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समर्पण: समग्र का स्वीकार

समर्पण से मेरा मतलब है: तुम्हारी सारी चेतन सामर्थ्य से समर्पण। इस समर्पण से धीरे-धीरे भीतर का अस्तित्व ऊपर आने लगेगा, और उसमें समाहित होने लगेगा

प्रश्न: ओशो, मैं हर चीज के बारे में पूरी तरह असहाय अनुभव करता हूं—जीवन, स्वास्थ्य, ध्यान, और यहां तक कि समग्र समर्पण के लिए भी मैं असहाय अनुभव करता हूं। जो भी मैं करता हूं हमेशा अधूरा, आंशिक ही होता है। अचेतन कारण बहुत कुछ नियंत्रित करते हैं। और मेरे सारे प्रयास व अप्रयास की कोशिशें उनके सामने शक्तिहीन हैं। मुझे लगता है कि यह सब मैं आप पर छोड़ देना चाहता हूं, लेकिन वह भी वहीं तक संभव है जहां तक मैं सजग रूप से समर्थ हूं। और फिर मुझे यह भी खयाल है कि आत्यंतिक घटना इस जीवन में शायद घटे और शायद न भी घटे। और मैं यह भी आपसे नहीं पूछ सकता हूं कि यह कब घटेगी, यदि इसे मैं आप पर छोड़ता हूं। क्या मैं आप पर सब छोड़ सकता हूं यद्यपि मुझे खयाल है कि वह घटना घटने में कई-कई जीवन भी लग सकते हैं? यदि इस समर्पण से कुछ भी फलित नहीं होता तब भी क्या यह समर्पण ही है?

तीन बातें: पहली, समग्र से मेरा मतलब है जो भी संभव है, मेरा मतलब संपूर्ण से नहीं है। तुम अभी संपूर्ण समर्पण नहीं कर सकते, क्योंकि तुम स्वयं ही संपूर्ण नहीं हो, फिर तुम कैसे संपूर्ण समर्पण कर सकते हो? समग्र से मेरा मतलब है जो भी तुम कर सकते हो, कुछ भी बचाओ मत। जो भी तुम कर सकते हो, तुम्हारी सारी सामर्थ्य—न कि तुम्हारा पूरा अस्तित्व, क्योंकि तुम अभी वह हो ही नहीं, अतः तुम उसे समर्पित करोगे भी कैसे? लेकिन जो भी तुम कर सकते हो उस सबको अपने समर्पण में समाहित कर लो।

यह आंशिक ही होगा—आंशिक इन अर्थों में कि तुम्हारा सारा अस्तित्व उसमें समाहित नहीं होगा। तुम्हारा एक अचेतन भाग है। तुम उसे इसमें नहीं ला सकते, यह तुम्हारे लिए असंभव है। तुम जानते भी नहीं हो कि वह क्या है, वह कहां है, वह कैसे काम करता है और उसे समर्पण में कैसे लाया जा सकता है। तुम यह नहीं कर सकते। जो भी तुम कर सकते हो—उसमें से कुछ भी अनकिया मत छोड़ो। समर्पण से मेरा मतलब है: तुम्हारी सारी चेतन सामर्थ्य से समर्पण। इस समर्पण से धीरे-धीरे भीतर का अस्तित्व ऊपर आने लगेगा, और उसमें समाहित होने लगेगा।

प्रारंभ में तो यह ऐसे ही हो सकता है। इसलिए जब तक तुम अपना पूर्ण अस्तित्व ही समर्पित न कर सको, तब तक ठहरने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि तब समर्पण की आवश्यकता ही नहीं होगी—क्योंकि तब तुम भीतर समग्र हो ही गये हो तो फिर समर्पण की आवश्यकता ही नहीं है। समर्पण तो एक विधि है समग्र होने की। इसलिए तुम जैसे हो और जितना तुम कर सकते हो वैसे ही छलांग लगाओ बस इतना ही।

दूसरी बात, इस बात की चिंता मत करो कि यह कब घटेगा। यह अगले क्षण भी घट सकता है, और यह शायद कई-कई जीवन भी न घटे। यह निर्भर करता है। यह अगले क्षण भी घटित हो सकता है। यदि तुम्हारी छलांग तीव्र है, समग्र है, यदि तुमने उसमें अपनी सामर्थ्य भर सब कुछ लगा दिया है, तो यह अगले क्षण भी घटित हो सकता है। लेकिन यदि तुमने थोड़ा पीछे बचा लिया तो उसमें समय लगेगा। वह कई जीवन ले सकता है। लेकिन यदि यह कई जीवनों में भी घटित हो तो भी जल्दी ही है, क्योंकि तुम लाखों वर्षों से जी रहे हो, और अभी तक यह नहीं घटा।

अतः यदि इसमें कुछ जीवन भी लग जायें तो भी ज्यादा नहीं है, तो भी यह जल्दी ही है। इसके लिए चिंता मत करो, क्योंकि यह चिंता भी समग्र समर्पण के रास्ते में बाधा बन जायेगी, और यह चिंता एक भीतरी शर्त हो जायेगी। जाने-अनजाने तुम चाहने लगोगे कि यह जल्दी ही घट जाये, और यह अपेक्षा एक वासना बन जायेगी, और यही रुकावट हो जायेगी। इसलिए यह सोचो ही मत कि यह कब घटेगा, उसकी कोई शर्त मत बनाओ। उसे बेशर्त ही घटित होने दो। अपने हृदय के अंतर्तम में कह दो, ‘‘यह कभी भी घटित हो...मैं नहीं हूं। यह घटे चाहे न घटे तो भी मैं समर्पण करने को तैयार हूं।’’ तब यह बहुत जल्दी घट जाएगा। यह उस समर्पण में ही घटित हो सकता है, शायद उसमें एक क्षण भी न लगे।

मैं तुमसे एक कहानी कहता हूं। एक बहुत पुरानी हिंदू कथा है:

दो संन्यासी दो वृक्षों के नीचे ध्यान कर रहे हैं, और नारद वहां से गुजरते हैं। नारद इन दो जगतों के बीच में संदेशवाहक हैं—इस और उस जगत के बीच। वे दोनों के बीच घूमते रहते हैं और वे यहां की खबरें वहां पहुंचाते रहते हैं और वहां की खबरें यहां पहुंचाते रहते हैं।

वे पहले साधु के पास से गुजरते हैं जो कि बहुत बूढ़ा हो गया है, जो गहन तपस्या में लगा है, और कई जीवनों से मोक्ष के लिए श्रम कर रहा है। वह साधु पूछता है, ‘‘नारद, क्या तुम उस दूसरे जगत में जा रहे हो? तो कृपया भगवान से पूछना कि मुझे अभी कितना वक्त और लगेगा, कि अभी मुझे इस शरीर में कितनी देर और जीना होगा। यह बहुत हो गया है! मैं कई जन्मों से श्रम कर रहा हूं। अभी कितना समय और बचा है अंतिम मोक्ष पाने में? कृपया यह बात पूछना।’’

जिस तरह से वह साधु पूछ रहा था उससे लगता था कि वह बहुत तनाव से भरा है, लोभ से भरा है, शर्त लगा रहा है, जैसे कि वह शिकायत कर रहा हो। उसे लगता था कि वह पहले ही कई जन्मों से कठिन श्रम करता रहा है—जैसे कि उसके साथ बड़ा भारी अन्याय हो रहा हो। उसका स्वर, उसका ढंग शिकायत भरा है।

नारद दूसरे वृक्ष के पास से गुजरते हैं। एक नवयुवक वहां पर नाच रहा है, गा रहा है, आनंद मना रहा है। उसने नारद की तरफ देखा भी नहीं। नारद वहां पर खड़े हो जाते हैं। उस युवक ने उनको देखा लेकिन फिर भी वह नाचता ही रहा। तो नारद ने ही उससे पूछा, ‘‘क्या तुम्हें कुछ नहीं पूछना है? उस पड़ोस के दूसरे वृक्ष के नीचे वाले साधु ने पूछा है। क्या तुम चाहते हो कि मैं तुम्हारे बारे में भी खबर लाऊं कि तुम्हें मुक्ति कब मिलेगी?’’ वह आदमी तो नाचता ही रहा और उसने कुछ भी नहीं कहा।

नारद दूसरे जगत जाते हैं, वापस आते हैं। उन्होंने उस बूढ़े संन्यासी से कहा, ‘‘मैंने परमात्मा से पूछा था, और उन्होंने कहा कि तीन जन्म और लगेंगे।’’

वह साधु अपनी माला फेर रहा था, उसने माला फेंक दी और बोला, ‘‘तीन जन्म और!’’ वह बड़ा क्रोधित और निराश हुआ।

नारद दूसरे वृक्ष के पास पहुंचे। वह युवक अभी भी नाच रहा था। नारद ने कहा, ‘यद्यपि तुमने तो पूछने के लिए नहीं कहा था फिर भी मैंने पूछ लिया। लेकिन मुझे तुम्हें बताने में बड़ा डर लग रहा है, क्योंकि उस साधु ने अपनी माला फेंक दी है और वह क्रोधित तथा निराश हो गया है। इसलिए तुम्हें कहने में मुझे डर लग रहा है।’’

युवक ने कहा, ‘‘फिर भी तुम कह सकते हो क्योंकि जो भी है सब आनंदपूर्ण है, जो भी होता है वह अच्छा ही है। तुम मुझे कह दो, चिंता करने की जरूरत नहीं है।’’

तो नारद ने कहा, ‘‘मैंने परमात्मा से पूछा था, और उन्होंने कहा है कि तुम्हें अभी उतने ही जीवन और लगेंगे जितने इस वृक्ष के पत्ते हैं, जिसके नीचे तुम नाच रहे हो।’’

वह युवक तो इतना हर्षोल्लास से भर गया। उसने कहा, ‘‘बस इतने ही पत्ते? इतने कम? क्योंकि यह पृथ्वी तो पत्तों से भरी है, अनंत पत्ते हैं।’’ वह तो फिर से नाचने लगा। और कहते हैं कि उसी क्षण वह इस पृथ्वी से अदृश्य हो गया।
यह है समर्पण। यह है समग्र स्वीकार—कोई शिकायत नहीं, कोई शर्त नहीं, कोई अपेक्षा नहीं। तत्क्षण उसकी मुक्ति हो गई, उसी क्षण वह मुक्त हो गया।

मुझे उस बूढे साधु का तो पता नहीं, उसके बारे में कुछ भी नहीं कहा गया। लेकिन मुझे नहीं लगता है कि तीन जन्म भी उसके लिए पर्याप्त होंगे। वह अभी भी यहीं कहीं होगा, अभी भी तपस्या कर रहा होगा।

-ओशो
केनोपनिषद
प्रवचन नं. 13 से संकलित
(पूरा प्रवचन एम.पी.थ्री. पर भी उपलब्ध है)