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| ओशो दर्शन |
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| ओशो अमृत-पत्र |
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जीवन की सार्थकता के लिए स्वयं को जानो
आत्मज्ञान एकमात्र ज्ञान है। क्योंकि, जो स्वयं को ही नहीं जानते, उनके और सब कुछ जानने का मूल्य ही क्या है?
मनुष्य की सबसे बड़ी कठिनाई मनुष्य का अपने ही प्रति अज्ञान है। दीये के ही नीचे जैसे अंधेरा होता है, वैसे ही मनुष्य उस सत्ता के ही प्रति अंधकार में होता है, जो कि उसकी आत्मा है। हम स्वयं को ही नहीं जानते हैं, और तब यदि हमारा सारा जीवन ही गलत दिशाओं में चला जाता हो, तो आश्चर्य करना व्यर्थ है। आत्मज्ञान के अभाव में जीवन उस नौका की भांति है...
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| ध्यान-विधि |
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ओम्
शिव ने कहाः ओम् जैसी किसी ध्वनि का धीमे-धीमे गुंजार करो। जैसे-जैसे ध्वनि पूर्णध्वनि में प्रवेश करती है वैसे-वैसे साधक भी
‘‘ओम जैसी किसी ध्वनि का धीमे-धीमे गुंजार करो।’’ उदाहरण के लिए ओम् को लो। यह आधारभूत ध्वनियों में से एक है। अ उ और म-ये तीन ध्वनियां ओम् में सम्मिलित हैं...
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| ओशो कथा-सागर |
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अहंकार को संतुष्टि नहीं!
अहंकार बड़े आश्वासन देता है, पूरे कभी नहीं करता, कर सकता नहीं। अहंकार बिल्कुल नपुसंक है।
मैंने एक कहानी सुनी है...
एक आदमी को शिव की पूजा करते-करते और रोज शिव का सिर खाते-खाते....क्योंकि पूजा और क्या है, सिवाय सिर खाने के। एक ही धुन, एक ही रट कि हे प्रभू, कुछ ऐसी चीज दे दो कि जिंदगी में मजा आ जाए। एक ही बार मांगता हूं... |
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| ओशो का ओशनिक साहित्य |
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ज़ेन की घोषणा
स्वयं से मुक्ति
ज़ेन सदगुरुओं पर आधारित ‘ज़ेन की घोषणा स्वयं से मुक्ति’ ओशो की अंग्रेजी पुस्तक का हिंदी अनुवाद है। जिसके अनुवादक है ओशो की अंग्रेजी पुस्तकों का निरन्तर अनुवाद करने वाले स्वामी ज्ञानभेद। पुस्तक का प्रकाशन डायमंड बुक्स पब्लिकेशन ने किया है...
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| रहस्यदर्शियों पर ओशो |
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पलटूदास
संत तो पक्षियों जैसे होते हैं। आकाश पर उड़ते जरूर हैं, लेकिन पदचिन्ह नहीं छोड़ जाते
अजहूं चेत गंवार! नासमझ! अब भी चेते! ऐसे भी बहुत देर हो गई। जितनी न होनी थी, ऐसे भी उतनी देर हो गई। फिर भी, सुबह का भूला सांझ घर आ जाए तो भूला नहीं... |
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| स्वास्थ्य |
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मनुष्य की चेतना भीतर से कब स्वस्थ होती है?
ध्यान का पहला अर्थ है कि हम अपने शरीर और स्वयं के प्रति जागना शुरू करें। यह जागरण अगर बढ़ सके तो आपका मृत्यु-भय क्षीण हो जाता है। और जो चिकित्सा-शास्त्र मनुष्य को मृत्यु के भय से मुक्त नहीं कर सकता... |
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| ओशोधाम-आगामी ध्यान शिविर |
गुरु पूर्णिमा महोत्सव
3 जुलाई, 2012
संचालन - मा धर्म ज्योति और स्वामी चैतन्य कीर्ति
स्थान - ओशोधाम, नई दिल्ली
फोन - 011-25319026, 25319027
मोबाइल - 09717490340
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| टैरो-मार्ग दर्शन |
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जुलाई 2012
-मा दिव्यम नदीशा
‘‘मैं यह कहता हूं कि इसकी फिक्र ही मत करना कि पाप को हम कैसे पुण्य बनाएं, असंयम को संयम कैसे बनाएं, हिंसा को अहिंसा कैसे बनाएं, कठोरता को दया कैसे बनाएं। इस चक्कर में ही मत पड़ना। सवाल यह है ही नहीं कि हम क्रिया को कैसे बदलें, सवाल यह है कि कर्ता कैसे रूपांतरित हो। अगर कर्ता बदल जाता है तो क्रिया अनिवार्यरूपेण बदल जाती है, क्योंकि तब कुछ चीज़ें करने में असमर्थ...
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| हास्य-ध्यान |
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"आनंदित व्यक्ति में व्यक्तित्व होता है; दुखी व्यक्ति में कोई व्यक्तित्व नहीं होता। दुखी व्यक्ति भीड़ का हिस्सा होता है; आनंदित व्यक्ति व्यक्ति होता है, उसमे एक निजता होती है। और आनंदित व्यक्ति अपनी स्वतंत्रता को किसी भी मूल्य पर खोने को राजी नहीं हो सकता, क्योंकि वह जानता है उसका आनंद भी उसी क्षण खो जाएगा जिस क्षण स्वतंत्रता खोएगी।" -ओशो
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