Osho World Online Hindi Magazine :: January 2012
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नए मनुष्य की धारणा

यदि तुम पदार्थ और चेतना दोनों के साथ-साथ मालिक बन सके, तब वह एक आमंत्रण, एक चुनौती बन जाएगा और प्रत्येक उस व्यक्ति के लिए, जो तुम्हारे सम्पर्क में आता है यह एक उत्तेजना भरी यात्रा होगी।

प्यारे ओशो! आप ही सच्चे विद्रोही हैं, आप ही नए मनुष्य हैं और आप ऐसे भी सद्गुरु हैं, जो हमें जन्माने के लिए दाई बनकर सहायता करते हैं, चूंकि सच्चे विद्रोह का जन्म चेतना, प्रेम और ध्यान से होता है, जैसे मानो यह एक समग्रता से जीने का रसायन है, जिसकी जरूरत हमें जाग जाने तक है। विद्रोह जंगल जैसी आग की तरह कैसे फैल सकता है?

प्रश्न यह नहीं है कि यह विद्रोह जंगल जैसी आग की तरह किस तरह फैले, प्रश्न यह है कि यह लपट तुम्हें कैसे पकड़े, जिससे तुम विद्रोही बन सको। इस बात की फिक्र करो ही मत कि इस विद्रोह की लपट को विश्व कैसे पकड़े। तुम ही संसार हो। प्रत्येक वैयक्तिक रूप से संसार ही है।

एक बार ऐसा हुआ, भारत के महान सम्राट अकबर ने एक बहुत सुंदर महल बनवाया। संसार की सबसे अधिक ऊंचाई पर स्थित हिमालय के मानसरोवर से उसने सबसे अधिक सुंदर हंस मगवाए। सबसे अधिक सुंदर सफेद और महान हंसों का जन्म उसी झील में होता है। अपने महल के उद्यान के लिए उसने एक बहुत बड़ा तालाब बनवाया, जिससे उन हंसों को यह अनुभव न हो कि वे कारागार में हैं। वह तालाब भी लगभग एक झील जैसा ही विशाल था। जिससे वे उसमें स्वतंत्रता और आनंद से रह सकें। वह खड़ा हुआ उस तालाब का पूरा होना देख रहा था और वह पूरा तालाब श्वेत संगमरमर से बनाया गया था।

उसके प्रधानमंत्री ने कहा--‘हम लोगों को यह सूचना प्राप्त हुई है कि हंस कल आ रहे हैं। उनके स्वागत के लिए हम लोगों को इस तालाब में पानी नहीं बल्कि इसे दूध से भर देना चाहिए। बाद में निश्चित रूप से हमें उसे पानी से भरना ही होगा, लेकिन उनके स्वागत के लिए पहले दिन।’

अकबर ने कहा--‘लेकिन इतना अधिक दूध हम लाएंगे कहां से?’

प्रधानमंत्री ने कहा--‘हमें पूरी राजधानी-भर को सिर्फ यह सूचित करना होगा कि सम्राट के उद्यान में हंसों का स्वागत किया जाएगा और हिमालय से आए हंसों का स्वागत करने के लिए वे चाहते हैं कि कम-से-कम पहले दिन तालाब को दूध से भर दिया जाए। राजधानी के प्रत्येक नागरिक से यह प्रार्थना है कि एक बाल्टी दूध तालाब में डालें।’

राजधानी बहुत विशाल थी और प्रत्येक व्यक्ति यदि तालाब में एक बाल्टी दूध डालता तो तालाब दूध से निश्चित रूप से भर जाने वाला था और कौन व्यक्ति ऐसा था जो सम्राट की प्रार्थना को पूरी करने नहीं जा रहा था? वास्तव में हिमालय से आए हुए दुर्लभ प्रजाति के हंसों का सम्राट के द्वारा स्वागत करना बहुत बड़े आनंद की बात थी।

हिंदू लोग हमेशा से ही हंसों की पूजा इसलिए करते आए हैं, क्योंकि उनके पास एक क्षमता है; यदि तुम दूध और पानी मिलाकर रख दो--शायद यह एक पौराणिक विचार है--हंस में यह क्षमता है कि वह उसमें से केवल दूध तो पी लेगा और पानी बच रहेगा। यदि पानी और दूध दोनों मिला दिए जाएं तो उन्हें अलग-अलग करना लगभग असंभव है, लेकिन हंस में यह क्षमता होती है। निश्चित रूप से यह है तो एक पौराणिक कल्पना, लेकिन यह बहुत महत्वपूर्ण है। इसका अर्थ है कि जो मनुष्य सच में से झूठ को अलग कर सकता है, जो अमर तत्व में से मृत्यु को, पवित्रता में से तुच्छ वासनाओं को और जागृति में नींद या मूर्छा को पृथक कर सकता है, उसी को महान हंस अर्थात् ‘परमहंस’ कहकर पुकारा जाता है।

सम्राट बहुत खुश हुआ, लेकिन अगला ही दिन पूरे महल के लिए एक बहुत बड़ा आश्चर्य था, क्योंकि पूरा तालाब पानी से भरा हुआ था। शहर में प्रत्येक व्यक्ति ने यह सोचा--‘जब वहां लाखों बाल्टी दूध होगा, तो एक बाल्टी पानी को कौन खोज सकेगा? तुम्हें बस जरा जल्दी उठकर जाना होगा, जब जरा अंधेरा हो।’

इसलिए प्रत्येक व्यक्ति अंधेरा रहते कुछ जल्दी उठा और प्रत्येक ने इस आशा में कि उसके अतिरिक्त सभी लोग दूध ही डाल रहे होंगे, उसमें एक बाल्टी पानी डाल दिया। पूरी राजधानी में एक भी व्यक्ति ने दूध नहीं डाला।

तुम सिर्फ अपने बारे में ही सोचो। तुम्हारी बाल्टी दूध से भरी हुई होनी चाहिए। दूसरों के बारे में चिंता करना छोड़ो।

प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं अपने बारे में ही सोचना चाहिए। यदि उसे अस्तित्व की इस आंगिक इकाई, अपनी पृथ्वी को बचाना है, यदि उसे इस संसार में अपनी प्रसन्नता और चेतना के अपने आनंद को साथ-साथ बचाना है तो उसे इस महान विद्रोह का, जिसके बारे में मैं बात कर रहा हूं, एक भाग बनना ही है। यह विद्रोह ही भविष्य का धर्म बनने जा रहा है, लेकिन प्रत्येक व्यक्ति को अपने कंधों पर यह जिम्मेदारी उठानी ही होगी।

तुम केवल अपने ही बारे में सोचो--यही पर्याप्त है और यदि तुम एक लपट बन गए, यदि लोग तुम्हारे ही अंदर ज़ोरबा और बुद्ध दोनों को एक साथ देख सकें तो तुम अपने चारों ओर प्रत्येक के लिए एक महान चुनौती उत्पन्न कर दोगे। यदि तुम बाहर और अंदर दोनों ही स्थानों पर समृद्ध बन सके, इतने अधिक समृद्ध कि तुम्हारे पास पृथ्वी में गहरे उतरने के लिए जड़ें और आकाश में उड़ने के लिए पंख हो सकें।

यदि तुम पदार्थ और चेतना दोनों के साथ-साथ मालिक बन सके, तब वह एक आमंत्रण, एक चुनौती बन जाएगा और प्रत्येक उस व्यक्ति के लिए, जो तुम्हारे सम्पर्क में आता है यह एक उत्तेजना भरी यात्रा होगी।

विद्रोह सदा छूत की बीमारी या जंगल की आग की तरह फैलता है, लेकिन तुम्हारे पास आग की लपट होनी चाहिए। तब तुम जहां भी जाओगे, तुम लोगों को विद्रोह की वह आग दे रहे होगे, जिसे वह लोग भी ज्वाला बनकर, नई दृष्टि, नए विचार और नए मनुष्य की धारणा और उसके भविष्य को एक नया आलोक दें।

तुम पूछ रही हो कि विद्रोह की यह आग जंगल की आग की तरह पृथ्वी पर चारों ओर कैसे फैल सकती है? बस तुम्हारे अंदर की आग सुलगती ही रहे, निरंतर बनी रहे, फिर आग से आग तो स्वयं अपने आप फैलती है। जंगल में आग फैलाने कोई दूसरा व्यक्ति नहीं जाता। सूखे पत्ते और सूखे पेड़ हवा के सहयोग से स्वयं आग पकड़ लेते हैं। लोग सूखे वृक्षों की तरह ही निराश, उदास और शुष्क हैं, वैसी ही आबोहवा भी है। आग तो निरंतर फेलती ही जाएगी।

-ओशो
एक नयी मनुष्यता का जन्म
प्रवचन नं. 8 से संकलित
(पूरा प्रवचन एम.पी.थ्री. पर भी उपलब्ध है)