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रहस्यदर्शियों पर ओशो
पलटूदास

संत तो पक्षियों जैसे होते हैं। आकाश पर उड़ते जरूर हैं, लेकिन पदचिन्ह नहीं छोड़ जाते

अजहूं चेत गंवार! नासमझ! अब भी चेते! ऐसे भी बहुत देर हो गई। जितनी न होनी थी, ऐसे भी उतनी देर हो गई। फिर भी, सुबह का भूला सांझ घर आ जाए तो भूला नहीं।

अजहूं चेत गंवार! अब भी जाग! अब भी होश को संभाल!

ये प्यारे पद एक अपूर्व संत के हैं। डुबकी मारी तो बहुत हीरे तुम खोज पाओगे। पलटूदास के संबंध में बहुत ज्यादा ज्ञात नहीं है। संत तो पक्षियों जैसे होते हैं। आकाश पर उड़ते जरूर हैं, लेकिन पदचिन्ह नहीं छोड़ जाते। संतों के संबंध में बहुत कुछ ज्ञात नहीं है। संत का होना ही अज्ञात होना है। अनाम। संत का जीवन अंतर्जीवन है। बाहर के जीवन के तो परिणाम होते हैं इतिहास पर, इतिवृत्त बनता है। घटनाएं घटती हैं बाहर के जीवन की। भीतर के जीवन की तो कहीं कोई रेख भी नहीं पड़ती। भीतर के जीवन की समय की रेत पर कोई अंकन नहीं होता। भीतर का जीवन तो शाश्वत, सनातन, समयातीत जीवन है। जो भीतर जीते हैं उन्हें तो वे ही पहचान पाएंगे जो भीतर जाएंगे। इसलिए सिंकदरों, हिटलरों, चंगीज और नादिरशाह, इनका तो पूरा इतिवृत मिल जाएगा, इनका तो पूरा इतिहास मिल जाएगा। इनके भीतर का तो कोई जीवन होता नहीं, बाहर ही बाहर का जीवन होता है; सभी को दिखाई पड़ता है।

राजनीतिज्ञ का जीवन बाहर का जीवन होता हैं; धार्मिक का जीवन भीतर का जीवन होता है। उतरी गहरी आंखें तो बहुत कम लोगों के पास होती हैं कि उसे देखें; वह तो अदृश्य और सूक्ष्म है।

अगर बाहर का हम हिसाब रखें तो संतों ने कुछ भी नहीं किया। तो, तो सारा काम असंतो ने ही किया है दुनिया में। असल में कृत्य ही असंत से निकलता है। संत के पास तो कोई कृत्य नहीं होता। संत का तो कर्ता ही नहीं होता तो कृत्य कैसे होगा? संत तो परमात्मा में जीता है। संत तो अपने को मिटा कर जीता है - आपा मेट कर जीता है। संत को पता ही नहीं होता कि उसने कुछ किया, कि उससे कुछ हुआ, कि उससे कुछ हो सकता है। संत होता ही नहीं। तो न तो संत के कृत्य की कोई छाया पड़ती है और न ही संत के कर्ता का कोई भाव कहीं निशान छोड़ जाता है।

पलटूदास बिल्कुल ही अज्ञात संत हैं। इनके संबंध में बड़ी में बड़ी थोड़ी-सी बातें ज्ञात हैं - उंगलियों पर गिनी जा सकें। एक-उनके ही वचनों से पता चलता है गुरु के नाम का। गोंविद उनके गुरु थे। गोंविद संत भीखा के शिष्य थे, एक परम संत के शिष्य थे। और गोंविद उनके गुरु थें

संतों ने अपने बाबत चाहे कुछ भी न कहा हो, लेकिन गुरु का स्मरण किया है, जरूर किया है। अपने को तो मिटा डाला है, लेकिन गुरु में हो गए। अपने को पोंछ डाला, सब तरह से अपने को समाप्त कर लिया। उसी समाप्ति में गुरु से तो संबंध जुड़ता है। और परमात्मा की याद की है, लेकिन गुरु की याद को नहीं भूले हैं। क्योंकि परमात्मा से जिसने जुड़ाया उसे कैसे भूल जाएंगे!

...तो गोंविद उनके गुरु थे, यह बात ज्ञात है। दूसरी बात, जो उनके पदों से ज्ञात होती है, वह यह कि वे वणिक थे, वैश्य थे, बनिया थे। वह भी इसलिए ज्ञात होती है कि वैश्य की भाषा का उपयोग किया है। जैसे कबीर जुलाहे थे तो कबीर के पदों में जुलाहे की भाषा का उपयोग है। स्वाभाविक। झीनी-झीनी बीनी रे चदरिया! अब यह कोई दूसरा नहीं लिखेगा, जिसने चदरिया कभी बीनी ही न हो। यह दूसरा नहीं लिख सकता। गोरा कुम्हार लिखेगा तो वह मटके बनाने की बात लिखता है। ऐसे इनके पदों में इनके वणिक होने का प्रमाण मिलता है। बड़ी मस्ती की बात कही है। कहा है कि ‘मैं राम का मोदी’-राम का बनिया; राम को बेचता हूं! छोटी-मोटी दुकान नहीं करता।

-ओशो
अजहूं चेत गंवार
प्रवचन नं. 1 से संकलित