Osho World Online Hindi Magazine :: July 2012
www.oshoworld.com
 
समाचार पत्रों में ओशो-वाणी
एक पत्ती वृक्ष में हिल रही है...

''एक पत्ती वृक्ष में हिल रही है, क्या उससे ज्यादा आपका होना है? देखें जीवन को, देखें दूर तक फैले आकाश को, करोड़-करोड़ सूर्यों को, करोड़-करोड़ सूर्यों के फासले को, देखें इस विराट ब्रह्मांड को, सोचें इस छोटी-सी पृथ्वी को, उस पर छोटे से अपने होने को। इसके प्रति जागें। तो क्या पता चलेगा? पता चलेगा कि मैं तो कुछ भी नहीं हूं यह सब होने में, एक सागर की बूंद भी जैसा मेरा होना नहीं है। और तब, तब अहंकार क्षीण होगा और विलीन हो जाएगा। और सरलता पैदा होगी।'' 1 मई को जयपुर से हिंदी समाचार पत्र 'कामयाब कलम' ने ओशोवाणी स्तंभ में 'अहंकार जाए तो सरलता आए' शीर्षक के साथ ओशो-प्रवचनों का एक लेख प्रकाशित किया।

मई के महीने में, बुद्ध पूर्णिमा के उपलक्ष्य में अनेक राज्यों के हिंदी तथा अंग्रेजी समाचार पत्रों ने भगवान बुद्ध पर ओशो-प्रवचनों को अपने कॉलम में जगह दी। 2 मई को ''बुद्ध हमारे भीतर हैं'' शीर्षक पर दैनिक जागरण ने ओशो-प्रवचनांश दिए। नई दिल्ली से 6 मई को विराट वैभव में ''ओशो की नजर में भगवान बुद्ध का मौन' नाम के शीर्षक से प्रवचन छपा। इसी तारीख में हैदराबाद से स्वतंत्र वार्ता में 'भगवान बुद्ध पर ओशो के विचार' आए। अंग्रेजी पत्र दि टाइम्स ऑफ इंडिया ने 6 मई के संस्करण में 'ओशो स्पीक' स्तंभ छपा जिसका शीर्षक है ''यू आर योअर ओन टीचर''। 13 मई को राजधानी से आज समाज पत्र ने 'राग की आग में जल रहा संसार' शीर्षक पर ओशो-प्रवचनों को प्रकाशित किया। इसके उद्धरण में ओशो कहते हैं: ''श्रवण बड़ी कला है। आते-आते ही आती है। राग, द्वेष, मोह और तृष्णा के कारण धर्म-श्रवण नहीं हो पाता। भय के कारण धर्म-श्रवण नहीं हो पाता है। पुरानी आदतों के कारण धर्म-श्रवण नहीं हो पाता। लेकिन, सबके मूल में राग है। राग की आग के समान आग नहीं है। इसमें ही मनुष्य का बोध जल रहा है।''

3 मई को दिल्ली के हिंदी समाचार पत्र नया इंडिया ने 'मेरे शरीर का अनुशासन' नाम से प्रकाशित किय। 5 तारीख को आज समाज ने 'सक्रिय ध्यान' पर ओशो-प्रवचनों को प्रकाशित किया। साथ-ही हिंदी दैनिक राष्ट्रीय सहारा में 'ध्यान का विज्ञान' छपा। ध्यान-साधना पर अपने प्रवचनों में ओशो समझाते हैं: ''विचार चलते हैं। जब हम बोलते हैं तभी हमें पता चलता है कि हमारे भीतर क्या था, ध्यान का विज्ञान इस स्थिति को अत्यंत ऊपरी अवस्था मानता है। अगर एक आदमी न बोले तो हम पहचान भी न पाएंगे कि वह कौन है, क्या है!''

''हंसना भी है ध्यान'', इस शीर्षक के साथ 12 तारीख को राष्ट्रीय सहारा ने 'हास्य-ध्यान' पर ओशो-उद्धरणों को अपने सत्संग स्तंभ में प्रकाशित किया। 17 मई को दैनिक हिंदी अख़बार नव-भारत टाइम्स के द स्पीकिंग ट्री स्तंभ में 'और सेक्स की इस विकृति से कैसे बचाया जाए'' आया।

चंडीगढ़ से दिव्य हिमाचल ने 'सत्य एक है' प्रकाशित किया 19 तारीख को। जिसमें ओशो कहते हैं: ''सत्य के मार्ग पर वह व्यक्ति है, जिसने सारे मतों को तिलांजलि दे दी है। जिसका कोई पक्ष है और कोई मत है, सत्य उसका नहीं हो सकता। सब पक्ष मनुष्य-मन से निर्मित हैं। सत्य का कोई पक्ष नहीं है और इसलिए जो निष्पक्ष होता है, पक्ष शून्य होता है, वह सत्य की ओर जाता है और सत्य उसका हो जाता है।''

अंग्रेजी पत्र दि टाइम्स ऑफ इंडिया ने अपने 19 मई के अंक में 'फील फ्री, डांस ए लिटिल मोर' शीर्षक के साथ ओशो-प्रवचनांशों को प्रकाशित किया--''यदि मनुष्य रोज़ाना थोड़ा नृत्य करे, थोड़ा गाए, गुनगुनाए, थोड़ा हंसे - हंसाए, इन दैनिक गतिविधियों को करने से वह अपने अंदर एक नई शक्ति पैदा कर सकता है, उसके अंदर एक नया रूपांतरण आएगा।''

जून महीने की मासिक पत्रिका जागरण-सखी ने एक पूरे पृष्ठ का ओशो-प्रवचनांश प्रकाशित किया है। हेल्दी फेमिली स्पेशल स्तंभ में स्वस्थ शब्द के ही दो हिस्से करते हुए ओशो समझाते हैं: 'स्व$स्थ - स्वयं में स्थित होना।' वह स्वास्थ्य को ही सुख का आधार बताते हैं। उनके अनुसार 'स्वस्थ यानी स्वयं में स्थित' होने का यह अर्थ बिलकुल नहीं है कि आप बाकी दुनिया से अलग-थलग पड़ जाएं। इसका केवल इतना आशय है कि शेष दुनिया के सुख-साधनों से अपनी तुलना करके अहंकार और कुंठा का शिकार होना छोड़ दें।