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प्रामाणिक बनो

यह संसार नहीं चाहता कि तुम मनुष्य बनकर रहो, वह चाहता है कि तुम एक योग्य मशीन जैसे बनकर रहो। तुम जितने अधिक योग्य होगे, तुम्हारा उतना ही अधिक आदर होगा, उतना ही अधिक तुम्हें सम्मान दिया जाएगा।

इस संसार में प्रत्येक मनुष्य को, जहां उसने जन्म लिया है, कई समस्याओं में से एक समस्या का सामना करना ही पड़ता है। उसका अस्तित्व और सांसारिक उद्देश्य ये दोनों साथ-साथ नहीं चल सकते। यह संसार उसके काम करवाना चाहता है, उसे गुलाम बनाना चाहता है, वे लोग उसका इस्तेमाल करना चाहते हैं जो सत्ता में बैठे हैं और वह स्वाभाविक रूप से उसका प्रतिरोध करता है। वह स्वयं अपने आपमें मग्न रहना चाहता है। संसार किसी भी व्यक्ति को वह जो स्वभाव से है, उसे वैसे होने और खिलने की अनुभति नहीं देता।

संसार प्रत्येक व्यक्ति को एक उपयोगी, कुशल और आज्ञाकारी वस्तु के रूप में ढालने की कोशिश करता है, वह यह नहीं चाहता कि वह किसी भी तरह विद्रोही, अपने अधिकार का दावा करने वाला और अपनी वैयक्तिकता की घोषणा करने वाला बने, बल्कि वह उसे हमेशा एक साधन की तरह प्रयोग करने वाला लगभग एक रोबोट जैसा बनाकर रखना चाहता है। यह संसार नहीं चाहता कि तुम मनुष्य बनकर रहो, वह चाहता है कि तुम एक योग्य मशीन जैसे बनकर रहो। तुम जितने अधिक योग्य होगे, तुम्हारा उतना ही अधिक आदर होगा, उतना ही अधिक तुम्हें सम्मान दिया जाएगा।

इसी बात से समस्या उत्पन्न होती है। यहां कोई भी व्यक्ति मशीन बनने के लिए उत्पन्न नहीं हुआ है। यह उसको अपमानित करना, उसको नीचा दिखाना, उसके गर्व और गरिमा को गिराना और उसके आत्मिक अस्तित्व को मिटाकर उसे अपने अधीन एक यांत्रिक पुतला बनाने जैसा है।

इसलिए शुरू से ही प्रत्येक बच्चा, जैसे ही वह समाज, माता-पिता, शिक्षा प्रणाली, देश और धर्म के इरादों के प्रति सजग बनता है, वह अपने आपको बंद कर लेना शुरू कर देता है। वह भयवश बस सुरक्षात्मक बनना शुरू कर देता है क्योंकि उसे एक बहुत बड़े बल का सामना करना पड़ता है। वह है इतना अधिक छोटा, नाजुक आघात सहने में असहाय और उन लोगों का ही इतना अधिक आश्रित जिनके विरुद्ध उसे अपनी सुरक्षा करनी है। यह समस्या और भी अधिक जटिल हो जाती है कि वे लोग जिनसे उसे अपनी सुरक्षा करनी है, उसके विरुद्ध हैं और वे सोचते हैं कि वे उसे प्रेम करते हैं। संभवतः वे झूठ भी नहीं बोल रहे। उनके इरादे नेक हैं लेकिन वे अपनी चेतना से चूके जा रहे हैं, वे गहरी मूच्र्छा में हैं। वे नहीं जानते कि वे उस अंधी शक्ति के हाथों की कठपुतली बने हुए हैं, जिसे समाज और सामाजिक व्यवस्था कहा जाता है-सभी के साथ-साथ निहित-स्वार्थ है।

बच्चा बहुत दुविधा में पड़ जाता है। उसे उन लोगों के विरुद्ध संघर्ष करना है जिनसे वह प्रेम करता है और सोचता है कि वे भी उससे प्रेम करते हैं, लेकिन यह अजीब बात है कि वे लोग जो उसे प्रेम करते हैं, वह जैसा जो है, उससे प्रेम नहीं करते। वे उससे कहते हैं-‘हम तुम्हें प्रेम करेंगे, हम तुम्हें प्रेम करते हैं, लेकिन केवल तभी, यदि तुम उस मार्ग का अनुसरण करो, जिसका हम अनुसरण करते हैं, यदि तुम उस धर्म को मानो जो हम मानते हैं और जिस तरह से हम उस धर्म के आज्ञाकारी हैं, तुम भी वैसे ही आज्ञाकारी बनो।

यदि तुम इस बड़ी यांत्रिक व्यवस्था के एक भाग बन जाते हो, जिसमें तुम जीवन-भर के लिए रहने जा रहे हो...तो उसके विरुद्ध संघर्ष करना सिर्फ अर्थहीन होकर रह जाता है, तुम कुचल दिए जाओगे। बुद्धिमानी यही है कि बस समर्पण कर दो और केवल ‘हां’ कहना ही सीखो, भले ही तुम उसे पसन्द करो अथवा नहीं। अपनी ‘न’ का दमन करो। सभी परिस्थितियों में, सभी शर्तों में तुमसे यह आशा की जाती है कि तुम ‘हां’ कहने वाले ही बने रहो। ‘न’ कहने की मनाही है। न कहना ही मूल पाप है। आज्ञापालन न करना ही सबसे बड़ा पाप है-और तब समाज एक गहरा जख्म देते हुए तुमसे बदला लेता है। वह बच्चे में बहुत बड़ा भय उत्पन्न करता है। उसका पूरा अस्तित्व अपनी क्षमता के अधिकार का दावा करना चाहता है। वह जो स्वयं है, वह वही बनना चाहता है क्योंकि उससे दूसरा बनने में वह जीवन कोई अर्थ नहीं देख सकता। उसकी अपेक्षा कुछ और बनकर वह कभी भी खुश नहीं रह सकेगा। वह कभी भी आनंदपूर्ण, संतुष्ट और सम्पूर्ण न बन सकेगा। वह कभी भी विश्राम का अनुभव नहीं करेगा और हमेशा विभाजित और अस्थिर बना रहेगा। उसका एक भाग, इसके अस्तित्व के अंतर्निहित उसका स्वाभाविक भाग हमेशा क्षुधाग्रस्त, प्यासा, अपूर्ण और अतृप्त रहेगा।

लेकिन ये शक्तियां बहुत बड़ी हैं और इनके विरुद्ध संघर्ष करना बहुत बड़ा जोखिम का काम है। स्वाभाविक रूप से प्रत्येक बच्चा धीमे-धीमे अपनी सुरक्षा करना स्वयं सीखना शुरू कर देता है। उसे अपने आपको बचाना है, इसलिए वह अपने अस्तित्व के सभी दरवाजे बंद कर लेता है। वह किसी भी व्यक्ति के सामने अपने आपको खोलता नहीं, वह बहाने बनाना शुरू कर देता है। वह अभिनेता बनना शुरू कर देता है। उसे जो आदेश दिए जाते हैं, वह उनके अनुसार अभिनय करता है। उसके अंदर जो संदेह उठते हैं, वह उन्हें दबा देता है। उसका स्वभाव चाहता है कि वह अपने अधिकार का दावा करे, पर वह उसे दबा देता है। उसकी बुद्धि उससे कहना चाहती है-‘यह ठीक नहीं है, तुम क्या कर रहे हो?, पर वह अपनी बुद्धि की बात को गिरा देता है। अपने आपको रोक लेना और बुद्धिहीन बने रहना ही वह सुरक्षात्मक समझता है।

कोई भी चीज जो निहित स्वार्थों के साथ तुम्हें संघर्ष में ले जाती है, खतरनाक है और उन लोगों के सामने भी जो तुम्हारे बहुत निकट हैं, अपने आपको खोलना, जोखिम से भरा काम है।

-ओशो
भविष्य की आधारषिलाएं
प्रवचन नं. 14 से संकलित
(पूरा प्रवचन एम.पी.थ्री. पर भी उपलब्ध है)