Osho World Online Hindi Magazine :: September 2012
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क्या है विवाह?

मेरे एक वक्तव्य में मैंने कहा है कि शादी जैसी आज है, विवाह जैसा आज है, वह इतना इतना विकृत है कि उस विवाह से गुजर कर मनुष्य के चित्त में विकृत ही आती है, सुकृति नहीं।

यह बात सच है कि विवाह एक अति सामान्य, अति जरूरी स्थिति है। और साधारणतः अगर विवाह वैज्ञानिक हो तो व्यक्ति विवाह के बाद ज्यादा सरल, ज्यादा शांत और सुव्यवस्थित होगा। लेकिन विवाह अगर गलत हो-जैसा कि गलत है-तो विवाह के पहले से भी ज्यादा परेशानियां, अशांतियां और चित्त की रुग्णताएं बढेंगी।

जैसे मेरा कहना है, जो विवाह प्रेम से फलीभूत नहीं हुआ है, ज्योतिषी से पूछ कर हुआ है, जो विवाह मां-बाप ने तय किया है, स्वयं विवाह करने वालों के प्रेम से नहीं निकला है-वह विवाह विकृत करेगा, सुकृत नहीं करेगा। वह विवाह नई परेशानियों में ले जाएगा बजाय पुरानी परेशानियां हल करने को और इसलिए सारी दुनिया में विवाह की पूरी की पूरी व्यवस्था रुग्ण हो गई है, बीमार हो गई है, सड़ गई है। और जब तक हम विवाह की व्यवस्था नहीं बदलते...और भी बहुत बातें हैं, समाज को जो सड़ा रही हैं और पागलपन पैदा कर रही हैं। लेकिन उनमें से बहुत बुनियादी बातों में से एक विवाह है। जब तक हम उसे नहीं बदलते, तब तक परिवार का वह रूप प्रकट नहीं हो सकेगा जो व्यक्ति को शांति देता हो, प्रेम देता हो, आनंद देता हो, गति देता हो, बल देता हो-और सबसे बड़ी बात-जो व्यक्ति के जीवन में अध्यात्म देता हो।

अभी तो जो परिवार है वह रोग देता है, बीमारी देता है, लड़ाई देता है, कलह देता है, अशांति देता है, तनाव देता है। और यह सब भी आदमी झेलने को राजी हो सकता है अगर दो व्यक्तियों के बीच कोई बहुत गहरे प्रेम का संबंध हो। इस सबको झेला जा सकता है। लेकिन अगर बीच में प्रेम का संबंध भी न हो और यह सब झेलना पड़े, तो विवाह व्यक्ति को तोड़ता है, बनाता नहीं। और इसीलिए परिवार को छोड़ कर भागने वाले लोगों की संख्या निरंतर बढ़ती चली गई। चाहे वे संन्यास के नाम से भागते हो, वह परिवार से छुटकारा पाने का उपाय है। चाहे वे अपराध के नाम से भागते हों और जेल में सड़ जाते हों, वह भी परिवार से भागने का उपाय है। चाहे वे समाज-सेवा के नाम से चौबीस घंटे घर के बाहर घूमते हों, वह भी परिवार से भागने का उपाय है।

हजार तरकीब से आदमी परिवार से भागने का उपाय कर रहा है। होना तो यह चाहिए कि परिवार इतना सुखद हो कि सब तरफ से भाग कर आदमी परिवार की शरण में आए। लेकिन हालतें ऐसी हैं कि परिवार से बचने के लिए न मालूम कितने उपाय आदमी करता है। जितने लोग शराब पीते हैं, उसमें अधिक लोग परिवार से, परिवार को भूलने, छुटकारा पाने के लिए। लोग सिनेमाघरों में बैठे हुए हैं, परिवार से छूटने के लिए। लोग पागल तक हो जाते हैं, वह भी एक बचाव है परिवार से छूट जाने के लिए।

अगर परिवार की हम पूरी व्यवस्था देखें, तो परिवार अभी वैज्ञानिक नहीं है, किसी भी दृष्टि से वैज्ञानिक नहीं है। और इसलिए मैंने कहा कि हमें परिवार पूरा का पूरा बदलना पड़े, आमूल क्रांति परिवार में जरूरी है, तो ही मनुष्य को स्वस्थ, शांत और सरल बनाया जा सकता है। नहीं तो परिवार उसको विकृत किये दे रहा है। और पता भी नहीं चल रहा है, क्योंकि परिवार हमें इस तरह स्वीकृत हो गया है कि हम सोचते हैं परिवार कोई प्राकृतिक व्यवस्था है। जो कि सरासर झूठ है। परिवार बिलकुल मनुष्य की ईजाद है। और जो भी चीजें मनुष्य की ईजाद हों उनमें सुधार हो सकते हैं, होने चाहिए। कोई भी...परिवार कोई ऐसी चीज नहीं है जो कि नैसर्गिक है, इसलिए परिवार बहुत प्रकार के हो सकते हैं।

जैसे उदाहरण के लिए आपको कहूं, अब तक तो हम यही समझते रहे हैं कि बच्चों को मां-बाप पके साथ पाला जाना चाहिए। हम यह भी सोचते रहे हैं कि बच्चे अगर मां-बाप के पास नहीं पलेंगे तो उन्हें प्रेम नहीं मिलेगा। हम यह सोचते रहे हैं कि बच्चे अगर मां-बाप से दूर पाले जाएंगे तो उनके बीच कभी प्रेम का संबंध विकसित नहीं होगा। यह सरासर ही गलत और व्यर्थ बात है।

इजराइल में उन्होंने नया प्रयोग किया है-बच्चों को परिवार से अलग पालने का। और परिणाम बिल्कुल उलटे हुए हैं। हमारे बच्चे मां-बाप के साथ पलने के बाद मां-बाप के प्रति प्रेम नहीं सीखते, बहुत बुनियाद में घृणा सीखते हैं, बगावत सीखते हैं, मां-बाप के प्रति क्रोध सीखते हैं। और यही सारा का सारा क्रोध जब मां-बाप बूढ़े होते हैं और बच्चे ताकतवर होते हैं, जब परिवार का पांसा पलट जाता है, क्योंकि बचपन में बच्चे कमजोर हो जाते है, मां-बाप ताकतवर होते हैं; बुढ़ापे में बच्चे ताकतवर हो जाते हैं, मां-बाप कमजोर हो जाते है; तो बचपन में जो-जो पीड़ा उन्होंने मां-बाप से सही है, उसका बदला लेना बुढ़ापे में वे शुरु करते हैं। फिर मां-बाप चिल्लाते हैं और कहते हैं कि बच्चे हमें सता रहे हैं। हम कमजोर हो गए, बूढ़े हो गए, हमारी न सेवा की जा रही है, न फिकर की जा रही है। लेकिन कोई भी नहीं सोचता कि बच्चे क्यों सता रहे हैं मां-बाप को! कहीं ऐसा तो नहीं है कि मां-बाप ने बचपन में सताया हो? कही यह उसका बदला तो नहीं है, यह उसका प्रतिकार तो नहीं है?

और मनोवैज्ञानिक कहेंगे कि उसका प्रतिकार है, बिलेटेड रिवेंज है, जो कि उनके भीतर इकट्ठा होता चला गया। अगर मां-बाप के साथ बच्चों को पालना है तो यह होगा, क्योंकि मां-बाप उनको शिक्षा भी देंगे, कुछ काम करने से भी रोकेंगे, जरूरी भी होगा रोकना, डांटेंगे, डपटेंगे, मारेंगे-पीटेंगे, समझाएंगे-बुझाएंगे। तो इन सारी प्रक्रिया के बीच गुजर कर बच्चे का प्रेम तो बातचीत रह जाती है और मां-बाप के प्रति क्रोध असलियत हो जाती है।

अभी इजरायल में उन्होंने नया प्रयोग किया कि बच्चे को, जैसे ही वह थोड़ा सा हुआ बड़ा, छह महीने का, तो उसको नर्सरी में ले जाएंगे; मां उसे दूध पिलाने जाएगी दिन में चार-छह बार, लेकिन सप्ताह में ही एक दिन से ज्यादा वह बच्चे को घर नहीं ला सकेगी। फिर जैसे ही बच्चा और बड़ा होने लगेगा, वैसे ही पूरे दिन भी घर नहीं रह सकेगा। कभी सप्ताह में दो सप्ताह में आएगा घंटे, दो घंटे घर खेलने, मिलने-जुलने। मां मिलने जाएगी, पिता मिलने जाएगा।

तो पहले यह सोचा था कि इसमें तो मां-बाप और बच्चे के बीच प्रेम कम हो जाएगा। लेकिन अनुभव यह हुआ कि चूंकि बच्चा सिर्फ मां के सुखद रूप को ही देखता है, कभी दुखद रूप को देखता ही नहीं। क्योंकि घंटे भर के लिए बच्चा घर आएगा तो मां मारेगी उसको, डांटेगी-यह तो असंभव है। वह उसे प्रेम ही करेगी। तो बच्चा चूंकि प्रेमपूर्ण रूप को ही देखता है। अठारह-बीस साल का होकर जब वह यूनिवर्सिटी से बाहर आएगा, तो मां उसे सिवाय प्रेम की प्रतिमा के और कुछ भी नहीं है। यह बच्चा मां को बुढ़ापे में कभी भी नहीं सता सकता, यह असंभावना हो गई।

लेकिन ये नए प्रयोग हैं। मेरा कहना यह है कि जरूरी नहीं है कि हम ऐसा करें। मेरा कहना यह है, लेकिन परिवार जैसा है वह विचारणीय हो गया है और बहुत से नये प्रयोग करने जरूरी हो गए हैं। और इतने नये प्रयोग अगर नहीं किये जाते तो परिवार, जिसको हम समझते हैं हमारे समाज का आधार है, वही हमारे समाज को सड़ाने का बुनियादी रूप हो गया है।

और हमें यह भी...हमें खयाल ही नहीं है कि परिवार की कितनी कुरूपता है, कि वह किस तरह के आदमी पैदा करता है। ये जो हम चारों तरफ देख रहे हैं कि लोग पैदा हुए हैं, ये परिवार से पैदा हुए हैं। न तो ये ठीक से शिक्षित होते हैं। क्योंकि इनकी शिक्षा अनिवार्य रूप से मां-बाप जो जानते हैं, जो समझते हैं, उनके दिमाग में डाल देते हैं। अब वे कहते हैं इस वक्त कि मां-बाप से बच्चों को बचाया जाना सबसे जरूरी बात है।

अब जैसे उदाहरण के लिए मैं कुछ बात कहूं। हिन्दुस्तान के बच्चे अगर नर्सरीज में पाले जा सकें, तो उन बच्चों का भविष्य बहुत और होगा। मां-बाप के पास पलता हुआ बच्चा, अगर मुसलमान मां-बाप हैं तो बच्चे को मुसलमान बना देते हैं। और जो रोग मुसलमान के साथ जुड़ा था वह जुड़ा रहेगा। मां-बाप हिंदू हैं तो बच्चे को हिंदू बना देते हैं। अगर बच्चों को हम सामूहिक तल पर पाल सकें, तो बीस साल में हिन्दुस्तान में कोई हिंदू न होगा, न कोई मुसलमान, न कोई ईसाई, न कोई जैन, सीधा मनुष्य होगा। और वे बच्चे जो कि साथ पलेंगे और जिनके दिमाग में हिंदू-मुसलमान बिठाने वाली कोई तरकीब जारी नहीं की जाएगी, वे बच्चे एक ऐसी दुनिया बनाएंगे जिसमें झगड़े कम होंगे, पाकिस्तान-हिन्दुस्तान के होने की जरूरत नहीं होगी। मंदिर और मस्जिद के झगड़े की जरूरत नहीं होगी। मंदिर और मस्जिद के झगड़े की जरूरत नहीं होगी।

लेकिन जब तक मां-बाप के पास बच्चे पल रहे हैं तब तक आप नहीं बचा सकते। मां-बाप मुसलमान हैं तो मुसलमान बना जाएंगे, हिंदू हैं तो हिंदू बना देंगे। और इतने बचपन से बनाएंगे कि बच्चे को पता ही नहीं चलेगा कि वह कब मुसलमान बन गया और कब हिंदू बन गया। और पुराने सब झगड़े उसके दिमाग में फिर डाल दिए जाएंगे।

यह तो सारा का सारा परिवार जैसा है वह इस योग्य नहीं है कि बचाया जाए। लेकिन दूसरा विकल्प जब तक न हो तब तक हम प्रयोग भी नहीं कर सकते। तो अभी तो मैं चाहता हूं कि जीवन की प्रत्येक स्थिति पर पुनर्विचार हो, हम सोचें। मैं यह नहीं कहता हूं कि जो मैं कहता हूं वही मान लें। वह गलत भी हो सकता है। लेकिन हम सोचना शुरू कर दें ।

अब जैसे परिवार जैसी चीज पर सोचना ही बंद है। हमने मान ही लिया है कि जैसा परिवार है बस यही ठीक है, यही हो सकता है। हमने परिवार को कोई प्राकृतिक चीज बना ली है। वह प्राकृतिक चीज नहीं है, वह सिर्फ हजारों साल से चलने वाली चीज है। और दुनिया में सब जगह एक सा परिवार भी नहीं है, अलग-अलग ढंग के परिवार हैं। अब हमें सोच कर फिर से व्यवस्था देनी चाहिए कि परिवार कैसा हो। इसलिए मैंने वह बात कही है। परिवार रोग ला रहा है, क्योंकि परिवार सड़ गया है, वह स्वस्थ नहीं कर रहा है।

-ओशो
पुस्तकः नये समाज की खोज
प्रवचन नं. 16 से संकलित
पूरा प्रवचन एम.पी. थ्री. एवं पुस्तक में उपलब्ध है