Osho World Online Hindi Magazine :: February 2012
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जीवन का रूपांतरण
जीवन आविर्भाव

पहली बार मुझे सद्गुरु ओशो के बारे में 1976 में एक अखबार के जरिये पता चला तब उन्हें भगवान रजनीश से संबोधित किया जाता था। उन दिनों में कुछ लोगों के मुख से भी अनेक बार उनके बारे में सुना पर सरकारी नौकरी की व्यस्तता और कुछ शारीरिक परेशानियों की वजह से मैं उस समय पूना नहीं जा सका, लेकिन सौभाग्यवश 1993 में मा योग नीलम से बात हुई। तो उन्होंने ध्यान के बारे में बताया और स्वामी चैतन्य कीर्ति से विपस्सना ध्यान विधि का पता चला, और उसे करके बहुत ही अच्छा महसूस हुआ।

उसके बाद ध्यान-सूत्र किताब को पढ़कर प्यास और भी गहरी हो गई। फिर उन्हीं दिनों एस धम्मो सनंतनो, ताओ उपनिषद और गीता दर्शन किताबों को पढ़कर ध्यान के लिए प्यास दिन-प्रतिदिन बढ़ती चली गई और ध्यान के संबंध में सही मार्ग दर्शन मिला।

सन् 1997 में वह सौभाग्यशाली दिन आया जब मैं ओशो राजयोग ध्यान केंद्र दिल्ली पहुंचा। वहां पहुंचते ही मुझे बहुत ही शांति मिली जब स्वामी ओम प्रकाश सरस्वती जी के पास बैठकर ध्यान की झलक मिली। कोई बात होठों को बिना हिलाए और मौन में ही हो गई और मैं काफी देर वहां बैठा रहा। वह अनुभव ऐसा हुआ कि मुझे एक दम साफ हो गया कि वह वही जगह है जिसकी मुझे काफी समय से तलाश थी। और उस साल में ही मेरा नव-संन्यास भी हुआ, उसके बाद सक्रिय ध्यान, कुण्डलिनी, विपस्सना, नादब्रह्म, नटराज, कीर्तन ध्यान की विधियों से गुजरकर पहली बार ध्यान का न भूलने वाला स्वाद मिला। और फिर हर सप्ताह शुक्रवार से शनिवार की शाम तक ओशोधाम में ध्यान करने का मौका बार-बार मिलता रहा। ध्यान की गहराई बढ़ने लगी और बहुत अच्छा, हल्का-फुल्का महसूस होने लगा। सच पूछो तो जिंदगी को उसके हर आयाम में जीने का मजा आने लगा और विपरीत परिस्थितियों में भी एक ऐसी गहरी शांति बनी रही जिसे किसी भी कीमत पर अब खोया नहीं जा सकता। एक न खत्म होने वाली आनंदमय शांतिपूर्ण यात्रा की शुरुआत इन ध्यान विधियों को करने के बाद महसूस हुई। इतना मौन, इतना उत्सव और शांति का अनुभव हुआ जिससे कि शब्दों में कहना असंभव है। इस यात्रा में वैभवशाली सहयात्री भी साथ मिले जिसे भुलाया नहीं जा सकता। सचमुच यह ध्यान की विधियां मौन में ले जाने के लिए बहुत ही सहायक सिद्ध हुईं और जिसके लिए मैं सद्गुरु ओशो को हृदय से नमन करता हूं।

उनकी एक किताब ध्यान-सूत्र पर जो पहले पृष्ठ पर लिखा है ‘‘ध्यान है तो सब कुछ है, ध्यान नहीं तो कुछ भी नहीं’’ उन्हीं की कृपा से ध्यान के बारे में इतनी सही सुंदर मार्गदर्शन मिला और हंसते खेलते ध्यान होने लगा। अब तो सब घरवालों को भी लगने लगा कि ध्यान सचमुच शांति और प्रेमपूर्ण होने के लिए एकमात्र सहयोगी उपाय है और वह भी ध्यान के बारे में पूछने लगे तब मैं उन्हें ओशो द्वारा बताई गई एक ध्यान की विधि और साथ में एक पुस्तक पढ़ने के लिए दे देता हूं जिसे वह खुद ही अध्ययन भी करते हैं।

ओशो के नव-संन्यास के संबंध में इतना ही कहा जा सकता है कि हर व्यक्ति अपने जीवन के प्रति उत्तरदायित्व को समझे और पूरा करे। ज़िंदगी को जागकर होशपूर्ण, आनंदपूर्ण और प्रेमपूर्ण हो कर भरपूर जिये। ओशो कहते हैं: ‘‘जितनी सुंदर पृथ्वी पैदा होने के समय तुम्हें मिली उससे भी ज्यादा इसे सुंदर बनाने में सहयोग करके छोड़कर जायें। और अपनी जिम्मेदारी से भागें नहीं बल्कि उसे जागकर पूरा करें।’’

अब ध्यान के होते हुए सबसे प्रेमपूर्ण ढंग से मिलने में एक अलग ही मजा आता है, हर काम को होशपूर्ण और आनंद से करने में बहुत ही हल्का महसूस होता है और कोई बोझ महसूस नहीं होता, जो भी हो रहा है प्रभु को समर्पित है। जीवन की प्राथमिकताओं पर ध्यान देते हुए जीना हो रहा है। अब ज़िंदगी को इसके हर पहलू में जीने का मजा प्रतिपल आ रहा है। और बहुत से लोगों के सम्पर्क में होने के कारण जो ध्यान के बारे में पूछते हैं और इस संदर्भ में, शेयरिंग होती जा रही है। इसका अपना ही एक मज़ा है। हंसते-खेलते हुए ज़िंदगी जीने का मजा ही कुछ और हो गया है। सिवाय ध्यान के और किसी बात में अब अरुचि रहती है।

आज के युग में ‘युगपुरुष ओशो’ एक आध्यात्मिक जन-जागरण की लहर को फैलाने की दृष्टि के रूप में ही पहचाने जाते हैं। जिससे कि यह पृथ्वी सभी के लिए आध्यात्मिक ऊंचाई को छूते हुए जीवन जीने लायक बनें। जिसमें ज़ोरबा की भांति भौतिक जीवन जीने का आनंद और बुद्ध की मौन भी हो।

और अंत में इतना ही कहना पसंद करूंगा कि इस जीवन में ओशो की अपार कृपा से बहुत ही ध्यान के विषय में सही मार्गदर्शन एक उपहार के रूप में मिला है। एक न खत्म होने वाली आनंदपूर्ण, प्रेमपूर्ण यात्रा की शुरुआत हुई। बस अब हृदय से एक ही प्रार्थना उठती है कि जो शांति और आनंद मुझे मिला है वह सब को मिले।

स्वामी जीवन आविर्भाव
(बलविंदर सिंह निगह)
नई दिल्ली