Osho World Online Hindi Magazine :: July 2012
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गुरु एक संगम है

गुरु चैतन्य की मूर्ति निखारता है - बड़ा नाजुक है। और नाजुकता यही है कि गुरु को विपरीत काम करने पड़ते हैं। एक तरफ तुम घबड़ाकर गिर ही न जाओ, दूसरी तरफ तुम कहीं इतने आश्वस्त भी न हो जाओ कि तुम जो हो वही रह जाओ!

यूं तुझको अख्तियार है तासीर दे न दे
दस्ते-दुआ हम आज उठाए हुए तो हैं
अपने हाथ हमने प्रार्थना में उठाए हुए हैं, अब तेरी मर्जी

यह हाथ उठाना आदमी एकदम से परमात्मा के सामने नहीं कर सकता, क्योंकि परमात्मा का हमें कोई पता नहीं। कहां है? किस दिशा में है? कौन है? कैसे पुकारें ? क्या है उसका नाम? क्या कहें? कौन-सी भाषा वह समझता है? गुरु के पास आसान है। वहां से हम जीवन का क, ख, ग सीखते हैं। वहां से हम परमात्मा की पहली सीढ़ी लगातें हैं। वह पहला पायदान है। क्योंकि गुरु हमारे जैसा है भी और हमारे जैसा नही भी है। कुछ-कुछ हमारे जैसा है और कुछ-कुछ हमसे पार। कुछ-कुछ हमारे-जैसा है और कुछ-कुछ परमात्मा जैसा है। गुरु एक अद्भुत संगम है, जहां आदमी और परमात्मा का मिलन हुआ है।

जहां तक हमारे जैसा है वहां तक तो हम उससे बोल सकते हैं। वहां तक तो हम कह सकते हैं। वहां तक तो वह हमें समझेगा। और जहां वह हमारे जैसा नहीं है, वहां से उसकी क्षमा आयेगी। यही गुरु का चमत्कार है। यही गुरु की महिमा है। है मनुष्य, ठीक तुम्हारे जैसा। ऐसे ही हाथ-पैर, ऐसा ही मुंह, ऐसी ही जरूरतें - भोजन, भूख-प्यास, सर्दी-गर्मी, जन्म-मृत्यु - सब तुम्हारे जैसा है। वहीं से गुजरा है, उन्ही राहों से गुजरा है, जहां तुम गुजर रहे। उन्हीं अंधेरों में से टटोल-टटोलकर मार्ग बनाया है उसने, जहां तुम टटोल रहे। वह तुम्हें समझ सकेगा, क्योंकि तुम उसकी ही अतीत-कथा हो। तुम उसी की आत्मकथा हो। जहां वह कल था, वहां तुम आज हो। और जहां वह आज है, वहां तुम कल हो सकते हो।

परमात्मा बहुत दूर है। गुरु पास भी, और दूर भी। परमात्मा तक सेतु फैलाना बड़ा कठिन है। आदमी की सामर्थ्य के बाहर है। तुम कहते तो हो परमात्मा शब्द, लेकिन कोई भाव उठता है भीतर? कुछ भाव नहीं उठता। जब तक तुम किसी मनुष्य में परमात्मा की झलक न पाओगे, तब तक तुम्हारे परमात्मा शब्द में कोई प्राण न होंगे। गुरु परमात्मा शब्द को सप्राण करता है। तो तुम्हारे जैसा है, इसलिए तुम जो कहोगे, समझेगा। समझेगा कि चोरी का मन हो गया था। दस हजार रूपये पड़े थे रास्ते के किनारे, कोई देखने वाला न था, उठा लेने का मन हो गया था। वह कहेगा, बहुत बार मेरा भी हुआ है ऐसा। कुछ चिंता न करो। कुछ घबड़ाने की बात नहीं। मैं, मंै उसके पार आ गया। तुम भी आ जाओगे। सभी को होता है। स्वाभाविक है। मानवीय है।

तुम्हारे जैसा है गुरु, तुम्हारी भाषा समझेगा। और ठीक तुम्हारे जैसा भी नहीं कि निंदा करे, कि तुम्हारे रोग में रस ले, कुतूहल करे, कि खोदकर-खोदकर, कुरेद-कुरेदकर तुम्हारे भीतर छिपे हुए, रहस्यों को चेष्टा कर-करके जाने। न, गुरु तो सिर्फ निष्क्रिय भाव से, शांत-भाव से सुन लेता है तुम जो कहते हो। और तुम्हें आश्वासन दे देता है।

यह आश्वासन शब्द का उतना नहीं है जितना उसके सत्व का है। अपने अस्तित्व से, अपनी उपस्थिति से तुम्हें आश्वासन दे देता है। तुम्हारे हाथ को हाथ में ले लेता है। या तुम्हारे सिर पर अपना हाथ रख देता है। और तुम अनुभव कर लेते हो कि उसने क्षमा कर दिया। और अगर उसने क्षमा कर दिया तो परमात्मा निश्चित क्षमा कर देगा। जब गुरु तक क्षमा करने में समर्थ है, तो परमात्मा की तो बात ही क्या कहनी!

यूं तुझको अख्तियार है तासीर दे न दे
दस्ते -दुआ हम आज उठाए हुए तो हैं
गुरु खोज लेना साधक के लिए पहली अनिवार्य बात है।
जीवन पाया पर जीवन में क्या
दो क्षण सुख के बीत सके?
मन छलने वाले मिले बहुत पर
क्या मिल मन के मीत सके?

मन के मीत मिल जाए, तो गुरु मिला। शरीर से मित्रता रखने वाले बहुत मिल जाएंगे। शरीर का उपयोग करने वाले बहुत मिल जाएंगे। तुम्हारा साधन की तरह उपयोग करने वाले बहुत मिल जाएंगे। तुम्हारे साध्य की तुम्हें जो याद दिलाए, जब वह मिल जाएं, तो मन का मीत मिला। गुरु मित्र है।

बुद्ध ने तो कहा है, कि मेरा जो आनेवाला अवतार होगा, उसका नाम होगा मैत्रेय। मित्र। गुरु सदा से निकटतम मित्र है। कल्याण-मित्र। तुम से कुछ चाहता नहीं। उसकी चाह जा चुकी। वह अचाह हुआ। तुम्हारा कोई उपयोग करने का प्रयोजन नहीं। उसे कुछ उपयोग करने को बचा नहीं। जो पाना था, पा लिया। वह अपने घर आ गया। वह तुम्हारी सीढ़ी न बनायेगा। वह तुम्हारे कंधे पर न चढ़ेगा। प्रयोजन नहीं। जो देखना था, देख लिया; जो होना था, हो लिया। सब तरह तृप्त। ऐसा कोई व्यक्ति मिल जाए, तो सौभाग्य है! ऐसे व्यक्ति की छाया फिर छोड़ना मत। फिर बना लेना अपना घोसला उसी की छाया में। फिर करना विश्राम वहीं खोल देना अपने ह्दय को पूरा। निशल्य हो जाओगे तुम। मन में कोई शल्य नहीं रह जाता। लेकिन लोग बड़े उलटे है हैं। लोग गुरु से बचते हैं। और उनको पकड़ लेते हैं जो गुरु नहीं हैं। क्योंकि जो गुरु नहीं हैं। उनसे तुम्हें कुछ खतरा नहीं है। जो गुरु नहीं है वे तुम्हें मिटायेंगे नहीं - तुम्हें सूली भी न देंगे, तुम्हें सिंहासन भी न देंगे,वे तुम्हारी मृत्यु भी न बनेंगे। उनके पास तुम झूठी सांत्वनाएं लेकर घर आ सकते हो। सत्य तो वहां न मिलेगा। सत्य तो महंगा है। उसके लिए तो प्राणों से कीमत चुकानी पड़ेती है। सांत्वना मिलेगी, लेकिन सांत्वना बड़ी सस्ती है।

आईने से बिगड़ के बैठ गये
जिनकी सूरत जिन्हें दिखायी गयी

गुरु से तो लोग नाराज हो जाते हैं। क्योंकि गुरु तो दर्पण है तुम्हारी सूरत तुम्हारे सामने आ जाएगी।

आईने से बिगड़ के बैठ गये
जिनकी सूरत जिन्हें दिखायी गयी

तो गुरु का काम तो बड़ा कठिन है। उसे तुम्हें तुम्हारी सूरत से मुक्त भी करना है तुम जैसे हो वह बताना है, और तुम जैसे हो सको उस तरफ ले जाना है। और तुम्हारी निंदा भी हो जाए, तुम्हारा आत्मविश्वास भी खो न जाए, तुम्हारी प्रतिमा भी खंडित न हो जाए, बड़ा नाजुक काम है। तुम्हें संभालना भी है, तुम्हें गिरने भी नहीं देना है, और तुम्हें संभालना भी ऐसे है कि तुम्हें ऐसा न लगने लगे कि कोई जबर्दस्ती संभाल रहा है। कहीं तुम्हें ऐसा न लगने लगे कि तुम्हारी स्वतंत्रता खोये जा रही है, तुम गिरने की स्वतंत्रता खोये दे रहे हो।

तो गुरु का काम इस जगत में सबसे नाजुक काम है। मूर्तिकार पत्थर की मूर्ति खोदते हैं, चित्रकार कैनवस पर चित्र बनाते हैं, कवि शब्दों को जमाते हैं, संवारते हैं, गुरु चैतन्य की मूर्ति निखारता है--बड़ा नाजुक है। और नाजुकता यही है कि गुरु को विपरीत काम करने पड़ते हैं। एक तरफ तुम घबड़ाकर गिर ही न जाओ, दूसरी तरफ तुम कहीं इतने आश्वस्त भी न हो जाओ कि तुम जो हो वही रह जाओ!

तुम्हारे बीज को तोड़ना भी है। तुम जैसे हो उसे बदलना भी है, लेकिन तुम्हें कोई चोट न पड़े, हिंसा न हो जाए। तुम्हें कहीं ऐसा न लगने लगे कि यह बंधन हो गया, परतंत्रता हो गयी, यह तो कारागृह हो गया। स्वेच्छा से, स्वतंत्रता से तुम्हारे जीवन में अनुशासन आये। यही जटिलता है। थोपा न जाए, आये। गुरु के प्रेम में आये, गुरु की उपस्थित में आये। गुरु के आदेश से न आये, बस उनके उपदेश से आये। वह तुम्हें आज्ञा न दे। कोई गुरु आज्ञा नहीं देता। जो आज्ञा देते हैं वे गुरु नहीं है। गुरु तो सिर्फ कहता है, निवेदन करता है। सुझाव ज्यादा से ज्यादा, आज्ञा नहीं।
तुम्हारी स्वंतत्रता भी बचानी है और तुम्हारी सत्य की यात्रा को भी पूरा करना है।

-ओशो
जिन सूत्र भागः दो
प्रवचन नं. 13 से संकलित
(पूरा प्रवचन एम.पी.थ्री. पर भी उपलब्ध है)