Osho World Online Hindi Magazine :: September 2012
www.oshoworld.com
 
  ध्यान विधि
 
 

समग्रता को देखना

जब तुम किसी वस्तु को देखते हो एक समग्रता की भांति, तब आंखों को गति करने की कोई जरुरत नहीं रह जाती...

शिव ने कहाः एक पात्र को देखो-बिना उसकी दीवारों को, या उसकी धातु के प्रकार को देखे। और कुछ ही क्षणों में जाग्रत हो जाओ।

किसी भी चीज को देखो। एक पात्र या कोई भी चीज काम हो जाएगा, लेकिन एक नई गुणवत्ता से देखना हैः ‘‘एक पात्र को देखो-बिना उसकी दीवारों को या उसकी धातु के प्रकार को देखे।’’ किसी भी वस्तु को देखो, लेकिन इन दो शर्तों के साथ देखो। पात्र की दीवारों को मत देखोः पात्र को एक समग्रता की भांति देखो।

सामान्यतया तो हम हिस्सों को देखते हैं। भले ही यह ज्यादा सचेतन रूप से नहीं किया जाता हो, लेकिन हम हिस्सों को ही देखते हैं। यदि मैं तुम्हें देखता हूं तो पहले मैं तुम्हारे चेहरे को देखता हूं, फिर तुम्हारे धड़ को, शरीर के मध्य भाग को देखता हूं और तब तुम्हारे पूरे शरीर को देखता हूं।

किसी चीज को एक समग्रता की भांति देखो; उसे हिस्सों में मत बांटों। क्यों? क्योंकि जब तुम बांटते हो, तब आंखों को एक हिस्से से दूसरे हिस्से में गति करने का मौका मिल जाता है। किसी चीज को एक समग्रता की तरह देखो।

इसका प्रयास करो। पहले किसी चीज को एक हिस्से से दूसरे हिस्से तक क्रमशः देखो। फिर अचानक उस चीज को एक समग्रता की भांति देखो; बांटो मत। जब तुम किसी वस्तु को देखते हो एक समग्रता की भांति, तब आंखों को गति करने की कोई जरुरत नहीं रह जाती। आंखों को गति करने का कोई मौका न देने के लिए यह शर्त बनाई गई हैः किसी वस्तु को पूरा देखो, उसे एक समग्र इकाई की तरह लो। और दूसरी शर्त है-‘‘बिना उसकी धातु के प्रकार को देखे।’’ यदि कटोरा लकड़ी का है तो लकड़ी को मत देखो-सीधे कटोरे को देखो, उसके आकार को देखो। पदार्थ को मत देखो। कटोरा सोने का बना हो सकता है, वह चांदी का बना हो सकता है। इसका ख्याल लो। उस धातु को मत देखो जिससे कि यह कटोरा निर्मित हुआ है; केवल आकर को देखो।

पहली बात है, उसे एक समग्रता की तरह देखना। दूसरी बात हैः उसे एक रूप की तरह देखो-एक पदार्थ की तरह नहीं। क्यों? क्योंकि उसका ठोस हिस्सा तो पदार्थ का अंग है और रूप आध्यात्मिक हिस्सा है। तुम्हें भौतिक से अभौतिक की ओर गति करना है। यह सहायक होगा।

इसका प्रयोग करो। इसका प्रयोग तुम किसी व्यक्ति के साथ भी कर सकते हो। कोई पुरुष या कोई स्त्री खड़ी हैः देखो, और उस पुरुष या स्त्री को अपनी दृष्टि में पूरा का पूरा लो। शुरू-शुरू में यह बड़ा अटपटा लगेगा, क्योंकि तुम्हें इसकी कोई आदत नहीं है, लेकिन अंत में यह बहुत सुंदर अनुभव हो जाता है। और तब यह मत सोचो कि शरीर सुंदर है या नहीं, गोरा है या काला है, पुरुष है या स्त्री है।

सोचो मत, बस आकार को देखो। पदार्थ को भूल जाओ और केवल आकार को देखो। ‘‘और कुछ ही क्षणों में जाग्रत हो जाओ।’’

लगातार एक वस्तु के आकार को एक समग्रता की भांति देखते रहो। आंखों को कोई हलन-चलन मत करने दो। उस वस्तु के ‘‘पदार्थ’’ के बारे में सोचना शुरू मत कर देना।

इससे क्या घटित होगा? अचानक तुम स्व-सत्ता के बोध से भर जाओगे। किसी वस्तु को देखते हुए तुम्हें स्वयं का बोध आ जाएगा। क्यों? क्योंकि आंखों के लिए कोई संभावना नहीं है कि वे बाहर गति कर सकें। वस्तु के आकार को एक समग्रता की तरह देखा जा रहा है, इसलिए तुम उस वस्तु के छोटे हिस्से पर गति नहीं कर सकते। वस्तु के भौतिक तत्व को छोड़ दिया गया है; उसके शुद्ध रूप को, आकार को देखा जा रहा है। अब तुम सोना, लकड़ी, चांदी आदि के बारे में नहीं सोच सकते।

समग्रता के साथ और आकार के साथ जुड़े रहो। और अचानक तुम स्वयं के बोध से भर जाओगे, क्योंकि अब आंखें गति नहीं कर सकती। और उन्हें गति की जरुरत है; गति उनका स्वभाव है। इसलिए तुम्हारी दृष्टि तुम पर चली आएगी। वह वापस हो जाएगी, वह घर चली आएगी और अचानक तुम स्वयं के बोध से भर जाओगे। यह स्व-सत्ता के बोध से भर जाना एक सर्वाधिक संभव आह्लादकारी क्षण है। जब पहली बार तुम्हें स्व-सत्ता का बोध होता है, तो उसका ऐसा सौंदर्य है और उसका ऐसा आनंद है कि तुम उसकी तुलना किसी भी पूर्व-परिचित अनुभव से नहीं कर सकते।

-ओशो
ध्यान योगः प्रथम और अंतिम मुक्ति से संकलित