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स्वतंत्रता से ही समता का संघर्ष संभव

नया इंडिया, नई दिल्ली, 21 नवंबर, 2012

समानता जो है, वह आज अगर नहीं है तो उसका कारण पूंजीवाद नहीं है। समानता न होने का बुनियादी कारण बिल्कुल दूसरा है जिस पर समाजवादी पट्टी डालना चाहते हैं। समाज समान नहीं है, क्योंकि समाज में समान लायक संपत्ति नहीं है। समाज इसलिए असमान नहीं है कि पूंजीपति हैं और गरीब हैं। पूंजीपति और गरीब भी इसलिए हैं, क्योंकि संपत्ति कम है।

समाजवाद कहता है कि हम समानता लाना चाहते है। मगर मजेदार बात यह है कि इसलिए समाजवाद यह कहता है कि समानता लाने के पहले स्वतंत्रता छीननी पड़ेगी । इस तरह हम स्वतंत्रता छीन कर सभी लोगों को समान कर देंगे। ध्यान रहे, स्वतंत्रता है तो समानता के लिए संघर्ष कर सकते हैं, लेकिन अगर स्वतंत्रता नहीं है तो समानता के लिए संघर्ष करने का कोई उपाय आदमी के पास नहीं रह जाता है।

आज एक मित्र मुझसे कह रहे थे कि मैं आपसे बैठ कर विवाद कर रहा हूं और हम तय कर रहे है कि सोशलिज्म ठीक है या कैपिटलिज्म ठीक है। इस पर मैंने उनसे कहा कि यह विवाद तभी तक चल सकता है, जब तक कैपिटलिज्म है। जिस दिन सोशलिज्म होगा, हम विवाद न कर सकेंगे। उस दिन फिर विवाद का कोई मौका नहीं है। यह हम जो बात कर पा रहे हैं आज कि समाजवाद उचित है या नहीं, पूंजीवाद उचित है या नहीं-यह बात समाजवादी दुनिया में संभव नहीं है।

रूस के सारे अखबार सरकारी है। एक भी गैर-सरकारी अखबार नहीं है। सारा पब्लिकेशन, सारा प्रकाशन सरकारी है। एक किताब गैर सरकारी नहीं छप सकती है। आप क्या करेंगे? स्वतंत्रता एक बार छीन गई तो समानता की बात भी उठाने का मौका नहीं मिलेगा। इसलिए मैं मानता हूं, अगर समानता कभी दुनिया में लानी है तो स्वतंत्रता छीन कर नहीं, स्वतंत्रता बढ़ा कर लायी जा सकती है।

समानता जो है वह आज अगर नहीं है तो उसका कारण पूंजीवाद नहीं है। समानता न होने का बुनियादी कारण बिल्कुल दूसरा है जिस पर समाजवादी पट्टी डालना चाहते हैं। समाज समान नहीं है, क्योंकि समाज में समान लायक संपत्ति नहीं है। समाज इसलिए असमान नहीं है कि पूंजीपति हैं और गरीब हैं। पूंजीपति और गरीब भी इसलिए हैं, क्योंकि संपत्ति कम है और संपत्ति इतनी ज्यादा नहीं है कि सब अमीर हो सकें। सवाल राजनीतिक परिवर्तन का नहीं है। असली सवाल मुल्क में संपत्ति को अधिक पैदा करने के उपाय खोजने का है। असली सवाल यह है कि संपत्ति नहीं है। वह कैसे पैदा की जाए? संपत्ति पैदा करने की जो व्यवस्था पूंजीवाद के पास है, वह समाजवाद के पास नहीं है, क्योंकि पूंजीवाद के पास व्यक्तिगत प्रेरणा की आधारशिला है। एक-एक उत्प्रेरित होता है संपत्ति कमाने को, प्रतिस्पर्धा को, प्रतियोगिता को। समाजवाद में न तो प्रतियोगिता को उपाय है न प्रतिस्पर्धा का उपाय है। और न ही समाजवाद में कोई आदमी कम काम कर रहा है, न ज्यादा काम कर रहा है कि इन दोनों के बीच तय करने का कोई उपाय है।

जो सरकारी दफ्तर की हालत है वही सारे मुल्क की बनाने की कोशिश है। सरकारी दफ्तर जो छह घंटे काम कर रहा है, वह बेवकूफ है और जो छह घंटे काम नहीं कर रहा है और विश्राम कर रहा है वह आदमी समझदार है। दफ्तर में बीस समझदार है और एक नासमझ है और एक नासमझ को परेशान किये हुए है, वे बीस कि तुम छह घंटे काम क्यों कर रहे हो। पूरे मुल्क को सरकारी दफ्तर बनाने की इच्छा है तो समाजवाद बड़ी उचित व्यवस्था है। सच तो यह है कि सरकारी दफ्तर भी निजी व्यक्तियों के हाथों में जाने चाहिए अन्यथा मुल्क में उत्पादन नहीं हो सकता। इस मुल्क में कोई श्रम करने को राजी नहीं हो सकता।

मैं सरकारी स्कूल में कुछ दिन था। मैं बहुत हैरान हुआ। सरकारी स्कूल में कोई प्रोफेसर पढ़ाने को बिल्कुल भी उत्सुक नहीं है। गैर सरकारी स्कूल में वह बीस घंटे ले रहा है। उसका ही जो समांतर शिक्षक गैर सरकारी कालेज में है, वह बीस घंटे पढ़ा रहा है, क्योंकि उसके पढ़ाने पर ही उसकी नौकरी निर्भर है। सरकारी दफ्तरों में नौकरियां सिक्योर्ड हैं, पढ़ाने की कोई जरूरत नहीं है। पढ़ाना-वढ़ाना बेकार की बातें हैं। जैसे ही कोई व्यवस्था तंत्र के हाथ में चली जाए, वैसे ही अनुत्पादक हो जाती है और या फिर एक उपाय है। वह यह कि सरकारी प्रोफेसर के पीछे एक पुलिस वाला खड़ा रहे। वह उसे बंदूक के हुद्दे देता रहे कि पढ़ाओ, तुम पढ़ाओ। लेकिन यह कितनी देर चलाएगा? और वह पुलिस वाला भी सरकारी है, उसके पीछे एक पुलिस वाला और-नहीं तो वह पुलिस वाला हुद्दे देना बंद कर देगा। वह कहेगा कि क्या निरंतर काम करते रहना। इस तरह हमारा तंत्र आगे बढ़ता रहेगा। लिहाजा सरकार का तंत्र एकदम ही तत्रबद्ध होता चला जाता है। एक के पीछे दूसरा खड़ा करना पड़ता है।

भीतर के विभाजन को मिटाओ और बनो अखंड

आज समाज, नई दिल्ली, 8 नवंबर, 2012

ऐसा नहीं कि कुछ लोग विक्षिप्त हैं, बल्कि पूरी मनुष्यता ही विक्षिप्त है। कुछ लोगों का ही उपचार करने भर का सवाल नहीं है, पूरी मनुष्यता का उपचार किया जाना जरूरी है। मनुष्य को इतना दबाया जाता है, इतना संस्कारित किया जाता है कि विक्षिप्तता उसकी साधारण स्थिति बन गई है।

जैसा वह है उसे वैसा ही नहीं रहने दिया जाता। उसे समाज के ढांचे में ढालने की कोशिश की जाती है। उस ढांचे से ही विक्षिप्तता पैदा होती है। समाज तुम्हें एक ढांचा देता है, एक ढर्रा देता है। तुम जो नहीं हो वह तुम्हें बनना पड़ता है। तुम्हारे व्यक्तित्व का केवल एक अंश ही अभिव्यक्त होने दिया जाता है, जबकि बाकी का हिस्सा दबा दिया जाता है। इससे तुम्हारे भीतर चीखें बिखरने लगती हैं, टूटने लगती हैं। और जो कुछ तुम दबाते हो, वह अभिव्यक्त होने के लिए संघर्ष करता है। तो हर मनुष्य टुकड़ों में बंटा हुआ है, टूटा हुआ है, अपने ही खिलाफ लड़ रहा है। मनुष्य का होना ही विक्षिप्तता बन गया है।

वह विश्रांत नहीं हो सकता, शांत नहीं हो सकता, आनंदित नहीं हो सकता। मनुष्य हमेशा नरक में ही है और जब तक उसके सब खंड एक न हो जाएं, तब तक वह इस नरक से नहीं निकल सकता। कुछ करना पड़ेगा जिससे तुम्हारी विक्षिप्तता को बाहर निकाला जा सके, तुम्हारे बिखरे हुए खंडों को फिर से एक किया जा सके। जो अभिव्यक्त नहीं किया गया उसे अभिव्यक्त करना होगा, और चेतन मन द्वारा अचेतन का जो लगातार दमन चल रहा है वह रोकना होगा। ध्यान की पुरानी विधियां इस बात की फिकर नहीं लेतीं, इसीलिए वे विधियां सफल नहीं हो पाईं।

कारण क्या होगा उनकी असफलता का? कारण यह है कि वे विधियां मनुष्य को उसी स्थिति में ध्यान में ले जाना चाहती हैं जैसा कि वह है। ये विधियाँ कुछ हद तक ही उपयोग हो सकती हैं। केवल परिधि पर ही उनका प्रभाव होगा, लेकिन भीतर का जो विभाजन है, वह तो बना ही रहेगा, क्योंकि उसको मिटाने के लिए तुमने कुछ भी नहीं किया। जैसे झेन विधियां हैं, भावातीत ध्यान है, और दूसरी कई विधियां हैं जो तुम्हें एक सीमा तक ले जा सकती हैं।

वे तुम्हें थोड़ी शांति दे सकती हैं, बाहर से तुम शांत हो जाओगे, लेकिन अगर देखा जाए तो बाहर की शांति खतरनाक है, क्योंकि फिर भीतर ही भीतर अशांति पकती रहेगी और एक दिन फूटकर बाहर आ जाएगी। मूलतः तो कुछ हुआ ही नहीं। तुमने बस अपने चेतन मन को स्थिर होने में पारंगत कर लिया। मन को स्थिर तो बड़ी आसानी से किया जा सकता है- कोई मंत्र पढ़ने लगो, जाप करने लगो। जिस किसी चीज से भी भीतर बोरडम पैदा हो जाए, उससे तुम्हें थोड़ी राहत-सी महसूस होगी। उदाहरण के लिए, तुम अगर राम-राम-राम जपते रहो तो उसके सतत दोहराने से ही एक ऊब, एक नींद पैदा होने लगती है और तुम्हारा मन सो जाता है।

उस नींद को तुम शांति समझ सकते हो, स्थिरता समझ सकते हो। वास्तव में यह एक तरह की ऊब है, लेकिन उसकी वजह से अब तुम अपने जीवन को किसी तरह सह लेते हो और पागलपन भीतर ही भीतर उबलता रहेगा। किसी दिन जब पागलपन सीमा के बाहर हो जाएगा तो फूटकर बाहर आ जाएगा। इसीलिए तो मेरा जोर इस बात पर है कि पहले तुम अपने भीतर के विभाजन को मिटाओ, भीतर से अखंड बनो। जब तक तुम अखंड न हो जाओ तब तक कुछ नहीं किया जा सकता। धरा में आए हो तो जीवन सफल बनाओ।

धन से बड़ा कौन?

दैनिक जागरण, कानपुर, 7 नवंबर, 2012

ध्यान हो तो धन भी सुंदर है। ध्यानी के पास धन होगा, तो जगत का हित ही होगा, कल्याण ही होगा। क्योंकि धन ऊर्जा है। धन शक्ति है। धन बहुत कुछ कर सकता है। मैं धन विरोधी नहीं हूं। मैं उन लोगों में नहीं, जो समझाते हैं कि धन से बचो। भागो धन से। वे कायरता की बातें करते हैं। मैं कहता हूं जियो धन में, लेकिन ध्यान का विस्मरण न हो। ध्यान भीतर रहे, धन बाहर। फिर कोई चिंता नहीं है। तब तुम कमल जैसे रहोगे, पानी में रहोगे और पानी तुम्हें छुएगा भी नहीं।

ध्यान रहे, धन तुम्हारे जीवन का सर्वस्व न बन जाए। तुम धन को ही इकट्ठा करने में न लगे रहो। धन साधन है, साध्य न बन जाए। धन के लिए तुम अपने जीवन के अन्य मूल्य गंवा न बैठो। तब धन में कोई बुराई नहीं है। मैं चाहता हूं कि दुनिया में धन खूब बढ़े, इतना बढ़े कि देवता तरसें पृथ्वी पर जन्म लेने को।

लेकिन धन सब कुछ नहीं है। कुछ और भी बड़े धन हैं। प्रेम का, सत्य का, ईमानदारी का, सरलता का, निर्दोषता का, निर-अहंकारिता का। ये धन से भी बड़े धन हैं। कोहिनूर फीके पड़ जाएं, ऐसे भी हीरे हैं- ये भीतर के हीरे हैं।

एक दिन मुल्ला नसीरुद्दीन से किसी ने पूछा- नसीरुद्दीन सुना है कि तुमने नई फर्म बनाई है, कितने साझीदार हैं? मुल्ला ने कहा - अब आपसे क्या छिपाना। चार तो अपने ही परिवार के लोग है और एक पुराना मित्र। इस तरह पांच पार्टनर हैं। उसने पूछा- फर्म का नाम क्या रखा है? मुल्ला ने कहा - मेसर्स मुल्ला ऐंड मुल्ला ऐंड मुल्ला ऐंड मुल्ला ऐंड अब्दुल्ला कंपनी। उसने कहा- नाम तो बड़ा अच्छा है, मगर यह अब्दुल्ला कहां से बीच में आ टपका? दुखी स्वर में मुल्ला नसीरुद्दीन बोला- पैसा तो उसी बेवकूफ का लगा है।

यहां मित्रता पैसे की है। संबंध पैसे के हैं। हम धन का एक ही अर्थ लेते हैं कि दूसरों की जेब से निकाल लें। इससे कुछ हल नहीं होता। धन उसकी जेब से तुम्हारी जेब में आ जाता है, फिर तुम्हारी जेब से दूसरा कोई निकाल लेता है। धन जेबों में घूमता रहता है, लेकिन धन पैदा नहीं होता। अभी हमने यह नहीं सीखा कि धन का सृजन कैसे किया जाता है। अभी धन हमारे लिए शोषण का ही अर्थ रखता है। जो सच में समृद्ध देश हैं, उन्हें पता है कि धन शोषण नहीं, सृजन है। हमारा देश किसी देश से गरीब नहीं है, लेकिन समस्या यह है कि हम मूढ़तापूर्ण बातों को महत्वपूर्ण मानते हैं।

यहां दरिद्र को एक नया नाम दे दिया गया- दरिद्र नारायण। जब तुम दरिद्र को नारायण कहोगे, तो उसकी दरिद्रता मिटाओगे कैसे? भगवान को कोई मिटाता है क्या? भगवान को तो बचाना पड़ता है। दरिद्र नारायण की तो पूजा करनी होती है। दरिद्र नारायण के पैर दबाओ। उसे दरिद्र रखो, नहीं तो वह नारायण नहीं रह जाएगा। हम अगर गरीब की पूजा करेंगे, तो अमीर कैसे बनेंगे। अगर हम धन का तिरस्कार करेंगे, तब तो धन को पैदा करना ही बंद कर देंगे।

हां, धन को शोषण से मत पैदा करना। धन का सृजन करने का तरीका खोजो। यह तो हमारे हाथ में है- मशीनें हैं, तकनीक है। जमीन से हम उतना ले सकते हैं, जितना चाहिए। गायें उतना दूध दे सकती हैं, जितना चाहिए। मगर हमें उसकी फिक्र ही नहीं है। हम तो बस गऊमाता के भक्त हैं। हमारी गायें दुनिया में सबसे कम दूध देती हैं और हम उनके भक्त हैं। हम दस हजार साल से जय गोपाल, जय गोपाल.. कृष्ण के गीत गा रहे हैं और गउएं? किसी की गऊ अगर तीन पाव दूध देती है तो वह समझता है कि बहुत है। स्वीडन में कोई गाय अगर तीन पाव दूध दे, तो वह कल्पना के बाहर है। पश्चिम में लोग भैंस का दूध नहीं पीते, क्योंकि गायें इतना दूध देती हैं कि भैंस का दूध पीने की जरूरत ही नहीं।

सारी तकनीक उपलब्ध है। धन के सृजन के लिए मशीन की मदद लो। अगर तुम मशीन, रेलगाड़ी, टेलीग्राफ के खिलाफ रहोगे, तो दरिद्र ही रहोगे। दीन ही रहोगे। मशीनों का जितना उपयोग हो, उतना ही अच्छा है। क्योंकि मशीनें जितनी काम में आती हैं, आदमी का उतना ही श्रम बचता है। यह बचा हुआ श्रम किसी ऊंचाई के लिए लगाया जा सकता है। इसे नई खोजों में लगाया जाए। यह नए आविष्कारों में लगे। पृथ्वी सोना उगल सकती है, लेकिन बिना मशीन यह नहीं होगा। देश का औद्योगिकीकरण, यंत्रीकरण होना चाहिए। देश जितना समृद्ध होता है, उतना धार्मिक हो सकता है।

संन्यास एक उपलब्धि है

स्पष्ट आवाज, लखनऊ, 5 नवंबर, 2012

संन्यास मेरे लिए त्याग नहीं, आनंद है. संन्यास निषेध भी नहीं है, उपलब्धि है।

लेकिन आज तक पृथ्वी पर संन्यास को निषेधात्मक अर्थ में ही देखा गया है- त्याग के अर्थ में, छोड़ने के अर्थ में, पाने के अर्थ में नहीं।

मैं संन्यास को देखता हूं पाने के अर्थ में। निश्चित ही, जब कोई हीरे-जवाहरात पा लेता है तो कंकड़-पत्थरों को छोड़ने का अर्थ इतना ही है कि हीरे-जवाहरातों के लिए जगह बनानी पड़ती है। कंकड़-पत्थरों का त्याग नहीं किया जाता। त्याग तो हम उसी बात का करते हैं जिसका बहुत मूल्य मालूम होता है। कंकड़-पत्थर तो ऐसे छोड़े जाते हैं जैसे घर से कचरा फेंक दिया जाता है। घर से फेंके हुए कचरे का हम हिसाब नहीं रखते कि हमने कितना कचरा त्याग दिया।

यदि संन्यास आनंद है, यदि संन्यास उपलब्धि है; तो संन्यास का अर्थ विराग नहीं हो सकता. तो संन्यास का अर्थ उदासी नहीं हो सकता। तो संन्यास का अर्थ जीवन का विरोध नहीं हो सकता।

तब तो संन्यास का अर्थ होगा, जीवन का फैलाव, विस्तार, गहराई। अभी तक जिसे हम संन्यासी कहते हैं वह अपने को सिकोड़ता है। सबसे तोड़ता है। सब तरफ से अपने को बंद करता है। मैं उसे संन्यासी कहता हूं जो सबसे अपने को जोड़े; जो अपने को ही बंद न करे, खुला छोड़ दे।

जो संन्यास सिकोड़ने वाला हैं, वह संन्यास बंधन बन जाएगा, वह संन्यास कारागृह बन जाएगा, वह संन्यास स्वतंत्रता नहीं हो सकता। और जो संन्यास स्वतंत्रता नहीं है वह संन्यास ही कैसे हो सकता है! संन्यास की आत्मा तो परम स्वतंत्रता है।

इसलिए मेरे लिए संन्यास की कोई मर्यादा नहीं, कोई बंधन नहीं. मेरे लिए संन्यास का कोई नियम नहीं, कोई अनुशासन नहीं। मेरे लिए संन्यास कोई अनुशासन नहीं है।

मेरे लिए संन्यास व्यक्ति के परम विवेक में परम स्वतंत्रता की उद्भावना है। उस व्यक्ति को मैं संन्यासी कहता हूं जो परम स्वतंत्रता में जीने का साहस करता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वह उच्छृंखल हो जाता है।

इसका यह मतलब नहीं है कि वह स्वच्छंद हो जाता है। असलियत तो यह है कि जो आदमी परतंत्र है, वही उच्छृंखल हो सकता है। और जो आदमी परतंत्र है, बंधन में बंधा है, वही स्वच्छंद हो सकता है। जो स्वतंत्र है, वह तो कभी स्वच्छंद होता ही नहीं।

संन्यास ऐसा फूल है जो खो नहीं जाना चाहिए। वह ऐसी अदभुत उपलब्धि है, जो विदा नहीं हो जानी चाहिए। पुरानी व्यवस्था में बंधा हुआ वह मर सकता है। इसलिए संन्यास को नये अर्थ देने जरूरी हो गए हैं।

स्वयं को बदलो, परिस्थिति को नहीं

स्वतंत्र वार्ता, हैदराबाद, 4 नवंबर, 2012

धर्म जबसे भागने पर निर्भर हो गया है, तभी से धर्म निष्प्राण हो गया है। जब धर्म वापस बदलने पर निर्भर होगा, तब उसमें फिर पुनः प्राण आएंगे।

इसको स्मरण रखें, आपको अपने को बदलना है, अपनी जगह को नहीं बदलना है। जगह को बदलने का कोई मतलब नहीं है। जगह को बदलने में धोखा है, क्योंकि जगह को बदलने से यह हो सकता है कि आपको कुछ बातें पता न चलें। नए वातावरण में, शांत वातारण में आपको धोखा हो कि आप शांत हो गए हैं।

जो शांति प्रतिकूल परिस्थितियों में न टिके, वह कोई शांति नहीं है। इसीलिए जो समझदार हैं, वे प्रतिकूल परिस्थिति में ही शांति को साधते हैं क्योंकि जो प्रतिकूल में साध लेते हैं, अनुकूल में तो उसे हमेशा उपलब्ध कर ही लेते हैं।

इसलिए जीवन से भागने की बात नहीं है। जीवन को परीक्षा समझें। और इसे स्मरण रखें कि आपके आसपास जो लोग हैं, वे सब सहयोगी हैं। वह आदमी भी आपका सहयोगी है जो सुबह आपको गाली दे जाए। उसने एक मौका दिया है आपको। चाहें तो अपने भीतर प्रेम को साध सकते हैं। वह आदमी आपका सहयोगी है, जो आप पर क्रोध को प्रकट करे। वह आदमी आपका सहयोगी है, जो आपकी निंदा कर जाए।

वह आदमी आपका सहयोगी है, जो आप पर कीचड़ उछालता हो। वह आदमी भी आपका सहयोगी है, जो आपके रास्ते पर कांटे बिछा दे, क्योंकि वह भी एक मौका है और परीक्षा है। और चाहें उससे पार हो जाएं, तो आपके मन में उसके प्रति इतना ऋण होगा, जिसका हिसाब नहीं है। साधु जो नहीं सिखा सकते हैं, इस जगत में शत्रु सिखा सकते हैं।

मैं पुनः कहूं, साधु जो नहीं सिखा सकते इस जगत में शत्रु सिखा सकते हैं। अगर आप सजग हैं और आपमें सीखने की समझ है, तो आप जिंदगी के हर पत्थर को सीढ़ी बना सकते हैं। और नहीं तो नासमझ, सीढ़ियों को भी पत्थर समझ लेते हैं और उनसे ही रुक जाते हैं। अन्यथा हर पत्थर सीढ़ी हो सकता है। अगर समझ हो। अगर समझ हो तो हर पत्थर सीढ़ी हो सकता है।

इस पर थोड़ा विचार करें। आपको अपने घर में, परिवार में जो-जो बातें पत्थर मालूम होती हों कि इनकी वजह से मैं शांत नहीं हो पाता, उन्हीं को साधना का केंद्र बनाएं और देखें कि वे ही आपको शांत होने में सहयोगी हो जाएँगी। कौन-सी बात आपको रोकती है? जो बात आपको रोकती हो, जरा विचार करें, क्या कोई रास्ता उसे सीढ़ी बनाने का हो सकता है? बराबर रास्ते हो सकते हैं। और अगर विचार करेंगे और विवेक करेंगे, तो रास्ता दिखाई पड़ेगा।