Osho World Online Hindi Magazine :: September 2012
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  भारत एक सनातन यात्रा
 
 

जीवन और धर्म

जिंदगी में हर चीज का अनुपात है। और अगर अमृत भी ज्यादा पी जाएं तो मारने वाला हो जाता है और जहर भी अगर अनुपात से पीएं तो जिलाने वाला हो जाता है। जिंदगी में हर चीज की एक सीमा है, एक मात्रा है...

यह सोचने जैसी बात है कि दुनिया में जो भी कीमती है, चाहे सितार हो, चाहे संगीत हो, चाहे काव्य हो, चाहे धर्म हो, चाहे मोक्ष हो, यह सारे उन लोगों से पैदा होते हैं जो बेकार हैं। बेकार अनएंप्लायड के मतलब में नहीं, बेकार लग्जूरियस के अर्थ में, जिनके पास कोई काम नहीं है और सुविधा है। अकबर के दरबार में तानसेल पलता है, और महावीर राजा के घर में पैदा होते हैं, बुद्ध राजा के घर में पैदा होते है, राम राजा के घर में पैदा होते हैं, कृष्ण, ये सारे के सारे शाही परिवार के लोग हैं। इनके पास काम बिल्कुल नहीं है और सुविधा बहुत है। ये करें क्या? रोटी पैदा नहीं करनी है, कपड़ा बनाना नहीं है। तो यें संगीत पैदा करेंगे, चित्र बनाएंगे, मूर्ति बनाएंगे, भगवान की खोज करेंगे, ध्यान करेंगे, प्रार्थना करेंगे, पूजा करेंगे, धर्म की खोज करेंगे, मोक्ष की यात्रा करेंगे-ये कुछ तो करेंगे, आदमी बेकार नहीं हो सकता। तो जब आदमी की नीचे की जरूरतें पूरी हो जाती हैं, तब उसकी ऊपर की खोज शुरू होती है। और जब तक नीचे की जरूरतें पूरी न हों, तब तक ऊपर की खोज कभी शुरू नहीं होती।

इसलिए हम इस मुल्क में धर्म की कितनी ही बातें भला करते रहें, हम धार्मिक नहीं हैं। हम धार्मिक हो नहीं सकते। क्योंकि धार्मिक होने के लिए सुविधा चाहिए, धार्मिक होने के लिए लग्जरी चाहिए। असल में धार्मिक होना आदमी की आखिरी लग्जरी है, वह आदमी का आखिरी विलास है। जिसके पास अब कुछ भी करने को इस पृथ्वी का शेष नहीं रह गया, अब वह आकाश के कामों में उलझ सकता है।

इसलिए जैनियों के चौबीस तीर्थंकर राजाओं के बेटे हैं, हिंदुओं के सब अवतार राजाओं के बेटे हैं, बुद्ध राजा के बेटे है। इसका कारण है कि सब मिल गया है, अब इसमें कुछ खोजने जैसा नहीं रह गया।

तो मैं आपसे कहता हूं कि हिंदुस्तान में नहीं, धर्म की अगली जो किरण है वह अमेरिका में उतरेगी। उतरेगी ही! क्योंकि अमेरिका अब बेकार हुआ जा रहा है-दूसरे अर्थों में। अब उसके पास सब है और काम करने की भी जरूरत रोज कम होती जा रही है। अमेरिका का अर्थशास्त्री चिंतित है कि बीस साल बाद अगर कोई आदमी काम मांगेगा तो हम काम कहां से देंगे, क्योंकि काम तो सब मशीन कर देगी। बड़ी अजीब दुनिया है हमारी! इधर हम चिंतित हैं कि आदमी काम कैसे दें? अमेरिका में वे चिंतित हैं कि अगर आदमी काम मांगेगा तो हम सबको काम न दे सकेंगे! इसलिए अमेरिका के अर्थशास्त्री कह रहे हैं कि अब हमें लोगों को राजी करना पड़ेगा कि तुम बिना काम के तनख्वाह लेने को राजी हो जाओ। तनख्वाह तुम ले लो। लेकिन काम न मांगो।

एक अर्थशास्त्री ने तो यह कहा है कि यह भी संभव है इस सदी के पूरे होते-होते कि जो आदमी काम न मांगे उसको तनख्वाह ज्यादा मिल जाए और जो आदमी काम मांगे उसको तनख्वाह कम मिले। इसलिए कि वह दो चीजें एक साथ मांग रहा है, तनख्वाह भी मांग रहा है और काम भी मांग रहा है। अगर सारा काम मशीनें ले लेंगी तो बहुत थोड़े लोग, जहां दस हजार आदमी काम करते थे, वहां दस आदमी बटन दबा कर काम कर सकेंगे। बाकी नौ हजार आदमी जो बाहर हो जाएंगे, इन आदमियों का क्या होगा? इनको काम नहीं है। तनख्वाह नहीं दोगे तो कारखाना चलेगा कैसे? इनको तनख्वाह देगी पड़ेगी। इनको बेकारी की तनख्वाह देनी पड़ेगी कि तुम तनख्वाह लो और घर पर रहो।

निश्चित ही जिस दिन ऐसी हालत आ जाएगी-रोज आ रही है-उस दिन अमेरिका में धर्म का पहली दफा विस्तार होगा, लोग पहली दफा पूरी फुर्सत में होंगे। जैसा कभी-कभी किसी राजा के बेटे हुए थे, ऐसे पूरी जनता के बेटे इतनी फुर्सत के काम करेंगे, जिनमें कि कोई उलझन नहीं है। वे धर्म की भी खोज करेंगे।

मेरी दृष्टि में, अगर हिंदुस्तान पूंजीवाद के मामले में पिछड़ गया, तो धर्म के मामले में भी पिछड़ जाएगा। और समाजवाद अधार्मिक व्यवस्था है। और पूंजीवाद अगर पूरी तरह विकसित हो जाए तो अनिवार्य रूप से धर्म उसमें से जन्मता है। लेकिन हमने एक भूल कर ली है अतीत में, हम भौतिकवाद के विरोधी हो गए हैं, बिना इस बात को समझे हुए कि भौतिकवाद परमात्मा की जिंदगी का आधार है, आधारशिला है।

हम एक मंदिर तो ऐसा बना सकते हैं जिसमें सिर्फ नींव हो और शिखर न हो, लेकिन हम ऐसा मंदिर नहीं बना सकते जिसमें सिर्फ शिखर हो और नींव न हो। हम एक पौधा तो लगा सकते हैं जिसमें सिर्फ जड़ हो और फूल न हों, लेकिन हम एक ऐसा पौधा नहीं लगा सकते जिसमें सिर्फ फूल हों और जड़ न हो। यह बड़े मजे की बात है! ऊंची चीजें नीची चीज़ों पर निर्भर होती हैं, नीची चीजें ऊंची चीज़ों पर निर्भर नहीं होतीं। अगर आप नींव के पत्थर न भरें तो मंदिर के सोने के शिखर को नहीं चढ़ा सकते, सोने के शिखर को चढ़ाने के लिए नींव के पत्थर भरने ही पड़ेंगे। हां, आप चाहें तो नींव भर कर छोड़ सकते हैं, सोने का शिखर मत चढ़ाएं तो भी चल जाएगा।

अकेला मैटीरियलिज्म चल सकता है, लेकिन अकेला स्प्रिचुएलिज्म नहीं चल सकता। अकेला भौतिकवाद चल सकता है, लेकिन अकेला अध्यात्मवाद नहीं चल सकता। इस मुल्क में हमने ऐसी भूल कर ली, अकेले अध्यात्मवाद की चेष्टा करके हम परेशानी में पड़ गए। हमने सोचा कि हम सिर्फ आत्मा ही आत्मा रहेंगे, शरीर की हम फिकर नहीं करेंगे। हमने समझा कि हम तो सिर्फ परमात्मा को मानेंगे, संसार को माया कहेंगे। इससे हम बहुत मुश्किल में पड़ गये।

यह संसार, यह माया जिसको हम कहते हैं, यह भी सत्य है, यह भी झूठ नहीं है। और यह शरीर उतना ही सत्य है जितनी आत्मा सत्य है। और यह तो हो सकता है कि कोई आदमी सिर्फ शरीर में रहे, आत्मा की फिकर छोड़ दे। लेकिन कोई आदमी सिर्फ आत्मा में नहीं रह सकता शरीर की फिकर छोड़ कर। शरीर की फिकर तो करनी ही पड़ेगी। शरीर आधार है बुनियाद है। नीचा है, लेकिन आधार है।

हिन्दुस्तान को सौ साल अपने शरीर को मजबूत करने में, अपनी संपत्ति को बढ़ाने में, अपने भौतिकवाद को फैलाने में लगाने की जरूरत है। इससे घबराने की जरूरत नहीं है।

लोग मुझसे पूछते हैं, एक मित्र ने पूछा है कि आप सदा तो धर्म की बात करते हैं। आप तो ये भौतिकवाद की, मैटीरियलिज्म की बातें कर रहे हैं!

मेरे लिए धर्म मैटीरियलिज्म का विरोधी नहीं है। और जो धर्म मैटीरियलिज्म का विरोधी है, वह जिंदगी का विरोधी धर्म होगा। वह धर्म जिंदगी के काम का नहीं है। जो धर्म कहता है कि हम भौतिकवाद को नहीं मानते, उस धर्म को जिंदा रहने का मौका भी नहीं है, हक भी नहीं है, उसको मर जाना चाहिए। क्योंकि जिंदा रहने के लिए भौतिकवाद के बिना कोई रास्ता नहीं है। श्वास लो तो भी भौतिक है, पानी पीओ तो भी भौतिक है, जिंदगी भौतिक है।

इसका यह मतलब नहीं है कि जिंदगी भौतिक ही है। जिंदगी का मकान भौतिक है, उसका निवासी आत्मिक है। जिंदगी का घर भौतिक है, उसके भीतर का रहने वाला जो मेहमान है, अतिथि है, वह अभौतिक है। लेकिन मेहमान को भी रखना हो तो उसको भी रोटी खिलानी पड़ती है। अगर घर में मेहमान आए और अध्यात्मवादी हैं, तो बड़ी मुश्किल में पड़ जाएगा मेहमान, ज्यादा दिन घर में नहीं रुक सकेगा। क्योंकि आप कहेंगे, रोटी हम दे नहीं सकते, क्योंकि यह तो भौतिक है; पानी हम दे नहीं सकते, यह तो भौतिक है; बिस्तर हम दे नहीं सकते, यह तो माया है; छप्पर हम दे नहीं सकते, क्योंकि यह सब संसार झूठा है, सपना है। तो मेहमान ज्यादा देर नहीं टिक सकता।

हिन्दुस्तान की आत्मा मुश्किल में पड़ गई है इसके अत्यधिक अध्यात्मवाद के कारण। यह टू मच ऑफ स्प्रिचुएलिज्म हमारे लिए जहर सिद्ध हो गया। जिंदगी में हर चीज का अनुपात है। और अगर अमृत भी ज्यादा पी जाएं तो मारने वाला हो जाता है और जहर भी अगर अनुपात से पीएं तो जिलाने वाला हो जाता है। जिंदगी में हर चीज की एक सीमा है, एक मात्रा है। हम कुछ ज्यादा मात्रा खा गए अध्यातमवाद की, उससे हम परेशान रहे। पांच हजार साल हम गुलामी में, गरीबी में मरे, वह अध्यात्मवाद की दवाई हम जरा ज्यादा पी गए। ऋषि -मुनियों को हम घोल कर इस बुरी तरह पी गए कि मरने के सिवाय रास्ता नहीं रहा।

नहीं, जिंदगी अध्यात्मवाद के विपरीत नहीं होनी चाहिए, लेकिन भौतिकवाद के विपरीत होने की भी कोई जरूरत नहीं है। जिंदगी का असली धर्म और अध्यात्म दोनों का जोड़ है।

-ओशो
पुस्तकः नये समाज की खोज
प्रवचन नं. 9 से संकलित
पूरा प्रवचन एम.पी.थ्री. एवं पुस्तक में उपलब्ध है