Osho World Online Hindi Magazine :: September 2012
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  ओशो दर्शन
 
 

अहंकार और निरहंकार

अहंकार की बड़ी से बड़ी भूल यह है कि जो अंत में दुख देता है, उसमें प्रारंभ में सुख देखता है। जहां-जहां प्रारंभ में सुख दिखाई पड़े वहां-वहां अंत में तुम पाओगे कि दुख मिलेगा। क्योंकि सुख इतना सस्ता नहीं हो सकता कि प्रारंभ में मिल जाए...

मनुष्य ने दो तरह के जीवन-दर्शन जाने हैं। एक जीवन-दर्शन है अहंकार का, एक जीवन-दर्शन है निरहंकारिता का।

अहंकार का जीवन-दर्शन अपने आप में परिपूर्ण शास्त्र है। और वैसे ही निरहंकार का जीवन दर्शन की अंतिम उपलब्धि नरक है-अपने आस-पास दुख और पीड़ा का एक साम्राज्य। और निरहंकार जीवन-दर्शन की अंतिम उपलब्धि मोक्ष है-मुक्ति, सच्चिदानंद लेकिन अहंकार का जीवन-दर्शन आश्वासन देता है मोक्ष तक पहुंचाने का, और अहंकार का जीवन-दर्शन सब तरह के प्रलोभन देता है। अहंकार के द्वार पर भी लिखा है स्वर्ग, और अहंकार के आमंत्रण बड़े ही भुलावेपूर्ण हैं। वे ऐसे ही हैं जैसे कोई मछलियां पकड़ने जाता है तो कांटे पर आटा लगा देता है। कोई मछलियों को आटा खिलाने के लिए नहीं; खिलाना तो कांटा है। लेकिन आटे के बिना कांटा मछलियों तक पहुंचेगा नहीं। अहंकार बड़े प्रलोभन देता है; दुख के कांटे पर बड़ा आटा लगा देता है। आटे के लोभ में ही हम उसे निगल जाते हैं। और बहुत देर हो गई होती है; फिर उसे थूक देना संभव नहीं। कांटा छिद गया होता है; घाव बन गये होते हैं। और फिर अहंकार के कारण ही यह कहना भी बहुत मुश्किल होता है कि हमने भूल की।

यह जिदंगी की बड़ी गहरी बातों में नहीं, छोटी-छोटी बातों में भी ऐसा है। तुम कभी भोजन करते समय गरम आलू मुंह में रख लेते हो, तो भी उसे थूकते नहीं। जलता है मुंह, तो भी अहंकार कहता है अब सब के सामने इसे बाहर थूकना कैसे संभव है। मुंह जल जाए, लेकिन तुम आलू को भी किसी तरह गटक जाते हो। और ऐसा कोई गरम आलू के साथ ही नहीं है। यह तो तुम्हारे जीवन का दृष्टिकोण है। तुमने जो चुन लिया वह गलत कैसे हो सकता है? तुम उसे थूककर कैसे स्वीकार करोगे कि तुमसे भूल हो गई। तुमसे और कहीं भूल होती है? तो जलता होता है मुंह, तो भी तुम चेहरे पर प्रसन्नता बनाए रखता हो।

कहानी है कि मुल्ला नसरुद्दीन की पत्नी नाराज थी। और जब पत्नियां नाराज होती हैं तो किसी न किसी रूप में प्रतिशोध लेती हैं। उसने सूप बनाया हैं, और इतना गरम कि मुल्ला पीएगा तो जलेगा। लेकिन बातचीत में भूल गई, और भूल ही गई कि सूप दुश्मन की तरह बनाया है, और मुल्ला को जलाने को बनाया है। तो खुद बातचीत में भूल कर सूप को पीना शुरू कर दिया। जल गया कंठ। आंख से आंसू बहने लगे। लेकिन अब यह कहना कि इतना गरम सूप पी गई है, और यह कहना कि यह बनाया था मुल्ला के लिए, मुश्किल। और यह स्वीकार कर लेने पर तो फिर मुल्ला पीएगा ही नहीं। तो आंख से आंसू बहते रहे, लेकिन वह सूप पी गई। मुल्ला ने पूछा, क्या बात है, आंख से आंसू बह रहे हैं? तो उसने कहा कि मुझे मेरी मां की याद आ गई; ऐसा ही सूप मेरी मां भी बनाया करती थी। और इसलिए आंख से आंसू बह रहे हैं। और कोई बात नहीं।

मुल्ला ने भी सूप चखा। वह जलती आग था। उसकी भी आंख से आंसू बहने लगे, लेकिन वह भी पीए इसलिए आंसू बह रहे हैं कि तुम्हारी मां मर गई, और तुम्हें क्यों छोड़ गई! तुम्हें भी ले जाती तो अच्छा होता।

जीवन में रोज छोटे-छोटे कामों में भी तुम्हारा मूल जीवन-दर्शन प्रकट होता है। तुम भूल स्वीकार नहीं कर सकते। अहंकार कभी भूल स्वीकार नहीं कर सकता। क्योंकि अगर भूल स्वीकार की तो ज्यादा देर न लगेगी जब कि तुम्हें यह भी पता चल जाएगा कि अहंकार तो महा भूल है। इसलिए अहंकार कोई भूल स्वीकार नहीं करता। क्योंकि कहीं से भी भूल स्वीकार की गई तो ज्यादा देर न लगेगी कि तुम पाओगे कि अहंकार तो महा भूल है। इसलिए अहंकार भूलों का निषेध करता है, इनकार करता है; वह उनको स्वीकार नहीं करता।

और अहंकार की बड़ी से बड़ी भूल यह है कि जो अंत में दुख देता है, उसमें प्रारंभ में सुख देखता है। जहां-जहां प्रारंभ में सुख दिखाई पड़े वहां-वहां अंत में तुम पाओगे कि दुख मिलेगा। क्योंकि सुख इतना सस्ता नहीं हो सकता कि प्रारंभ में मिल जाए। सुख तो यात्रा की मंजिल की सुवास है। वह यात्रा का पहला पड़ाव नहीं है, न द्वार है। वह तो यात्रा का अंत है। सुख तो उपलब्धि है। इसलिए जहां-जहां पहले सुख मिलता है वहां-वहां पीछे दुख मिलेगा। और जहां-जहां पहले दुख दिखाई पड़ता है, अगर तुमने साहस रखा तो तुम पाओगे कि पीछे वहीं से महा सुख के द्वार खुलते हैं।

दुख को झेलने की जिसकी क्षमता है वही सुख को पा सकेगा। दुख को सुखपूर्वक झेल लेने की जिसकी सामर्थ्य है महा सुख उस पर बरसेगा। लेकिन जिसने कहा कि दुख को मैं झेलना ही नहीं चाहता, मैं तो पहले ही कदम पर सुख चाहता हूं, वह आटे के लोभ में बड़े कांटों में उलझ जाएगा।

तो अहंकार का एक जीवन-दर्शन है जो शुरू में सुख का आभास खड़ा करता है, सब तरफ फंदा ही फंदा है वहां। वहां एक दफा भीतर गए तो लौटना कठिन होता जाता है।

मुल्ला नसरुद्दीन का बेटा उससे पूछ रहा था कि अब मैं एक लड़की के प्रेम में पड़ रहा हूं, ऐसा मालूम पड़ता है। क्या आप उचित समझते हैं कि अब मैं विवाह कर लूं? मुल्ला नसरुद्दीन ने कहा, अभी तुम प्रौढ़ नहीं हुए, विवाह के योग्य नहीं हुए। जब प्रौढ़ हो जाओ तब मुझसे कहना। उस लड़के ने पूछा, और मैं यह भी जान लूं कि प्रौढ़ होने का लक्षण क्या है? यानि कब मेरा प्रौढ़ होना सिद्ध होगा? नसरुद्दीन ने कहा, जब तुम विवाह का ख्याल ही भूल जाओगे तभी तुम प्रौढ़ हुए। जब तक तुम्हारे मन में खयाल उठता रहे कि विवाह करना है तब तक समझना अभी बचकाने हो, विवाह के योग्य नहीं। और जब तुम्हें समझ में आ जाए कि विवाह बेकार है तब तुम प्रौढ़ हो गए। तब अगर तुम्हें विवाह करना हो तो मुझसे कहना।

यह कठिन शर्त मालूम पड़ती है, लेकिन जीवन की भी यही शर्त है। तुम जब तक सुख के लिए बहुत आतुर हो तब तक तुम प्रौढ़ नहीं हुए, और तुम दुख में फंसोगे। लेकिन हर जगह दुख छदम्-आवरण बना रखा है सुख का। नहीं तो दुख को कौन चुनेगा, सोचो! कांटे को कौन मछली चुनेगी? कांटे को चुनने को तो कोई भी राजी नहीं है। दुख को तो कोई भी न चुनेगा इस संसार में, अगर दुख पर दुख ही लिखा हो। लेकिन सब जगह दुख पर सुख लिखा है, स्वागतम बने हैं; द्वार पर ही बैंड-बाजे बज रहे हैं कि आओ, स्वागत है!

और तुम्हारा अहंकार ऐसा है कि तुम एक बार द्वार में प्रविष्ट हो जाओ तो लौटना तुम्हें अपने ही कारण मुश्किल हो जाएगा। क्योंकि दुनिया में भद्द होगी; लोग हंसेंगे कि तुम गए और वापस लौट आए! फिर तो आगे ही आगे तुम चलते जाते हो। पीछे लौटना अहंकार को बहुत मुश्किल है। इसी तरह तो तुम संसार में गहरे उतर गए हो। एक दुख को छोड़ते हो, दूसरा चुन लेते हो। और भी गहन दुख में पड़ते जाते हो। और अगर कोई आदमी तुम्हारे बीच से इस सबको छोड़कर जाता है तो तुम कहते होः एस्केपिस्ट है, पलायनवादी; देखो भाग खड़ा हुआ। तो तुम दूसरों को भी नहीं भागने देते। घर में आग लगी हो और अगर कोई घर के बाहर जाता है तो तुम कहते होः एस्केपिस्ट है, पलायनवादी है, भगोड़ा है; देखो भाग रहा है।

तो न केवल तुम अपने को रोकते हो, अहंकारियों की भीड़ दूसरों को भी निकलने नहीं देती। समझ में भी किसी को आ जाए तो भी सब तरह की बाधा खड़ी करते हो कि वह निकल न जाए। क्योंकि न केवल उसके भागने से यह सिद्ध होगा कि उसने जान लिया जहां दुख था वहां सुख की भ्रांति हुई थी, उसके भागने से तुम्हें अपने पैरों पर भी अविश्वास आ जाएगा। और एक के भागने से अनेक को यह हिम्मत आनी शुरु हो जायेगी कि हम भी भाग जाएं। इसलिए तुम एक को भी भागने नहीं देते।

लेकिन इस सूत्र को खयाल में रख लेनाः जहां-जहां तुम सुख पहले चरण में पाओ, समझ लेना कि धोखा है। क्योंकि पहले चरण में अगर सुख मिलता होता तो सारा संसार कभी का सुखी हो गया होता। सुख तो अंतिम चरण की उपलब्धि है। सुख तो पुरस्कार है। सुख तो पूरी जीवन-यात्रा का निचोड़ है। सुख तो सार है सारे अनुभवों का। सुख खुद कोई अनुभव नहीं है; सुख तो सारे अनुभवों के बीच से गुजर कर तुम्हें जो प्रौढ़ता उपलब्ध होती है, जो जागृति आती है, उस जागृति की छाया है। सुख अपने आप में कोई अनुभव नहीं है; सुख जागे हुए आदमी की प्रतीति हैं। और जागना तो मंजिल पर होगा, अंत में होगा। प्रथम तो तुम कैसे जाग सकोग?

इसलिए जहां-जहां सुख हो वहां-वहां सावधान हो जाना। और अहंकार की यह तरकीब अगर तुम्हारी समझ में आ जाए तो बहुत साफ हो जाएगा। अहंकार की यह रणनीति है। इसी तरह उसने तुम्हें फंसाया है-व्यक्ति को भी, समाज को भी, राष्ट्रों को भी, सभ्यताओं को भी। इस अहंकार की रणनीति के कुछ सूत्र समझ लेने चाहिए तो लाओत्से आसान हो जाएगा। लाओत्से अहंकार की रणनीति के बिल्कुल विपरीत है।

-ओशो
पुस्तकः ताओ उपनिषद, भाग-6
प्रवचन नं. 112 से संकलित
पूरा प्रवचन एम.पी.थ्री. एवं पुस्तक में उपलब्ध है

क्या है प्रेम में भेद?

प्रेम जहां पजेशन बनता है, प्रेम जहां परिग्रह बनता है, प्रेम जहां आधिपत्य लाता है, प्रेम न रहा; यात्रा गलत हो गई। जिसे तुमने प्रेम किया है, उसके तुम मालिक बनना चाहो; बस भूल हो गई। क्योंकि मालिक तुम जिसके भी बन जाते हो, तुमने उसे गुलाम बना दिया...

प्रेम और प्रेम में बहुत भेद है, क्योंकि प्रेम बहुत तलों पर अभिव्यक्त हो सकता है। जब प्रेम अपने शुद्धतम रूप में प्रकट होता है-अकारण, बेशर्त-तब मंदिर बन जाता है। और जब प्रेम अपने अशुद्धतम रूप में प्रकट होता है, वासना की भांति, शोषण और हिंसा की भांति, ईर्ष्या-द्वेष की भांति, आधिपत्य, पजेशन की भांति, तब कारागृह बन जाता है।

कारागृह का अर्थ हैः जिससे तुम बाहर होना चाहो और हो न सको। कारागृह का अर्थ है: जो तुम्हारे व्यक्तित्व पर सब तरफ से बंधन की भांति बोझिल हो जाए, जो तुम्हें विकास न दे, छाती पर पत्थर की तरह लटक जाए और तुम्हें डुबाए। कारागृह का अर्थ हैः जिसके भीतर तुम तड़फड़ाओ मुक्त होने के लिए और मुक्त न हो सको; द्वार बंद हों, हाथ-पैरों पर जंजीरें पड़ी हो, पंख काट दिए हों। कारागृह का अर्थ हैः जिसके ऊपर और जिससे पार जाने का उपाय न सूझे।

मंदिर का अर्थ हैः जिसका द्वार खुला हो; जैसे तुम भीतर आए हो वैसे ही बाहर जाना चाहो तो कोई प्रतिबंध न हो, कोई पैरों को पकड़े न; भीतर आने के लिए जितनी आज़ादी थी उतनी ही बाहर जाने की आज़ादी हो।

मंदिर से तुम बाहर न जाना चाहोगे, लेकिन बाहर जाने की आज़ादी सदा मौजूद है। कारागृह से तुम हर क्षण बाहर जाना चाहोगे, और द्वार बंद हो गया! और निकलने का मार्ग न रहा!

मंदिर का अर्थ हैः जो तुम्हें अपने से पार ले जाए; जहां से अतिक्रमण हो सके; जो सदा और ऊपर, और ऊपर ले जाने की सुविधा दे। चाहे तुम प्रेम में किसी के पड़े हो और प्रारंभ अशुद्ध रहा हो; लेकिन जैसे-जैसे प्रेम गहरा होने लगे वैसे-वैसे शुद्धि बढ़ने लगे। चाहे प्रेम शरीर का आकर्षण रहा हो; लेकिन जैसे ही प्रेम की यात्रा शुरू हो, प्रेम शरीर का आकर्षण न रह कर दो मनों के बीच का खिंचाव हो जाए, और यात्रा के अंत-अंत तक मन का खिंचाव भी न रह जाए, दो आत्माओं का मिलन बन जाए।

जिस प्रेम में अंततः तुम्हें परमात्मा का दर्शन हो सके वह तो मंदिर है, और जिस प्रेम में तुम्हें तुम्हारे पशु के अतिरिक्त किसी की प्रतीति न हो सके वह कारागृह है। और प्रेम दोनों हो सकता है, क्योंकि तुम दोनों हो। तुम पशु भी हो और परमात्मा भी। तुम एक सीढ़ी हो जिसका एक छोर पशु के पास टिका है और जिसका दूसरा छोर परमात्मा के पास है। और यह तुम्हारे ऊपर निर्भर है कि तुम सीढ़ी से ऊपर जाते हो या नीचे उतरते हो। सीढ़ी एक ही है, उसी सीढ़ी का नाम प्रेम है; सिर्फ दिशा बदल जाएगी। जिन सीढ़ियों से चढ़ कर तुम मेरे पास आए हो उन्हीं सीढियों से उतर कर तुम मुझसे दूर भी जाओगे।

सीढियां वही होंगी, तुम भी वही होओगे, पैर भी वही होंगे, पैरों की शक्ति जैसा आने में उपयोग आई है वैसे ही जाने में भी उपयोगी होगी, सब कुछ वही होगा; सिर्फ तुम्हारी दिशा बदल जाएगी। एक दिशा थी जब तुम्हारी आंखें ऊपर लगी थीं, आकाश की तरफ, और पैर तुम्हारी आंखों का अनुसरण कर रहे थे, दूसरी दिशा होगी, तुम्हारी आंखें जमीन पर लगी होंगी, नीचाईयों की तरफ, और तुम्हारे पैर उसका अनुसरण कर रहे होंगे।

साधारणतः प्रेम तुम्हें पशु में उतार देता है। इसलिए तो प्रेम से लोग इतने भयभीत हो गए हैं; घृणा से भी इतने नहीं डरते जितने प्रेम से डरते हैं; शत्रु से भी इतना भय नहीं लगता जितना मित्र से भय लगता है। क्योंकि शत्रु क्या बिगाड़ लेगा? शत्रु और तुम में तो बड़ा फासला है, दूरी है। लेकिन मित्र बहुत कुछ बिगाड़ सकता है। और प्रेमी तो तुम्हें बिलकुल नष्ट कर सकता है, क्योंकि तुमने इतने पास आने का अवसर दिया है। प्रेमी तो तुम्हें बिलकुल नीचे उतार सकता है नरकों में। इसलिए प्रेम में लोगों को नरक की पहली झलक मिलती है। इसलिए तो लोग भाग खड़े होते हैं प्रेम की दुनिया से, भगोड़े बन जाते हैं। सारी दुनिया में धर्मों ने सिखाया हैः प्रेम से बचो। कारण क्या होगा? कारण यही है कि देखा कि सौ में निन्यानबे तो प्रेम में सिर्फ डूबते हैं और नष्ट होते हैं।

प्रेम की कुछ भूल नहीं है; डूबने वालों की भूल है। और तुमसे कहता हूं, जो प्रेम में नरक में उतर जाते थे वे प्रार्थना से भी नरक में ही उतरेंगे, क्योंकि प्रार्थना प्रेम का ही एक रूप है। और जो घर में प्रेम की सीढ़ी से नीचे उतरते थे वे आश्रम में भी प्रार्थना की सीढ़ी से नीचे ही उतरेंगे। असली सवाल सीढ़ी को बदलने का नहीं है, न सीढ़ी से भाग जाने का है; असली सवाल तो खुद की दिशा को बदलने का है।

तो मैं तुमसे नहीं कहता हूं कि तुम संसार को छोड़ कर भाग जाना; क्योंकि भागने वाले कुछ नहीं पाते। सीढ़ी को छोड़ कर जो भाग गया, एक बात पक्की है कि वह नरक में नहीं उतर सकेगा; लेकिन दूसरी बात भी पक्की है कि स्वर्ग में कैसे उठेगा? तुम खतरे में जीते हो, संन्यासी सुरक्षा में; नरक में जाने का उसका उपाय उसने बंद कर दिया। लेकिन साथ ही स्वर्ग जाने का उपाय भी बंद हो गया। क्योंकि वे एक ही सीढ़ी के दो नाम हैं। संन्यासी, जो भाग गया है संसार से, वह तुम्हारे जैसे दुख में नहीं रहेगा, यह बात तय है; लेकिन तुम जिस सुख को पा सकते थे, उसकी सम्भावना भी उसकी खो गई। माना कि तुम नरक में हो, लेकिन तुम स्वर्ग में हो सकते हो-और उसी सीढ़ी से जिससे तुम नरक में उतरे हो। सौ में निन्यानबे लोग नीचे की तरफ उतरते हैं, लेकिन यह कोई सीढ़ी का कसूर नहीं है; यह तुम्हारी ही भूल है।

और स्वयं को न बदल कर सीढ़ी पर कसूर देना, स्वयं की आत्मक्रांति न करके सीढ़ी की निंदा करना बड़ी गहरी नासमझी है। अगर सीढ़ी तुम्हें नरक की तरफ उतार रही है तो पक्का जान लेना कि यही सीढ़ी तुम्हें स्वर्ग की तरफ उठा सकेगी। तुम्हें दिशा बदलनी है, भागना नहीं है। क्या होगा दिशा का रूपांतरण?

जब तुम किसी को प्रेम करते हो-वह कोई भी हो, मां हो, पिता हो, पत्नी हो, प्रेयसी हो, मित्र हो, बेटा हो, बेटी हो, कोई भी हो-प्रेम का गुण तो एक है; किससे प्रेम करते हो, यह बड़ा सवाल नहीं है। जब भी तुम प्रेम करते हो तो दो संभावनाएं हैं। एक तो यह कि जिसे तुम प्रेम चाहते हो, या जिसे तुम प्रेम करते हो, उस पर तुम प्रेम के माध्यम से आधिपत्य करना चाहो मालकियत करना चाहो,। तुम नरक की तरफ उतरने शुरू हो गए।

प्रेम जहां पजेशन बनता है, प्रेम जहां परिग्रह बनता है, प्रेम जहां आधिपत्य लाता है, प्रेम न रहा; यात्रा गलत हो गई। जिसे तुमने प्रेम किया है, उसके तुम मालिक बनना चाहो; बस भूल हो गई। क्योंकि मालिक तुम जिसके भी बन जाते हो, तुमने उसे गुलाम बना दिया। और जब तुम किसी को गुलाम बनाते हो तो याद रखना, उसने भी तुम्हें गुलाम बना दिया। क्योंकि गुलामी एक तरफा नहीं हो सकती; वह दोधारी धार है। जब भी तुम किसी को गुलाम बनाओगे, तुम भी उसके गुलाम बन जाओगे। यह हो सकता है कि तुम छाती पर ऊपर बैठे होओ और वह नीचे पड़ा है; लेकिन न तो वह तुम्हें छोड़ कर भाग सकता है, न तुम उसे छोड़ कर भाग सकते हो। गुलामी पारस्परिक है। तुम भी उससे बंध गए हो जिसे तुमने बांध लिया। बंधन कभी एकतरफा नहीं होता। अगर तुमने आधिपत्य करना चाहा तो दिशा नीचे की तरफ शुरू हो गई।

जिसे तुम प्रेम करो उसे मुक्त करना; तुम्हारा प्रेम उसके लिए मुक्ति बने। जितना ही तुम उसे मुक्त करोगे, तुम पाओगे कि तुम मुक्त होते चले जा रहे हो, क्योंकि मुक्त भी दोधारी तलवार है। तुम जब अपने निकट के लोगों को मुक्त करते हो तब तुम अपने को भी मुक्त कर रहे हो; क्योंकि जिसे तुमने मुक्त किया, उसके द्वारा तुम्हें गुलाम बनाए जाने का उपाय नष्ट कर दिया तुमने। जो तुम देते हो वही तुम्हें उत्तर में मिलता है। जब तुम गाली देते हो तब गालियों की वर्षा हो जाती है। जब तुम फूल देते हो तब फूल लौट आते हैं। संसार तो प्रतिध्वनि करता है। संसार तो एक दर्पण है जिसमें तुम्हें अपना ही चेहरा हजार-हजार रूपों में दिखाई पड़ता है।

-ओशो
पुस्तकः ताओ उपनिषद भाग 6
प्रवचन नं. 127 से संकलित
पूरा प्रवचन एम.पी.थ्री. एवं पुस्तक में उपलब्ध है

नकारात्मक मन

जिस दिन तुम्हें यह भी दिखायी पड़ेगा कि फूल और कांटे साथ-साथ आते हैं, उस दिन कांटे का दुख फूल के साथ भी संयुक्त हो जाएगा-संयुक्त है ही। फूल में भी दुख है, ऐसा जिस दिन दिखायी पड़ जाएगा, उस दिन छूटने में क्षणभर की देर न लगेगी...

पहली बात, नकारात्मक मन से छुटकारे की चेष्टा सफल नहीं हो सकती, क्योंकि विधायक मन को बचाने की चेष्टा साथ में जुड़ी है। और विधायक और नकारात्मक साथ-साथ ही हो सकते हैं। अलग-अलग नहीं। यह तो ऐसे ही है जैसे सिक्के का एक पहलू कोई बचाना चाहे और दूसरा पहलू फेंक देना चाहे। मन या तो पूरा जाता है, या पूरा बचता है, मन को बांट नहीं सकते। नकारात्मक और विधायक जुड़े हैं, संयुक्त हैं, साथ-साथ हैं। एक-दूसरे के विपरीत हैं, इससे यह मत सोचना कि एक-दूसरे से अलग-अलग हैं। एक-दूसरे के विपरीत होकर भी एक-दूसरे के परिपूरक हैं। जैसे राज और दिन जुड़े हैं, ऐसे ही नकारात्मक और विधायक मन जुड़े हैं।

तो पहली तो बात यह समझ लो कि अगर नकारात्मक से छुटकारा पाना है, तो कभी छुटकारा न होगा। मन से ही छुटकारा पाने की बात सोचो। मन यानी नकारात्मक विधायक, दोनों।

हम जीवनभर ऐसी चेष्टाएं करते हैं और असफल होते हैं। असफल होते हैं तो सोचते हैं, हमारी चेष्टा शायद समग्र मन न हुई, पूरे संकल्प से न हुई, शायद हमने अधूरा-अधूरा किया, कुछ भूल-चूक रह गयी नहीं, भूल-चूक कारण नहीं है। जो तुम करने चले हो, वह हो ही नहीं सकता। उसके होने की ही संभावना नहीं है। वह स्वभाव के नियम के अनुकूल नहीं है, इसलिए नहीं होता।

इसलिए इसके पहले कि कुछ करो, ठीक से देख लेना कि जो तुम करने जा रहे हो, वह जगत-धर्म के अनुकूल है? वह जगत-सत्य के अनुकूल है? जैसे एक आदमी दुख से छुटकारा पाना चाहता है और सुख से तो छुटकारा पाना नहीं चाहता, तो क्भी सफल नहीं होगा। सुख-दुख साथ-साथ जुड़े हैं। दुख गया तो सुख गया। सुख बचा तो दुख बचा।

तुम्हारी उलझन और दुविधा यही है कि तुम एक को बचा लेना चाहते हो, दूसरे को हटाते। यही तो सभी लोग जन्मों-जन्मों करते रहे हैं। सफलता बच जाए, असफलता चली जाए। सम्मान बच जाए, अपमान चला जाए। विजय हाथ रहे, हार कभी न लगे। जीवन तो बचे और मौत समाप्त हो जाए। यह नहीं हो सकता। यह असंभव है। जीवन और मृत्यु साथ-साथ हैं। जिसने जीवन को चुना, उसने अनजाने मृत्यु के गले में भी वरमाला डाल दी। ऐसा ही विधायक और नकारात्मक मन है।

विधायक मन का अर्थ होता है, हां; और नकारात्मक मन का अर्थ होता है, नहीं। हां और नहीं को अलग कैसे करोगे? और अगर नहीं बिल्कुल समाप्त हो जाए तो हां में अर्थ क्या बचेगा? हां में जो अर्थ आता है, वह नहीं से ही आता है।

इसलिए मैं कहता हूं, तुम अगर आस्तिक हो, तो नास्तिक भी होओगे ही। चाहे नास्तिकता भीतर दबा ली हो। नास्तिकता के ऊपर बैठ गए होओ, उसे बिलकुल भुला दिया हो, अचेतन के अंधेरे में डाल दिया हो, मगर, अगर तुम आस्तिक हो तो तुम नास्तिक भी रहोगे ही। अगर तुम नास्तिक हो, तो कहीं तुम्हारी आस्तिकता भी पड़ी है; जानो न जानो, पहचानो न पहचानो। आस्तिक और नास्तिक साथ-साथ ही होते हैं।

इसलिए धार्मिक व्यक्ति को मैं कहता हूं, जो आस्तिक और नास्तिक दोनों से मुक्त हो गया। धार्मिक व्यक्ति को मैं आस्तिक नहीं कहता, और धार्मिक व्यक्ति को विधायक नहीं कहता, धार्मिक व्यक्ति को कहता हूँ, द्वंद्व के पार।

तो पहली बात, पूछते हो, ‘नकारात्मक मन से कैसे छुटकारा होगा?’

मन से छुटकारे की बात सोचो। नकारात्मक मन से छुटकारे की बात सोचो ही मत, अन्यथा कभी न होगा। और जब मन से छुटकारे की बात उठती है तो उसमें विधायक मन सम्मिलित है उतने ही अनुपात में, जितने अनुपात में नकारात्मक मन सम्मिलित है। वे दोनों ही मन के ही पहलू हैं। हां कहो तो मन आती है, न कहो तो मन से आती है।

इसीलिए तो परम सत्य को कहा नहीं जा सकता; कैसे कहो? यहां तो हां कहो, या न कहो। हां कहो नहीं आ जाती है, नहीं कहो तो हां आ जाती है। इसलिए परम सत्य को केवल मौन से ही कहा जा सकता है, शून्य से कहा जा सकता है। जहां शून्य है, वहां मन नहीं। ऐसा समझो, जहां हां और नहीं दोनों गिर गये, वहां जो बचता है उसी का नाम शून्य है।

बुद्ध का मार्ग तो शून्य का मार्ग है। इसे समझना। इसे हम समझ नहीं पाए, इस देश में बुद्ध को ठीक से समझा नहीं गया। ऐसा लगा कि शून्य तो नकारात्मक है। गलत हो गयी, भूल हो गयी बात। शून्य तो केवल इस बात की सूचना है कि हां और न दोनों गए।

बुद्ध बार-बार कहते हैं कि लोग कहते हैं कि मैं ईश्वर को मानता हूं; कुछ लोग हैं, जो कहते हैं, मैं ईश्वर को नहीं मानता; कुछ लोग हैं, जो कहते हैं, मैं आत्मा को मानता हूं, कुछ लोग हैं, जो कहते हैं, मैं आत्मा को नहीं मानता; लेकिन मैं मान्यताओं के पार हूं। न मैं कहता हूं ऐसा है, न मैं कहता हूं वैसा है। मैं कुछ कहता ही नहीं। मैंने मान्यता ही छोड़ दी है। मैंने मन ही छोड़ दिया है। मैं शून्यभाव में ठहरा हूं।

इस शून्य का अर्थ तुम नकारात्मक मत ले लेना। इस शून्य का अर्थ है, द्वंद्व जा चुका, विभाजन गिर चुका। दो बचे ही नहीं, चुनाव का सवाल कहां है? और जहां चुनाव को कुछ भी नहीं बचा, वहीं है सत्य। सत्य तुम्हारा चुनना नहीं है। जब तुम्हारे चुनने की सारी आदत गिर गयी, तब जो शेष रह जाता है वही सत्य है।

मैं समझता हूं, तुम कांटों से मुक्त होना चाहते हो, फूलों को बचाना चाहते हो। और सारे बुद्धपुरुषों की शिक्षा यही है कि अगर कांटों से मुक्त होना हो, तो फूलों को विदा दे दो। यही अड़चन है।

इसलिए पूछा है तुमने, ‘ये दुखदायी हैं, तो भी इनसे लगाव क्यों बना है?’

फूल से लगाव है, फूल में दुख नहीं है। कांटे में दुख है। सो कांटे से छूटने की तुमने जिज्ञासा उठायी है। जिस दिन तुम्हें यह भी दिखायी पड़ेगा कि फूल और कांटे साथ-साथ आते हैं, उस दिन कांटे का दुख फूल के साथ भी संयुक्त हो जाएगा-संयुक्त है ही। फूल में भी दुख है, ऐसा जिस दिन दिखायी पड़ जाएगा, उस दिन छूटने में क्षणभर की देर न लगेगी।

हमारी कठिनाई यही है। मन के सिक्के को हाथ में रखे हैं, एक हिस्सा प्रीतिकर मालूम होता है कि इसे बचा लें, एक हिस्सा अप्रीतिकर मालूम होता है। तो न छोड़ पाते हैं। दुविधा में दोनों गए, माया मिली न राम। ऐसे बीच में अटक जाते र्हैं। ऐसे बड़ा तनाव और चिंता पैदा होती है। ऐसे बहुत खिंचे-खिंचे हो जाते है। ऐसे बड़ी बेचैनी पैदा होती है। और जीवन एक रोग जैसा मालूम होने लगता है।

-ओशो
पुस्तकः दुख-निरोध
प्रवचन नं. 68 से संकलित
पूरा प्रवचन एम.पी.थ्री. एवं पुस्तक में उपलब्ध है

मनुष्य की उलझनें

जितना ही तुम शक्तिशाली होना चाहोगे उतनी ही तुम्हारी अशक्ति का तुम्हें पता चलेगा। क्योंकि जगह-जगह तुम्हारी शक्ति की सीमा आ जाएगी...

इस सदी के एक बहुत बड़े मनसविद अल्फ्रेड एडलर ने मनुष्य के जीवन की सारी उलझनों का मूल स्रोत हीनता की ग्रंथि में पाया जाता है। हीनता की ग्रंथि का अर्थ है कि जीवन में तुम कहीं भी रहो, कैसे भी रहो, सदा ही मन में यह पीड़ा बनी रहती है कि कोई तुमसे आगे है, कोई तुमसे ज्यादा है, कोई तुमसे ऊपर है। और इसकी चोट पड़ती रहती है। इसकी चोट भीतर के प्राणों को घाव बना देती है। फिर तुम जीवन के आस्वाद को भोग नहीं सकते; फिर तुम सिर्फ जीवन से पीड़ित, दुखी और संत्रस्त होते हो।

हीनता की ग्रंथि, इनफीरियारिटी कांप्लेक्स, अगर एक ही होती तो भी ठीक था। तो शायद कोई हम रास्ता भी बना लेते। अल्फ्रेड एडलर ने तो हीनता की ग्रंथि शब्द का प्रयोग किया है; मैं तो बहुवचन का प्रयोग करना पसंद करता हूँ हीनताओं की ग्रंथियां। क्योंकि कोई तुमसे ज्यादा सुंदर है। और किसी की वाणी में कोयल है, और तुम्हारी वाणी में नहीं। और कोई तुमसे ज्यादा लंबा है; कोई तुमसे ज्यादा स्वस्थ है। किसी के पास ज्यादा धन है; किसी के पास ज्यादा ज्ञान है; किसी के पास ज्यादा त्याग है। कोई गीत गा सकता है; कोई संगीतज्ञ है; कोई प्रतिमा गढ़ता है; कोई चित्रकार है; कोई मूर्तिकार है। करोड़-करोड़ लोग हैं तुम्हारे चारों तरफ, और हर आदमी में कुछ न कुछ खूबी है। बिना खूबी के तो परमात्मा किसी को पैदा करता ही नहीं। और जिसके भीतर हीनता की ग्रंथि है उसकी नजर सीधी खूबी पर जाती है कि दूसरे आदमी में कौन सी खूबी है। क्योंकि जाने-अनजाने वह हमेशा तौल रहा है कि मैं कहीं किसी से पीछे तो नहीं हूं! तो उसकी नजर झट से पकड़ लेती है कि कौन सी चीज है जिसमें मैं पीछे हूं। तो जितने लोग हैं उतनी ही हीनताओं का बोझ तुम्हारे ऊपर पड़ जाता है। तुम करीब-करीब हीनताओं की कतार से घिरे जाते हो। एक भीड़ तुम्हें चारों तरफ से दबा लेती है। तुम उसी के भीतर तड़फड़ाते हो। और बाहर निकलने का कोई भी उपाय नहीं है। क्योंकि क्या करोगे तुम?

एक आदमी ने मुझे कहा, कहा कि बड़ी मुश्किल में पड़ा हूं। दो साल पहले अपनी प्रेयसी के साथ समुद्र के तट पर बैठा था। एक आदमी आया, उसने पैर से रेत मेरे चेहरे में उछाल दी और मेरी प्रेयसी से हंसी मजाक करने लगा। तो मैंने पूछा कि तुमने कुछ किया? उसने कहा, क्या कर सकता था? मेरा वजन सौ पौंड का, उसका डेढ़ सौ पौंड। फिर भी तुमने कुछ तो किया होगा? उसने कहा, मैंने किया यह कि स्त्रियों की तो फिक्र ही छोड़ दी उस दिन से। हनुमान अखाड़े में भर्ती हो गया। हनुमान चालीसा पढ़ता हूं और दंड बैठक लगाता हूं। फिर डेढ़ सौ पौंड मेरा भी वजन हो गया दो साल में। फिर मैंने एक स्त्री खोजी, गया समुद्र तट पर। वहां बैठा भी नहीं था कि एक आदमी आया, उसने फिर लात मारी रेत में, मेरी आंखों में धूल भर दी, फिर मेरी प्रेयसी से हंसी-मजाक करने लगा।

मैंने कहा, अब तो तुम कुछ कर सकते थे।

उसने कहा, क्या कर सकते थे? मैं डेढ़ सौ पौंड का, वह दो सौ पौंड का।

तो अब क्या करते हो?

उसने कहा, फिर अब हनुमान चालीसा पढ़ता हूँ; फिर हुनमान अखाड़े में व्यायाम करता हूं। लेकिन अब आशा छूट गई। क्योंकि दो सौ पौंड का हो जाऊंगा, क्या भरोसा कि ढाई सौ पौंड का आदमी नहीं जाएगा।

तुम कभी भी हीनता के बराबर नहीं हो सकते उस रास्ते से। कितने लोग हैं! कितने विभिन्न रूप हैं! कितनी विभिन्न कुशलताएं हैं, योग्यताएं हैं! तुम उसमें दब मरोगे। अल्फ्रेड एडलर ने मनुष्य की सारी पीड़ाओं और चिंताओं का आधार दूसरे के साथ अपने को तौलने में पाया है।

गहरे जैसे-जैसे एडलर गया उसको समझ में आया कि आदमी क्यों आखिर अपने को दूसरे से तौलता है? क्या जरूरत है? तुम तुम जैसे हो; दूसरा दूसरा जैसा है। यह अड़चन तुम उठाते क्यों हो? पौधे नहीं उठाते। छोटी सी झाड़ी बड़े से बड़े वृक्ष के नीचे निश्चिन्त बनी रहती है; कभी यह नहीं सोचती कि यह वृक्ष इतना बड़ा है। छोटा सा पक्षी गीत गाता रहता है; बड़े से बड़ा पक्षी बैठा रहे, इससे गीत में बाधा नहीं आती कि मैं इतना छोटा हूं, क्या खाक गीत गाऊं! पहले बड़ा होना पड़ेगा। छोटे से घास में भी फूल लग जाते हैं; वह फिक्र नहीं करता कि इतने-इतने बड़े वृक्षों के नीचे तुम फूल उगाने की कोशिश कर रहे हो, पागल हो, पागल हुए हो! पहले बड़े हो जाओ; फिर फूल लाना। नहीं, प्रकृति में तुलना है ही नहीं; सिर्फ आदमी के मन में तुलना है।

तुलना क्यों है? तो एडलर ने कहा कि तुलना इसलिए है कि तुम-और सारी मनुष्यता-एक गहन दौड़ से भरी है। उस दौड़ को एडलर कहता हैः दि विल टु पावर, शक्ति की आकांक्षा। कैसे मैं ज्यादा शक्तिवान हो जाऊं! फिर चाहे वह धन हो, पद हो, प्रतिष्ठा हो, यश हो, कुशलता हो, कुछ भी हो। कैसे मैं शक्तिशाली हो जाऊं, यही मनुष्य की सारी दौड़ का आधार है। और जब तुम शक्तिशाली होना चाहोगे तो तुम पाओगे कि तुम शक्तिहीन हो। जितना ही तुम शक्तिशाली होना चाहोगे उतनी ही तुम्हारी अशक्ति का तुम्हें पता चलेगा। क्योंकि जगह-जगह तुम्हारी शक्ति की सीमा आ जाएगी। सिकंदर और नेपोलियन और हिटलर भी चुक जाते हैं। उनकी भी शक्ति की सीमा आ जाती है। आज तक कोई भी व्यक्ति ऐसी जगह नहीं पहुंच पाया जहां वह कह सके कि शक्ति की सीमा आ जाती है। आज तक कोई भी व्यक्ति ऐसी जगह नहीं पहुंच पाया जहां वह कह सके कि शक्ति की मेरी आकांक्षा तृप्त हो गई। जो कभी नहीं हुआ वह कभी होगा भी नहीं। और तुम अपने को अपवाद मानने की कोशिश मत करना।

लाओत्से है मार्ग। एडलर ने प्रश्न तो खड़ा कर दिया, उलझन भी साफ कर दी, लेकिन मार्ग एडलर को भी नहीं सूझता कि बाहर इसके कैसे हुआ जाए। पश्चिम के मनोविज्ञान के पास मार्ग है ही नहीं। अभी पश्चिम का मनोविज्ञान समस्या को समझने में ही उलझा है। अभी समस्या ही समझ में नहीं आई है पूरी तरह तो उसके बाहर जाने की तो बात ही बहुत दूर है। कैसे कोई बाहर जाए? तो एडलर का तो सुझाव इतना ही है कि तुम्हे अतिशय की आकांक्षा नहीं करनी चाहिए; सामान्य रूप से जो उपलब्ध हो सकता है उसका प्रयास करना चाहिए।

लेकिन इससे कुछ हल न होगा। क्योंकि कहां अतिशय की सीमा शुरू होती है? कौन सी चीज समान्य है? जो तुम्हारे लिए सामान्य है वह मेरे लिए सामान्य नहीं। जो मेरे लिए सामान्य है, तुम्हारे लिए अतिशय हो सकती है। एक आदमी एक घंटे में पंद्रह मील दौड़ सकता है; वह उसके लिए सामान्य है। तुम एक घंटे में पांच मील भी दौड़ गए तो मुसीबत में पड़ोगे। वह तुम्हारे लिए सामान्य नहीं है। कौन तय करेगा? कहां तय होगी यह बात कि क्या सामान्य है? औसत क्या है? एडलर कहता है, औसत में जीना चाहिए; तो तुम इतने ज्यादा पीड़ित न होओगे। लेकिन औसत कहां है? कैसे तय करोगे? और तुम ही तो तय करने वाले हो और तुम ही रुग्ण हो। तुम्हारे रोग से ही तय होगा कि औसत क्या है। अगर तुमसे कोई पूछे कि एक आंकड़ा बता दो, कितने रुपये से तुम राजी हो जाओगे; कैसे बता पाओगे? और अगर कोई कहता हो कि जितना तुम बताओगे उतना हम देने को तैयार हैं; तब तुम और मुसीबत में पड़ जाओगे। दस हजार? मन कहेगा, क्यों दस हजार की बात कर रहे हो जब बीस मांगे जा सकते हैं?

-ओशो
पुस्तकः ताओ उपनिषद भाग-6
प्रवचन नं. 110 से संकलित
पूरा प्रवचन एम.पी.थ्री. एवं पुस्तक में उपलब्ध है

नारी का अस्तित्व कहां है?

जब तक स्त्री अपने अस्तित्व की स्पष्ट घोषणा नहीं करती है, तब तक उसे आत्मा उपलब्ध नहीं हो सकती है, तब तक वह छाया ही रहेगी...


‘नारी और क्रांति’, इस संबंध में बोलने का सोचता हूं, तो पहले यही खयाल आता है कि नारी कहां है? नारी का कोई अस्तित्व ही नहीं है। मां का अस्तित्व है, बहन का अस्तित्व है, बेटी का अस्तित्व है, पत्नी का अस्तित्व है, नारी का कोई भी अस्तित्व नहीं है। नारी जैसा कोई व्यक्तित्व ही नहीं है। नारी की अपनी कोई अलग पहचान नहीं है। नारी का अस्तित्व उतना ही है जिस मात्रा में वह पुरुष से संबधित होती है। पुरुष का संबंध ही उसका अस्तित्व है। उसकी अपनी कोई आत्मा नहीं है।

यह बहुत आश्चर्यजनक है! लेकिन यह कड़वा सत्य है कि नारी का अस्तित्व उसी मात्रा और अनुपात में होता है! जिस अनुपात से वह पुरुष से संबंधित होती है। पुरुष से संबंधित नहीं हो तो ऐसी नारी का कोई अस्तित्व नहीं है। और नारी का अस्तित्व ही न हो तो क्रांति की क्या बात करनी है?

इसलिए पहली बात यह समझ लेनी जरूरी है कि नारी अब तक अपने अस्तित्व को भी-अपने अस्तित्व को-स्थापित नहीं कर पाई है। उसका अस्तित्व पुरुष के अस्तित्व में लीन है। पुरुष का एक हिस्सा है उसका अस्तित्व।

बर्नार्ड शा ने एक छोटी सी किताब लिखी। उस किताब का नाम बहुत अजीब है और जब पहली दफे वह किताब प्रकाशित हुई तो सारे लोग हैरान हुए। उस किताब का नाम हैः इंटेलिजेंट वीमेन्स गाइड टु सोशलिज्म। बुद्धिमान स्त्री के लिए समाजवाद की पथ-प्रदर्शिका।

लोग बड़े हैरान हुए। लोगों ने पूछा कि स्त्री के लिए? क्या समाजवाद का पथ-प्रदर्शन स्त्री के लिए जरूरी है, पुरुष के लिए नहीं? आपको नाम रखना चाहिए थाः इंटेलिजेंट मेंन्स गाइड टु सोशलिज्म।

बर्नाड शा ने कहा कि मेन्स लिखने से स्त्रियां उसमें सम्मिलित हो जाती हैं, लेकिन वीमेन्स लिखने से पुरुष उसमें सम्मिलित नहीं होते? यह बड़ी हैरानी की बात है। बर्नार्ड शा ने कहा, अगर हम कहें मनुष्य, तो स्त्रियां सम्मिलित हैं। और अगर हम कहें नारी, तो फिर मनुष्य सम्मिलित नहीं है, पुरुष सम्मिलित नहीं है?

स्त्री पुरुष की छाया से ज्यादा अस्तित्व नहीं जुटा पाई है। इसलिए जहां पुरुष होता है, स्त्री वहां है। लेकिन जहां छाया होती है वहां थोड़े ही पुरुष को होने की जरूरत है!

स्त्री का विवाह हो, तो वह श्रीमती हो जाती है, मिसेज हो जाती है, पुरुष के नाम की छाया रह जाती है, मिसेज फलानी हो जाती है। लेकिन इससे उलटा नहीं होता कि स्त्री के नाम पर पुरुष बदल जाता हो। अगर चंद्रकांत मेहता नाम है पुरुष का, तो स्त्री का कुछ भी नाम हो, वह श्रीमती चंद्रकांत मेहता हो जाती है। लेकिन अगर स्त्री का नाम चंद्रकला मेहता है तो ऐसा नहीं होता कि पति श्रीमान चंद्रकला मेहता हो जाते हों। ऐसा नहीं होता। ऐसा होने की जरूरत नहीं पड़ती, क्योंकि स्त्री छाया है, उसका कोई अपना अस्तित्व थोड़े ही है।

श्शास्त्र कहते हैं, जब स्त्री बालपन में हो तो पिता उसकी रक्षा करें; जवान हो, पति रक्षा करे, बूढ़ी हो जाए, बेटा रक्षा करे। सब पुरुष उसकी रक्षा करे, क्योंकि उसका कोई अपना अस्तित्व नहीं है। रक्षितत्व तो ही वह है, अन्यथा नहीं है।

यह क्या मूढ़ता है? स्त्री अब तक अपने अस्तित्व की घोषणा ही नहीं कर पाई है। इसलिए पहला क्रांति का सूत्र तो यह है कि स्त्री अपने अस्तित्व की स्पष्ट घोषणा करे। वह है। उसका अपना होना है-पुरुष से बहुत पृथक, बहुत भिन्न। उसके होने का आयाम, उसके होने की दिशा और डायमेंशन बहुत अलग है। वह पुरुष की छाया नही है, उसका अपनी हैसियत से भी होना है।

और यह भी ध्यान रहे, जब तक स्त्री अपने अस्तित्व की स्पष्ट घोषणा नहीं करती है, तब तक उसे आत्मा उपलब्ध नहीं हो सकती है, तब तक वह छाया ही रहेगी।

मैंने सुना है कि जर्मनी में ऐसी एक कथा है, कि एक आदमी पर देवता नाराज हो गए और उन्होंने उसे अभिशाप दे दिया कि आज से तेरी छाया खो जाएगी, आज से तेरी छाया नहीं बनेगी। तू धूप में चलेगा तो तेरी कोई छाया नहीं बनेगी, कोई शैडो नहीं बनेगी।

उस आदमी ने कहा, इससे मेरा क्या बिगड़ जाएगा? यह तुम अभिशाप देते हो, ठीक है, लेकिन मेरा हर्ज क्या हो जाएगा इससे?

देवताओं ने कहा, वह तुझे पीछे पता चलेगा।

और घर आते ही उस आदमी को पता चला कि बहुत मुश्किल हो गई। जैसे ही लोगों को पता चला कि उसकी छाया नहीं बनती है, लोगों ने उसका साथ छोड़ दिया। पत्नी ने उससे हाथ जोड़ लिए कि क्षमा करो! बेटों ने कहा, माफ करो! गांव के लोगों ने कहा, दूर रहो! यह आदमी खतरनाक है, इसकी छाया नहीं बनती।

धीरे-धीरे गांव में वह एक अछूत हो गया, घर के लोग भी दरवाज बंद करने लगे, मित्र रास्ता छोड़ कर जाने लगे, लोगों ने पहचानना बंद कर दिया। आखिर सारे गांव की पंचायत ने कहा, इस आदमी को निकाल बाहर करो। इस आदमी को कोई महारोग लग गया है, इसकी छाया नहीं बनती, ऐसा कभी सुना है? आखिर गांव के लोगों ने उसे कोढ़ी की तरह गांव के बाहर निकाल दिया। वह आदमी चिल्लाया कि मेरी छाया मिट गई है तो हर्ज क्या है? लेकिन लोगों ने कहा कि छाया मिट गई, इसका मतलब है कि कोई न कोई महारोग तेरे पीछे लग गया। वह बहुत चिल्लाने लगा कि मैं तो पूरा का पूरा हूं, मेरी छाया भर मिट गई है। लेकिन किसी ने उसकी सुनी नहीं।

पता नहीं ऐसा कभी हुआ या नहीं, लेकिन स्त्री के मामले में बिल्कुल उल्टी बात हो गई। उसकी आत्मा तो मिट गई है, वह सिर्फ छाया रह गई है। और छाया मिटने से एक आदमी इतनी मुसीबत में पड़ गया हो तो अगर नारियों की पूरी जाति की आत्मा मिट गई हो और वे सिर्फ छाया रह गई हों, तो उनकी कठिनाई का अंदाज लगाना बहुत मुश्किल है।

लेकिन पुरुषों को कोई चिंता क्या हो सकती है कि वे अंदाज लगाएं उस कठिनाई का? उन्हें जरूरत भी क्या हो सकती है? पुरुषों के यह हित में है कि स्त्री की कोई आत्मा न हो। क्योंकि जिनका भी हमें शोषण करना होता है, अगर उनके पास आत्मा हो तो विद्रोह का डर होता है। पुरुष की जाति हजारों वर्षों से नारी का वर्गीय शोषण कर रही है। उसके यह हित में है कि नारी के पास कोई व्यक्तित्व, कोई आत्मा न हो। क्योंकि जिस दिन नारी के पास अपनी आत्मा होगी, उसी दिन बगावत की यात्रा शुरू हो जाएगी, विद्रोह शुरू हो जाएगा।

गरीब और अमीर के बीच जो शोषण है, उससे भी ज्यादा खतरनाक, उससे भी ज्यादा लंबा शोषण पुरुष और नारी के बीच में है। पुरुष नहीं चाहेगा। और नारियों के पास कोई आत्मा नहीं है कि वे सोंचे भी, विचारें भी, बगावत का कोई स्वर वहां से पैदा हो। आत्मा ही खो गई है। लेकिन यह घटना घटे इतना लंबा समय हो गया है कि अब किसी को पता भी नहीं चलता कि यह घटना घट चुकी है। यह याद में भी नहीं आता। हम जीए चले जाते हैं।

जैसे हजारों वर्षों तक शूद्रों को समझा दिया था कि तुम शूद्र हो, तो हजारों वर्षों तक धीरे-धीरे वे भूल ही गए कि वे आदमी हैं। वैसी ही स्थिति स्त्री के साथ हो गई है। वह सिर्फ छाया है पुरुष की, पुरुष के पीछे होने में उसका हित है, पुरुष से भिन्न और पृथक खड़े होने में उसका कोई अस्तित्व नहीं है।

यह पहली बात समझ लेनी जरूरी है कि बिना आत्मा के भी नारी के जीवन में कोई आनंद, कोई मुक्ति, कोई सृजनात्मकता, कोई अभिव्यक्ति, उसके जीवन में कोई सुगंध हो सकती है?

ऐसे धर्म हैं जो कहते हैं कि नारी के लिए मोक्ष नहीं है। यह तो आपको पता ही होगा कि मस्जिद में नारी के लिए प्रवेश नही है। मस्जिद में नारी के लिए प्रवेश नहीं है। आश्चर्यजनक है! मस्जिद सिर्फ पुरुषों के लिए है? नारी की छाया भी मस्जिद के भीतर नहीं पड़ी है। मोक्ष में नारी के लिए प्रवेश नहीं हैः ऐसे धर्म हैं। ऐसे धर्म हैं जो घोषणा करते हैः नारी नरक का द्वार है। ऐसे धर्म हैं जिनके श्रेष्ठतम शास्त्र भी नारी के लिए अभद्रतम शब्दों का उपयोग करते हैं। और भी आश्चर्य की बात है कि जिन धर्मों ने, जिन धर्मगुरुओं ने, जिन साधु-संन्यासियों और महात्माओं ने नारी को आत्मा मिलने में सबसे ज्यादा बाधा दी है, नारी अजीब पागल है, उन साधु-संन्यासियों और महात्माओं को पालने का सारा ठेका नारियों ने ले रखा है।

ये मंदिर और मस्जिद नारी के ऊपर चलते हैं। साधु और संन्यासी नारी के शोषण पर जीते हैं और उनकी ही सारी की सारी करतूत और लंबा षड्यंत्र है कि नारी को अस्तित्व नहीं मिल पाता। जो रोज-रोज घोषणा करते हैं कि नारी नरक का द्वार है, नारी उन्हीं के चरणों में-दूर से, पास से छू तो नहीं सकती, क्योंकि छूने की मनाही है-दूर से नमस्कार करती रहती है, भीड़ लगाए रहती है।

अभी मैं बंबई था। एक महिला ने मुझे आकर कहा कि एक संन्यासी का, एक महात्मा का प्रवचन चलता है। हजारों लोग सुनने इकट्ठे होते हैं, लेकिन कोई नारी उनका पैर नहीं छू सकती। लेकिन एक दिन एक नारी ने भूल से उनका पैर छू दिया। महात्मा ने सात दिन का उपवास किया प्रायश्चित्त में। और इस प्रायश्चित्त का परिणाम यह हुआ कि नारियों की, लाखों नारियों की संख्या उनके दर्शन के लिए इकट्ठी हो गई कि बहुत बड़े महात्मा हैं।

बेवकूफी की भी कोई सीमाएं होती है! एक नारी को नहीं जाना चाहिए था फिर वहां और नारी को विरोध करना चाहिए था कि वहां कोई भी नहीं जाएगा। लेकिन नारी बड़ी प्रसन्न हुई होगी कि बड़ा पवित्र आदमी है यह। नारी को छूने से सात दिन का उपवास करके प्रायश्चित्त करता है, महान आत्मा है यह।

नारियों के मन में भी यह ख्याल पैदा कर दिया है पुरुषों ने कि वे अपवित्र हैं, और उन्होंने उसे स्वीकार कर लिया है, उसे वे मान कर बैठ गई हैं।

कितने आश्चर्य की बात है, ये जो महात्मा जिनके पैर छूने से सात दिन का इन्होंने उपवास किया, ये नारी के पेट में नौ महीने रहे होंगे, और अगर अपवित्र होना है तो हो चुके होंगे। अब बचना बहुत मुश्किल है अपवित्रता से। और एक नारी की गोद में बरसों बैठे रहे होंगे-खून उसका है, मांस उसका है, हड्डी उसकी है, मज्जा उसकी है, सारा व्यक्तित्व उसका है-और उसी के छूने से ये सात दिन का इन्हें उपवास करना पड़ता है, क्योंकि वह नरक द्वार है।

साधु-संन्यासियों से मुक्त होने की जरूरत है नारी को। और जब तक वह साधु-संन्यासियों के खिलाफ उसकी सीधी बगावत नहीं होती और वह यह घोषणा नहीं करती कि नारी को नरक कहने वाले लोगों को कोई सम्मान नहीं मिल सकता है, नारी को अपवित्र कहने वाले लोगों की के लिए कोई आदर नहीं मिल सकता है-सीधा विद्रोह और बगावत चाहिए-तो नारी की आत्मा की यात्रा की पहली सीढ़ी पूरी होगी।

जिन-जिन देशों में धर्मों का जितना ज्यादा प्रभाव है, उन-उन देशों में नारी उतनी ही ज्यादा अपमानित और अनादृत है। यह बड़ी हैरानी की बात है! धर्म का प्रभाव जितना कम हो रहा है, नारी का सम्मान उतना बढ़ रहा है। धर्म का जितना ज्यादा प्रभाव, नारी का उतना अपमान। यह कैसा धर्म है? होना तो उल्टा चाहिए कि धर्म का प्रभाव बढ़े तो हो सबका सम्मान बढ़े, सबकी गरिमा बढ़े।

-ओशो
पुस्तकः नारी और क्रांति
प्रवचन नं. 5 से संकलित
पूरा प्रवचन एम.पी.थ्री. एवं पुस्तक में उपलब्ध है

प्रेम में पाप और पुण्य क्या?

प्रेम और प्रार्थना में उतना ही फर्क है जितना अशुद्ध सोने और शुद्ध सोने में। मगर दोनों ही सोना हैं, यह मैं जोर देकर कहना चाहता हूं। इस पर मेरा बल है। यही आने वाले भविष्य के मनुष्य के धर्म की मूल भित्ति है...

प्रेम यदि पाप है तो फिर संसार में पुण्य कुछ होगा ही नहीं प्रेम पाप है तो पुण्य असंभव है। क्योंकि पुण्य का सार प्रेम के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं।

लेकिन तुम्हारे प्रश्न को मैं समझा। तुम्हारे तथाकथित साधु-महात्मा यही कहते हैं कि प्रेम पाप है। और वे ऐसी व्यर्थ की बात कहते रहे हैं, लेकिन इन्होंने इतने दिनों से कही है, इतने लंबे अर्से से कही है कि तुम्हें उसकी व्यर्थता, उसका विरोधभास दिखाई नहीं पड़ता।

प्रेम को तो वे पाप कहते हैं और प्रार्थना को पुण्य कहते हैं। और तुमने कभी गौर से नहीं देखा कि अगर प्रेम पाप है, तो प्रार्थना भी पाप हो जाएगी। क्योंकि प्रार्थना प्रेम का ही परिशुद्ध रुप है। माना कि प्रेम में कुछ अशुद्धियां हैं, लेकिन पाप नहीं है। सोना अगर अशुद्ध हो तो भी लोहा नहीं है। सोना अशुद्ध हो तो भी सोना है। अशुद्ध होकर भी सोना सोना है। रही शुद्ध करने की बात, सो शुद्ध कर लेंगे। कूड़े-करकट को जला देंगे, सोने को आग से गुजार लेंगे; जो व्यर्थ है, असार है, जल जाएगा आग में; जो सार है, जो शुद्ध है, बच जाएगा।

प्रेम और प्रार्थना में उतना ही फर्क है जितना अशुद्ध सोने और शुद्ध सोने में। मगर दोनों ही सोना हैं, यह मैं जोर देकर कहना चाहता हूं। इस पर मेरा बल है। यही आने वाले भविष्य के मनुष्य के धर्म की मूल भित्ति है।

अतीत ने प्रार्थना और प्रेम को अलग-अलग तोड़ दिया था। और उसका दुष्परिणाम हुआ। उसका दुष्परिणाम यह हुआ कि प्रेम दूषित हो गया, कुलषित हो गया, निंदित हो गया। एक तरफ प्रेम को अपराध बना दिया हमने; तो जो प्रेम में थे, उनकी आत्मा का अपमान किया, उनके भीतर आत्मनिंदा पैदा कर दी। और इस जगत में इससे बड़ी कोई दुर्घटना नहीं है कि किसी व्यक्ति के भीतर आत्मनिंदा पैदा हो जाए। तो प्रेम के कारण हमने पापी पैदा कर दिया दुनिया में। प्रेम पाप है, तो जो भी प्रेम करते हैं, सब पापी हैं। और कौन है जो प्रेम नहीं करता? कोई पत्नी को करता है, कोई पति को, कोई बेटे को, कोई भाई को, कोई मित्र को। शिष्य भी तो गुरु को प्रेम करते हैं! गुरु भी तो शिष्यों को प्रेम करता है! यहां जितने संबंध हैं, वे सारे संबंध ही किसी न किसी अर्थ में प्रेम के संबंध हैं। संबंध मात्र प्रेम के हैं। तो हमने प्रेम को पापी कर दिया। सारा संसार हमने पाप से भर दिया, एक छोटी सी भूल करके कि प्रेम पाप है।

और दूसरा दुष्परिणाम हुआ है कि जब प्रेम पाप हो गया, तो प्रार्थना हमारी थोथी हो गई, उसमें प्राण न रहे, औपचारिक हो गई। प्राण तो प्रेम से मिल सकते थे, तो प्रेम को तो हमने पाप कह दिया। जीवन तो प्रेम से मिलता प्रार्थना को, तो जीवन के तो हमने द्वार बंद कर दिए। प्रेम की ही भूमि से प्रार्थना रस पाती है, तो हमने भूमि को निंदित कर दिया और प्रार्थना के वृक्ष को भूमि से अलग कर लिया। भूमि वृक्षहीन हो गई और वृक्ष मुर्दा हो गया। ये दो दुर्घटनाएं घटीं। प्रेम पाप हो गया और प्रार्थना थोथी हो गई।

इसलिए तुम्हारा प्रश्न तो स्वाभाविक है। सदियों-सदियों से यही समझाया है, इसलिए मन में यह सवाल उठता हैः कहीं प्रेम पाप तो नहीं? लेकिन एक बुनियादी भूल हो गई। और उस बुनियादी भूल के कारण पृथ्वी धार्मिक होने से वंचित रह गई। उस भूल को सुधार लेना है। और जितनी जल्दी सुधर जाए उतना अच्छा है।

मैं तुमसे कहता हूं, यह घोषणा करता हूं कि प्रेम पुण्य है।

लेकिन मुझे गलत मत समझ लेना। जब मैं प्रेम को पुण्य कहता हूं तो मैं यह नहीं कह रहा हूं कि बस प्रेम पर रुक जाना है। जब मैं प्रेम को पुण्य कह रहा हूं तो सिर्फ यह कह रहा हूं कि प्रेम में सोना छिपा है। कचरा भी है। लेकिन जो कचरा है, वह प्रेम नहीं है। वह विजातीय है। वह सोना नहीं है। कूड़ा-करकट होगा, मिट्टी होगी, कुछ और होगा। विरह की अग्नि से गुजारो इसे। और तुम धीरे-धीरे पाओगे कि तुम्हारे हाथों में प्रार्थना का पक्षी लग गया है, जिसके पंख हैं, जो आकाश में उड़ सकता है। जो इतना हल्का है! क्योंकि सारा बोझ कट गया, सारी व्यर्थता गिर गई। जिस दिन तुम प्रार्थना को अनुभव कर पाओगे, उस दिन तुम धन्यवाद दोगे अपने सारे प्रेम के संबंधों को, क्योंकि उनके बिना तुम प्रार्थना तक कभी नहीं आ सकते थे। तुम धन्यवाद दोगे प्रेम के सारे कष्टों को, सुखों को, मिठास के अनुभव और कडुवाहट के अनुभव; जहर और अमृत, प्रेम ने दोनों दिए, उन दोनों को तुम धन्यवाद दोगे। क्योंकि जहर ने भी तुम्हें निखारा और अमृत ने भी तुम्हें सम्हाला और यह घडी अंतिम आ सकी सौभाग्य की कि प्रेम प्रार्थना बना।

प्रेम जब प्रार्थना बनता है तो परमात्मा के द्वार खुलते हैं।

प्रेम पाप नहीं है। और किसी बुद्धपुरुष ने प्रेम को पाप कहा है।

लेकिन लोग कुछ का कुछ समझे हैं। पंडितों-पुजारियों ने कहा है। पंडित-पुजारियों की समझ ही क्या है? उनका अनुभव क्या है? तोतों की तरह शास्त्रों को रटे हुए बैठे हैं। हां, उनसे रामायण कहलवा लो, कि उनसे गीता दोहरवा लो, कि वे कुरान का पूरा पाठ कर दें। मगर बस तोतों की तरह, मशीनों की तरह। यह काम तो मशीनें कर सकती हैं। अब तो कंम्प्यूटर पैदा हो गए हैं, ये सारी बातें कंप्यूटर कर सकते हैं। और आदमी से ज्यादा शुद्ध, आदमी से ज्यादा भूलचूक-मुक्त। बुद्धों ने कुछ कहा, पंडित कुछ समझे। और यह स्वाभाविक है एक अर्थ में, क्योंकि बुद्ध अपनी ऊंचाई से बोलते हैं और पंडित-पुरोहित अपनी नीचाई से समझते हैं। बुद्ध पुकारते हैं पर्वत-शिखरों से और पंडित-पुरोहित अंधेरी घाटियों में सरक रहे हैं। और वही से उन्हें जो सुनाई पड़ता है, उसका वे अर्थ बिठाते हैं, उसकी व्याख्या करते हैं। उन्होंने सब गुड़-गोबर कर दिया।

मुल्ला नसरुद्दीन पुलिस ऑफिस गया। पुलिस अफसर ने पूछा, बड़े मियां, तुम्हारे पास क्या सुबूत है कि तुम्हारी बीबी पागल हो गई है? कोई डाक्टर की रिपोर्ट, या।

मुल्ला नसरुद्दीन ने बात काटते हुए कहा, यह सब कुछ मैं नहीं जानता साहब, किंतु जो कुछ मैं कह रहा हूं वह सौ प्रतिशत सच है। आज शाम मैं आफिस से घर लौटा तो उसने मुस्कुरा कर मेरा स्वागत किया, बड़े प्यार से चाय की प्याली पेश की-हालांकि आज पहली तारीख नहीं है।

लोगों के अपने समझने के ढंग है।

मुल्ला नसरुद्दीन होटल से बाहर निकल रहा है और होटल के बैरा ने कहा, बड़े मियां, टिप में सिर्फ अठन्नी! आप मेरा अपमान कर रहे हैं। कम से कम एक रुपया तो होना ही चाहिए।

मुल्ला नसरुद्दीन ने कहा, क्षमा करना भाई, एक अठन्नी और देकर मैं दुबारा तुम्हारा अपमान नहीं करना चाहता।

लोगों की अपनी समझ है, अपनी व्याख्या है। बुद्धपुरुष कुछ कहते हैं, बुद्ध कुछ समझते हैं। किसी बुद्धपुरुष ने नहीं कहा कि प्रेम पाप है। जीसस ने कहा है: प्रेम परमात्मा है। बुद्ध ने कहा है: प्रेम ध्यान की परिणति है। महावीर ने कहा है: प्रेम समाधि की आत्यंतिक अनुभूति है। नारद से पूछो। शांडिल्य से पूछो। चैतन्य से पूछो। मीरा से पूछो। और क्या तुम सोचते हो, योगेंद्र, इनमें से कोई भी कहेगा प्रेम पाप है? असंभव। जिन्होंने प्रार्थना जानी, जिन्होंने ध्यान जाना, वे कह ही नहीं सकते कि प्रेम पाप है। लेकिन जिन्होंने न ध्यान जाना है, न प्रार्थना जानी है, जिन्होनें जिदंगी का कुड़ा-करकट ही इकठटा किया है, और जिन्होंने प्रेम भी नहीं जाना, प्रेम के नाम पर भी कुछ और ढोते रहे हैं; प्रेम के नाम पर भी, प्रेम का मुखोटा लगा कर भी कुछ और ही करते रहे हैं, वे जरुर कहेंगे कि प्रेम पाप है। उसका अनुभव।

अगर साधारण मनुष्य के प्रेम का तुम विचार करो तो बहुत चकित हो जाओगे! उसके प्रेम में इतनी कीचड़ मिली है, उसके सोने में इतना कचरा मिला है, कि सोना तो एक प्रतिशत होगा, निन्यानबे प्रतिशत कचरा है। प्रेम के नाम पर घृणा तक भीतर छिपी है।

तुमने यह बात गौर की? प्रेम को घृणा बनने में देर नहीं लगती। मित्र को दुश्मन बनने में देर कितनी लगती है? जिस स्त्री के लिए तुम जान देने को तैयार थे, उसी की जान लेने को भी तैयार हो जाते हो-इसमें देर कितनी लगती है?

प्रेम इतनी जल्दी घृणा बन जाता है? प्रेम घृणा बन सकता है? और अगर प्रेम घ्रण बन सकता है तो कैसा प्रेम! प्रेम घृणा नहीं बन सकता। फिर जो घृणा बन जाता है, वह प्रेम था ही नहीं, कुछ और था, घृणा ही थी, प्रेम का मुखोटा लगा कर नाटक कर रही थी। प्रेम के नाम पर तुम शोषण कर रहे हो। प्रेम के नाम पर तुम एक-दूसरे का उपयोग कर रहे हो। प्रेम के नाम पर तुम एक-दूसरे का उपयोग कर रहे हो। प्रेम के नाम पर तुम एक-दूसरे की मालकियत कर रहे हो। प्रेम के नाम पर राजनीति है, कूटनीति है। प्रेम बड़ा लुभावना शब्द है, बड़ा प्यारा शब्द है, खूब उलझा लेता है। जिससे भी तुम कह देते होः मुझे आपसे बहुत प्रेम है, वही आपकी बातों में आ जाता है। तुम्हें खुद से भी प्रेम नहीं है, तुम्हें और किस्से प्रेम होगा? तुम कहते हो, हमें अपने बच्चों से प्रेम है। अपने बच्चों से तुम्हें प्रेम नहीं है, अपने हैं, इसलिए प्रेम है। मेरे हैं, अहंकार का हिस्सा हैं तुम्हारे, इसलिए प्रेम है। और अगर तुम्हारा बेटा प्रधानमंत्री हो जाए, तो बहुत प्रेम पैदा हो जाएगा। और तुम्हार बेटा अगर डाकू हो जाए और कारागृह में चला जाए, तो तुम जाकर अदालत में घोषणा कर दोगे कि मैं इनकार करता हूं कि यह मेरा बेटा है। प्रेम समाप्त हो जाएगा।

तुम्हारा प्रेम भी अहंकार है। तुम्हारा प्रेम भी उतने ही दूर तक है जहां तक तुम्हारे अहंकार को सहारा मिलता है, सत्कार मिलता है, सम्मान मिलता है। इस प्रेम के अनुभव के कारण लोगों को भी बात जंच जाती है कि प्रेम पाप है। मगर यह तो प्रेम का अनुभव ही नहीं है। कंकड़-पत्थर बीनते रहे और कहने लगे कि हीरे पाप हैं! हीरों का तुम्हें अनुभव नहीं है।

प्रेम का थोडा अनुभव करो। प्रेम बड़ी अदभुत घटना है। साधारण नहीं है, अलौकिक है। इस पृथ्वी पर स्वर्ग की छोटी सी जो किरण उतरती है, उसी का नाम प्रेम है। इस अंधेरे में रोशनी की जो थोड़ी सी झलक उतर आती है, उसी का नाम प्रेम है। इस पथरीले हृदय में जो थोड़ी आर्द्रता आ जाती है, उसी का नाम प्रेम है।

-ओशो
पुस्तकः प्रेम पंथ ऐसो कठिन
प्रवचन सं 11 से संकलित