Osho World Online Hindi Magazine :: September 2012
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  एक सवाल?
 
 

बुद्धपुरुषों का बुद्धत्व के बाद दुबारा जन्म क्यों नहीं होता है?

बुद्धत्व को पाया व्यक्ति परम सागर में डूब गया। जिसकी तुम तलाश करते थे, जिस आनंद की, वह उसे मिल गया, अब वह यहां क्यों आए?

जरूरत नहीं रह जाती। जन्म अकारण नहीं है, जन्म शिक्षण है। जीवन एक परीक्षा है, पाठशाला है। यहां तुम आते हो, क्योंकि कुछ जरूरत है। बच्चे को हम स्कूल भेजते हैं न, पढ़ने-लिखने, समझने-बूझने; फिर जब वह सब परीक्षाएं उत्तीर्ण हो जाता है, फिर तो नहीं भेजते। फिर वह अपने घर आ गया। फिर भेजने की जरूरत न रही।

परमात्मा घर है-सत्य कहो, निर्वाण कहो, मोक्ष कहो-संसार विद्यालय है। वहां हम भेजे जाते हैं, ताकि हम परख लें, निरख लें, कस लें कसौटी पर अपने को सुख-दुख की आंच में, सब तरह के कड़वे-मीठे अनुभव से गुजर लें और वीतरागता को उपलब्ध हो जाएं। सब गंवा दें, सब तरफ से भटक जाएं, दूर-दूर अंधेरों में, अंधेरी खाइयों-खड्डों में सरकें, सत्य से जितनी दूरी संभव हो सके निकल जाएं और फिर बोध से वापस लौटें।

बच्चा भी शांत होता, निर्दोष होता; संत भी शांत होता, निर्दोष होता। लेकिन संत की निर्दोषता में बड़ा मूल्य है, बच्चे की निर्दोषता में कोई खास मूल्य नहीं है। यह निर्दोषता जो बच्चे की है, मुफ्त है, कमायी हुई नहीं है। यह आज है, कल चली जाएगी। जीवन इसे छीन लेगा। संत की जो निर्दोषता है, इसे अब कोई भी छीन नहीं सकता। जो-जो घटनाएं छिन सकती थीं, उनसे तो गुजर चुका संत। इसलिए परमात्मा को खोना, परमात्मा को ठीक से जानने के लिए अनिवार्य है। इसलिए हम भेजे जाते हैं।

बुद्ध पुरुष को भेजने की कोई जरूरत नहीं, जब फल पक जाता है तो फिर डाली से लटका नहीं रहता, फिर क्या लटकेगा। किसलिए? वृक्ष से लटका था पकने के लिए। धूप आयी, सर्दी आयी, वर्षा आयी, फल पक गया, अब वृक्ष से क्यों लटका रहेगा! कच्चे फल लटके रहते हैं। बुद्ध यानी पका हुआ फल।

छोड़ देती है डाल
रस भरे फल का हाथ
किसी और कसैले फल को
मीठा बनाने के लिए

छोड़ ही देना पड़ेगा। वृक्ष छोड़ देगा पके फल को, अब क्या जरूरत रही! फल पक गया, पूरा हो गया, पूर्णता आ गयी। बुद्धत्व का अर्थ है, जो पूर्ण हो गया। दुबारा लौटने का कोई कारण नहीं।

हमारे मन में सवाल उठता है कभी-कभी, क्योंकि हमें लगता है, जीवन बड़ा मूल्यवान है। यह तो बड़ी उलटी बात हुई कि बुद्धत्व को उपलब्ध व्यक्ति को फिर जीवन नहीं मिलता। हमें लगता है, जीवन बहुत मूल्यवान है। बुद्धत्व को जो उपलब्ध है, उसे तो पता चल गया और बड़े जीवन का, और विराट जीवन का।

ऐसा ही समझो कि तुम शराबघर जाते थे रोज, फिर एक दिन भक्तिरस लग गया, फिर मंदिर में नाचने लगे, डोलने लगे, फिर प्रभु की शराब पी ली, अब शराबघर नहीं जाते। शराबी सोचते होंगे कि बात क्या हो गयी! ऐसी मादक शराब को छोड़कर यह आदमी कहां चला गया? अब आता क्यों नहीं?

बुद्धत्व को पाया व्यक्ति परम सागर में डूब गया। जिसकी तुम तलाश करते थे, जिस आनंद की, वह उसे मिल गया, अब वह यहां क्यों? इसे असली शराब मिल गयी, अब यह नकली के पास आए क्यों? इसे ऐसी शराब मिल गयी जिसको पीकर फिर होश में आना ही नहीं पड़ता। और इसे एक ऐसी शराब मिल गयी जिसमें बेहोशी भी होश है। अब यह इस क्षुद्र सी शराब को पीने क्यों आए?

बुद्धत्व को पाया व्यक्ति परम सागर में डूब गया। जिसकी तुम तलाश करते थे, जिस आनंद की, वह उसे मिल गया, अब वह यहां क्यों आए? यह जीवन तो कच्चे फलों के लिए है, ताकि वे पक जाएं, परिपक्व हो जाएं। इस जीवन के सुख-दुख, इस जीवन की पीड़ाए, इस जीवन के आनंद, जो कुछ भी है, वह हमें थपेड़े मारने के लिए है, चोटें मारने के लिए है।

देखा, कुम्हार घड़ा बनाता है, घड़े को चोटें मारता है। एक हाथ भीतर रखता है, एक हाथ बाहर रखता, चाक पर घड़ा घूमता और वह चोटें मारता! फिर जब घड़ा बनकर तैयार होगा, चोटें बंद कर देता है; फिर घड़े को आग में डाल देता है। फिर जब घड़ा पक गया, तो न तो चोट की जरूरत है, न आग में डालने की जरूरत है।

संसार में चोटें हैं और आग में घी डाला जाना है। जब तुम पक जाओगे, तब प्रभु का परम रस तुममें भरेगा। तुम पात्र बन जाओगे, तुम घड़े बन जाओगे, फिर कोई जरूरत न रह जाएगी।

-ओशो
पुस्तकः दुख निरोध
प्रवचन नं. 68 से संकलित
पूरा प्रवचन एम.पी.थ्री एवं पुस्तक में उपलब्ध है