Osho World Online Hindi Magazine :: June 2012
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ध्यान-विधि
दौड़ना, जागिंग और तैरना

जब तुम गति में होते हो तो सजग रह पाना स्वाभाविक और सरल होता है। जब तुम शांत बैठे होते हो स्वाभाविक है कि सो जाओ। जब तुम अपने बिस्तर पर लेटे होते हो तो सजग रह पाना बहुत कठिन हो जाता है क्योंकि पूरी परिस्थिति तुम्हें सोने में मदद करती है। लेकिन सक्रियता में स्वभावतः तुम सो नहीं सकते, तुम अधिक सजग होकर कार्य करते हो। समस्या एक यही है कि कृत्य यांत्रिक बन सकता है।

अपने शरीर, मन और आत्मा को पिघला कर एक करना सीखो। ऐसे उपाय खोजो कि तुम एक इकाई की भांति कार्य कर सको। दौड़ने वालों के साथ कई बार ऐसा होता है। शायद तुमने सोचा भी न हो कि दौड़ना भी ध्यान हो सकता है, लेकिन दौड़ने वालों को कई बार ध्यान के अपूर्व अनुभव हुए हैं। और वे चकित हुए, क्योंकि इसकी तो वे खोज भी नहीं कर रहे थे — कौन सोचता है कि कोई दौड़ने वाला परमात्मा का अनुभव कर लेगा, परंतु ऐसा हुआ है। और अब तो दौड़ना अधिकाधिक एक नए प्रकार का ध्यान बनता जा रहा है। जब दौड़ रहे हों तो ऐसा हो सकता है।

यदि तुम कभी एक दौड़ाक रहे होओ, यदि तुमने सुबह-सुबह दौड़ने का आनंद लिया हो जब हवा ताजी और युवा हो और सारा विश्व नीदं से लौटता हो, जागता हो — तुम दौड़ रहे होओ और तुम्हारा शरीर सुंदर रूप से गति कर रहा हो; ताजी हवा, रात के अंधकार से गुजर कर जन्मा नया संसार — जैसे हर चीज गीत गाती हो — तुम बहुत जीवंत अनुभव करते हो....एक क्षण आता है जब दौड़ने वाला विलीन हो जाता है, और बस दौड़ना ही बचता है। शरीर, मन और आत्मा एक साथ कार्य करने लगते हैं; अचानक एक आंतरिक आनंदोन्माद का आविर्भाव होता है। दौडाक कई बार संयोग से चैथे के, तुरीय के अनुभव से गुजर जाते हैं, यद्यपि वे उसे चूक जाएंगे — वे सोचेंगे कि शायद दौड़ने के कारण ही उन्होंने इस क्षण का आनंद लिया: कि प्यारा दिन था, शरीर स्वस्थ था और संसार सुदंर, और यह अनुभव एक भावदशा मात्र थी। वे उसकी ओर कोई ध्यान नहीं देते — परंतु वे ध्यान दें, तो मेरी अपनी समझ है कि एक दौड़ाक किसी अन्य की अपेक्षा अधिक सरलता से ध्यान के करीब आ सकता है।

‘जागिंग’ (लयबद्ध धीरे-धीरे दौड़ना) अपूर्व रूप से सहयोगी हो सकती है, तैरना बहुत सहयोगी हो सकता है। इन सब चीजों को ध्यान में रूपांतरित कर लेना है।

ध्यान की पुरानी धारणाओं को छोड़ दो — कि किसी वृक्ष के नीचे योग मुद्रा में बैठना ही ध्यान है। वह तो बहुत से उपायों में से एक उपाय है, और हो सकता है वह कुछ लोगों के लिए उपयुक्त हो, लेकिन सबके लिए उपयुक्त नहीं है। एक छोटे बच्चे के लिए ध्यान नहीं, उत्पीड़न है। एक युवा व्यक्ति जो जीवंत और स्पंदित है, उसके लिए यह दमन होगा, ध्यान नहीं।

सुबह सड़क पर दौड़ना शुरू करो। आधा मील से शुरू करो और फिर एक मील करो और अंततः कम से कम तीन मील तक आ जाओ। दौड़ते समय पूरे शरीर का उपयोग करो; ऐसे मत दौड़ो जैसे कसे कपड़े पहने हुए हों। छोटे बच्चे की तरह दौड़ो, पूरे शरीर का — हाथों और पैरों का — उपयोग करो और दौड़ो। पेट से गहरी श्वास लो। फिर किसी वृक्ष के नीचे बैठ जाओ, विश्राम करो, पसीना बहने दो और शीतल हवा लगने दो; शांत अनुभव करो। यह बहुत गहन रूप से सहयोगी होगा।

कभी-कभी बिना जूते-चप्पल पहने नंगे पांव जमीन पर खड़े हो जाओ और शीतलता को, कोमलता को, ऊष्मा को महसूस करो। उस क्षण में पृथ्वी जो कुछ भी देने को तैयार है, उसे अनुभव करो और अपने में बहने दो। और अपनी ऊर्जा को पृथ्वी में बहने दो। पृथ्वी के साथ जुड़ जाओ।

यदि तुम पृथ्वी से जुड़ गये, तो जीवन से जुड़ गये। यदि तुम पृथ्वी से जुड़ गये, तो अपने शरीर से जुड़ गए। यदि तुम पृथ्वी से जुड़ गए, तो बहुत संवेदनशील और केंद्रस्थ हो जाओगे — और यही तो चाहिए।

दौड़ने में कभी भी विशेषज्ञ मत बनना; नौसिखिए ही बने रहना ताकि सजगता रखी जा सके। जब कभी तुम्हें लगे कि दौड़ना यंत्रवत हो गया है, तो उसे छोड़ दो; फिर तैर कर देखो। यदि वह भी यंत्रवत हो जाए, तो नृत्य को लो। यह बात याद रखने की है कि कृत्य मात्र एक परिस्थिति है कि जागरण पैदा हो सके। जब तक वह जागरण निर्मित करे तब तक ठीक है। जब वह जागरण पैदा करना बंद कर दे तो किसी काम का न रहा; किसी और कृत्य को पकड़ो जहां तुम्हें फिर से सजग होना पड़े। किसी भी कृत्य को यंत्रवत मत होने दो।

-ओशो
ध्यानयोगः प्रथम और अंतिम मुक्ति