Osho World Online Hindi Magazine :: September 2012
www.oshoworld.com
 
  प्रबुद्धज़नों के ओशो पर विचार
 
 
 

1. "मुझे याद आता है की पहली बार मैंने 1967 रजनीश जी के विचार राजनीति के बारे में सुने थे। उस समय चुनाव भी थे। उनके प्रवचनों के टेप्स किसी परिचित ने आकर मुझे दिया था।। तब ओशो नाम इतना प्रचलित नहीं था। सभी लोग आचार्य रजनीश से ही जानते थे। ये टेप्स मुंबई के व्याख्यान के थे। और मुझे स्मरण है कि मैं उन टेप्स को सुनने के बाद बहुत प्रभावित हुआ कि, जिसका विरोध करना उन दिनों में लगभग घटिया बात मानी जाती थी,। कैसे कोई समाजवाद का विरोध कर सकता है। लेकिन उन्होंने समाजवाद की बेहद तर्कपूर्ण व्याख्या, कि इससे देश का भारी अहित हो सकता है। वो सुनकर मैं बहुत दंग रह गया, लेकिन प्रभावित भी हुआ। हालांकि मैंने कभी उनके दर्शन नहीं किये थे। न उनसे मैं कभी मुलाकात हुई र्थी। जब मुझे 19 महीने की कारावास हुई तो जेल में मैंने ओशो की किताबें पढ़ी। जिसमें मुख्य रूप से महापरिनिर्वाण और कबीर के बारे में पढ़ा। उन पुस्तकों का अध्ययन करने के पश्चात आतंरित मन की आवाज उठी कि भारत में इस सदी में शायद ही कोई इतना मौलिक चिंतक हैं, जितने कि ओशो थे।"

लाल कृष्ण आडवाणी
भाजपा नेता

2. "भारत ने अब तक जितने विचारक पैदा किया हैं। उनमे ओशो रजनीश सबसे मौलिक, सबसे उर्वर, सबसे स्पष्ट और सर्वाधिक सर्जक विचारक हैं। शब्दों की अभिव्यक्ति की उन्हें जन्मजात भेंट मिली है। उनके जैसा कोई व्यक्ति हम सदियों तक न देख पाएंगे। एक विचारक की भांति उन्हें महामानवों में गिना जाएगा। मैं अपने पाठकों से अनुरोध करूंगा कि, वे सैकड़ों पुस्तकों के रूप में प्रकाशित उनके शब्दों को पढ़ें।"

खुशवंत सिंह
वरिष्ठ चर्चित पत्रकार साहित्यकार

3. "पांचतत्व की काया को जिन्दगी का यह कर्म क्षेत्र किस लिए मिला है। मैं समझती हूं इसका रहस्य ओशो ने पाया है और उस क्षण का दर्शन किया है, जब लहू मांस की यह काया उस मंदिर और मस्जिद सी हो जाती है। जहां पूजा के धूप की सुगंध अंतर से उठने लगती है और कोई आयत भीतर से सुनाई देने लगती है।
मैं समझती हूं कि ओशो हमारे युग की एक बहुत बड़ी प्राप्ति हैं। जिन्होंने सूरज की किरण को लोगों के अंतर की ओर मोड़ दिया। और सहज मन से उस संभोग की बात कह पाए जो एक बीज और एक किरण का संभोग है और जिससे खिले हुए फूल की सुगंधि इंसान को समाधि की ओर ले जाती है, मुक्ति की ओर ले जाती है, मोक्ष की ओर ले जाती है।
मन की मिट्टी का जरखेज होना ही उसका मोक्ष है, और उस मिट्टी में पड़े हुए बीज का फूल बनकर खिलना ही उसका मोक्ष है। मानना होगा की ओशो ही यह पहचान दे सकते थे, जिन्हें चिंतन पर भी अधिकार है, और वाणी पर भी अधिकार है।
सिर्फ एक बात और कहना चाहती हूं अपने अंतर अनुभव से उस व्यथा की बात, जो अंकुर बनने से पहले एक बीज की व्यथा होती है।
मेरा सूरज बादलों के महल में सोया हुआ है
जहां कोई सीढ़ी नहीं कोई खिड़की नहीं
और वहां पहुंचने के लिए-
सदियों के हाथों ने जो डंडी बनाई है
वो मेरे पैरों के लिए बहुत संकरी है
मैं मानती हूं कि हर चिंतनशील साधक के लिए, हर बना हुआ रास्ता संकरा होता है। अपना रास्ता तो उसे अपने पैरों से बनाना होता है। लेकिन ओशो इस रहस्य को सहज मन से कह पाए। इसके लिए हमारा युग उन्हें धन्यवाद देता है।"

अमृता प्रीतम
कवियत्री एवं लेखिका

4. "ओशो ने कहा है कि हास्य एक प्रार्थना है। और आज दिक्कत क्या है कि हम हास्य और उपहास दोनों को एक मान बैठे हैं। जबकि इसमें बहुत बड़ा अंतर है। हम उपहास करते हैं, हास्य नहीं करते। मेरे विचार में ओशो जो था। वो विचारों का परमाणु बम था। जिसने विचारों का विस्फोट किया एक परमाणु बम वह होता है, जो आदमी के टुकड़े-टुकड़े करता है। और एक परमाणु बम वो होता है, जो टुकड़े-टुकड़े हुए लोगों को एक करता है।
ओशो हमेशा सत्य के पक्ष में खड़े रहे, इसलिए उनके सब दुश्मन बन गए। क्योंकि सत्य का कोई दोस्त नहीं होता। सत्य निपट अकेला होता है। देखिये सारी सरकारें ओशो की दुश्मन बन गई, सारे धर्मगुरु दुश्मन हो गए, समाज दुश्मन हो गए। क्योंकि सत्य बर्दाश्त नहीं होता।
मैं तो कहता हूं कि-ओशो संसार का सबसे बड़ा स्वीपर है। जो आपके मन की गंदगी को साफ करता है। शरीर की गन्दी तो दुनिया साफ कर लेती है। मगर जो मन की गंदगी आपके अन्दर बसी हुई है, ओशो ने उसको साफ किया। इसलिए मैं उसको प्रणाम करता हूं। ओशो ने कहा है-सब बराबर हैं। उसी पे अपनी चार पंक्तिया कहना चाहता हूं-
नदी ने अकड़ते हुए कुएं से कहा- तेरी क्या औकात है तुझे पता है,
कुआं हाथ जोड़कर बोला- बहनजी भटकाव और ठहराव में कुछ तो फर्क होता ही है।
फर्क इतना ही है कि, तुम प्यासे के पास जाती हो और प्यासा मेरे पास आता है,
तुम ऊपर से नीचे की ओर जाती हो, इसलिए मीठे से खारी हो जाती हो।
मैं नीचे से ऊपर की ओर आता हूं, इसलिए मीठे का मीठा ही रह जाता हूं।"

सुरेन्द्र शर्मा
हास्य-कवि

5. "मुझे ये सौभाग्य भी मिला है कि मैंने ओशो की मौजूदगी में उन्होंने मुझे याद फरमाया, तो मैंने उन्हें यहां पे भी और पुणे में भी सुनाया है और उनके हमारी नजरों से ओझल होने के बाद भी मुझे एक दो बार मौका मिला है और मुझे ये सौभाग्य प्राप्त हुआ है कि जिस जगह उनकी समाधि है। उस जगह के पास बैठ कर मैंने परफार्म किया है। वो खास तौर पर ध्रुपद वीणा के बहुत ही गुनगाहक थे और संगीत की हर विधा के जानकार थे। खुद उनके अन्दर एक संगीत समाया हुआ था। वो आप लोग मुझसे ज्यादा बेहतर जानते हैं। उन्होंने अपनी पुस्तकों में लिखा है कि उर्दू वीणा जो है, वो मेरे अन्दर सांस लेती है। वो संगीत को बहुत चाहते थे और प्यार करते थे।"

उस्ताद असद अली खान
रूद्र वीणा वादक

6. "तुम वो शक्ति हो परम महाशक्ति।
जो सदियों से विचारों में जकड़े लाखों लोगों को,
एवं उनकी भ्रांतियों को उन्हीं के अन्दर सोई शक्तियों से जगाकर
उनको मुक्त कर रहे हो।
जीवन की रिक्तता एवं सूनेपन को
सत्यम शिवम् सुंदरम, के कणों से भर रहे हो।
तुम वो शक्ति हो
जो अक्का और मीरा की तरह नाचती और गाती है,
जिसे कोई बुद्ध, राम और कृष्ण कह कर बुलाता है,
सद्गुरु जो,
निर्विचार होना शून्य होना और जागृत होना सिखाता है,
ओ प्रिय तुम कौन को
जो अपनी तरल आंखों से करुणा बांट रहा है,
जो मुझे परमानान्दित कर, मुझे पूर्व के निर्मित विचारों से मुक्त कर रहा है।
चेतना जो यहां है, मेरे अंदर है, मुझ में पूरी तरह से है,
उसे फिर से निर्मित करता है,
और रोम-रोम को झंकृत कर जागृत करता है।
प्रिय ओशो, तुम महान हो,
महानतम हो, सुख का महासागर हो,
जिसमें मैं कुछ गिने चुने-मूंगें, मोती एवं सीप शंख से बुदबुदे पाती हूं
मगर तब जब मैं निर्विकार निर्विचार व शून्य होती हूं,
आह! क्या आनंद है! परमानंद!"

सोनलमान सिंह
पद्मविभूषण प्राप्त शास्त्रीय नृत्यांगाना

7. "पृथ्वी पर नाचते हुए असंख्य पैर-पैर जो पगों को निःसंकोच फैलाकर नाचते हैं। बदन जो उत्तेजित भंगिमाओं में बात करते हैं। मनुष्य उनकी हताशाएं, मस्ती, ध्यान। हाथ जो अभीप्सा लेकर अज्ञात क्षितिजों तक पहुंचना चाहते हैं और अंततः पहुंचते हैं। पहाड़ी, शेर की प्रबल छलांग, सप्त-ऋषियों की प्रज्ञा, अनंत का चिंतन, ध्यान का अटल गहराइयों में उतरता हुआ गतिशील मौन ऊर्जा को हर्षोल्लास के साथ समेट कर। उसे परात्पर की विराटता की ओर ले जाने वाले-ओशो। प्रत्येक के भीतर जीते हैं, अनवरत मैं ओशो को अपने आस-पास महसूस करते हुए बड़ी हुई हूं। वह विवादित व्यक्तित्व हैं, क्योंकि उनमें सत्य कहने का साहस था।"

मल्लिका साराभाई
पदमविभूषण प्राप्त शास्त्रीय नृत्यांगना

8. "ओशो के गहन विचारों से परिचय हुआ और मेरे मन की वीणा के तार झंकृत हुए। जीवन के छोटे-छोटे मसलों पर जब वे अपनी पारदर्शी नजर की रोशनी डालते हैं तो यूं लगता है, जैसे कुहासे से भरी हुई राह पर सूरज की किरणे फैल गई। मन की बदलियां दूर हो जाती है और स्वच्छ आकाश उदित हो जाता है। उनकी बनाई हुई स्वर्ग स्थली पूना का ओशो कम्यून मेरा प्रिय स्थान है। वहां जाकर अपने सुरों की बंदगी पेश करना मुझे बहुत अच्छा लगता है। कम्यून का सुरम्य निसर्ग प्रेमपूर्ण निवासी और बुद्ध सभागार की पवित्र ध्यानमय शांति गायक की आत्मा का पोषण करती है। ऐसे अद्वितीय सदगुरु को मेरा शत शत प्रणाम।"

शुभा मुदगल
शास्त्रीय गायिका

9. "ओशो श्रेष्ठ दार्शनिक होने के साथ-साथ सदगुरुओं की उच्च कोटि में भी आते हैं। विश्व के कोने-कोने से लोग उनकी वाणी से प्रभावित हुए और संन्यास को अपनाकर परम सत्य की तरफ उन्मुख हुए है। दुनिया की समस्त परंपराओं और सभी संप्रदाओं के लोगों को उनकी ओजस्वी वाणी ने, उनके क्रांतिकारी विचारों ने, उनके अद्वितीय चिंतन ने प्रभावित किया है। वे अतुलनीय थे। बहुत सारे संतो को स्वयं में समाहित किए हुए थे।
ओशो विवादस्पद रहें, क्योंकि भारत जैसे देश में उन्होंने काम के ऊपर बहुत खुलकर चर्चा की। भारत की जो परंपरा रही है कि संत के मुख से केवल राम नाम की ही चर्चा सुनी जाती है। तो जब उनके मुख से काम से संबधित विषय आया, तो एकदम सबको लगा की शायद यह सही नही हैं। देश की परंपरा के अनुकूल नहीं है। मुझे लगता है कि जब भी कुछ नया होता है, उसको स्वीकार करने में समाज को थोड़ा समय लगता है।
लेकिन दुनिया से विदा लेने के बाद बाद वे विवादित नहीं हैं। वो गाहय हो रहे हैं और सबको समझ में आ रहा है कि परंपरा, रुड़ियों के नाम पर जो कूड़ा-कचरा है। वह हटना ही चाहिए। परंपराओं का भी प्रक्षालन होना चाहिए, क्योंकि गौमुख से निकली हुई गंगा बहुत पावन है, बहुत पवित्र है लेकिन जब काशी तक पहुंचती है, तो उसकी पवित्रता तो नष्ट नहीं होती पर स्वच्छता में कमी आ जाती है। जब स्वच्छता में कमी आती है तो निश्चित ही गंगा का प्रक्षालन होना चाहिए। इसी तरह परंपराओं की गंगा भी है। काल के प्रभाव से उसमें प्रदूषण पैदा होता है। उसका प्रक्षालन होना चाहिए। तो भारत की परंपराओं का प्रक्षालन कोई संत ओशो के रूप में करते हैं। तो वह अब स्वीकार्य हैं। अधिकाधिक स्वीकार्य होता जा रहा है।
उन्होंने भारत की बहुत सी परंपराओं को संभाला और उसमें से सर्वश्रेष्ठ निकालने का प्रयत्न किया। लेकिन निश्चित रूप से वह पीड़ादायक था। लेकिन उसके पीछे एक संत की जो दृष्टि होती है। एक शल्य-चिकित्सक का जो भाव होता है। वही ओशो का भाव था। वे आपरेशन कर रहे थे, जो व्यर्थ था। उसको काटना-छांटना चाहते थे, ताकि शरीर स्वस्थ रहें।
लेकिन आने वाले समय में लोग उनको केवल सुन ही नहीं रहे उनसे बहुत प्रभावित भी हो रहे हैं। भारत के बहुत से प्रवचनकर्ता उन्हीं के साहित्य से प्रभावित होकर प्रवचन करते हैं। उनके प्रवचनों को भारत और पूरे विश्व में पढ़ा व सुना जा रहा है। क्योंकि ओशो बहुत बड़े मनोवैज्ञानिक हैं।"

मा ऋतंभरा
टैरो कार्ड रीडर

10. "ओशो ने जो मंत्र दिया है, प्रेम का। बस उसी के साथ चलती हूं और उनके प्रवचनों को सुनती हूं, उनको पढ़ती हूं और बस उसी से इमेज बननी शुरू हो जाती है। जिसे मैं अपने रंगों से कैनवास पे उतार देती हूं। जबसे ओशो उपदेशों से प्रभावित हुई हूं। तब से आज तक एक अद्भुत शक्ति हर बार कुछ नया करने के लिए प्रेरित करती है। मेरे लिए जीवन की शक्ति का स्रोत हैं ओशो।
ओशो ने कहा है, “तुम्हें शायद ठीक-ठीक पता भी न हो मुझे पता है कि तुम एक विराट आयोजन के भागीदार हो रहे हो। अनजाने तुम जो अपनी छोटी सी ईंट रख रहे हो इस मंदिर में। यह किसी विराट मंदिर का हिस्सा बनेगी। तुम्हारी ईंट के बिना यह मंदिर उठ भी नहीं सकता। तुम्हारी ईंट कितनी ही छोटी हो तुम्हारी ईंट अनिवार्य है तुम धन्यभागी हो।"

बिंदु पोपली
चित्रकार