Osho World Online Hindi Magazine :: September 2012
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  रहस्यदर्शियों की जीवन कथा
 
 

"जब किसी बुद्ध को उत्पन्न होना होता है, तो मां प्रभावित रहती है किन्हीं विशेष स्वप्नों द्वारा। क्योंकि हजारों बार यही स्वप्न फिर-फिर दोहराएं जाते हैं। इसका अर्थ होता है कि मां के भीतर की बुद्ध-चेतना एक निश्चित घटना निर्मित करती है उसके मन में और वह स्वप्न देखने लगती है एक विशेष आयाम के। उदाहरण के लिए बौद्ध कहते हैं कि जब कोई बुद्ध मां के भीतर होता है, तो मां स्वप्न देखती है सफेद हाथी का। यह एक प्रतीक है, किसी बहुत दुर्लभ चीज का प्रतीक- क्योंकि सफेद हाथी भारत की दुर्लभतम चीजों में से एक चीज है, करीब-करीब असंभव है उसे ढूढ़ निकालना। एक दुर्लभ प्राणी होता है गर्भ में और सफेद हाथी का प्रतीक मात्र एक संकेत है। और स्वप्नों की एक श्रृखंला पीछे-पीछे चली आती है।" -ओशो

दादू दयाल

कबीर की शिष्य परंपरा मे पांचवे राजस्थान के संत दादू संवत 1601 में अहमदाबाद में साबरमती नदी के तट पर लोदीराम नाम के ब्राह्मण को पानी में बहते मिले थे। 11 की उम्र में श्रीकृष्ण की भक्ति में लीन हो गये। 13 साल में जब वे घर से भागे तो माता-पिता पकड़ कर वपास ले आये। लेकिन सात वर्ष बाद वे फिर भाग खड़े हुए और सागर पहुंच कर धुनिया का काम करने लगे।

वहीं 12 साल तक अध्ययन में करते रहे। उनके इस काम से कई ब्राह्मण खफा रहने लगे। एक बार जब दादू अपने घर में ध्यान लीन थे तो कुछ पंडितो ने ईर्ष्यावश उनके घर के द्वारों को ईटों से बंद करवा दिया था। जिसे बाद में उनके पड़ोसियों ने खोला। दादू ने कहा, अच्छा हुआ कि कृष्ण की उपासना करने का इतना शांत माहौल मिला। दयालु स्वभाव के होने के कारण दादू से संत दादूदयाल हो गये। मतलब दयालु संत। गुरु-कृपा से ज्ञान प्राप्त होने से इनके कई सैकडों शिष्य हो गए। जिनमें गरीबदास, सुंदरदास, रज्जब और बखना मुख्य हैं। दादू हिन्दी, गुजराती, राजस्थानी आदि कई भाषाओं के ज्ञाता थे। इन्होंने शबद और साखी लिखीं। इनकी रचना प्रेमभावपूर्ण है। जात-पात के निराकरण, हिन्दू-मुसलमानों की एकता आदि विषयों पर इनके पद तर्क-प्रेरित न होकर हृदय-प्रेरित हैं।

प्रसिद्धि होने पर एक बार उन्हें अकबर बुलवाया और पूछा कि अल्लाह कि जाति क्या है ? इस पर दादू ने एक दोहा सुनाया-

इश्क अल्लाह की जाती है इश्क अल्लाह का अंग

इश्क अल्लाह मौजूद है, इश्क अल्लाह का रंग ।

कहा जाता है कि साधना के क्रम मे ही नाराना नगर कि भाराना पहाड़ी से वे गायब हो गए। आज भी उस पहाड़ी पर दादू के कपडे-किताबें आदि दादुपंथियो के पास हैं और उनकी एक समाधि भी है। दादू कि रचनाओं मे कबीर कि रचनाओं के कई अंश शामिल हैं।

दादू के बारें में सद्गुरु ओशो कहते हैं: मैं उसी को धार्मिक कहता हूं, जो न तो आस्तिक है, न नास्तिक है; खोजी है, यात्री है, जो कहता है, जीवन दांव पर लगा देंगे, लेकिन खोज कर रहेंगे। उसके जीवन में अंधेरे की प्रतीत हुई है। अब वह प्रकाश चाहता है। उसने प्यास को जाना है और जीवन के मरुस्थल को जाना है। वह मरूद्यान की खोज में है। वह किसी सरोवर की तलाश में है। और वह तलाश बौद्धिक नहीं है, उसका रोआं-रोआं प्यास से प्यासा है।

दादू उसी की बात कर रहे हैं। वे कहते हैं:

मन चित्त चातक ज्यूं रटै, पिव पिव लागी प्यास।

ऐसी बौद्धिक बातचीत से परमात्मा कुछ मिलेगा नहीं कि तुम बैठ कर गीता पढ़ लो, कि दर्शनशास्त्र का विचार कर लो; नहीं इससे कुछ न होगा।

मन चित चातक ज्यूं रटै, जैसे चातक चिल्लाता है रात भर-पिव पिव लागी प्यास! पियू पियू कहे चला जाता है। साधारण जल से राजी नहीं होता, स्वाति की बूंद की प्रतीक्षा करता है। वर्ष बिता देता है। दिन आते हैं, जाते हैं, चातक की रटन बढती चली जाती है।

चातक नाम का पक्षी केवल स्वाति नक्षत्र के पानी को ही पीता है। बाकी साल भर रोता रहता है। साधारण जल उसे तृप्त नहीं करता-स्वाति का परम जल चाहिये। संत साधारण जल से राजी नहीं-परमात्मा के जल से ही राजी है। साधारण प्रेम से उसे तृप्त नहीं कर पाता। जब तक परमात्मा की ही वर्षा उस पर न हो जाये, जब तक परम प्रेम न आ जाए तब तक वह प्यासा ही रहेगा।

मन चित चातक ज्यूं रटै, पिव पिव लागी प्यास।

बस उस प्यारे की ही प्यास लगी है। वही बुझा सकेगा।

दादू के शब्द बड़े महत्वपूर्ण हैं, वे कहते हैं, मन चित। मन के लिए भारत में बहुत शब्द हैं, ऐसा दुनिया की किसी भाषा में नहीं है। अंग्रेजी में एक ही शब्द है-माइंड, लेकिन भारत में बहुत शब्द हैं। इसमें दो शब्दों का प्रयोग कर रहे हैं दादू: मन, चित, चातक।

साधारण मन तो तुम्हारे पास है, चित तुम्हारे पास नहीं है। जब तक मन अँधेरे से राजी है तब तक वह चित नहीं है। जब मन चैतन्य की प्यास से भरता है और चैतन्य के आरोहण पर निकलता है; और जब कहता है चैतन्य होना है और चेतना है, जागना है, जागरण की अभीप्सा जब मन में पैदा होती है तब मन चित हो जाता है। तब मन साधारण मन न रहा। तब एक नई ही घटना घट गई। वह चैतन्य होने लगा।

मन साधारणतः अचित है, वह बेहोश है। तुम्हारा मन तो बिलकुल बेहोश है। तुम्हें पता नहीं तुम्हारा मन तुमसे क्या करवाता है। तुम करते रहते हो। जैसे कि कोई शराब के नशे में कर रहा है। किसी ने गाली दी, तुम्हें क्रोध आ गया। तुम कहते जरुर हो कि मैंने क्रोध किया, अब मैं क्रोध न करूंगा; लेकिन तुम गलत कहते हो। तुमने क्रोध किया नहीं। मन ने क्रोध करवा लिया। तुम मालिक नहीं हो। इसलिए तुम यह मत कहो कि मैंने क्रोध किया। अगर तुम करने ही वाले होते तब तो तुम्हारे बस में होता करते, या न करते। तुम मालिक नहीं हो।

-ओशो
पुस्तकः पिव पिव लागी प्यास से संकलित

संत सुन्दरदास

संत सुन्दरदासजी एक कवि ही नहीं बल्कि एक महान संत, धार्मिक एवं समाज सुधारक थे। उनका जन्म जयपुर राज्य की पुरानी राजधानी देवनगरी दौसा में भूसरगोत्र के खंडेलवाल वैश्य कुल में चैत्र शुक्ल नवमी संवत 1653 में हुआ। उनके पिता का नाम साहचोखा उमर नाम परमानंद तथा माता का नाम सती था। सुन्दरदासजी संत दादू के शिष्य थे। उन्होंने छोटी सी आयु में ही अपने गुरु से दीक्षा और आध्यात्मिक उपदेश प्राप्त कर लिया। संवत 1664 में जगजीवन जी दादू शिष्य रज्जबजी आदि के साथ काशी चले गए। काशी में रहकर उन्होंने संस्कृत, हिंदी व्याकरण, कोष शास्त्र, पुराण, वेदान्त का गहन अध्ययन किया।

संवत 1682 से जयपुर राज्य के शेखावटी प्रान्तवर्ती फतेहपुर में आये और वहां निवास किया। सुन्दरदास वहां योगाभ्यास कथा-कीर्तन तथा ध्यान आदि करते रहे। संत सुंदरदासजी का साहित्य सृजनकाल संवत 1664 से लेकर मृत्यु पर्यंत चलता रहा। सुंदरदासजी ने 42 मौलिक ग्रन्थ लिखे हैं, जो इनकी प्रखर प्रतिभा को उजागर करते हैं। ग्रंथों की भाषा सरल, सुबोध, स्पष्ट, सरस है।

ओशो कहते हैं: सुंदरदास थोड़े-से कलाकारों में एक है जिन्होंने इस ब्रह्म को जाना। फिर ब्रह्म को जान लेना एक बात है, ब्रह्म को जनाना और बात है। सभी जानने वाले जना नहीं पाते। करोड़ों में कोई एक-आध जानता है और सैकड़ों जाननेवालों में कोई एक जना पाता है। सुंदरदास उन थोड़े-से ज्ञानियों में से एक है, जिन्होंने निःशब्द को शब्द में उतारा; जिन्होंने अपरिभाष्य की परिभाषा की; जिन्होंने अगोचर को गोचर बनाया, अरूप को रूप दिया। सुंदरदास थोड़े-से सद्गुरूओं में से एक हैं। उनके एक-एक शब्द को साधारण शब्द मत समझना। उनके एक-एक शब्द में अंगारे छिपे है। और जरा-सी चिंगारी तुम्हारे जीवन में पड़ जाये तो तुम भी भभक उठ सकते हो परमात्मा से। तो तुम्हारे भीतर भी विराट का आविर्भाव हो सकता है। पड़ा तो है ही विराट, कोई जगाने वाली चिंगारी चाहिए।

चकमक पत्थरों में आग दबी होती है, फिर दो पत्थरों को टकरा देते हैं, आग प्रगट हो जाती है। ऐसी ही टकराहट गुरु और शिष्य के बीच होती हे। उसी टकराहट में ज्योति का जन्म होता है। और जिसकी ज्योति जली है वहीं उसको ज्योति दे सकता है, जिसकी ज्योति अभी जली नहीं है। जले दीये के पास हम बुझते दीये को लाते है। बुझे दीये की सामर्थ्य भी दीया बनने की है, लेकिन लपट चाहिए। जले दीये से लपट मिल जाती है। जले दीये का कुछ भी खोता नहीं है; बुझे दीये को सब मिल जाता है, सर्वस्व मिल जाता है।

यही राज है गुरु और शिष्य के बीच। गुरु का कुछ खोता नहीं है और शिष्य को सर्वस्व मिल जाता है। गुरु के राज्य में जरा भी कमी नहीं होती। सच पूछो तो, राज्य और बढ़ जाता है। रोशनी और बढ़ जाती है। जितने शिष्यों के दिए जगमगाने लगते हैं उतनी गुरु की रोशनी बढ़ने लगती है।

यहां जीवन के साधारण अर्थशास्त्र के नियम काम नहीं करते। साधारण अर्थशास्त्र कहता हैः जो तुम्हारे पास है, अगर दोगे तो कम हो जायेगा। रोकना, बचाना। साधारण अर्थशास्त्र कंजूसी सिखाता है, कृपणता सिखाता है। अध्यात्म के जगत में जिसने बचाया उसका नष्ट हुआ; जिसने लुटाया उसका बढ़ा। वहां दान बढ़ाने का उपाय है। वहां देना और बांटना-विस्तार है। वहां रोकना, संग्रहीत कर लेना, कृपण हो जाना-मृत्यु है।

इसलिए जिनके जीवन में रोशनी जन्मती है, वे बांटते हैं, लुटाते है। कबीर ने कहा हैः दोनों हाथ उलीचिए। लुटाओ! अनंत स्त्रोत पर आ गये हो, लुटाने से कुछ चुकेगा नहीं। और नयी धाराएं और नये झरने फूटते आएंगे। ऐसे एक ही ज्योति जल जाये तो अनेक की ज्योति जलती है। सुंदरदास के सत्संग में बहुमतों के दीए जले। ज्योति से ज्योति जले!

इन अपूर्व वचनों को ऐसे ही मत सुन लेना जैसे और बातें सुन लेते हो। और बातों की तरह सुन लिया तो सुना भी-और सुना भी नहीं। इन्हें तो गुनना! इन्हें सिर्फ कानों से मत सुनना! कानों के पीछे अपने ह्रदय को जोड़ देना, तो ही सुन पाओगे। सुनो तो जागना बहुत दूर नहीं है।

अनलिखे अक्षर बहुत
दीखे
बोल अनबोले बहुत
सीखे
भरे घट पाए कई
रीते
पनप भी पाए न हम
बीते!
अधिक लोग ऐसे ही जीते हैं।
पनप भी पाए न हम
बीते!

-ओशो
ज्योति से ज्योति जले
प्रवचन-9 से संकलित

अमीर खुसरो

खड़ी बोली हिन्दी के प्रथम कवि अमीर खुसरो एक सूफीयाना कवि थे और ख्वाजा निजामुद्दीन औलिया के मुरीद थे। इनका जन्म सन् 1253 में हुआ था। इनके जन्म से पूर्व इनके पिता तुर्क में लाचीन कबीले के सरदार थे। मुगलों के जुल्म से घबरा कर इनके पिता अमीर सैफुद्दीन मुहम्मद हिन्दुस्तान आ गये थे और उत्तरप्रदेश के ऐटा जिले के पटियाली नामक गांव में जा बसे। इत्तफाकन इनका सम्पर्क सुल्तान शमसुद्दीन अल्तमश के दरबार से हुआ, उनके साहस और सूझ-बूझ से ये सरदार बन गए और वहीं एक नवाब की बेटी से शादी हो गई और तीन बेटे पैदा हुए उनमें बीच वाले अबुल हसन ही अमीर खुसरो थे। इनके पिता खुद तो खास पढे न थे पर उन्होंने इनमें ऐसा कुछ देखा कि इनके पढने का उम्दा इंतजाम किया। एक दिन वे इन्हें ख्वाजा निजामुद्दीन औलिया के पास ले गए जो कि उन दिनों के जाने माने सूफी संत थे।

मृत्यु- अमीर खुसरो किसी काम से दिल्ली से बाहर कहीं गए हुए थे वहीं उन्हें अपने ख्वाजा निजामुद्दीन औलिया के निधन का समाचार मिला। समाचार क्या था खुसरो की दुनिया लुटने की खबर थी। वे सन्नीपात की अवस्था में दिल्ली पहुंचे, धूल-धूसरित खानकाह के द्वार पर खडे हो गए और साहस न कर सके अपने पीर की मृत देह को देखने का। आखिरकार जब उन्होंने शाम के ढलते समय पर उनकी मृत देह देखी तो उनके पैरों पर सर पटक-पटक कर मूर्च्छित हो गए। और उसी बेसुध हाल में उनके होंठों से निकला,

गोरी सोवे सेज पर मुख पर डारे केस।

चल खुसरो घर आपने सांझ भई चहुं देस।।

अपने प्रिय के वियोग में खुसरो ने संसार के मोहजाल काट फेंके। धन-सम्पत्ति दान कर, काले वस्त्र धारण कर अपने पीर की समाधि पर जा बैठे-कभी न उठने का दृढ निश्चय करके। और वहीं बैठ कर प्राण विसर्जन करने लगे। कुछ दिन बाद ही पूरी तरह विसर्जित होकर खुसरो के प्राण अपने प्रिय से जा मिले। पीर की वसीयत के अनुसार अमीर खुसरो की समाधि भी अपने प्रिय की समाधि के पास ही बना दी गई।

आज तक दिल्ली में हजरत निजामुद्दीन की समाधि के पास अमीर खुसरो की समाधि मौजूद है। हर बरस यहां उर्स मनाया जाता है। हर उर्स का आरंभ खुसरो के इसी अंतिम दोहे से किया जाता है - गोरी सोवे सेज पर।

ओशो कहते हैं: अमीर खुसरो एक बहुत अद्भुत कवि हुआ। वह साधारण कवि न था, ऋषि था। उसने जाना था, वही गया था। और खूब गहराई से जाना था। उसके गुरु थे निजामुदीन औलिया, एक सूफी फकीर। निजामुदीन औलिया की मृत्यु हुई, तो हजारों भक्त आए। अमीर खुसरो भी गया अपने गुरु को देखने। लाश रखी थी, फूलों से सजी थी। अमीर खुसरों ने देखी लाश, और कहा:

'गौरी सोवत सेज पर मुख पर डारे केश। चले खुसरो घर आपने रैन भई यह देश।'

खुसरो ने कहा: 'गौरी सोवत सेज पर मुख पर डारे केश।' यह गोरी सो रही है सेज पर। मुख पर केश डाल दिए गए। 'चल खुसरो घर आपने'-अब यह वक्त हो गया, अब रोशनी चली गई इस संसार से, अब यहां सिर्फ अन्धकार है। 'चल खुसरो घर आपने रैन भई यह देश।' यह देश अब अंधेरा हो गया, रात हो गई।

और कहते हैं, यह पद कहते ही खुसरो गिर पड़ा और उसने प्राण छोड़ दिए। बस, यह आखिरी पद है, जो उसके मुंह से निकला। तुमने जिसे रोशनी जानी है, वह रोशनी नहीं है। खुसरो से रोशनी देख ली थी निजामुदीन औलिया की। उस रोशनी के जाते ही सारा देश अंधकार हो गया-रैन भई इस देश। चल खुसरो घर आपने। अब हम भी अपने घर चलें, अब वक्त-अब यहां कुछ रहें को बचा न।

खुसरो ने निजामुदीन औलिया में जीवन का दीया पहली-दफा देखा। जाना कि जीवन के है! पहचाना प्रकाश क्या है! होश में आया कि होना क्या है! उस दीये के बुझते ही उसने कहा: अब हमारे भी घर जाने का वक्त आ गया।

तुम जिसे अभी प्रकाश समझ रहे हो, वह प्रकाश नहीं है। और तुम जिसे अभी जल समझ रहे हो, वह जल नहीं है। और जिससे तुम अभी प्यास बुझाने की कोशिश कर रहे हो, उससे प्यास बुझेगी नहीं, बढ़े भला!

एक ही बात का ख्याल रखो और प्रतीक्षा करो कि उसका तीर तुम्हारे ह्रदय में बिंध जाए। और तुम्हारे नख से लेकर सर तक विरह की पीड़ा में तुम जल उठो। एक ही प्रार्थना हो तुम्हारी अभी, कि तेरा विरह चाहिए। तू बुला। तेरी पुकार चाहिए। एक ही प्रार्थना और एक ही भाव रह जाये कि उससे मिले बिना कोई सुख, कोई आनंद संभव नहीं है।

तो फिर देर न लगेगी बिना हाथों के, बिना प्रत्यंचा और तीर के-उसका तीर सदा ही तैयार है। सदा सधा है, तुम इधर ह्रदय खोलो, उधर से तीर चल पड़ता है। तुम इधर राजी होओ, उसकी पुकार आ जाती है। कहना मुश्किल है की पुकार पहले आती है कि तुम पहले राजी हो।

-ओशो
पिव पिव लगी प्यास
प्रवचन 9 से संकलित

सुकरात

सुकरात (469-399 ई. पू.) यूनान का विख्यात दार्शनिक। सुकरात को सूफियों की भांति मौलिक शिक्षा और आचार द्वारा उदाहरण देना ही पसंद था। वस्तुतः उसके समसामयिक भी उसे सूफी समझते थे। सूफियों की भांति साधारण शिक्षा तथा मानव सदाचार पर वह जोर देता था और उन्हीं की तरह पुरानी रूढ़ियों पर प्रहार करता था। वह कहता था, सच्चाज्ञान संभव है बशर्ते उसके लिए ठीक तौर पर प्रयत्न किया जाए जो बातें हमारी समझ में आती हैं या हमारे सामने आई हैं, उन्हें तत्संबंधी घटनाओं पर हम परखें, इस तरह अनेक परखों के बाद हम एक सचाई पर पहुंच सकते हैं। ज्ञान के समान पवित्रतम कोई वस्तु नहीं हैं।

बुद्ध की भांति सुकरात ने कोई ग्रंथ नहीं लिखा। बुद्ध के शिष्यों ने उनके जीवनकाल में ही उपदेशों को कंठस्थ करना शुरु किया था जिससे हम उनके उपदेशों को बहुत कुछ सीधे तौर पर जान सकते हैं, किंतु सुकरात के उपदेशों के बारे में यह भी सुविधा नहीं। सुकरात का क्या जीवनदर्शन था यह उसके आचरण से ही मालूम होता है, लेकिन उसकी व्याख्या भिन्न-भिन्न लेखक भिन्न-भिन्न ढंग से करते हैं। कुछ लेखक सुकरात की प्रसन्नमुखता और मर्यादित जीवनयोपभोग को दिखलाकर कहते हैं कि वह भोगी था। दूसरे लेखक शारीरिक कष्टों की ओर से उसकी बेपरवाही तथा आवश्यकता पड़ने पर जीवनसुख को भी छोड़ने के लिए तैयार रहने को दिखलाकर उसे सादा जीवन का पक्षपाती बतलाते हैं। सुकरात को हवाई बहस पसंद न थी। वह एथेंस के बहुत ही गरीब घर में पैदा हुआ था। गंभीर विद्वान् और ख्यातिप्राप्त हो जाने पर भी उसने वैवाहिक जीवन की लालसा नहीं रखी। ज्ञान का संग्रह और प्रसार, ये ही उसके जीवन के मुख्य लक्ष्य थे। उसके अधूरे कार्य को उसके शिष्य अफलातून और अरस्तू ने पूरा किया। इसके दर्शन को दो भागों में बाँटा जा सकता है, पहला सुकरात का गुरु-शिष्य-यथार्थवाद और दूसरा अरस्तू का प्रयोगवाद।

तरुणों को बिगाड़ने, देवनिंदा और नास्तिक होने का झूठा दोष उस पर लगाया गया था और उसके लिए उसे जहर देकर मारने का दंड मिला था।

ओशो कहते हैं: सुकरात को जहर दे कर मारा गया। अदालत ने सुकरात से कहा कि अगर तुम एक वचन दे दो कि तुम सत्य का प्रचार नहीं करोगे-जिसको तुम सत्य कहते हो, उसका प्रचार नहीं करोगे, चुप रहोगे-तो यह मृत्यु बचाई जा सकती है। हम तुम्हे माफ कर दे सकते हैं।

सुकरात ने कहा, जीवन को तो मैं देख चुका। सब कोनों से पहचान लिया। पर्त-पर्त उघाड़ ली। और अगर मुझे जीने का मौका दिया जाए, तो मैं एक काम के लिए जीना चाहूंगा कि दूसरे लोगों को भी जीवन का सत्य पता चल जाए। और तो अब कोई कारण न रहा। मेरी तरफ से जीवन का काम पूरा हो गया। पकना था, पक चुका। मेरी तरफ से तो मृत्यु में जाने में कोई अड़चन नहीं है। वस्तुतः मैं तो जाना चाहूंगा। क्योंकि जीवन देख लिया, मृत्यु अभी अनदेखी पड़ी है। जीवन तो पहचान लिया, मृत्यु से अभी पहचान नहीं हुई। जीवन तो ज्ञात हो गया, मृत्यु अभी अज्ञात है, रहस्यमय है। उस मंदिर के द्वार भी खोल लेना चाहता हूं। मेरे लिए तो मैं मरना ही चाहूंगा, जानना चाहूंगा-मृत्यु क्या है? यह प्रश्न और हल हो जाए। जीवन क्या है, हल हो चुका। एक द्वार बंद रह गया है; उसे भी खोल लेना चाहता हूं। और अगर मुझे छोड़ दिया जाए जीवित, तो मैं एक ही काम कर सकता हूं-और एक ही काम के लिए जीना चाहूंगा-और वह सत्य यह कि जो मैंने देखा है वह दूसरों को दिखाई पड़ जाए। अगर इस शर्त पर आप कहते हैं की सत्य बोलना बंद कर दूं तो जीवित रह सकता हूं, तो फिर मुझे मृत्यु स्वीकार है।

मृत्यु सुकरात ने स्वीकार कर ली। जब उसे जहर दिया गया, वह जहर पीकर लेट गया। मित्र रोने लगे शिष्य दहाड़ने लगे पीड़ा में; आंसुओं की धारें बह गई। सुकरात ने आंख खोलीं और कहा की यह वक्त रोने का नहीं। मैं चला जाऊं, फिर रो लेना। फिर बहुत समय पड़ा है। ये क्षण बड़े कीमती हैं। कुछ रहस्य की बातें तुम्हें और बता जाऊं। जीवन के संबंध में तुम्हें बहुत बताया, अब मैं मृत्यु में गुजर रहा हूं, धीरे धीरे प्रवेश हो रहा है। सुनो!

मेरे पैर ठन्डे हो गए हैं; पैर मर चुके हैं। जहर का प्रभाव हो गया। मेरी जांघ शून्य होती जा रही है। अब मैं पैरों का कोई अनुभव नहीं कर सकता, हिलाना चाहूं तो हिला नहीं सकता। वहां से जीवन विदा हो गया। लेकिन आश्चर्य! मेरे भीतर जीवन में जरा भी कमी नहीं पड़ी है। मैं उतना ही जीवित हूं। जांघें सो गई, शून्य हो गई।

सुकरात ने अपने शिष्य को कहा, क्रेटो, तू जरा चिउंटी लेकर देख मेरे पैर पर।

उसने चिउंटी ली।

सुकरात ने कहा, मुझे पता नहीं चलता। पैर मुर्दा हो गए। आधा शरीर मर गया। लेकिन मैं तो भीतर अभी भी पूरा का पूरा अनुभव कर रहा हूं! हाथ ढीले पड़ गए। हाथ उठते नहीं। गर्दन लटक गई। आखिरी क्षण में भी, आंख जब बंद होने लगी, तब भी उसने कहा कि मैं तुम्हें एक बात कहे जाता हूं, याद रखना: करीब-करीब सब मर चुका है, आखिरी किनारा रह गया है हाथ में, लेकिन मैं पूरा का पूरा जिंदा हूं, मृत्यु मुझे छू नहीं पाई है।

जिसने जीवन को जान लिया, वह मृत्यु को जानने को उत्सुक होगा। क्योंकि मृत्यु जीवन का दूसरा पहलू है; छिपा हुआ हिस्सा है। चांद की दूसरी बाजू है, जो कभी दिखाई नहीं पड़ती।

-ओशो
सब सयाने एक मत
प्रवचन-4 से संकलित
पूरा प्रवचन एम. पी. थ्री. एवम पुस्तक में उपलब्ध है