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ज्योति से जले ज्योति

राष्ट्रीय सहारा, नई दिल्ली, 5 जनवरी, 2013

आनंद को उपलब्ध व्यक्ति अपना गीत गाता है, अपनी धुन में मस्त होता है। जरूर उसके पास एक महफिल इकट्ठी हो जाती है। जरूर उसके पास दीवाने आ जाते हैं। जरूर उसके पास एक मधुशाला खड़ी हो जाती है। मगर यह सब सहज होता है। इसकी कोई शर्त नहीं। ऐसा होना चाहिए, ऐसा नहीं। ऐसा हो जाता है। जरूर बुद्धत्व को उपलब्ध व्यक्ति के पास बहुत से लोग बुद्धत्व को उपलब्ध होता जाते हैं। मगर बुद्ध उन्हें बुद्धत्व को उपलब्ध करवा नहीं देते। वे खुद ही अपनी प्यास से बुद्धत्व के जल को पीते हैं; खुद अपनी प्यास से, अपने हृदय को पात्र बनाते हैं। खुद अपने बुझे हुए दीये को बुद्ध के दीये के पास लाते है; ताकि ज्योति से ज्योति जल उठे।

अगर तुम मेरी बात समझना चाहते हो, प्रेम प्रमोद, तो मैं तुमसे कहना चाहूंग कि बुद्धत्व को उपलब्ध व्यक्ति कुछ भी नहीं करता। बुद्धत्व को उपलब्ध हो गया व्यक्ति पर्याप्त है; उसकी मौजूदगी में चीजे घटती हैं, वह कुछ करता नहीं। जैसे वसंत आता है और फूल खिल जाते है; यूं नहीं है कि एक-एक फूल को और पंखुरी-पंखुरी को खींच-खींच कर खोलना पड़ता है। सुबह होती है और पक्षी गीत गाने लगते हैं; यू नहीं है कि सूरज आकर एक-एक पक्षी के गले को दबाता है कि गा, सुबह हो गई! यह स्वाभाविक घटता है।

लेकिन सभी फूल नहीं खिलते। कुछ फूल रात को खिलते हैं। और सभी पक्षी नहीं गाते। उल्लू भी हैं, उल्लू के पटठे भी हैं; वे सूरज को देखते ही से आंख बंद कर लेते हैं; मगर यह उनकी स्वतंत्रता है। अब जबरदस्ती उल्लुओं की आंखें खोलो तो नाराज ही होंगे। यह उनकी मौज! डनको रात में ही मजा आता है, तो कोई हर्ज नहीं। जिसको जैसे मजा आता है।

मेरे मन में किसी की निंदा नहीं-किसी की भी! अगर किसी को शराब पीने में मजा आ रहा है, तो भी मेरे मन में उसकी कोई निंदा नहीं। यह उसकी स्वतंत्रता है। जरूर निवेदन कर दूंगा कि तू व्यर्थ की शराब में उलझा है, और भी बेहतर शराब है! भीतर की भी शराब है, जो अंगूरों से नहीं ढलती, आत्मा से ढलती है। मगर फिर तेरी मौज। तुझे अगर अंगूर से ढली शराब में ही रस आ रहा है, तो तू अधिकारी है अपने रास्ते पर जाने का। जबरदस्ती खींच कर तुझे भीतर की शराब पिलाने का आयोजन नहीं किया जा सकता। जबरदस्ती मेरे जीवन-दृष्टिकोण में कही आती नहीं।

इसलिए मुझसे अक्सर लोग पूछते हैं कि आप अपने संन्यासियों को कोई अनुशासन क्यों नहीं देते?

अनुशासन मैं नहीं दे सकता हूं। महावीर ने दिया; इसलिए महावीर को जैन कहते हैं अनुशास्ता। और जैन धर्म को कहते हैं जैन शासन। यह राजनीति की भाषा है। बुद्ध ने दिया मगर अब तुम बुद्ध का अनुशासन पढ़ने बैठो तो घबड़ा जाओगे। तैंतीस हजार नियम, जिनको याद रखना भी मुश्किल, पालने की तो बात छोड़ दो। हर छोटी-छोटी बात के नियम। कैसे उठना, कैसे बैठना, कौन सा पैर किस पैर के ऊपर रख कर बैठना, कौन से हाथ पर कौन सा हाथ होना-हर छोटी-छोटी बात के नियम, तैंतीस हजार नियम-क्या खाना, क्या नहीं खाना; कब खाना, कब नहीं खाना; कब पीना, कब नहीं पीना; कब यात्रा करनी, कब यात्रा करनी, कब नहीं करनी। तैंतीस हजार नियमों में बंधा हुआ आदमी मोक्ष को उपलब्ध हो सकेगा? तैंतीस हजार जंजीरों में बंधा हुआ आदमी है यह। जंजीरें ही जंजीरें हैं, आदमी तो वह न मालूम कहां खो जाएगा!

और फिर, बुद्ध को क्या अधिकार है? किसी को क्या अधिकार है कि दूसरे के जीवन पर नियमन करे, शासन करे? और प्रत्येक व्यक्ति इतना अनूठा और भिन्न है कि कोई भी सार्वलौकिक नियम बनाए नहीं जा सकते।

‘रामनाम जान्यो नहीं’ से संकलित
साभारः ओशो वर्ल्ड फाउंडेशन

अमरत्व का बोध कराता है ध्यान

डेली हिन्दी मिलाप, हैदराबाद, 2 जनवरी, 2013

आदमी की उम्र बढ़ाने से मृत्यु का भय कम नहीं होगा। आदमी को स्वस्थ कर देने से जिंदगी ज्यादा सुखी हो जाएगी, लेकिन ज्यादा अभय नही होगी। अभय तो सिर्फ एक ही स्थिति में, फियरलेसनेस एक ही स्थिति में आती है कि मुझे भीतर पता चल जाए कि कुछ है जो मरता ही नहीं। उसके बिना कभी नहीं हो सकता।

तो ध्यान उस अमरत्व का बोध है। वह जो मेरे भीतर है, वह कभी नहीं मरता है। और वह जो मेरे बाहर है, वह मरता ही है। इसलिए जो बाहर है, उसकी चिकित्सा करो कि वह जितने दिन जिए। और वह जो भीतर है, उसका स्मरण करो कि मृत्यु भी द्वार पर खड़ी हो जाए तो भय न कंपा दे।

भीतर ध्यान, बाहर चिकित्सा, चिकित्सा-शास्त्र को परिपूर्ण शास्त्र बना सकते है। तो मेडिसन और मेडिटेशन को मैं एक ही शास्त्र मानता हूं, जिनके बीच अभी कड़ियां नहीं जुड़ पाई हैं। लेकिन धीरे-धीरे करीब बात आ रही है। आज तो अमेरिका के सभी विकसित अस्पतालों में एक हिप्नोटिस्ट का होना जरूरी हो गया है। लेकिन हिप्नोसिस मेडीटेशन नहीं है। पर यह अच्छा कदम है।

यह इस बात की स्वीकृति है कि आदमी की चेतना के साथ सीधा कुछ करने की जरूरत है, सिर्फ शरीर के साथ करना पर्याप्त नहीं है। आज हिप्नोटिस्ट आएगा, मैं मानता हूं कल अस्पताल में मंदिर भी आएगा। वह पीछे आएगा थोड़ा वक्त लगेगा। हिप्नोटिस्ट के बाद एक डिपार्टमेंट योगी का भी हर अस्पताल में आ ही जाएगा। आ ही जाना चाहिए। तब हम पूरे व्यक्ति को ट्रीट कर पाएंगे।

नए होकर नए वर्ष में प्रवेश करें

हिन्दुस्तान, लखनऊ, 1 जनवरी, 2013

मन का स्वभाव है अतीत की स्मृतियों और भविष्य की कल्पनाओं में खोए रहना। ऐसी मनोदशा में हम वर्तमान के बहूमूल्य क्षण से वंचित रह जाते हैं। और हमारे पास जो क्षण होता है, वह केवल वर्तमान का क्षण होता है। वर्तमान ही भविष्य का निर्धारक है।

नए वर्ष में प्रवेश करने का अभिप्राय है, हम स्वयं में नए होकर उसमे प्रवेश करें। और यह घटना तभी घटित होती है, जब हम चेतना के स्तर पर सद्य स्नात होते हैं। वर्तमान क्षण की सघनता और गहराई में जीने से ही हम भविष्य की दिशा में सुनिश्चित कदम बढ़ा सकते हैं और उसे सुंदर बना सकते हैं। वर्तमान की सुदृढ़ नींव पर भविष्य के स्वर्णिम कलश जगमगाते हैं। जीने की ऐसी कला को ही हम ध्यान कहते हैं। और जब तक हम ऐसी कला में स्थितप्रज्ञ नहीं हो जाते, तब तक हम सुंदर भविष्य की कल्पना भी नहीं कर सकते। जो व्यक्ति यह कला सीख जाता है, वही सच्चे अर्थों में परिपक्व है। यह परिपक्वता कोई बासीपन नहीं है, कोई गंभीरता वाला जीवन नहीं है। यह व्यक्तित्व की समग्र खिलावट है।

एक कथा है। एक राजा अपने वजीर से किसी बात पर नाराज हो गया। राजा ने उसके लिए मृत्युदंड की घोषणा कर दी। इधर वजीर इससे बेखबर अपने घर में बैठा हुआ था। तभी राजा का संदेशवाहक वजीर के पास संदेश लेकर आया। जब वजीर को यह पता चला कि आज शाम छह बजे उसे फांसी होने वाली है तो वह खुशी से नाचने लगा। संदेशवाहक ने जब वजीर को इस तरह खुशी से नाचते हुए देखा तो उसे लगा कि वजीर सजा के भय से दिमागी संतुलन खो चुका है और ऐसी हरकत कर रहा है। उसे कुछ समझ में नहीं आया। तभी वजीर ने उसकी ओर देखते हुए कहा कि जब मुझे पता चल ही गया है कि मेरा जीवन सिर्फ आज शाम छह बजे तक है तो अपने बचे हुए जीवन को क्यों न हंसते-गाते हुए गुजारूं और प्रत्येक क्षण का आनंद लूं।

वजीर की इस बात का पता जब राजा को चला तो वह भी अपने सैनिकों के साथ उसे देखने के लिए पहुंच गया। राजा उससे बहुत प्रभावित हुआ। वह समझ गया कि इसे जीने की कला आती है। ऐसे व्यक्ति को प्राणदंड देना उचित नहीं है। दरअसल इस पूरी कथा के पीछे मुख्य बात यह है कि हमारा जीवन के प्रति क्या दृष्टिकोण है, उससे ही हमारा जीवन तय होता है। यदि हम हर समय आनंद के क्षणों को जीते हैं तो प्रत्येक के लिए नव वर्ष है। इसलिए जरूरी है कि हम आनंदमय होकर जीएं।

प्रस्तुतिः स्वामी चैतन्य कीर्ति