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चैतन्य की बढ़ती ज्योति

तो कितना ही तुम बांधो शीर्षासन, सिद्धासन, सर्वांगासन करो, कितने ही बंध साधो, कितने ही शरीर को इरछा-तिरछा करो--वह बात बहुत महत्वपूर्ण नहीं है। महत्वपूर्ण है भीतर चैतन्य का बढ़ना

‘तन को जोगी सब करै, मन को करे न कोई।
सब विधि सहजे पाइये, जो मन जोगी होई।।’

सवाल शरीर से कुछ करने का नहीं है। सभी सवाल होश के जगत में कुछ करने का है। तो कितना ही तुम बांधो शीर्षासन, सिद्धासन, सर्वांगासन करो, कितने ही बंध साधो, कितने ही शरीर को इरछा-तिरछा करो — वह बात बहुत महत्वपूर्ण नहीं है। महत्वपूर्ण है भीतर चैतन्य का बढ़ना--चैतन्य की बढ़ती ज्योति।

‘तन को जोगी सब करै, मन को करै न कोई।’

इसलिए तुम पाओगे ऐसे जोगी, जिन्होंने शरीर की बड़ी कीमती उपलब्धियां पा ली हैं। लेकिन अगर तुम उनमें झांक कर देखोगे तो पाओगे कि तुमसे गये-बीते हैं।

योगी तीस दिन जमीन में पड़ा रह सकता है। उसने बड़ा कुछ साधा है; क्योंकि तीस दिन बिना ऑक्सीजन के, गड्ढे में दबा पड़ा रहना! तीस क्षण मुश्किल हैं। तीस दिन के बाद तुम उसे निकालो वह जीवित है! तुम चमत्कृत होओगे। लेकिन उस आदमी की आंखों में देखना और तुम उसमें वह ज्योति न पाओगे जो कबीर, बुद्ध या गोरख की आंखों में होती है। उस ज्योति की जगह तुम उसकी आंखों में एक उदासी पाओगे, एक सोयाहुआपन पाओगे। और तुम उसके जीवन में कोई चमक न पाओगे--जो होनी चाहिए। क्योंकि जिसके भीतर ब्रह्म जगा हो, उसके बाहर सब तरफ एक सुगंध और एक चमक और एक प्रकाश का विस्तार होगा — वह तुम बिलकुल न पाओगे। मजे की बात यह है कि तीस दिन यह जमीन में पड़ा रहा, क्योंकि पांच सौ रुपये उसे इनाम मिलने हैं। तुम किसी बुद्ध को राजी कर सकोगे कि पांच सौ रुपये के लिए तीस दिन जमीन में पड़ा रहे? तन को तो साध लिया उसने, पर मन की साधना का उसे कुछ भी पता नहीं है।

ऐसे योगी हैं कि संकल्प से केवल हाथ की नाड़ी की गति बंद कर देंगे, हृदय की चाल बंद कर देंगे; लेकिन वे सब कर रहे हैं पैसा पाने के लिए। उनकी जगह सर्कस में है, सत्य में नहीं है। वे सर्कस के लिए काम हैं, सत्य का उनसे क्या लेना-देना! तुम दुकान कर रहे हो, वे भी दुकान कर रहे हैं। तुम्हारी दुकान तुमसे जरा बाहर है, उनकी दुकान शरीर से जुड़ी है। लेकिन उनकी सारी साधना एक प्रदर्शन बन गई है।

ऐसे योगी हैं, जो आंख को खींच कर बाहर लटका लेते हैं। डॉक्टर पालब्रन्टन ने जब पहली दफा एक योगी को यह करते देखा, तो वह हैरान हो गया, क्योंकि वह तो खुद डॉक्टर था। यह अविश्वास की बात थी, यह हो ही नहीं सकता कि दोनों आंखें खींचकर उसने लटका लीं, चार इंच आंखें नीचे लटक गईं! और अब भी वह उन आंखों से देख रहा है — सारी मांश-पेशियां बाहर आ गयी हैं, खून झरने लगा; फिर वापस उसने आंखें अपने गड्ढों में जमा लीं! तब उसने कहा कि दो रुपये मेरी फीस! इतना बड़ा चमत्कार, लेकिन मांग तो लोभ की!

इसलिए कबीर कहते हैं, ‘तन को जोगी सब करै, मन को करे न कोई। सब विधि सहजे पाइये, जो मन होगी होई।।’

और जब मन योगी हो जाता है...क्या है मन के योग का अर्थ?

योग शब्द का अर्थ है: जोड़, संगम, मिलन, संभोग।

योग का अर्थ है: दो का एक हो जाना।

तो मन के योग का क्या अर्थ होगा? — जहां मन की लहरें, और मन का सागर एक हो जाए; जहां मन की दौड़ और मन का ठहरा होना एक हो जाए; जहां मन, मन में लीन हो जाए। परम संभोग का क्षण है जब मन मन में ही लीन हो जाता है, डूब जाता है। वही समाधि है।

सब विधि सहजे पाइये, जो मन जोगी होई।’

और जिसने मन के मिलन की यह कीमिया पा ली, उसके लिए सब सरल हो जाता है।

‘सब विधि सहजे पाइये’ — वह सभी कुछ सहज पा लेता है। उसे पाने के लिए कुछ और करना नहीं पड़ता।

-ओशो
सुनो भई साधो
प्रवचन नं. 2 से संकलित
(पूरा प्रवचन एम. पी. थ्री. पर भी उपलब्ध है)