Osho World Online Hindi Magazine :: February 2012
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कविता
अर्पित मेरी भावना-इसे स्वीकार करो!

तुमने गति का संघर्ष दिया मेरे मन को,
सपनों को छवि के इंद्रजाल का सम्मोहन;
तुमसे आंसू की सृष्टि रची है आंखों में,
अधरों को दी है शुभ्र मधुरिमा की पुलकन;

उल्लास और उच्छवास तुम्हारे ही अवयव,
तुमने मरीचिका और तृषा का सृजन किया;
अभिशाप बना कर तुमने मेरी सत्ता को,
मुझको पग-पग पर मिटने का वरदान दिया;

मैं हंसा तुम्हारे हंसते से संकेतों पर,
मैं फूट पड़ा लख बंक भृकुटि का संचालन;
अपनी लीलाओं से है विस्मित और चकित!
अर्पित मेरी भावना-इसे स्वीकार करो!
अर्पित है मेरा कर्म-इसे स्वीकार करो!

क्या पाप और क्या पुण्य इसे तो तुम जानो,
करना पड़ता है केवल इतना ज्ञात यहां;
आकाश तुम्हारा और तुम्हारी ही पृथ्वी,
तुम मे ही तो इस सांसों का आघात यहां;

तुम में निर्बलता और शक्ति इन हाथों की,
मैं चला कि चरणों का गुण केवल चलना है;
ये दृश्य रचे, दी वहीं दृष्टि तुमने मुझको,
मैं क्या जानूं क्या सत्य और क्या छलना है।

रच-रच कर करना नष्ट तुम्हारा ही गुण है,
तुम में ही तो है कुंठा इन सीमाओं की;
है निज असफलता और सफलता से प्रेरित!
अर्पित है मेरा कर्म-इसे स्वीकार करो!
अर्पित मेरा अस्तित्व-इसे स्वीकार करो!

रंगों की सुषमा रच, मधुऋतु जल जाती है,
सौरभ बिखरा कर फूल धूल बन जाता है;
धरती की प्यास बुझा जाता गल कर बादल,
पाषाणों से टकरा कर निर्झर गाता है;

तुमने ही तो पागलपन का संगीत दिया,
करुणा बन गलना तुमने मुझको सिखलाया;
तुमने ही मुझको यहां धूल से ममता दी,
रंगों में जलना मैंने तुम से ही पाया।

उस ज्ञान और भ्रम में ही तो तुम चेतन हो,
जिनसे मैं बरबस उठता-गिरता रहता हूं;
निज खंड-खंड में हे असीम तुम हे अखंड!
अर्पित मेरा अस्तित्व-इसे स्वीकार करो!

-ओशो
प्रीतम छबि नैनन बसी