड़ें भला, पाप ही होंगे। भीतर दीया जला न हो, तो जो भी हो सकता है वह पाप ही हो सकता है। पाप मेरे लिए चित्त की एक दशा है, कर्म का स्वरुप विभाजन नहीं।

और अगर भीतर का दीया जला हो, तो वह जो भी करे वह पुण्य होगा। हो सकता है ऊपर से दिखाई पड़े की यह तो पुण्य नहीं, यह कर्म तो पुण्य नहीं; लेकिन वह पुण्य ही होगा। असंभव है कि उससे पाप हो जाए। क्योंकि जिसका बोध जाग्रत है उससे पाप कैसे हो सकता है? उससे पाप नहीं हो सकता।

लेकिन हम कर्म के ताल पर चीजों को नापते-तौलते हैं। कल या परसों मैंने आपसे कहा, आचरण बहुत मूल्यवान नहीं है, अंतस मूल्यवान है। तो अंतस पाप की स्थिति में हो सकता है यदि अंधकार से भरा है; अंतस पुण्य की स्थिति में होता है अगर वह प्रकाश से भरा है। प्रकाशपूर्ण चित्त पुण्य की दशा में है; अंधकारपूर्ण चित्त पाप की दशा में है। ये कर्म के लक्षण नहीं हैं। ये कर्म के बिलकुल लक्षण नहीं हैं। कर्म का लक्षण, कर्म का लक्षण कुछ भी नहीं करता। क्योंकि व्यक्ति भीतर बिलकुल दुर्जन हो सकता है, आचरण बाहर सज्जन का कर सकता है-अनेक कारणों से।

हम इतने लोग यहां बैठे हैं, शायद सोचते होंगे की हम चोरी नहीं करते तो हम बड़ा पुण्य करते हैं। लेकिन अगर आज पता चल जाए कि हुकूमत नष्ट हो गई, चौरस्ते पर कोई पुलिस का आदमी नहीं है, अब कोई अदालत न रही, अब कोई सिपाही नहीं, अब कोई कानून नहीं। फिर पता चलेगा कितने लोग चोरी नहीं करते हैं। आप सोचते होंगे कि हम चोरी नहीं करते तो बड़ा पुण्य का काम कर रहे हैं।

चोरी न करना काफी नहीं है, चित्त में चोरी के न होने का सवाल है। आपको अगर सबको सुविधा और पूरा मौका मिल जाए, मुश्किल से कोई बचेगा जो चोरी न करे। तो यह जो अचोरी है, यह फिर पुण्य नहीं है। यह केवल भय और दहशत और डर, कमजोरी, और अनेक बातें हैं जिनकी वजह से आप चोरी नहीं कर रहे हैं। आपको मौका नहीं है, भयभीत हैं, कमजोर हैं, डरे हुए हैं; उस डर को, भय को छिपाने के लिए, अदालत से, नरक से घबड़ाए हुए हैं, उसको छिपाने के लिए आप कहते हैं, मैं तो चोरी नहीं करता, चोरी करना बहुत बुरी बात है। मैं तो चोरी करने का बुरा काम करता ही नहीं।

जो आदमी कर रहा है चोरी, उसमें आप में हो सकता है केवल सामर्थ्य का और साहस का फर्क हो। केवल सामर्थ्य और साहस का फर्क हो, वह ज्यादा साहसी हो। या हो सकता है विवेकहीन हो! इसलिए विवेकहीन में ज्यादा साहस दिखाई पड़ जाता है। क्योंकि उसे समझ में नहीं आता है कि मैं क्या कर रहा हूं, क्या परिणाम होगा! आप सब हिसाब-किताब सोचते हैं।

लेकिन अगर सारी चोरी की सुविधाएं हों, सारी चोरी की भीतर अनुकूल परिस्थिति हो, और फिर कोई आदमी चोरी न करे, तो बहुत अलग बात हो जाएगी, बहुत अलग बात हो जाएगी। अगर यह भी कोई कह दे कि चोरी करने वाले अब नरक नहीं जाएंगे बल्कि स्वर्ग जाएंगे; कोई धर्मशास्त्र यह भी कहने लगे कि अब चोरी करने वाले, अब कानून बदल गया परमात्मा का, अब वे उनको नरक नहीं भेजते, अब उनको स्वर्ग भेजते हैं; फिर भी कोई आदमी चोरी न करे। अगर यह पता चल जाए कि अब चोरी करने वालों को कष्ट नहीं दिया जाता बल्कि सम्मान मिलता है, और राष्ट्रपति जो हैं वह उनको पुरस्कार देते हैं और पदवियां देते हैं, और भगवान भी अब उनका सत्कार करने लगे हैं; फिर भी कोई चोरी न करे। अगर कोई यह कहे कि जो चोरी नहीं करेगा उसको नरक में डाला जायेगा और सड़ाया जायेगा; और फिर भी चोरी न कर सके। तब तो समझना कि उसके चित्त कि स्थिति अचोरी की हो गई है। नहीं तो उसकी चित्त की स्थिति अचोरी की नहीं है। यह सारी बात है।

अब जैसे हिंदुस्तान-पाकिस्तान का झगड़ा हुआ या हिंदुस्तान-पाकिस्तान का बंटवारा हुआ। जब बंटवारा हुआ, तो जो पड़ोस में थे, भले लोग थे, मंदिर जाते थे, मस्जिद जाते थे, वे एक-दूसरे कि छाती में छुरा भोंकने लगे, क्योंकि मौका मिल गया। उसके पहले मौका नहीं था तो वे मस्जिद जाते थे; अब मौका मिल गया तो छुरा भोंकने लगे। मौका नहीं मिलता था तो मंदिर में प्रार्थना करते थे; मौका मिल गया तो मकान में आग लगाने लगे।

कल जब ये मंदिर जा रहे थे तब आप सोचते हैं ये दूसरे आदमी थे? यह छुरा भोंकने वाला आदमी कल भी मौजूद था। लेकिन परिस्थिति नहीं थी इसलिए प्रकट नहीं हो रहा था, छिपा हुआ था। आज परिस्थिति प्रकट होने की हो गई है, यह प्रकट हो गया। कल मालूम हो रहा था की मंदिर जाना पुण्य है; आज पता चल रहा है कि दस हजार हिंदुओ को काट सकता है, आग लगा सकता है या मुसलमानों को आग लगा सकता है। यह वही आदमी है।

मेरे गांव में वहां हिंदू-मुस्लिम दंगे हुए, तो मैंने देखा कि वे ही लोग जिनको हम समझते हैं भले हैं, जो रोज सुबह गीता उठकर पढ़ते हैं, वे इकट्ठे करने लगे कि किस तरह मुसलमानों को काटा जाए। तो मैं मानता हूं, जब वे गीता को पढ़ते थे, यही के यही आदमी थे। गीता आगे पढ़ रहे थे, भीतर वही काटना-पीटना छिपा था, मौजूद था। परिस्थिति नहीं थी। परिस्थिति सामने आ गई, एक नारा खड़ा हो गया कि हिंदू-मुसलमान में दंगा हो गया। इतनी सी बात अखबार में छप गई और यह आदमी बदल गया! यह मकान जलाने कि सोचने लगा! यह वही का वही आदमी है, मौका इसे नहीं था। अब बहाना मिल गया; अब एक मौका मिला कि अपनी हिंसा दिखा सकता है एक बहाने का नाम लेकर। एक स्लोगन-कि मैं हिंदू हूं और हिंदू धर्म खतरे में है, मुसलमान को खतम करो! अब यह बहाना मिल गया, अब यह खतरा कर सकता है।

इनको कोई भी मिल जाए-गुजराती और मराठी में झगड़ा हो जाए, हिंदी बोलने वाले और गैर-हिंदी बोलने वालों में विरोध हो जाए-तो ये आग लगाने लगेंगे, हत्या करने लगेंगे। इनका सब धर्म, इनकी सब अहिंसा, इनकी सब नैतिकता एक तरफ धरी रह जाएगी। तो इनकी नैतिकता चल रही थी वह बिलकुल झूठी थी, उसका कोई मूल्य नहीं था। इनकी जो अहिंसा चल रही थी, बिलकुल थोथी थी, उसका कोई मूल्य नहीं है। इनके भीतर ये सब चीजें छिपी थीं, अवसर कि तलाश थी।

आप दुनिया को अवसर दे दें, यह जमीन इसी वक्त नरक हो सकती है इसी क्षण। आप नरक का पूरा इंतजाम किये बैठे हैं। लेकिन मंदिर भी जाते हैं, दान भी करते हैं, ग्रंथ भी पढ़ते हैं, सदगुरु के चरणों में प्रणाम भी करते हैं। ये बातें भी है, और आप अभी नरक बना दें इसी जगह को इसी क्षण, एक सेकेंड में यह नरक हो जाए। एक नारा उठे और यह अभी नरक हो जाए। अभी जिस आदमी के पास बैठ कर आप बड़े धार्मिक बने बैठे हैं उसी की गर्दन दबा सकते हैं इसी वक्त। तो मेरा मानना यह है कि आप जब नहीं दबा रहे हैं तब भी आप दबाने कि स्थिति में तो हैं; नहीं तो एकदम से कैसे स्थिति आ जाएगी?

पाप की स्थिति होती है, पाप का कर्म नहीं होता। वह स्टेट ऑफ माइंड है। और जब तक हम उसको कर्म समझेंगे, तब तक दुनिया में बहुत क्रांति नहीं हो सकती। क्योंकि कर्म का कोई पता नहीं चलता। कर्म तो मौके-मौके पर प्रकट होते हैं और अच्छे-अच्छे बहाने लेकर प्रकट हो जाते हैं। अच्छे-अच्छे बहाने ले लेते हैं और प्रकट हो जाते हैं। इसीलिए यह संभव हुआ है कि दुनिया में कोई भी शैतान आदमी, कोई भी हुकूमत, कोई भी पोलिटीशियन, कोई भी राजनीतिज्ञ किसी भी क्षण दुनिया को युद्ध में डाल सकता है, किसी भी क्षण! क्योंकि सारे लोग तैयार हैं पाप करने को, बिलकुल तैयार हैं। मौका नहीं है उनको। किसी भी क्षण, कोई भी बहाना-डेमोक्रेसी का, कम्युनिज्म का, भारत का, पाकिस्तान का, हिंदू का, मुसलमान का-कोई भी नारा, जरा सी आग पकड़ाने कि जरुरत है और आप दुनिया को एकदम पाप से भर सकते हैं। फिर लाखों को काट सकते हैं और मजा लेंगे।

ये वे ही लोग जो पानी छान कर पीते हैं, यह खबर सुन कर प्रसन्न होते हैं कि पाकिस्तान का फलां गांव बर्बाद कर दिया गया। या हिंदुस्तान का फलां गांव बर्बाद कर दिया गया; वही आदमी जो रोज नमाज पढ़ता है, वह प्रसन्न होता है कि अच्छा हुआ।

मैं यह समझ नहीं सकता कि यह आदमी जो पानी छान कर पीता था, अखबार में पढ़ता है, रात को खाना नहीं खाता था, अखबार में पढ़ता है कि इतने पाकिस्तानी मर गए, तो सोचता है बहुत अच्छा हुआ। यह आदमी अहिंसक है? इसका पानी छान कर पीना धोखा है, बेईमानी है। इसका रात को न खाना सब झूठी बकवास है। इसका कोई मतलब और मूल्य नहीं है। इसका स्टेट ऑफ माइंड तो पाप का है। यह कर्म-वर्म कुछ भी करे, इसकी चित्त कि दशा तो पापपूर्ण है।

इसलिए दुनिया को कभी किसी भी भूकंप में डाला जा सकता है, किसी भी उपद्रव में डाला जा सकता है। लोगों के काम तो बड़े अच्छे मालूम होते हैं, लेकिन चित्त कि दशा जरा ही, स्किनडीप, जरा सी चमड़ी उघाड़ो, भीतर पाप मौजूद है। और काम बड़े अच्छे-अच्छे कर रहे हैं।

टॉल्सटॉय ने लिखा है कि मैं एक दिन सुबह-सुबह चर्च में गया। अंधेरा था, सर्दी के दिन थे बर्फ पड़ती थी, कोई नहीं था चर्च में, मैं गया। एक और आदमी था, वह कन्फेशन कर रहा था भगवान के सामने। उसे पता नहीं की कोई दूसरा भी अंधेरे में मौजूद है, नहीं तो कन्फेशन करता ही क्यों? वह वहां कह रहा था कि हे परमपिता, मैं बड़ा बुरा आदमी हूं, मेरे मन में बड़े पाप उठते हैं, तू मुझे क्षमा कर! चोरी का भाव भी आता है, पर-स्त्री-गमन का भाव भी आता है, दूसरे के धन को हड़प लेने की वृति भी पैदा होती है, तू क्षमा कर! उसे पता नहीं था की यहां कोई और आदमी भी खड़ा है। वह चर्च से बाहर निकला, टॉल्सटॉय उसके पीछे हो लिया। जब बीच बाजार में पहुंचे, सुबह हो गई थी, लोग आ-जा रहे थे, उसने चिल्ला कर कहा कि ओ पापी, चोर, खड़ा रह!

वह आदमी बोला, अरे, कौन कहता है मुझसे पापी और चोर?

टॉल्सटॉय ने कहा कि मैं चर्च में मौजूद था, मैंने सुन लिया है।

उस आदमी ने कहा, अगर दुबारा मुंह से निकला तो अदालत में अपमान का मुकदमा चलाऊंगा। वह बड़ा प्रतिष्ठित आदमी था गांव का। वह मैंने भगवान के सामने कहा था, तुम्हारे सामने नहीं कहा था।

टॉल्सटॉय ने कहा, मैंने तो यह सोचा कि तूने मान लिया है कि तू पापी है, चोर है। लेकिन तू मानने को राजी नहीं। अदालत में मुकदमा चलाएगा?

यह स्थिति है हमारे चित्त की। भीतर तो वह छिपा है और बाहर हम अदालत में मुकदमा चलाएंगे अगर कोई हमसे चोर कह दे, हम शिकायत करेंगे कि यह क्या आपने हमसे कह दिया! तो हमारा कर्म हमारा ऊपर का आवरण मूल्य नहीं रखता। मूल्य तो अंतस रखता है। उस अंतस की क्रांति की बात है।

तो मैं मानता हूं, पाप-पुण्य कर्मो में नहीं होते, पाप-पुण्य होते हैं चित्त की दशाओं में। एक आदमी की चित्त की दशा पाप की हो, अंधकार की हो, तो वह कुछ भी करे, कुछ भी करे, कितना भी पानी छाने, कितनी ही बार छाने, उसकी हिंसा नहीं मिटेगी। और कितना ही रात को खाए, न खाए, कितना ही उपवास करे, न करे, कितनी ही पूजा करे, कितनी ही प्रार्थना करे-कुछ भी करे, लाख करे-अगर भीतर चित्त की दशा अंधकारपूर्ण है, उसका सब करना पापपूर्ण होगा। उसके भीतर पाप की स्थिति बनी रहेगी। वह जा नहीं सकती। वह किसी स्थिति में नहीं जा सकती।

-ओशो
पुस्तकः जीवन रहस्य
प्रवचन नं 4 से संकलित

संन्यास और गैरिक वस्त्र

गैरिक वस्त्र तुम्हें भीड़ से अलग करने का उपाय है, तुम्हें व्यक्तित्व देने की व्यवस्था है; ताकि तुम भीड़ से भयभीत होना छोड़ दो; ताकि तुम अपना स्वर उठा सको, अपने पैर उठा सको, पगडंडी को चुन सको...

उतरना हो तो थोड़ा पागल होना जरूरी है। ये पागल होने के रास्ते हैं, और कुछ भी नहीं। ये तुम्हारी होशियारी को तोड़ने के रास्ते हैं, और कुछ भी नहीं। ये तुम्हारी समझदारी को पोंछने के रास्ते हैं, और कुछ भी नहीं।

गैरिक वस्त्र पहना दिये, बना दिया पागल! अब जहां जाओगे, वहीं हंसाई होगी। जहां जाओगे, लोग वहीं चैन से न खड़ा रहने देंगे। सब आंखें तुम पर होंगी। हर कोई तुमसे पूछेगाः 'क्या हो गया?' हर आंख तुम्हें कहती मालूम पड़ेगी, 'कुछ गड़बड़ हो गया। तो तुम भी इस उपद्रव में पड़ गये? सम्मोहित हो गये?

गैरिक वस्त्रों का अपने-आप में कोई मूल्य नहीं है। कोई गैरिक वस्त्रों से तुम मो़क्ष को न पा जाओगे। गैरिक वस्त्रों का मूल्य इतना ही है कि तुमने घोषणा की कि तुम पागल होने को तैयार हो। तो फिर आगे और यात्रा हो सकती है। यहीं तुम डर गये तो आगे क्या यात्रा होगी?

आज तुम्हें गैरिक वस्त्र पहना दिये, कल एकतारा भी पकड़ा देंगे। उंगली हाथ में आ गयी तो पहुचा भी पकड़ लेंगे। यह तो पहचान के लिए है आदमी हिम्मतवर है या नहीं। हिम्मतवर है तो धीरे-धीरे और भी हिम्मत बढ़ा देंगे। आशा तो यही है कि कभी तुम सड़कों पर मीरा और चैतन्य की तरह नाच सको।

आदमी ने हिम्मत ही खो दी है। भीड़ के पीछे कब तक चलोगे?

ये गैरिक वस्त्र तुम्हें भीड़ से अलग करने का उपाय है, तुम्हें व्यक्तित्व देने की व्यवस्था है; ताकि तुम भीड़ से भयभीत होना छोड़ दो; ताकि तुम अपना स्वर उठा सको, अपने पैर उठा सको, पगडंडी को चुन सको।

राजमार्गों से कोई कभी परमात्मा तक न पहुंचा है, न पहुंचेगा; पगडंडियों से पहुंचता है। और हम धीरे-धीरे इतने आदी हो गये हैं भीड़ के पीछे चलने के कि जरा-सा भीड़ से अलग होने में डर लगता है।

जिन मित्रों ने पूछा है किसी विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हैं, बुद्धिमान हैं, सुशिक्षित हैं- फिर विश्वविद्यालय में गैरिक वस्त्र पहनकर जाएंगे, तो अड़चन मैं समझता हूं। वैसे ही अध्यापक मुसीबत में हैं; गैरिक वस्त्र की पूरी फजीहत हुई रखी है!

प्रश्न पूछा है तो जानता हूं कि मन में आकांक्षा भी जगी है, नहीं तो पूछते क्यों। अब सवाल है-हिम्मत से चुनेंगे कि फिर हिम्मत छोड़ देंगे? कठिन तो होगा। कठिन हो, यही तो पूरी व्यवस्था है।

पूछा है कि माला वस्त्रों के ऊपर ही पहननी क्यों जरूरी है। इच्छा पहनने की साफ है, मगर कपड़ों के भीतर पहनने की इच्छा है। नहीं, भीतर पहनने से न चलेगा; वह तो न पहनने के बराबर हो गया। वह बाहर पहनाने के लिए कारण है। कारण यही है कि तुम्हें किसी तरह भी भीड़ के भय से मुक्त करवाना है-किसी भी तरह। किसी भी भांति तुम्हारे जीवन से यह चिंता जाए कि दूसरे क्या कहते हैं, तो ही आगे कदम उठ सकते हैं। अगर परमात्मा का होना है तो समाज से थोड़ा दूर होना ही पड़ेगा। क्योंकि समाज तो बिल्कुल ही परमात्मा का नहीं है। समाज के ढांचे से थोड़ा मुक्त होना पड़ेगा।

न तो माला का कोई मूल्य है, न गैरिक वस्त्रों का कोई मूल्य है; अपने-आप में कोई मूल्य नहीं है-मूल्य किसी और कारण से है। अगर यह सारा मुल्क ही गैरिक वस्त्र पहनता हो तो मैं तुम्हें गैरिक वस्त्र न पहनाऊंगा; तो मैं कुछ और चुन लूंगा काले वस्त्र, नीले वस्त्र। अगर यह सारा मुल्क ही माला पहनता हो तो मैं तुम्हें माला न पहनाऊंगा; कुछ और उपाय चुन लेंगे।

बहुत उपाय लोगों ने चुने। बुद्ध ने सिर घोंट दिया भिक्षुओं का, उपाय है। अलग कर दिया। महावीर ने नग्न खड़ा कर दिया लोगों को, उपाय है।

थोड़ा सोचो, जिन लोगों ने हिम्मत की होगी महावीर के साथ जाने की और नग्न खड़े हुए होंगे, जरा उनके साहस की खबर करो। जरा विचारो। उस साहस में ही सत्य ने उनके द्वार पर आकर दस्तक दे दी होगी।

बुद्ध ने राजपुत्रों को, सम्पत्तिशालियों को भिखारी बना दिया द्वार-द्वार का, भिक्षापात्र हाथ में दे दिये। जिनके पास कोई कमी न थी, उन्हें भिखारी बनाने का क्या प्रयोजन रहा होगा? अगर भिखारी होने से परमात्मा मिलता है तो भिखमंगों को कभी का मिल गया होता। नहीं, भिखारी होने का सवाल न था-उन्हें उतारकर लाना था वहां, जहां वे निपट पागल सिद्ध हो जाएं। उन्हें तर्क की दुनिया के बाहर खींच लाना था। उन्हें हिसाब-किताब की दुनिया के बाहर खींच लाना था। जो साहसी थे, उन्होंने चुनौती स्वीकार ली। जो कायर थे, उन्होंने अपने भीतर तर्क खींच लिये। उन्होंने कहा, क्या होगा सिर घुटाने से? क्या होगा नग्न होने से? क्या होगा गैरिक वस्त्र पहनने से?'

यह असली सवाल नहीं है। असली सवाल यह है, 'तुम में हिम्मत है?' पूछो यह बात कि क्या होगा हिम्मत से। हिम्मत से सब कुछ होता है। साहस के अतिरिक्त और कोई उपाय आदमी के पास नहीं है। दुस्साहस चाहिए!

लोग हंसेंगे। लोग मखौल उड़ांएगे। और तुम निश्चिन्त अपने मार्ग पर चलते जाना। तुम उनकी हंसी की फिक्र न करना। तुम उनकी हंसी से डांवाडोल न होना। तुम उनकी हंसी से व्यथित मत होना। और तुम पाओगे, उनकी हंसी भी सहारा हो गयी; और उनकी हंसी ने भी तुम्हारे ध्यान को व्यवस्थित किया; और उनकी हंसी ने भी तुम्हारे भीतर से क्रोध को विसर्जित किया; और उनकी हंसी ने भी तुम्हारे जीवन में करूणा लायी।

....समाज के दायरे से मुक्त करने की व्यवस्था है। जिसको मुक्त होना हो और जिसे थोड़ी हिम्मत हो अपने भीतर, भरोसा हो थोड़ा अपने पर; अगर तुम बिलकुल ही बिक नहीं गये हो समाज के हाथों; और अगर तुमने अपनी सारी आत्मा गिरवी नहीं रख दी है; तो चुनौती स्वीकार करने जैसी है।

सत्य कमजोरों के लिए नहीं है, साहसियों के लिए है।

-ओशो
पुस्तकः भक्ति-सूत्र
प्रवचन नं. 8 से संकलित
पूरा प्रवचन एम.पी.थ्री. एवं पुस्तक में उपलब्ध है।

जोरबा दि बुद्धाः एक नया मनुष्य

नया मनुष्य, मेरा विद्रोही जोरबा दि बुद्धा पूरे संसार को अपना घर होने का दावा करता हैं। इसमें जो कुछ भी है वह हमारा है और हमें हर संभव तरीके से इसका उपयोग करना है-बिना किसी अपराध-भाव के, बिना किसी संघर्ष के और बिना किसी चुनाव के...

मेरा विद्रोही नया मनुष्य ही 'जोरबा-बुद्ध है। मनुष्यता अभी तक यह विश्वास करते हुए जीती आई है कि या तो आत्मा ही एकमात्र वास्तविकता है और संसार और पदार्थ एक भ्रम हैं अथवा पदार्थ ही वास्तविक है और आत्मा मात्र एक भ्रम है।

तुम अतीत की मनुष्यता को, अध्यात्मवादियों और पदार्थवादियों में विभाजित कर सकते हो, लेकिन किसी ने भी मनुष्य की वास्तविकता की ओर देखने की फिक्र ही नहीं की। वे दोनो एक साथ हैं। वे न तो केवल आध्यात्मिक हैं-वे केवल मात्र चेतना ही नहीं है और न केवल पदार्थ हैं। वह चेतना और पदार्थ के मध्य एक बहुत बड़ी लयबद्धता है अथवा शायद पदार्थ और चेतना दो अलग चीजें न होकर एक ही वास्तविकता के दो पहलू हैं। पदार्थ चेतना के बाहर का भाग है और पदार्थ का आंतरिक भाग है चेतना, लेकिन अतीत में ऐसा एक भी दार्शनिक, ऋषि अथवा विद्रोही रहस्यदर्शी नहीं हुआ, जिसने इस एकता की घोषणा की होः वे सभी मनुष्य को विभाजित करने के पक्ष में थे, जो एक भाग को सच्चा और दूसरे भाग को झूठा कहते थे। इसने पूरी पृथ्वी में एक ऐसा वातावरण उत्पन्न कर दिया, जहां मनुष्य के विचारों, भावों और कार्यो में कोई तारतम्य नहीं रह गया।

तुम केवल एक शरीर बनकर ही नहीं जी सकते। जीसस के कहने का भी यही अर्थ है, जब वह कहते हैं-'मनुष्य अकेला रोटी से ही नहीं जी सकता।' तुम अकेली चेतना बनकर भी नहीं जी सकते और न ही तुम बिना बेटी रोटी के जीवित रह सकते हो।

तुम्हारे होने के दो आयाम हैं और दोनों आयामों को, विकास का समान अवसर देकर दोनों को परिपूर्ण बनाना है, लेकिन अतीत एक आयाम के पक्ष में और दूसरे के विरोध में अथवा दूसरे के पक्ष में और पहले के विरोध में रहा है।

मनुष्य को उसकी समग्रता में स्वीकार नहीं किया गया है और इसने दुख और वेदना के घने अंधेरे की, हजारों वर्षों से, एक ऐसी रात उत्पन्न कर दी जिसका लगता है जैसे कोई अंत है ही नहीं। यदि तुम शरीर की बात नहीं सुनते हो तो तुम दुख भोगते हो क्योंकि तुम्हें भूख लगती है, प्यास लगती है और तुम्हें गरीबी के अभाव झेलने होते हैं। यदि तुम केवल चेतना की बात सुनते हो तो तुम्हारे विकास का संतुलन गड़बड़ा जाएगाः तुम्हारी चेतना का ही विकास होगा, लेकिन शरीर सिकुड़ जाएगा और संतुलन खो जाएगा और संतुलन में ही तुम्हारा स्वास्थ्य है, संतुलन में ही तुम्हारी समग्रता है, संतुलन में ही तुम्हारा आनंद, गीत और नृत्य है।

पश्चिम ने शरीर की बात सुनने का चुनाव किया और जहां तक चेतना की वास्तविकता संबंध है, वह पूरी तरह बहरा बन गया। इसका अंतिम परिणाम है-विज्ञान और तकनीकि ज्ञान की अभूतपूर्व प्रगति और तुच्छ सांसारिक वस्तुओं से समृद्धि एक स्वतंत्र और उन्मुक्त समाज। इस प्रचुर समृद्धि के बीच, बिना आत्मा का गरीब मनुष्य पूरी तरह खो गया है-कोई जानता ही नहीं कि वह है कौन, वह है भी या नहीं है और कोई नहीं जानता कि वह है क्यों और किसी दुर्घटनावश कभी यह ख्याल आ जाता है कि ऐसी दुर्लभ किस्म का कोई मनुष्य होता भी है।

जब तक चेतना का विकास भौतिक जगत की समृद्धि के साथ-साथ नहीं होता, शरीर और पदार्थ बहुत अधिक भारयुक्त हो जाते हैं और आत्मा बहुत कमजोर बन जाती है। अपने ही अविष्कारों और खोजों के कारण तुम्हारे ऊपर बहुत अधिक भार है। वस्तुतः तुम्हारे लिए एक सुंदर जीवन निर्मित करने के स्थान पर वे एक ऐसा जीवन निर्मित करते हैं जिसे पश्चिम के सभी बुद्धिजीवियों द्वारा जीवन के अयोग्य अनुभव किया गया है।

पूरब ने चेतना का चुनाव किया है और पदार्थ की निंदा की है। उनके अनुसार प्रत्येक भौतिक वस्तु जिसमें शरीर भी सम्मिलित है, एक माया है। एक भ्रम है, वह मरूस्थल में एक मृगतृष्णा के समान दिखाई देती है और जिसकी कोई वास्तविकता नहीं है। पूरब ने गौतम बुद्ध, महावीर, पंतजलि, कबीर, फरीद और रैदास जैसे लोग उत्पन्न किए और पूरी तरह होश से भरे हुए इन महान चेतना-पुरुषों की लम्बी श्रृंखला है। पर इसी ने उत्पन्न किया उन लाखों करोड़ों गरीबों को, जिनके पास न खाने को पर्याप्त अन्न, न पर्याप्त वस्त्र और न सिर छिपाने को छत है और जो कुत्तों की तरह भूखों मर रहे हैं।

बड़ी अजीब स्थिति है-पश्चिम में वे हर छः महीनों बाद अरबों डालर कीमत के दुग्ध उत्पाद और अन्य भोजन सामग्री आवश्यकता से अधिक होने के कारण समुद्र में डुबो देते हैं। वे यह नहीं चाहते कि उनके गोदामों पर अतिरिक्त भार हो और वे अपने आर्थिक ढांचे को सुदृढ़ रखने के लिए उनकी कीमतें भी नहीं घटाना चाहते। एक ओर इथोपिया में एक हजार मनुष्य प्रतिदिन की दर से भूखों मर रहे हैं तो दूसरी ओर इसी वक्त यूरोप का साझा बाजार करोड़ों डालर का भोजन नष्ट कर रहा है। यह राशि भी उस भोजन सामग्री का मूल्य नहीं है, यह वह लागत है जो भोजन सामग्री को समुद्र तक ले जाने और उसे डुबाने में खर्च होती है। इस स्थिति के लिए जिम्मेदार कौन है?

पश्चिम का सबसे अधिक धनी व्यक्ति आत्मा की खोज कर रहा है और अपने को खाली पा रहा है क्योंकि उसके पास केवल वासना है जिसमें प्रेम की कहीं कोई सुवास नहीं और उसके पास रविवारीय स्कूल में सीखे गए वे शब्द हैं जिन्हें वह तोते की तरह दोहराता है पर उस प्रार्थना में हृदय की पुकार और श्रद्धा नहीं। उसके पास कोई धार्मिकता नहीं, मनुष्य जाति की भलाई के लिए कोई भावना नहीं; पक्षियों, वृक्षों और पशुओं के प्रति, समस्त जीवन के प्रति कोई श्रद्धा नहीं और तभी विनाश इतना अधिक सरल है।

यदि मनुष्यों को पदार्थ मात्र ही न माना गया होता तो हिरोशिमा और नागासाकी में यह विनाश हुआ ही न होता। यदि यह ख्याल होता कि प्रत्येक मनुष्य में परमात्मा ही छिपा हुआ है तो इतने अधिक आणविक अस्त्र-शस्त्रों का ढेर इकट्ठा ही न किया गया होता और मनुष्य में छिपी परमात्मा की आभा को नष्ट न करके, उसके शरीर को परमात्मा का मंदिर मानते हुए उसे प्रकाश में लाया जाता, लेकिन यदि मनुष्य केवल एक ही पदार्थ या वस्तु है, केवल भौतिक या रसायन शास्त्र ही है और यदि वह खाल से मढ़ा एक हड्डियों का ढांचा मात्र है, तब मृत्यु के साथ प्रत्येक वस्तु मर जाती है और कुछ भी शेष नहीं रह जाता। इसी वजह से यह सम्भव हो पाता है कि बिना किसी हिचक के एडोल्फ हिटलर साठ लाख व्यक्तियों की हत्या कर दे। यदि सभी व्यक्ति केवल पदार्थ ही हैं तो इस बारे में दोबारा सोचने का प्रश्न ही कहां उठता है?

पश्चिम ने अपनी आत्मा खो दी है, अपने आंतरिक स्वभाव को खो दिया है। अर्थहीनता, ऊब और वेदना से घिरे हुए वह स्वयं को ही नहीं खोज पा रहा है। विज्ञान की सभी सफलताएं अनुपयोगी सिद्ध हो रही हैं, क्योंकि घर प्रत्येक वस्तु से भरा हुआ है, लेकिन घर का मालिक ही खोया हुआ है।

यहां पूरब में मालिक जो जीवित है, लेकिन घर पूरी तरह खाली है। भूखे पेटों और बीमार शरीरों के साथ जहां तुम्हारें चारों ओर मृत्यु घिरी हो, आनंद-उत्सव मनाते हुए ध्यान करना ही असम्भव है। अनावश्यक रूप से इसीलिए हम लोगों ने इतना सब कुछ खो दिया है।

हमारे सभी संत, सभी दार्शनिक, अध्यात्मवादी और पदार्थवादी दोनों ही मनुष्य के विरुद्ध किए गए इस अपराध के प्रति उत्तरदायी हैं।

जोरबा-बुद्ध होना ही इसका एकमात्र उत्तर है। यह पदार्थ और आत्मा का संश्लेषण है। यह इस बात की घोषणा है कि अब पदार्थ और चेतना के बीच कोई संघर्ष ही नहीं है और हम दोनों तरह से समृद्ध बन सकते हैं। हमारे पास प्रत्येक वह वस्तु हो सकती है जो संसार हमें उपलब्ध करा सकता है, विज्ञान और तकनीकि ज्ञान से जिसे हम उत्पन्न कर सकते हैं और इसके ही साथ-साथ हमारे पास वह भी प्रत्येक चीज हो सकती है, जिसे कोई एक बुद्ध, कोई नानक और कोई कबीर अपने अंदर अस्तित्व में अनुभव करता है, जिसके अंदर परमानंद की खिलावट होती है, भगवत्ता की सुवास चारों ओर फैल जाती है और सर्वोच्च स्वतंत्रता से उड़ान भरने के लिए जिसे पंख मिलते हैं।

जोरबा-बुद्ध होना ही नया मनुष्य होना है और यही होता है-विद्रोही। उसका विद्रोह नष्ट करता है मनुष्य की वह मानसिकता जिसमें उसके विचारों, भावों और कार्यो में तारतम्यता नहीं होती, वह नष्ट करता है उसके अंदर का विभाजन और नष्ट करता है वह आध्यात्मिकता, जो पदार्थवाद के विरुद्ध है और इसके ही साथ उस भौतिकता को भी नष्ट करता है जो आध्यात्मिकता के विरुद्ध है।

उसका घोषणा पत्र है कि शरीर और आत्मा दोनों साथ-साथ हैं और पूरा अस्तित्व आध्यात्मिकता से आपूरित है, यहां तक कि पर्वत भी जीवन्त हैं और वृक्ष भी संवेदनशील हैं और पूरे अस्तित्व में पदार्थ और चेतना दोनों एक साथ हैं अथवा केवल एक उर्जा ही है, जो दो रूपों में अभिव्यक्त हो रही है। जब उर्जा शुद्ध होती है वह अपने आपको चेतना के रूप में अभिव्यक्त करती है और जब वह अशुद्ध कच्चे रूप में सघन हो जाती है वह पदार्थ के रूप में दिखाई देती है, लेकिन पूरा अस्तित्व और कुछ भी नहीं, वरन बस एक उर्जा-क्षेत्र है।

यह कोई तत्वज्ञान न होकर मेरा अपना अनुभव है और अब भौतिकशास्त्र और उसकी खोजों से भी इस बात की पुष्टि होती है कि अस्तित्व केवल एक उर्जा है।

हम मनुष्य को दोनों संसारों में साथ-साथ रहने की अनुमति दे सकते हैं। उसे दूसरा संसार पाने के लिए इस संसार को छोड़ने की जरूरत नहीं है और न उसे इस संसार का आनंद उठाने के लिए दूसरे संसार से इंकार करना है। वास्तव में जब तुम दोनों संसारों को एक साथ पाने में समर्थ हो तो फिर केवल एक संसार के साथ अनावश्यक रूप से गरीब बनकर क्यों रहा जाए?

जोरबा-बुद्ध होना ही समृद्धतम संभावना है। वह सर्वाधिक अपने स्वभाव के अनुसार जिएगा और वह इस पृथ्वी के गीत भी गाएगा। न तो वह पृथ्वी को धोखा देगा और न का आकाश के साथ दगा करेगा। इस पृथ्वी पर जो कुछ भी सुंदर और आनंददायक है, जैसे विविध रंगों के सुवासित फूल, वह उन सभी पर अपने अधिकार की घोषणा करेगा और साथ-ही-साथ आकाश में चमकते सितारे भी उसके ही होंगे। वह दावा करेगा कि यह पूरा अस्तित्व ही अपना घर ही है।

अतीत का मनुष्य बहुत निर्धन था, क्योंकि उसने अस्तित्व को विभाजित कर दिया था। नया मनुष्य, मेरा विद्रोही जोरबा दि बुद्धा पूरे संसार को अपना घर होने का दावा करता हैं। इसमें जो कुछ भी है वह हमारा है और हमें हर संभव तरीके से इसका उपयोग करना है-बिना किसी अपराध-भाव के, बिना किसी संघर्ष के और बिना किसी चुनाव के। बिना किसी चुनाव के जितनी तुम्हारी शक्ति और सामर्थ्य हो, सभी पदार्थों का उपयोग करो और जितनी तुम्हारी शक्ति और योग्यता हो, उस सभी का जो चेतना में हैं, आनंद लो।

-एक जोरबा बनो लेकिन वहां रुको मत।

-बुद्ध बनने की ओर गतिशील होते रहो।

-जोरबा आधा है और बुद्ध भी आधे है।

-ओशो
पुस्तकः एक नई मनुष्यता का जन्म
प्रवचन नं. 8 से संकलित
पूरा प्रवचन एम.पी.थ्री. एवं पुस्तक में उपलब्ध है