Osho World Online Hindi Magazine :: September 2012
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  युवा-ज़ोन
 
 

कैसा हो युवा चित्त?

क्या हम सीखते हैं, यह मूल्यवान नहीं है। कितना हम सीखते हैं-उस सीखने की प्रक्रिया से गुजरने वाली आत्मा निरंतर जवान होती चली जाती है...

किसी भी राष्ट्र की उन्नति का मार्ग युवा पीढ़ी के विकास पर निर्भर करता है। उनके जोश और उमंग से ही मुश्किल से मुश्किल चीजों का हल पल में निकल आता है। जिससे देश के विकास में तेजी आती है। विकास चहुमुखी हो इसके लिए युवा और उसके मन की उमंगों का बेहतर होना और अच्छा सोचना लाज़िमी है। तभी सही मार्ग और उचित दिशा की किरण दिखाई पड़ सकती है। इसके लिए जरूरी है कि हमारा चित्ता क्या सुनता और सोचता है? क्योंकि चित्त में ही सभी भावों और विचारों का समावेश होता है। मन में तरह-तरह के विचार समुद्र की लहरों के समान हिलोरें मारते रहते हैं। कब जिए, कैसे जिए, जीवन का असल उद्देश्य क्या है? जब तक इसका ज्ञान होता तब तक हम जीवन का एक बड़ा भाग जी लेते है। जीवन की सार्थकता सिद्ध करने के लिए युवावस्था में चित्त का स्वस्थ होना, और भय से मुक्त होना आवश्यक है। हमारे चारों ओर जब कोई चीज हम देखते या सुनते है तब उसका असर मन और मस्तिष्क दोनों पर पड़ता है। उस के मुताबिक हमारा आचरण और व्यवहार भी होने लगता है। यह वह नाजुक समय होता है जब युवा मन में सीख की नयी कोपले फूट रही होती है उन कोपलों का नीति और शिष्टाचार की शाखा बनाने के लिए चित्त का सही दिशा में उपयोगी चीजों को सीखना और ग्रहण करना परम आवश्यक है। तभी हमारे सुनहरे भविष्य और कल की कल्पना साकार हो सकती है।

ओशो कहते हैः एक सूत्र युवा चित्त के जन्म के लिए, भय के बाहर हो जाने के लिए अभय है।

और दूसरा सूत्र....पहला सूत्र है, बूढ़े चित्त का मतलब हैः क्रिपिल्ड विद फियर विद फियर, भय से पुंज।

और दूसरा सूत्र है, बूढ़े चित्त का अर्थ हैः बर्डन विद नालेज, ज्ञान से बोझिल।

जितना बूढ़ा चित्त होगा उतना ज्ञान से बोझिल होगा। उतने पांडित्य का भारी पत्थर उसके सिर पर होगा। जितना युवा चित्त होगा, उतना ज्ञान से मुक्त होगा। उसने स्वयं ही हो जाना है, जानते ही उसके बाहर हो जाएगा। और आगे बढ़ जाएगा। ए कांस्टेंट अवेयरनेस ऑफ नाट नोन। एक सतत् भाव उसके मन में रहेगा-नहीं जानता हूं। कितना ही जान ले, उस जानने को किनारे हटाता हुआ, न जानने के भाव को सदा जिंदा रखेगा। वह अतीत में भी क्षमता रखेगा। रोज सब सीख सकेगा, प्रतिपल सीख सकेगा। कोई ऐसा क्षण नहीं होगा, जिस दिन वह कहेगा कि मैं पहले से ही जानता हूं, इसलिए सीखने की अब कोई जरूरत नहीं है। जिस आदमी ने ऐसा कहा, वह बूढ़ा हो गया।

युवा चित्त का अर्थ हैः सीखने की अनंत क्षमता।

बूढ़े चित्त का अर्थ हैः सीखने की क्षमता का अंत।

और जिसको यह ख्याल हो गया, मैंने जान लिया है, उसकी सीखने की क्षमता का अंत हो जाता है। और हम सब भी ज्ञान से बोझिल हो जाते हैं। हम ज्ञान इसीलिए इकट्ठा करते हैं कि बोझिल हो जाएं। ज्ञान को हम सिर परा लेकर चलते हैं। ज्ञान हमारा पंख नहीं बनता है, ज्ञान हमारा पत्थर बन जाता है।

ज्ञान बनना चाहिए पंख। ज्ञान बनता है पत्थर। और ज्ञान किनका पंख बनता है? जो निरंतर और-और-और जानने के लिए खुले हैं, मुक्त हैं, द्वार जिनके बंद नहीं हैं।

एक गांव में एक फकीर था। उस गांव के राजा को शिकायत की गई कि वह फकीर लोगों को भ्रष्ट कर रहा है।

असल मे, अच्छे फकीरों ने दुनिया को सदा भ्रष्ट किया ही है। वे करेंगे ही। क्योंकि दुनिया भ्रष्ट है और इसको बदलने के लिए भ्रष्ट करना पड़ता है। दो भ्रष्टताएं मिल कर सुधार शुरू होता है। दुनिया भ्रष्ट है। इस दुनिया को ऐसा ही स्वीकार कर लेने के लिए कोई संन्यासी, कोई फकीर कभी राजी नहीं हुआ है।

गांव के लोगो ने खबर की, पंडितों ने खबर की कि यह आदमी भ्रष्ट कर रहा है। ऐसी बातें सिखा रहा है, जो किताबों में नहीं हैं। और ऐसी बातें कह रहा है कि लोगों का संदेह जग जाए। और लोगों को ऐसे तर्क दे रहा है कि लोग भ्रमित हो जाएं, संदिग्ध हो जाएं।

राजा ने फकीर को बुलाया दरबार में, और कहा कि मेरे दरबार के पंडित कहते हैं कि तुम नास्तिक हो। तुम लोगों को भ्रष्ट कर रहे हो। तुम गलत रास्ता दे रहे हो। तुम लोगों में संदेह पैदा कर रहे हो।

उस फकीर ने कहा, मैं तो सिर्फ एक काम कर रहा हूं कि लोगों को युवक बनाने की कोशिश कर रहा हूं। लेकिन अगर तुम्हारे पंडित कहते हैं तो मैं तुम्हारे पंडितों से कुछ पूछना चाहूंगा।

राजा के बड़े सात पंडित बैठ गये। उन्होंने सोचा, वे तैयार हो गए!

पंडित वैसे भी एवररेडी, हमेशा तैयार रहता है, क्योंकि रेडिमेड उत्तर से पंडित बनता है। पंडित के पास कोई बोध नहीं होता है। जिसके पास बोध हो, वह पंडित बनने को राजी नहीं हो सकता है। पंडित के पास तैयार उत्तर होते हैं।

वे तैयार होकर बैठ गए हैं। उनकी रीढ़ें सीधी हो गईं-जैसे छोटे बच्चे स्कूल में परीक्षाएं देने को तैयार हो जाते हैं। छोटे बच्चों में, बड़े पंडितों में बहुत फर्क नहीं। परीक्षाओं में फर्क हो सकता है। तैयार हो गया पंडितों का वर्ग। उन्होंने कहा, पूछो!

सोचा कि शायद पूछेगा, बह्य क्या है? मोक्ष क्या है? आत्मा क्या है? कठिन सवाल पूछेगा। तो सब उत्तर तैयार थे। उन्होंने मन में दुहरा लिये जल्दी से कि क्या उत्तर देने हैं।

जिस आदमी के पास उत्तर नहीं होता है, उसके पास बहुत उत्तर होते हैं। और जिसके पास उत्तर होता है, उसके पास तैयार कोई उत्तर नहीं होता है। प्रश्न आता है तो उत्तर पैदा होता है। उनके पास प्रश्न पहले से तैयार होते हैं, जिनके पास बोध नहीं होता है। क्योंकि बोध न हो तो प्रश्न तैयार, प्रश्न का उत्तर तैयार होना चाहिए, नही तो वक्त पर मुश्किल हो जाएगा।

उन पंडितों ने जल्दी से अपने सारे ज्ञान की खोज कर ली होगी। उसने चार-पांच कागज के टुकड़े उन पंडितों के हाथ में पकड़ा दिये, एक-एक टुकड़ा। और कहा कि एक छोटा सा सवाल पूछता हूं, व्हाट इज़ ब्रेड? रोटी क्या है?

पंडित मुश्किल में पड़ गये, क्योंकि किसी किताब में नहीं लिखा हुआ है-किसी उपनिषद में नहीं, किसी वेद में नहीं, किसी पुराण में नहीं-व्हाट इज़ बे्रड, रोटी क्या है? कहा कि कैसा नासमझ आदमी है! कैसा सरल सवाल पूछता है।

लेकिन वह फकीर समझदार रहा होगा। उसने कहा, आप लिख दें एक-एक कागज पर। और ध्यान रहे, एक-दूसरे के कागज को मत देखना! क्योंकि पंडित सदा चोर होते हैं, वे सदा दूसरों के उत्तर सीख लेते हैं। आस-पास मत देखना। जरा दूर-दूर हट कर बैठ जाओ। अपना-अपना उत्तर लिख दो।

राजा भी बहुत हैरान हुआ। राजा ने कहा, क्या पूछते हो तुम?

उसने कहा, इतना उत्तर दे दें तो गनीमत है। पंडितों से ज्यादा आशा नहीं करनी चाहिए। बड़ा सवाल बाद में पूछूंगा, अगर छोटे सवाल का उत्तर आ जाए।

पहले आदमी ने बहुत सोचा, रोटी यानी क्या? फिर उसने लिखा कि रोटी एक प्रकार का भोजन है। और क्या करता? दूसरे आदमी ने बहुत सोचा, रोटी यानी क्या? तो उसने लिखा, रोटी आटा, पानी और आग का जोड़ है। और क्या करता? तीसरे आदमी ने बहुत सोचा, रोटी यानी क्या? उसे उत्तर नहीं मिलता। तो उसने लिखा, रोटी भगवान का एक वरदान है। पांचवें ने लिखा कि रोटी एक रहस्य है, एक पहेली है, क्योंकि रोटी खून कैसे बन जाती है, यह भी पता नहीं। रोटी एक बड़ा रहस्य है, रोटी एक मिस्ट्री है। छठे ने लिखा, रोटी क्या है, यह सवाल ही गलत है। यह सवाल इसलिए गलत है कि इसका उत्तर ही पहले से कहीं लिखा हुआ नहीं है। गलत सवाल पूछता है यह आदमी। सवाल वे पूछने चाहिए, जिनके उत्तर लिखे हों। सातवें आदमी ने कहा कि मैं उत्तर देने से इनकार करता हूं, क्योंकि उत्तर तब दिया जा सकता है, जब मुझे पता चल जाए कि पूछने वाले ने किस दृष्टि से पूछा है। तो रोटी यानी क्या? हजार दृष्टिकोण हो सकते हैं, हजार उत्तर हो सकते हैं। स्यादवादी रहा होगा। कहा कि यह भी हो सकता है, वह भी हो सकता है।

सातों उत्तर लेकर राजा के हाथ में फकीर ने दे दिये और उससे कहा कि ये आपके पंडित है! इन्हें यह पता नहीं है रोटी क्या है! और इनको यह पता है कि नास्तिक क्या है, आस्तिक क्या है! लोग किससे भ्रष्ट होंगे, किससे बनेंगे, यह इनको पता हो सकता है!

राजा ने कहा, पंडितों, एकदम दरवाजे के बाहर हो जाओ!

पंडित बाहर हो गये। उसने फकीर से पूछा कि तुमने बड़ी मुश्किल में डाल दिया।

फकीर ने कहा, जिनकी खोपड़ी पर भी ज्ञान का बोझ है, उन्हें सरल सा सवाल मुश्किल में डाल सकता है। जितना ज्यादा बोझ, उतनी समझ कम हो जाती है। क्योंकि यह खयाल पैदा जाता है बोझ से कि समझ तो है। और समझ ऐसी चीज है कांस्टेंटली क्रिएट करनी पड़ती है, है नहीं। कोई ऐसी चीज नहीं है कि आपके भीतर रखी है समझ। उसे आप रोज पैदा करिये तो वह पैदा होती है, और बंद कर दीजिए तो बंद हो जाती है। समझ साइकिल चलाने जैसी है। जैसी एक आदमी साइकिल चला रहा है। अब साइकिल चल पड़ी है। अब वह कहता है, साइकिल तो चल पड़ी है, अब पैडल रोक लें। अब पैडल रोक लें, साइकिल चलेगी? चार-छह कदम के बाद गिरेगा। हाथ-पैर तोड़ लेगा। साइकिल का चलना निरंतर चलाने के ऊपर निर्भर है।

प्रतिभा भी निरंतर गति है। जीनियस कोई डेड, स्टैटिक एंटाइटी नहीं है। प्रतिभा कोई ऐसी चीज नहीं है कि कहीं रखी है भीतर, कि आपके पास कितनी प्रतिभा है, सेर भर और किसी के पास दो सेर! ऐसी कोई चीज नहीं है प्रतिभा। प्रतिभा मूवमेंट है, गति है, निरंतर गति है।

इसलिए निरंतर जो सृजन करता है, उसके भीतर मस्तिष्क, बुद्धि और प्रतिभा, प्रज्ञा पैदा होती है। जो सृजन बंद कर देता है, उसके भीतर जंग लग जाती है और सब खत्म हो जाती है।

रोज चलिए। और चलेगा कौन? जिसको यह खयाल नहीं है कि मै पहुंच गया। जिसको यह ख्याल हो गया कि पहुंच गया, वह चलेगा क्यों? वह विश्राम करेगा, वह लेट जाएगा। ज्ञान का बोध पहुंच जाने का खयाल पैदा करवा देता है कि हम पहुचं गए, पा लिया, जान लिया, अब क्या है? रुक गये।

ज्ञान कितना ही आये, और ज्ञान आने की क्षमता निरंतर शेष रहनी चाहिए। वह तभी रह सकती है, जब ज्ञान बोझ न बने। ज्ञान को हटाते चलें। रोज सीखें। और रोज जो सीख जाएं, राख की तरह झाड़ दें। और कचरे की तरह-जैसे सुबह फेंक दिया था घर के बाहर कचरा-ऐसे रोज सांझ, जो जाना, जो सीखा, उसे फेंक दे। ताकि कल आप फिर ताजे सुबह उठें, और फिर जान सकें, फिर सीख सकें, सीखना जारी रहे। ध्यान रहे, क्या हम सीखते हैं, यह मूल्यवान नहीं है। कितना हम सीखते हैं-उस सीखने की प्रक्रिया से गुजरने वाली आत्मा निरंतर जवान होती चली जाती है।

-ओशो
पुस्तकः संभोग से समाधि की ओर
प्रवचन न. 12 से संकलित
पूरा प्रवचन एम.पी.थ्री. एवं पुस्तक में उपलब्ध है