Osho World Online Hindi Magazine :: September 2012
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  संपादकीय
 
 

ओशो का सत्य और साहित्य

अंग्रेजी समाचार-पत्र ट्रिब्यून के वरिष्ठ पत्रकार डॉ. कुलदीप कुमार धीमान द्वारा लिखित एक पुस्तक प्रकाशित हुई है जिसका शीर्षक है--परम विद्रोही: ओशो के क्रांतिकारी विचारों का विश्लेषण। इसके शीर्षक के साथ मुख्यपृष्ठ पर ओशो का एक वाक्य भी अंकित है: ‘‘ऐसा नहीं है कि मैं खतरनाक हूं--सत्य ही खतरनाक है।’’

सत्य खतरनाक है, क्योंकि उसकी अभिव्यक्ति दुस्साहसपूर्ण है। लोग नाराज़ हो जाते हैं, शत्रु बन जाते हैं। सत्य की अभिव्यक्ति के कारण ही सुकरात को ज़हर दिया गया था और जीसस को सूली पर चढ़ाया गया था। इसलिए अमेरिका के एक सुप्रसिद्ध उपन्यासकार टॉम राबिन्स को यह कहना पड़ा: जीसस के बाद सर्वाधिक खतरनाक व्यक्ति हैं ओशो।

इस वाक्य में ओशो की आलोचना नहीं है, बल्कि उनके व्यक्तित्व की प्रखरता की घोषणा है।

जबलपुर के एक कॉलेज में दर्शनशास्त्र के प्राध्यापक-पद पर कार्य करते हुए ओशो ने देश भर में घूम-घूम कर अनेक मंचों और विचार-गोष्ठियों द्वारा अपने विचार व्यक्त किए। आग्नेय होने के कारण ये विचार एक आग की भांति पूरे देश में फैलने लगे। परंपरावादी और तथाकथित नैतिक लोग खूब भड़के और उनकी निंदा-भत्र्सना करने लगे। कुछ समाचार पत्र-पत्रिकाएं, जैसे धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान, कादंबिनी और नवनीत, उनके विचारों को नियमित रूप से प्रकाशित करने लगे। इनके माध्यम से एक प्रबुद्ध वर्ग ओशो के विचारों पर चिंतन-मनन करने लगा। युवा वर्ग के बहुत लोग ओशो से जुड़ने लगे और उन्होंने युवक क्रांति दल की स्थापना की। इस दल के कुछ मित्रों ने युक्रांद नामक मासिक पत्रिका का प्रकाशन भी किया। देश भर में जीवन-जागृति केंद्र खुलना शुरू हो गए, जहां युवा चित्त के लोग नियमित रूप से मिलकर विचार गोष्ठियों का आयोजन करते और ध्यान-प्रयोगों द्वारा स्वयं को रूपांतरित करते थे।

60 के दशक में ओशो ने खूब यात्राएं कीं। इन यात्राओं में सार्वजनिक स्थानों पर उनके प्रवचन हुए, जिनमें वे लोगों को सोचने-विचारने के लिए आंदोलित करते, झंझोड़ते और उकसाते। ओशो की वाणी का अपूर्व जादू था कि कुछ जनसभाओं में हज़ारों-लाखों की संख्या में लोग उपस्थित होते। उनकी दो-तीन विवादास्पद पुस्तकें, जैसे संभोग से समाधि की ओर, भारत, गांधी और मैं, इन्हीं सार्वजनिक सभाओं में हुए प्रवचनों का संकलन थीं। इन पुस्तकों से देश में काफी तहलका मचा, लोग उद्वेलित हुए और राजनीतिक लोग उनसे दूरी बनाने लगे। न्यस्त स्वार्थों पर चोटें पड़ने लगीं। यद्यपि ओशो के विचारों की उपेक्षा करना असंभव था, तथापि उनसे संबंधित होना भी खतरनाक था, समाज में बदनामी की आशंका तो थी ही लेकिन फिर भी अनेक युवक और युवाचित्त के लोग ओशो से जुड़ गए, ओशो ने उन्हें उन्मत्त कर दिया। इन लोगों के लिए, जीवन-रूपांतरण के लिए माउंट आबू, माथेरान, महाबलेश्वर, मनाली, पहलगाम जैसे रमणीक स्थानों पर ओशो ध्यान शिविरों का आयोजन हुआ।

वर्ष 1970 में मनाली के एक ध्यान शिविर में, ‘श्री कृष्ण मेरी दृष्टि में’ प्रवचनमाला के साथ-साथ ओशो के ‘नव-संन्यास’ आंदोलन का सूत्रपात हुआ। ओशो ने एक हंसते-खेलते अभिनव संन्यास की प्रस्तावना की। इस संन्यास में कोई त्याग और पलायन नहीं है, बल्कि ध्यान द्वारा स्वयं को रूपांतरित करके जीवन को और सुंदर व सृजनात्मक बनाने की भावना है। संसार में रहते हुए संसार का न होना, कमलवत जीना, अतीत की स्मृतियों और भविष्य की कल्पनाओं से निर्भार होकर क्षण-क्षण होश में जीना ओशो का नव-संन्यास है।

संन्यास और अध्यात्म के साथ-साथ ओशो ने जीवन के अन्य आयामों के संबंध में अपने विचार और जीवन-दृष्टि की एक नयी जीवंत अभिव्यक्ति की। इन विषयों में प्रेम, विवाह, राजनीति, समाज, जनसंख्या, महत्वाकांक्षा, विज्ञान, मनोविज्ञान, साहित्य, काव्य, संगीत, बहु-आयामी सृजनात्मकता और कलाओं का उनका अपना ही दृष्टिकोण है। इन विषयों पर उन्होंने हज़ारों लोगों के प्रश्नों के उत्तर दिए। इस प्रकार उनकी चेतना से एक विशाल साहित्य का जन्म हुआ, जिसके अध्ययन से लेखक, विद्वान, समीक्षक और सामान्यजन चमत्कृत होते हैं।

ओशो लगभग चालीस वर्ष तक बोले और उनके प्रवचन लगभग सात सौ पुस्तकों में संकलित और प्रकाशित हैं। वे इतने अधिक धर्मों, दर्शनों और मतों पर बोले कि कोई भी उनका हिसाब रखते-रखते थक जाए। शायद ही किसी अकेले व्यक्ति ने इतने विभिन्न विषयों पर प्रवचन किए हों। ओशो को बहुत गंभीरता से पढ़ने वाले पाठक सोच सकते हैं कि उन्हें किस कोटि में रखा जाए, यह सुनिश्चित करना कठिन है, क्योंकि ओशो सब कोटियों से मुक्त, अपनी कोटि आप हैं।

ज्ञान का अपरिसीम खज़ाना देने के साथ-साथ ओशो ने हमें सब प्रकार के उधार ज्ञान से निर्भार होकर सहज प्राकृतिक जीवन जीने की कला सिखाई: अतीत और भविष्य से मुक्त होकर इस क्षण में पूरी तरह खुल कर कैसे जीएं, हर क्षण के साथ एक होकर, यही ध्यान है। ध्यान ही वह विधि है जिसके माध्यम से हम अपने मन में संग्रहीत सब प्रकार के कचरे को साफ कर सकते हैं। एक बार यह मन निर्मल और निर्भार हो जाए तो हम अपने स्वभाव को पुनः पा लेते हैं, जो मात्र शुद्ध चैतन्य के अतिरिक्त कुछ नहीं। यह अर्थ होता है ‘स्वयं होने’ का--निजता का।

-स्वामी चैतन्य कीर्ति