Osho World Online Hindi Magazine :: July 2012
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गुरु पूर्णिमा विशेष
आषाढ़-पूर्णिमा
ये मेघ साहसिक सैलानी


फिर घिर आए हैं आषाढ़ के बादल-चांद भी आया है। चांद तो सदा है, आषाढ़ के बादल केवल आषाढ़ में आते हैं और आषाढ़ भी कभी-कभी आता हैं। यद्यपि नियमित आता है। ऐसा ही कुछ गुरु-शिष्य का मिलन है।

गुरु की उपस्थिति चांद जैसी है। गुरु उपस्थित है, जैसे चांद उपस्थित है। बादल उमड़-घुमड़ कर आ रहे हैं, शिष्य भी सभी दिशाओं से उमड़-घुमड़ कर आ रहे हैं। यह संगम बहुत आर्द्र है। यह सम्मिलन बहुत भावभीना है। यह सत्संग अमृत की वर्षा लिए है, आनंद के आंसू लिए है। कहीं कुछ कंजूसी नहीं है। बाढ़ आयी है करूणा की-और ह्दय-घट सर्वथा सीधे और खुलें हैं मस्ती का पारावार नहीं रहा।

यह दर्शकों की बात नहीं है। चांदनी के आनंद में भीगना साहसी प्रेमी शिष्यों की पात्रता है। और जो शिष्य होकर सदगुरु के आनंद में भीगता है वही बरसता है मेघ बनकर।

ये मेघ साहसिक सैलानी!
ये तरल वाष्प से लदे हुए
द्रुत सासों से लालसा-भरे,
ये ढीठ समीरण के झोंके;
कंटकित हुए रोएं तन के
किन अदृश्य करों से आलोड़ित
स्मृति-शैफाली के फूल झरे!

सदगुरु के सत्संग में आत्म-स्मरण, आत्म-रमण करने ये विश्व भर से साहसी सैलानी आये हैं।

झर-झर झर-झर
अप्रतिहत स्वर
जीवन की गति आनी-जानी!
झर-
दूर आड़ में झुरमुर की
चातक की करूण कथा बिखरी
चमकी टिटीहरी की गुहार
झाऊ की सांसों में सिहरी;
मिलकर सहसा सहमीं ठिठकीं
ये चकित मृगी की आंखड़ियां-
झर! सहसा दर्शन से झंकृत
इस अल्हड़ मानस की कड़ियां!

इस परम चन्द्र की उपस्थित में, उसकी चांदनी के परस से अमृत-आलोक चहुं ओर झर रहा है और उसके दर्शन से अल्हड़ मानस की कड़िया ही नहीं, अनगिनत हृत्तत्रियां झंकृत हैं।

झर-
अंतरिक्ष की कौली भर
मतियाया-सा भूरा पानी
थिगलियां-भरे-छीजे आंचल-सी
ज्यों-त्यों बिछी धरा धानी,
हम कुंज-कुंज यमुना तीरे
बढ़ चले अटपटे पैरों से
छिन लता-युग्म, छिन वानी रे
झर-झर झर झर
द्रुत मन्द्र-स्वर
आये दल-बल ले अभिमानी
ये मेघ साहसिक सैलानी !

यह अभिमान नहीं अहं का-यह समग्र के साथ होने की अलमस्ती है। यह तो रास है वसंत का आषाढ़ में -यह तो उसकी नजर से नजर मिलाने का वसंत है, मधुमास है।

स्नेह भरे बादलों से
व्योम छा गया
जगो, जागो,
जगो सखि, वंसत आ गया! जागो!

मलय का झोंका बुला गया
खेलते से स्पर्श से
व’, रोम-रोम को कंपा गया-
जागो, जागो,
जागो सखि, वसंत आ गया! जागो!

होगा यह मास आषाढ़ का, लेकिन उससे क्या! यह तो सदगुरु की उपस्थिति में खिले शिष्य-प्रसूनों का वसंत है और सन्देश है पूरी जगती के लिएः जागो सखि, वसंत आ गया! जागो!

पीपल की सूखी खाल स्निग्ध हो चली
सिरिस ने रेशम से वेणी बांध ली
नीम के भी बोर में मिठास देख
हंस उठी है कंचनार की कली
टेसुओं की आरती सजा के
बन गयी वधू वनस्थली।

स्नेह भरे बादलों से
व्योम छा गया,
जागो, जागो,
जागो सखि, वसंत आ गया! जागो!

चेति उठी ढीली देह में लहू की धार
बेंध गयी मानस को दूर की पुकार
गूंज उठा दिग्दिगंत
चीन्ह के दुख वह स्वर बार-बार
"सुनो सखि! सुनो बंधु!
प्यार ही में यौवन है यौवन में प्यार।"

आज मधु-दूत निजगीत गा गया
जागो, जागो,
जागो सखि, वसंत आ गया! जागो!

दे दो निमंत्रण पूरे जग को। कह दो उनसे, मित्र क्यों सोते हो ? मधुदूतो! गा दो अपने गीत उनके सामने । मधुशाला खुली है यहां अमृत की, जागो और आओ। अनेक कानों में मधुमंत्र फूंक दो। वे आ जाएंगे।

-स्वामी चैतन्य कीर्ति