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ओशो कथा-सागर
अहंकार को संतुष्टि नहीं...

अहंकार बड़े आश्वासन देता है, पूरे कभी नहीं करता, कर सकता नहीं। अहंकार बिल्कुल नपुसंक है
मैंने एक कहानी सुनी है...

एक आदमी को शिव की पूजा करते-करते और रोज शिव का सिर खाते-खाते.... क्योंकि पूजा और क्या है, सिवाय सिर खाने के। एक ही धुन, एक ही रट कि हे प्रभू , कुछ ऐसी चीज दे दो कि जिंदगी में मजा आ जाए। एक ही बार मांगता हूं। मगर देना कुछ ऐसा कि फिर मांगने को कुछ रह न जाए। परेशानी में, हैरान होकर, क्योंकि सुबह देंखे न सांझ यह आदमी, न देखे रात, जब उठे तभी, आधी रात शिव के पीछे पड़ जाए। आखिर इसे वरदान में शंख शिव ने उठा कर दे दिया, जो उन्हीं के पूजा-स्थल में इसने रख छोड़ा था। और इससे कहा कि इस शंख की आज से यह खूबी है कि तुम इससे जो मांगोगे, तुम्हें देगा। अब तुम्हें कुछ आकर परेशान होने की जरूरत नहीं और पूजा प्रार्थना की जरूरत नहीं। अब मुझे छुट्टी दो। जो तुम्हें चाहिए, अब इससे ही मांग लेना। यह तुम्हें तत्क्षण देगा। तुमने मांगा और मौजूद हुआ।

उसने मांग कर देखा, जो मांगा, कि बन जाए एक महल, बन गया एक महल, कि बरस जाएं सोने के रुपये, और सोने के रुपये बरस गए। धन्यभाग हो गया। शिव न भी कहते तो भी भूल जाता। भूल-भाल गया, शिव कहां गए, क्या हुआ, उन बेचारों पर क्या गुजरी, इस सब की कोई फिकर भी न रही। फिर न कोई पूजा थी, न कोई पाठ। फिर तो यह शंख था और जो चाहिए।

लेकिन एक मुसीबत हो गई। एक महात्मा इसके महल में मेहमान हुए। महात्मा के पास भी एक शंख था। इसके पास जो शंख था बिल्कुल वैसा, लेकिन दो गुना बड़ा। और महात्मा उसे बड़े सम्हाल कर रखते थे। उनके पास कुछ और न था। उनकी झोली में बस एक बड़ा शंख था। इसने पूछा कि आप इस शंख को इतना सम्हाल कर क्यों रखते है ?

उन्होंने कहाः यह कोई साधारण शंख नहीं, महाशंख है। मांगो एक, देता है दो। कहो, बना दो एक महल! दो महल बनाता है। एक की तो बात ही नहीं। हमेशा!

उस आदमी को लालच उठा। उसने कहाः यह तो बड़े गजब की बात है। उसने कहाः एक शंख तो मेरे पास भी है, मगर छोटा-मोटा। आपने नाहक मुझे दीन-दुखी बना दिया। मैं गरीब आदमी हो गया। जरा देखूं चमत्कार आपके शंख के !

उन्होंने कहाः इसका चमत्कार देखना बड़ा मुश्किल है। रात के सन्नाटे में जब सब सो जाते हैं, तब निश्चित मुर्हुत में, अर्धरात्रि के सन्नाटे में इससे कुछ मांगने का नियम है। तुम जागते रहना और सुन लेना।

महात्मा ने शंख से ठीक अर्धरात्रि में कहाः दे दे कोहिनूर। उसने कहाः एक नहीं दूंगा, दो दूंगा। महात्मा ने कहाः भला सही दो दे दे। उसने कहाः दो नहीं, चार। किससे बात कर रहे हो, कुछ होश से बात करो ! महात्मा ने कहाः भई, चार ही दे दे। वह महाशंख बोलाः अब आठ दूंगा।

उस आदमी ने सुना, उसने कहाः हद हो गई। हम भी कहां का गरीब शंख लिए बैठे है! महात्मा के पैर पकड़ लिए। आप तो महात्मा हैं, त्यागी-व्रती हैं। इस गरीब का शंख आप ले लो, यह महाशंख मुझे दे दो।

महात्मा ने कहाः जैसी तुम्हारी मर्जी। हम तो इससे छुटकारा पाना ही चाहते थे। क्योंकि इस बेईमान ने हमें परेशान कर रखा है। मांगो कुछ, बकवास इतनी होती है, रात-रात गुजर जाती है।

फिर भी वह न समझा कि मामला क्या है, कि वह सिर्फ महाशंख था, वह सिर्फ बातचीत ही करता था, देता-वेता कुछ भी नहीं था। हमेशा संख्या दोहरी कर देता था। तुम कहो चार, तो वह कहे आठ, तो वह कहे सोलह। तुम कहो सोलह सही, तो वह कहे बत्तीस। तुम बोले संख्या कि उसने दो का गुणा किया। बस उसको दो गुणा करना याद था। और उसे कुछ नहीं आता था।

महात्मा तो सुबह चले गए। जब इसने उस शंख से दूसरी रात्रि ठीक मुहुर्त में कुछ मांगा, तो उसने कहाः अरे नालायक! क्या मांगता है एक? दूंगा दो। उसने कहाः भई, दो दे दो। उसने कहाः दूंगा चार। चार ही दे दो। उसने कहाः दूंगा आठ। सुबह होने लगी। संख्या लंबी होने लगी। मोहल्ले के लोग इकटठे हो गए कि यह क्या हो रहा है ? सारा मोहल्ला जग गया कि मामला क्या है ? संख्या बढ़ती जाती है, लेना देना कुछ भी नहीं। आखिर उस आदमी ने पूछाः भई दोगे भी कुछ कि बस बातचीत ही बातचीत ?

उसने कहाः हम तो महाशंख हैं। हम तो गणित जानते हैं। तुम मांग कर देखो। तुम जो भी मांगों, हम दोगना कर देंगे।

इसने कहाः मारे गए। वह महात्मा कहां है ?

उसने कहाः वह महात्मा हमसे छुटकारा पाना चाहता था बहुत दिन से। मगर वह इस तलाश में था कि कोई असली चीज मिल जाए। वह ले गया असली चीज। अब ढूंढे से न मिलेगा। हम मिला दे सकते हैं।

पैर तो नहीं थे शंख के, मगर फिर भी पैरों को पकड़ कर सिर रख कर कहा कि किसी भी तरह महात्मा से मिला दो। कहाः दो से मिलाएंगे। हद हो गई। नालायक से पाला पड़ गया। चार से मिलाएंगे। फिर वही बकवास। दो-चार दिन में उस आदमी को पागल कर दिया। शंख उससे पूछे कि अरे कुछ मांग। वह आदमी इधर-उधर देखे कि कुछ बोले कि यह दुष्ट, फंसाया इसने चक्कर में। बोले कि फंसे। फिर उससे छूटना मुश्किल। फिर पीछा करता है - कि बत्तीस लेगा? चौसठ लेगा? लेना-देना बिलकुल कुछ होता ही नहीं।

ध्यान और अहंकार के बीच वही संबंध है। अहंकार महाशंख है। कितना ही मिल जाए, और चाहिए। सख्या बढ़ती जाती है। दौड़ बढ़ती जाती है। और आदमी कभी उस जगह नहीं पहुंचता, जहां वह कह सके-आ गई मंजिल। मंजिल हमेशा मृग-मरीचिका बनी रहती है। दूर की दूर। यात्रा बहुत, पहुँचना कहीं भी नहीं। मगर दौड़-धाप बहुत होती है। और चूंकि सारी दुनिया यह दौड़-धाप कर रही है, इसलिए संघर्ष भी बहुत है। और यह भी मानने का मन नहीं होता कि इतने सारे लोग गलत होंगे। ध्यान के लिए तो कोई कभी बैठता है।

-ओशो
कोंपले फिर फूट आई
प्रवचन नं 12 से संकलित
(पूरा प्रवचन एम. पी. थ्री. पर भी उपलब्ध है।)