Osho World Online Hindi Magazine :: January 2012
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एक नए जीवन की ओर

जो पीछे छूट गया था, वह अब मिल गया है

सुप्रिया भल्ला, जो कि जालंधर की रहने वाली हैं और मध्यम कद की, दुबली पतली, प्यारी सी इंटेलीजेंट युवती जालंधर के ही सत्यं इंस्टिट्यूट आफ टेक्नोलाजी में साफ्टवेयर कंप्यूटर की लेक्चरर है। बुद्धि और भाव दोनों का संतुलित तालमेल है उसमें। ओशोधाम में ध्यान शिविर व संन्यास दीक्षा के लिए आई है। और यह उसका पहला ध्यान शिविर है।

ओशो से परिचय कैसे हुआ? सुप्रिया अब मा प्रेम सुरति से पूछे जाने पर उसने बताया कि उसकी एक मित्र मा उमंगो ने ओशो के बारे में उसे अवगत कराया। बाद में उसने ओशो को सुना और पढ़ा भी। लेकिन आश्चर्यजनक रूप से उसके जीवन में जो टर्निंग प्वाइंट लेकर आया; वह था-ओशो का एक विडियो-आई लीव यू माई ड्रीम। इस विडियो में ओशो के देहत्याग के समय का प्रस्तुतिकरण है।

जीवन वाकई बेबूझ है, किन अनजान तरीकों से अज्ञात भीतर प्रवेश पा जाता है; कुछ कहा नहीं जा सकता।

सुरति कहती है कि पहले वह बहुत दुखी रहा करती थी। अमरनाथ की तीर्थयात्रा पर गये उसके पिता का सड़क दुर्घटना में आकस्मिक निधन हो गया था। सारा परिवार शोक संतप्त था। उसे लगने लगा कि जीवन असार है। मौत एक सच्चाई है। गहरी उदासी पकड़ गई। दुखी रहना जीवन की शैली बन गई। जब इस विडियो को देखा तो जैसे एकाएक नींद से जागना हुआ। हां;...मृत्यु का भी उत्सव मनाया जा सकता है। दुख की अंधेरी रात में रोशनी की एक किरण दिखाई दी। और धर्म की खोज शुरु हो गई। ध्यान और उत्सवपूर्ण जीवन को जीने की चाह उसे ओशोधाम ले आई। यहां आकर और ध्यान-प्रयोगों में हिस्सा लेकर उसे भीतर बदलाहट महसूस होने लगी। जो कभी सपने बुने थे उसने-ध्यान के, मस्ती के, उत्सव के साथ ही अदृश्य अज्ञात के, वो भी हकीकत बनने लगे।

‘‘अदृश्य अज्ञात के सपने??’’ येस। सुरति बताती है कि वह अक्सर ये पंक्तियां गुनगुनाया करती थी!-
‘दुआ दुआ में दुआ मांगी हमने।
खुदा से खुदा जैसी तस्वीकर मांगी हमने।।’
तो यह जवाब आया था-‘फरिश्ते अर्श से फर्श पर नहीं उतरते।’
‘‘क्यों...?’’ मेरा दिल खुदा से बार-बार यही पूछा करता था--‘ऐसा क्यों?’ ऐसे मासूम से बेबूझ सवालों के कहीं उत्तर आया करते हैं। लेकिन जो जानते हैं उनसे ऐसा सुना गया है कि जब प्रार्थना पूरी होती है तो उत्तर स्वयं प्रकट हो जाते हैं।

ओशोधाम में आज की शाम खास है। आज सांध्य सत्संग में संन्यास दीक्षा महोत्सव भी है। स्वामी चैतन्य कीर्ति संन्यास दीक्षा संपन्न कर रहे हैं। उत्सव का हर्षोल्लास है। श्वेत वस्त्रों में संन्यासी मित्र संगीत के साथ लयबद्ध ही नृत्यगान में मगन हैं। एकाएक सुरति ठगी सी रह जाती है-‘फरिश्ते, अर्श से फर्श पर उतर आये हों जैसे।’

संन्यास-दीक्षा के लिए तैयार बैठी सुरति किस भावदशा में है, यह शब्दातीत है। बाद में मुझसे शेयर करती है। बताती है कि उस समय वहां पानी गिरने की सुखद आवाज आ रही थी, साथ ही पत्ते भी गिर रहे थे। और ओशो की मौजूदगी का जादू बिखरा हुआ था-चारों ओर। वो मुझे आशीर्वाद देते हैं। संन्यास ग्रहण करते ही भीतर महसूस हुआ; ‘जो पीछे छूट गया था, वह अब मिल गया है।’ सुरति उठी। आखें बंद। वहीं संगीत के साथ डोलती, नाचती, झूम रही थी। बार-बार फर्श पर गिर जाती थी। उठती थी। नाचती थी और गिर जाती थी। दीवानगी ऐसी हो गई थी कि संभल ही नहीं पा रही थी।

रात्रि-भोजन पर जब मैं उससे मिलती हूं तो पाती हूं कि वह अभी भी खुमारी में है। उससे कुछ खाया नहीं जा रहा है। सबसे प्रेम से मिल रही है। जब मेरे साथ बैठती है, तो ओशो के लिए प्रेम भरे गीतों को गुनगुना कर मुझे सुनाती है। फिर अपने दिल का राज खोलती है, ‘जिसकी मुझे तलाश थी, कुछ जो कहीं पीछे छूट गया था, वह आज मिल गया है। मैं अपनी उस दुनिया में वापिस लौट आई हूं। ओशो ने रंग दिया अपने प्रेम से। अब इसमें झूमने को, नाचने को, बांटने को दिल करता है। नाऊ आई एम कम्पलीटली फ्री फ्राम एवरी थिंग। आई हैव स्टार्टेड ग्रोइंग। यह मेरा जीवन ओशो को समर्पित है।

सुरति में प्रेम का दीवानापन छा गया है। आज वह समर्पित है। स्वागतपूर्ण है। ग्राहक है। तंत्र सूत्र में ओशो कहते हैं: ‘‘जब तुम गुरु के साथ एक हो जाओगे-समग्ररूपेण, गहनरूपेण-कि तर्क न रहा, बुद्धि न बची, तब तुम ग्रहण करते हो, तब तुम गर्भ बन जाते हो। तब गुरु की शिक्षा तुममें वृद्धि पाती है। तुमको बदलने लगती है।’’ ओशो आगे कहते हैं-‘‘तुम्हारी सहायता करना ही मेरा अभीष्ट है। यह करुणा है जो तुमको बढ़ने में, बदलने में, तुम्हारे पुनर्जन्म में सहयोगी होना चाहती है।

-मा प्रेम सुरति