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रहस्यदर्शियों पर ओशो

नारद

नारद सेतु हैं। इस तरफ से देखो तो बिलकुल संसारी हैं! और उस तरफ से तुम देख न सकोगे; उस तरफ से मैं देख रहा हूं। उस तरफ से देखो तो परम वीतराग हैं।

प्रश्न: एक परम्परा कहती है कि देवर्षि नारद परम मुक्ति को उपलब्ध नहीं थे। दूसरी परम्परा उन्हें सप्तऋषि में एक मानती है, जिनका गुह्य और परोक्ष सदा चलता रहा है। क्या भक्ति-सूत्र के रचयिता के व्यक्तित्व पर प्रकाश डालने की कृपा करेंगे?

जानकर ही नारद की कोई बात मैंने नहीं की। सोचकर ही छोड़ा। क्योंकि भक्त का कोई कर्तृत्व नहीं होता और न व्यक्तित्व होता है। भक्त तो एक मौन है, एक शून्य निवेदन है!
भक्त कुछ करता नहीं, इसलिए कोई कर्तृत्व नहीं होता।
भक्त तो एक आनंद है! एक गीत है! एक नृत्य है! एक अहोभाव है!
बड़ा सूक्ष्म है भक्त का अस्तित्व!
न तो कोई कर्तृत्व है, न कोई व्यक्तित्व है; क्योंकि भक्त तो एक खाली बांस की पोंगरी है, व्यक्तित्व क्या! खाली जगह है, जहां से भगवान को जगह देता है, जहां से भगवान उससे बहने लगते हैं।
नारद पर इसीलिए मैंने कुछ कहा नहीं। और इसीलिए नारद के संबंध में न मालूम कितनी कथाएं प्रचलित हैं। नारद के व्यक्तित्व को समझा ही नहीं जा सका। समझने के लिए जगह नहीं है। समझने के लिए आधार नहीं है।
एक परम्परा कहती है कि वे परम मुक्ति को उपलब्ध नहीं हुए। क्यों? ...क्योंकि नारद में बुद्ध जैसा व्यक्तित्व दिखायी नहीं पड़ता, न महावीर जैसा व्यक्तित्व दिखायी पड़ता है। नारद ऐसे सुलझे हुए मालूम नहीं होते जैसे बुद्ध सुलझे हुए मालूम होते हैं। नारद बड़े उलझे मालूम होते हैं। कथाएं कहे चली जाती हैं कि पृथ्वी और स्वर्ग के बीच में न केवल खुद उलझे हैं, दूसरों को भी उलझाते रहते हैं।
नारद का व्यक्तित्व साफ-साफ नहीं है। बुद्ध साफ-साफ उस पार हैं, समझ में आते हैं। नारद न इस पार न उस पार, कहीं बीच में डोलते हैं।
कितनी कथाएं हैं! नारद स्वर्ग जा रहे हैं, बैकुंठ जा रहे हैं, बैकुंठ से जमीन पर आ रहे हैं-दो लोकों के बीच में! मेरे लिए उतना ही इंगित है कि दो किनारों के बीच में...!
व्यक्तित्व बड़ा उलझा हुआ मालूम पड़ता है। एक ही किनारे पर इतनी उलझन है। दो संसारों के बीच में जो जिये-एक पैर यहां रखे, एक बैकुंठ में रखे-उसकी उलझन तुम समझ सकते हो। लेकिन वही मेरे लिए परम संन्यास का रूप है, जो दो अतियों के बीच अपने को संभाल ले।
एक किनारे पर बस गये, वह भी कोई सुलझाव, सुलझाव हुआ? या दूसरे किनारे पर हट गये, वह भी कोई सुलझाव, सुलझाव हुआ? सेतु बनना चाहिए, जिस पर दोनों किनारे जुड़ जाएं।
नारद सेतु हैं। इस तरफ से देखो तो बिलकुल संसारी हैं! और उस तरफ से तुम देख न सकोगे; उस तरफ से मैं देख रहा हूं। उस तरफ से देखो तो परम वीतराग हैं।
इसी तरफ से देखा गया है। इसी किनारे पर खड़े हुए लोग देखते हैं कि यह सेतु तो यहीं जुड़ा है, इसी किनारे पर जुड़ा है, दूसरा किनारा तो दिखायी नहीं पड़ता।
तो नारद संसार से जुड़े मालूम पड़ते हैं, सांसारिक मालूम पड़ते हैं। उनके आसपास रची गयी कथाएं इस किनारे के लोगों ने रची हैं। मैं तुमसे उस किनारे से कह रहा हूं कि नारद सेतु हैं।
नारद बड़े अनूठे रहस्यपूर्ण व्यक्ति हैं। उनका अनूठापन यही है, उनकी अद्वितीयता यही है कि वे एकतरफा नहीं हैं, एकांगी नहीं हैं। महान समन्वय उनमें सिद्ध हुआ है।
फिर सारी कथाएं कहती हैं कि वे कुछ उलझाव का ताना-बाना बुनते रहते हैं। लोकमानस में उनकी जो प्रतीति है वह कुछ चुगलखोर जैसी है। यह भी अकारण नहीं बन गयी होगी, क्योंकि कोई भी बात बनती है तो उसके पीछे कुछ न कुछ कारण होगा। हजारों साल तक करोड़ों लोग जब ऐसी कहानियां गढ़ते रहते हैं, तो उसके पीछे कहीं न कहीं कोई सूत्रपात होगा, कहीं न कहीं कोई आधार होगा। आधार है।
जब भक्त अपने को परमात्मा के हाथ में सौंप देता है, तो ‘वह’ जो करवाये वह करता है। फिर वह यह भी नहीं कहता कि यह बात जंचती नहीं, यह करना ठीक न होगा। फिर वह असंगतियां भी करवाये तो असंगति भी करता है। छोड़ने का अर्थ ही होता है पूरा छोड़ना। फिर उसमें हिसाब नहीं रखता। वह झूठ भी बुलवाये तो भी भक्त यह नहीं कह सकता, ‘मैं न बोलूंगा।’ क्योंकि भक्त है ही नहीं। वह कहता है, ‘तेरा झूठ, तो तेरा झूठ मेरे सच से भी ज्यादा बड़ा है।’
इसे थोड़ा समझना, ‘मेरा सच भी तेरे झूठ से छोटा होगा! तेरा झूठ भी मेरे सच से बड़ा होगा! फिर तू करवा रहा है तो जरूर कोई कारण होगा। फिर तू ही जान, यह हिसाब कौन रखे!’
तो नारद के व्यक्तित्व में संगति नहीं है। यहां कि बात वहां कह रहे हैं, बढ़ा-चढ़ाकर कह रहे हैं, कभी घटाकर कह रहे हैं, कभी जोड़कर कह रहे हैं। इसलिए स्वभावतः लोकमानस को यह लगता है कि यह व्यक्ति और मुक्त! तो थोड़ी अड़चन मालूम होती है।
मुक्त के संबंध में हमारी धारणाएं हैं कुछ; नारद सब धारणाओं को तोड़ देते हैं, क्योंकि नारद अपने को सब भांति समर्पित कर देते हैं। परमात्मा की इस विराट लीला में, इस बड़े खेल में, इस बड़े नाटक में, वे अपना कोई व्यक्तित्व लेकर नहीं चलते, वे ‘वह’ जो करवाता है करते हैं। इतना ही इंगित है। ‘वह’ अगर झूठ भी बुलवाये तो झूठ भी बोल देते हैं। लेकिन नारद ने झूठ नहीं बोला है; परमात्मा की लीला के अंश हो गये हैं!
इस बात को लोकमानस न समझ पाये, यह भी स्वाभाविक है। लेकिन इतना बड़ा सूत्र, इतना बड़ा नाटक चलता हो तो उसमें नारद जैसे व्यक्तित्व की भी जरूरत है। वह भी कोई कमी पूरी करता है। नारद के बिना कथाएं अधूरी रह जाएंगी। नारद के बिना नाटक सूना-सूना होगा। नारद कुछ महत्वपूर्ण सूत्र का काम पूरा करते हैं।
पर नारद के व्यक्तित्व की बात इतनी ही है कि उन्होंने छोड़ दिया है, ‘वह’ जो करवाये!
उनका रूप जो लोकमानस में है वह यह है कि वे अपना एकतारा लिये इस लोक से उस लोक के बीच डोलते रहते हैं। उनका वाद्य उनके साथ है। उनका संगीत उनके साथ है। उनके भीतर की संगीतपूर्ण दशा उनके साथ है।
ज्यादा कुछ उनके संबंध में कहा नहीं जा सकता; कहने की कोई जरूरत भी नहीं है। उनका एकतारा ही उनका प्रतीक है। भीतर उनके एक ही स्वर बज रहा है, वह भक्ति का है; एक ही स्वर बज रहा है, वह समर्पण का है; एक ही स्वर बज रहा है, वह श्रद्धा का है। फिर परमात्मा जो कराये, जो ‘उसकी’ मर्जी।
नारद की अपनी कोई मर्जी नहीं है। अपने व्यक्तित्व को बनाने में भी उनकी कोई आचरणगत धारणा नहीं है। महावीर की मर्जी है; वे पैर भी फूंक-फूंककर रखते हैं; उनके पास एक आचरण है। बुद्ध की मर्जी है, एक शील है; नारद के पास अपना उतना भी दावा नहीं है।
इसलिए अगर तुम मुझसे पूछते हो तो मैं तुमसे कहता हूं कि यही परम मुक्ति है।

-ओशो
भक्ति-सूत्र
प्रवचन नं. 10 से संकलित
(पूरा प्रवचन एम.पी.थ्री. पर भी उपलब्ध है)