Osho World Online Hindi Magazine :: June 2012
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आत्मा का यौवन

एक और भी जवानी जिसकी कबीर बात कर रहे हैं। एक और यौवन है जो आत्मा का है। एक और यौवन है जो परम सत्ता का है - वह शाश्वत है। वहां बाढ़ चढ़ती है और उतरती नहीं

‘तन रति करि मैं मन रति करिहुं, पंचतत बराती। रामदेव मोरे पाहुनै आए, मैं जोवन में माती।’

कबीर कहते हैं: तन को चढ़ा दूंगा, मन को चढ़ा दूंगा। तन से प्रेम करूंगा, मन से प्रेम करूंगा। ये जो पांच तत्वों के बराती हैं, ये जो पांच महातत्व हैं जिनसे शरीर बना है, ये सब चढ़ा दूंगा; जो भी मेरे पास है सब चढ़ा दूंगा।

शरीर से प्रेम, मन से प्रेम — पढ़ कर खयाल आना स्वाभाविक है कि कबीर आत्मा से प्रेम क्यों नहीं कहते? समझना जरूरी है। कबीर कहते है: तन से करूंगा प्रेम, मन से करूंगा प्रेम। ये जो पंचतत्व बराती हैं, ये जो महातत्व अब तक मुझे ले आये, इन सब को वार दूंगा तुम्हारे ऊपर, तुम्हारे चरणों में रख दूंगा।’ वे आत्मा की बात नहीं कहते है।

तुम तो जब किसी के प्रेम में पड़ते हो तो तुम कहते हो, आत्मा से प्रेम करूंगा — आत्मिक प्रेम! और कबीर केवल शरीर और मन की बात करते हैं। कारण है और कारण यह है कि आत्मा तो राम ही है। वहां तो कोई भेद नहीं है। भेद तो शरीर और मन तक ही है। जहां तक भेद है वहां तक चढ़ाया जा सकता है। जहां भेद नहीं है, वहां कैसे चढ़ाओगे? आत्मा में तो प्रेमी और प्रेयसी एक है । वहां तो राम में और राम के भक्त में रत्ती भर भी फासला नहीं है। वहां कौन करेगा प्रेम और किसको करेगा प्रेम?

तो कबीर कहते है: ‘‘जो भी मेरे पास है, वह सब चढ़ा देता हूं। अब मेरे प्रीतम आ गये — जिनकी प्रतीक्षा थी; जिनके लिए तैयारी थी; जिनके लिए इतनी लम्बी यात्रा और बारात थी! जन्मों-जन्मों की खोज पूरी हुई! दर्शन उस तत्व के जिसके लिए सारी तड़पन थी। अब मैं सब चढ़ाने को तैयार हूं।’’

‘तन रति करि मैं मन रति करहूं, पंचतत बराती। रामदेव मोरे पाहुनै आए, मैं जोवन में माती।’ और मेरे प्रीतम मेरे द्वार आये, मेरे पाहुने हुए हैं और मैं यौवन में मदमत्त हूं।

एक तो यौवन है जो शरीर से आता है, वह भी मदमत्त कर देता है। युवा व्यक्ति की बात ही और होती है बुढ़ापा तो ऐसे है जैसे बाढ़ आयी थी नदी में और जा चुकी। कभी देखी नदी बाढ़ के बाद? सब सूख-सूख गया, धारा जगह-जगह खंडित हो गयी, टूट गयी, रेत -ही-रेत का फैलाव दिखाई पड़ता है और जा चुकी नदी अपने बहाव में, कूड़ा-कर्कट, न मालूम क्या-क्या किनारे पर छोड़ गयी। सब उजाड़ लगता है। जैसे कोई घटना घटी थी और अब सब अभाव हो गया।

देखी है वर्षा में बाढ़ आई नदी? तब उसकी चाल में एक मस्ती होती है — जैसे शराब पिये हो, जैसे पैर जहां रखना चाहती हो वहां न पड़ते हों। बाढ़ में आयी नदी मदमस्त है, युवा है। ठीक वैसे ही शरीर का यौवन है। जब शरीर की शक्तियां बाढ़ में होती हैं, तब ईश्वर पर भरोसा नहीं आता; तब अपने पर ही भरोसा बहुुत मालूम होता है; तब दुनिया में किसी की चिंता करने का खयाल नहीं उठता; तब शक्ति की मदमत्तता इतनी होती है कि झुकने का सवाल नहीं, समर्पण का सवाल नहीं; तब आदमी पागल होता है, जवानी में अंधा होता है। वह क्षम्य है, क्योंकि अपने बस के बाहर है, बाढ़ से घिरा है।

शरीर का एक यौवन है, लेकिन आता है और चला जाता है। शरीर का यौवन वैसे है जैसे पहाड़ी नदियों में पानी का आना और जाना रुकता नहीं — इधर आया, उधर गया। होगा भी ऐसा, क्योंकि शरीर क्षणभंगुर है; उसकी ऊर्जा ज्यादा देर नहीं टिक सकती। यही चमत्कार है कि शरीर कुछ दिन के लिए जवान हो जाता है। यह रहस्यों का रहस्य है कि कभी-कभी बाढ़ का जल भर जाता है; उतरेगा ही। शरीर के तल पर आई हुई बाढ़ तो उतरेगी। शरीर के तल पर आई हुई रोशनी अंधेरा बनेगी। शरीर के तल पर बजा हुआ संगीत जल्दी ही शोरगुल हो जाएगा। शरीर के तल पर दिखा हुआ सौंदर्य जल्दी ही सपना बन जायेगा। शरीर में मिली थी जो झलक सरोवर की, ज्यादा देर न लगेगी, वह मरूद्यान का धोखा, भ्रान्ति हुई थी; नशे में कुछ देख लिया था जो था नहीं।

इसलिए तो बुढ़ापा इतना उदास है! कुछ था जो खो गया! जैसे सपने में रात तुमने देखा हो कि तुम सम्राट हो गये, बड़े महल हैं स्वर्ण के, बड़े दूर-दूर तक तुम्हारे राज्य की सीमाएं हैं और अचानक नींद खुल गई, सपना टूट गया! भरोसा नहीं आता अपनी दयनीय दशा पर जो अब है! अभी क्षण भर पहले इतना महान सपना था — सम्राट थे, स्वर्ण के महल थे, हजारों सेवक थे; सब खो गया!

बुढ़ापा चैंका-चैंका रहता है। उसे समझ में नहीं आता कि क्या हो गया! कहां गई वह ऊर्जा। कहां गये वे मदमत्त चरण? कहां गया वह भरोसा? कहां गया वह अहंकार? झुक गई सारी जीवन-ऊर्जा! सब तरफ खोखलापन मालूम पड़ता है, क्योंकि बूढ़ा भीतर खोखला हो गया है; अस्थिपंजर शेष रह गया है। जल्दी ही विदा का क्षण आ जायेगा। बस मौत की प्रतीक्षा है। ‘क्यू’ में खड़ा है।

एक तो जवानी है शरीर की, जो आती है और चली जाती है। जिसने उस पर भरोसा किया, वह धोखा खाएगा; क्योंकि उस पर भरोसा करो या न करो, उसका जाना निश्चित है। जितनी देर भरोसा करोगे, उतनी देर धोखे में रहोगे और जब टूट जायेगा धोखा तो विषाद से भर जाओगे।

जवानी जवानी में ही नहीं सताती, बुढ़ापे में भी सताती है; जवानी में होने के कारण सताती है, बुढ़ापे में न होने के कारण सताती है। रह-रह के मन, लौट-लौट के वहीं जाता है।

एक और भी जवानी जिसकी कबीर बात कर रहे हैं। एक और यौवन है जो आत्मा का है। एक और यौवन है जो परम सत्ता का है — वह शाश्वत है। वहां बाढ़ चढ़ती है और उतरती नहीं। वहां जो है, ठीक वैसा ही सदा है। वहां परिवर्तन नहीं, शाश्वतता है। उसकी मस्ती अलग है! और मस्ती इतनी अलग है कि तुम अपनी मस्ती से उसके संबंध में कुछ भी सोचोगे तो गलत होगा। अलग ही नहीं, विपरीत है। भिन्न ही नहीं, बिलकुल विरोधी है।

शरीर के साथ जवानी की जो मदमत्तता है, जो बेहोशी है, वह ठीक शराब जैसी है; वह बेहोशी की मदमत्तता है — जब तुम होश में नहीं हो। आत्मा की जो जवानी है, आत्मा का जो यौवन है, उसकी जो मदमत्तता है, वह होश की मदमत्तता है, तुम इतने होश से भरे हो इसलिए आनंदित हो। वह शराब होश की शराब है — अगर ऐसी कोई शराब हो सके।

एक मस्ती बुद्ध की है, महावीर की है; एक मस्ती नेपोलियन और सिकंदर की भी है। पर नेपोलियन और सिकंदर की मस्ती जल्दी ही उतर जाएगी। बुद्ध और महावीर की मस्ती रहेगी सदा और सदा। क्योंकि मस्ती अगर शरीर पर निर्भर है; शरीर ही नहीं टिकता, मस्ती कैसी टिकेगी? आधार ही बिखर जाता है, भवन कैसे बचेगा?

कबीर कहते हैं: ‘रामदेव मोरे पाहुनै आए, मैं जोवन में माती।’ मैं मदमस्त हूं। एक नया यौवन जैसे मेरे भीतर आ गया, क्योंकि रामदेव मेरे द्वार आये।

जब परमात्मा से आत्मा का मिलन होता है, तब एक मस्ती जो होश की है, जागृति की है; एक आनंद जो पूरी तरह डुबा देता है, फिर भी डुबा नहीं पाता; भीतर होश का दीया जलता ही रहता है!

‘रामदेव मेरे पाहुनै आए, मैं जोवन में माती।’

-ओशो
कहै कबीर मैं पूरा पाया
प्रवचन नं 3 से संकलित
(पूरा प्रवचन एम. पी. थ्री. पर भी उपलब्ध है)