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  स्वास्थ्य
 
 

शुद्धता तन और मन की...

योग जानता है तीन शब्दों को, तीन गुणों कोः सत्व, रजस, तमस। सत्व है शुद्धता; रजस है ऊर्जा; तमस है बोझ, अंधकार। जो भोजन तुम लेते हो उससे तुम्हारा शरीर बनता है, और एक अर्थों में, तुम बनते हो...

प्रत्येक बात को गहराई से समझ लेना है। पहली बात हैः शुद्धता, शौच। तुम संसार में हो शरीर के रूप में-सशरीर। यदि तुम्हारा शरीर बीमार हो तो तुम स्वस्थ कैसे हो सकते हो? यदि तुम्हारे शरीर में बहुत विष हैं तो वे तुम्हें मूर्च्छित करते हैं। यदि तुम्हारा शरीर बहुत अशुद्ध है, बहुत बोझिल है, तो तुम हलके नहीं हो सकते, तुम उड़ नहीं सकते। इसलिए अब तुम्हें अपने शरीर और उसकी शुद्धता के लिए कुछ करना होगा।

ऐसे भोजन हैं जो तुम्हें पृथ्वी से बांध देते हैं; ऐसे भोजन हैं जो तुम्हें आकाश की ओर उन्मुख कर देते हैं। जीने के ऐसे ढंग हैं जहां कि तुम गुरुत्वाकर्षण के बहुत प्रभाव में होते हो; जीने के ऐसे ढ़ग हैं कि तुम गुरुत्वाकर्षण के विपरीत ऊपर उठने के लिए उपलब्ध हो जाते हो।

दो नियम हैं: एक है गुरुत्वाकर्षण, दूसरा है ग्रेस, प्रसाद। गुरुत्वाकर्षण तुम्हें नीचे की ओर खींचता है, प्रसाद तुम्हें ऊपर की ओर खींचता है। विज्ञान केवल गुरुत्वाकर्षण को जानता है; योग प्रसाद को भी जानता है। और इस संबंध में योग विज्ञान की अपेक्षा ज्यादा वैज्ञानिक मालूम होता है, क्योंकि प्रत्येक नियम का विपरीत नियम होता है। यदि पृथ्वी तुम्हें नीचे खींचती है तो जरुर कोई चीज होगी जो तुम्हें ऊपर भी खींचती होगी; वरना तो पृथ्वी ने तुम्हें खींच लिया होता पूरी तरह ही-तुम्हें भीतर ही खींच लिया होता-तुम तिरोहित हो चुके होते। तुम जीते हो धरती के धरातल पर। इसका अर्थ है की तुम्हें नीचे खींचने वाले नियम और तुम्हें ऊपर खींचने वाले नियम के बीच एक संतुलन है। अन्यथा तो तुम बहुत पहले विनष्ट हो चुके होते पृथ्वी द्वारा-तुम समा चुके होते पृथ्वी के गर्भ में और तिरोहित हो चुके होते। इस विपरीत नियम का नाम है 'प्रसाद।'

तुमने कई बार अनुभव किया होगा की बिना किसी कारण के किसी दिन सुबह अचानक तुम बहुत हलका अनुभव करते हो, जैसे की तुम उड़ सकते हो। तुम चलते हो जमीन पर, लेकिन तुम्हारे पांव जमीन पर नहीं पड़ते-तुम ऐसे हलके हो जाते हो जैसे पंख। और किसी दिन तुम इतने भारी होते हो, ऐसे बोझिल कि चल भी नहीं सकते। क्या होता है? तो तुम्हें अपनी पूरी जीवन-शैली का अध्ययन करना चाहिए। कोई चीज हलके होने में तुम्हारी मदद करती है, और कोई चीज तुम्हारे बोझिल होने में मदद करती है। वह सब जो तुम्हें बोझिल करता है अशुद्ध है, और वह सब जो तुम्हें हलका करता है शुद्ध है। शुद्धता निर्भार होती है, अशुद्धता भारी और बोझिल होती है। एक स्वस्थ व्यक्ति हलका और निर्भार अनुभव करता है; अस्वस्थ व्यक्ति बहुत ज्यादा बोझिल होता है पृथ्वी द्वारा; बहुत नीचे कि ओर खिंचा रहता है। स्वस्थ व्यक्ति चलता नहीं, दौड़ता है। अस्वस्थ व्यक्ति यदि बैठा भी है तो वह बैठा हुआ नहीं होता, वह सो रहा होता है।

योग जानता है तीन शब्दों को, तीन गुणों कोः सत्व, रजस, तमस। सत्व है शुद्धता; रजस है ऊर्जा; तमस है बोझ, अंधकार। जो भोजन तुम लेते हो उससे तुम्हारा शरीर बनता है, और एक अर्थों में, तुम बनते हो। यदि तुम मांस खाते हो, तो तुम ज्यादा बोझिल होओगे। यदि तुम केवल दूध और फलों पर जीते हो, तो तुम हलके रहोगे। क्या तुमने ध्यान दियाः कई बार जब तुम उपवास करते हो, तो तुम कितना निर्भार अनुभव करते हो, जैसे कि शरीर का सारा वजन खो गया हो! वजन करने वाली मशीन तो बताएगी तुम्हारा वजन तो भी उसको अनुभव नहीं करते। क्या होता है? शरीर के पास पचाने के लिए कुछ भी नहीं होता; शरीर दिन-प्रतिदिन के कार्यक्रम से मुक्त होता है। ऊर्जा बह रही होती है, ऊर्जा के पास कुछ होता नहीं करने के लिए-यह एक छुट्टी का दिन होता है शरीर के लिए। तुम शांत अनुभव करते हो; तुम सुन्दर अनुभव करते हो।

तो भोजन का ध्यान रखना है। भोजन कोई साधारण बात नहीं है। तुम्हें सावधानी बरतनी चाहिए, क्योंकि जो तुमने खाया है उसी से तुम्हारा शरीर बना है। प्रतिदिन तुम इसे भोजन द्वारा निर्मित कर रहे हो। कम या ज्यादा भोजन लेने से या सम्यक भोजन लेने से भी बहुत अंतर पड़ता है। तुम अति भोजन करने वाले हो सकते हो-तुम बहुत ज्यादा खा सकते हो जिसकी कि कोई जरुरत नहीं है-तब तुम बहुत सुस्त, बहुत बोझिल हो जाओगे। तुम एकदम ठीक मात्र में ले सकते हो, तब तुम ज्यादा आनंदित अनुभव करोगे, बोझिल नहीं-ऊर्जा बह रही होती है, अवरुद्ध नहीं होती। और वह व्यक्ति जो भीतर के आकाश में उड़ान भरना चाहता है और प्रयास कर रहा है भीतर के केंद्र तक पहुंचने का, उसे निर्भार होने कि जरुरत है; वरना यात्रा पूरी नहीं हो सकती। आलसी रह कर तुम उस आंतरिक केंद्र में प्रवेश नहीं कर पाओगे। कौन यात्रा करेगा उस आतंरिक केंद्र तक?

तो जो तुम खाते हो उसके प्रति सावधान रहो; जो तुम पीते हो उसके प्रति सावधान रहो। सावधान रहो कि कैसे तुम ध्यान रखते हो अपने शरीर का। छोटी-छोटी बातें महत्त्व रखती हैं। साधारण व्यक्ति के लिए वे कोई महत्व नहीं रखतीं क्योंकि वह कहीं जा नहीं रहा होता है। जब तुम अंतर्यात्रा पर निकलते हो, तो हर चीज महत्त्व रखती है। तुम प्रतिदिन स्नान करते हो या नहीं-यह बात भी महत्वपूर्ण है। साधारणतया यह कोई महत्व नहीं रखती। बाजार में, दुकान में तो यह बात खास महत्व नहीं रखती कि तुमने ठीक से स्नान किया या नहीं। असल में यदि तुम रोज ठीक से स्नान करते हो, तो यह बात तुम्हारे व्यवसाय के लिए एक अड़चन होगी। तुम इतना हलका अनुभव कर सकते हो कि चालाक होना कठिन हो जाए; तुम इतना ताजा अनुभव कर सकते हो कि धोखा देना कठिन हो जाए; तुम इतना शुद्ध, निर्दोष अनुभव कर सकते हो कि शोषण करना शायद असंभव ही हो जाए।

तो अस्वच्छ रहना बाजार में तो मदद दे सकता है, किन्तु मंदिर में नहीं। मंदिर में तुम्हें ताजा और स्वच्छ जाना होता है-ओस-कणों की भांति, फूलों की भांति। मंदिर में, जहां तुम अपने जूते छोड़ते हो, वहीं छोड़ देना सारे संसार को और उसके सारे बोझों को। उन्हें भीतर मत ले जाना।

स्नान सर्वाधिक सुन्दर घटनाओं में से एक है-बड़ी सरल है। यदि तुम इसका आनंद लेने लगो, तो यह बात शरीर के लिए एक ध्यान बन जाती है। बस फव्वारे के नीचे बैठना और उसका आनंद लेना, कोई गीत गुनगुनाना-या कोई मंत्र गुनगुनाना-तब वह दुगुना जानदार हो जाता है। तुम फव्वारे के नीचे बैठे हो और ओम का गुंजार कर रहे हो और पानी बरस रहा है तुम्हारे शरीर पर और ओम बरस रहा है तुम्हारे मन में, तो तुम दोहरा स्नान कर रहे होः शरीर शुद्ध हो रहा है पानी के द्वारा, वह संबंध रखता है भौतिक तत्वों के संसार से; और तुम्हारा मन शुद्ध हो रहा है ओम के मंत्र द्वारा। स्नान के बाद तुम स्वयं को प्रार्थना के लिए तैयार पाओगे-तुम प्रार्थना करना चाहोगे। इस स्नान और मंत्र-उच्चार के बाद तुम बिलकुल भिन्न अनुभव करोगे; तुम्हारे चारों ओर एक अलग गुणवत्ता और सुवास होगी।

तो शौच का अर्थ है: भोजन की शुद्धता, शरीर की शुद्धता, मन की शुद्धता-शुद्धता की तीन पर्तें। और चौथी जो कि तुम्हारी अंतस सत्ता है, उसे किसी शुद्धता कि कोई जरुरत नहीं, क्योंकि वह अशुद्ध हो ही नहीं सकती। तुम्हारा अन्तरतम केंद्र सदा शुद्ध है, सदा कुंआरा है। लेकिन वह अंतस केंद्र ढंका होता है दूसरी चीजों से जो अशुद्ध हो सकती हैं-जो रोज-रोज अशुद्ध होती हैं।

तुम रोज उपयोग करते हो अपने शरीर का, उस पर धूल जमती रहती है। तुम रोज उपयोग करते हो मन का, तो विचार एकत्रित होते रहते हैं। विचार धूल की भांति ही हैं। संसार में रह कर कैसे तुम बिना विचारों के जी सकते हो? तुम्हें सोच-विचार करना पड़ता है। शरीर पर धूल जमती है और वह गन्दा हो जाता है; मन विचारों को इकठ्ठा करता है और वह गन्दा हो जाता है। दोनों को जरुरत होती है एक अच्छे स्नान की। यह बात तुम्हारी जीवन-शैली का अंग बन जानी चाहिए। इसे नियम की भांति नहीं लेना चाहिए; यह सुंदरता से जीने का एक ढंग होना चाहिए। और यदि तुम शुद्ध हो तो दूसरी संभावनाएं तुरंत खुल जाती हैं, क्योंकि हर चीज जुड़ी है दूसरी चीज से; एक श्रृंखला है। और यदि तुम जीवन को रूपांतरित करना चाहते हो तो सदा प्रथम से ही शुरूआत करना।

-ओशो
पंतजलि योग सूत्र भाग-3
प्रवचन 9 से संकलित
पूरा प्रवचन एम.पी.थ्री. एवं पुस्तक में उपलब्ध है।