Osho World Online Hindi Magazine :: June 2012
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जीवन का रूपांतरण - मा आत्मो क्रांति
ओशो में सब कुछ समाहित है

Ma Atmo Krantiओशो का धर्म है-जीवन का स्वीकार — जैसा है, वैसा ही उसका स्वीकार, सम्मान और ध्यान। ओशो इस आधुनिक युग में सर्वाधिक सार्थक सदगुरु हैं

हरमनप्रीत कौर जिनके संन्यास का नाम मा आत्मो क्रांति है और इस समय वह ऋषिकेश में रहती हैं, उन्होंने अपने संन्यास जीवन और ओशो से जुड़ने के बारे में कुछ महत्वपूर्ण जानकारियां ओशो वर्ल्ड पत्रिका के लिए दी हैं जो उल्लेखनीय हैं।

ओशो से आपका प्रथम कैसे जुड़ना हुआ, पूछे जाने पर उन्होंने बताया: मैंने 2001 में कहीं से एक ओशो के चित्रों सहित ओशो टाइम्स (हिंदी) को देखा और पढ़ा। ध्यान के बारे में पढ़ा। जिज्ञासा होने लगी कि मुझे ध्यान विधियां सीखनी हैं। किससे, कहां से सीखूं - कोई स्रोत नज़र नहीं आता था। फिर ओशो की एक पुस्तक ‘ध्यानयोग: प्रथम और अंतिम मुक्ति’ के अनुसार कुछ ध्यान के प्रयोग घर पर ही करने लगी। फिर एक संन्यासी मित्र से जालंधर में मिलना हुआ। उन्होंने मुझे सक्रिय ध्यान और कुण्डलिनी ध्यान की विधियां सिखायीं। जैसे-जैसे मैं ध्यान करने लगी मन वैसे-वैसे शांत होने लगा। छोटी-छोटी बातों पर विचलित होना, क्रोध आना कम होने लगा।

वर्ष 2002 में मैं स्वामी आनंद सत्यार्थी के माध्यम से ओशो के नव-संन्यास में दीक्षित हो गई। तब जैसे ओशो ही मिल गये हों। मैं बहुत आनंदित थी। मुझे संन्यास का नाम मिला - मा आत्मो क्रांति। लेकिन मेरे घर पर, मेरे परिवार में मेरा विरोध होने लगा। तनाव इतना अधिक बढ़ गया कि मुझे घर-परिवार या ओशो इन दोनों में से एक को चुनने की नौबत आ गई।

ओशो से मुझे इतना कुछ मिल रहा था-ध्यान में प्रवेश करते ही शरीर की सीमा भूल जाती थी, जीवन की बोझिलता दूर हो जाती थी। जीवन में रूपांतरण घट रहा था। भीतर हिम्मत बढ़ती जा रही थी। लड़की हूं, असहाय हूं, ऐसा नहीं लगता था। ओशो जैसे मेरे साथ थे। ओशो को छोड़ना असंभव था। अतः मैंने हिम्मत करके यही तय किया कि घर-परिवार का त्याग कर दूं। वैसा ही किया। कुछ अड़चनों का सामना तो करना पड़ा लेकिन रास्ता मिलता गया। ध्यान की यात्रा चलती रही।

आज जब पीछे मुड़कर देखती हूं तो ओशो के प्रति अहोभाव के आंसू उमड़ते हैं। उनकी करुणा अपार है। जब भी हमारा हृदय उनके प्रति खुलता है, वह मौजूद ही हैं।

ओशो की ध्यान-विधियों में मेरा प्रिय ध्यान है, कुंण्डलिनी ध्यान। जिबरिश ध्यान भी करती हूं। प्रारंभ में मैं निष्क्रिय ध्यान किया करती थी।

अपने मित्रों के प्रति, सहयोगियों के प्रति प्रेमपूर्ण हूं। जीवन ने बहुत सिखाया है। मित्रों को ध्यान के लिए मार्गदर्शन देना, ध्यान विधियां सिखाना, ओशो से परिचित करवाने में सहयोग करना - यह मुझे प्रिय है। ओशो से जुड़कर सबसे क्रांतिकारी बदलाव जो आया वह यह लगता है कि बाहर की यात्रा छूट गयी। उसमें कोई आकर्षण नज़र नहीं आता। भीतर की यात्रा शुरू हो गई।

मेरी समझ से ओशो जिस यात्रा की बात करते हैं, वह अपने अंतर में लौट जाने की बात करते हैं। ओशो में सब कुछ समाहित है — ध्यान, भक्ति, योग, उत्सव।

ओशो ने हमारे लिए, पूरी मानवता के लिए प्रेम व ध्यान के क्रांतिकारी दृष्टिकोण को जीने के लिए एक सुनहरा अवसर दिया है। जो भी प्रेमी, मित्र अंतर्यात्रा पर जाने के मुमुक्षु हैं; ओशो ही उनके लिए एकमात्र मार्ग हैं। मुझे लगता है कि ओशो से जुड़ना अर्थात ध्यान से जुड़ना। सभी समस्याओं का एक ही समाधान है - ध्यान और ध्यान। दूसरा मार्ग न कभी था, न है और न कभी होगा।

ओशो का धर्म है — जीवन का स्वीकार - जैसा है, वैसा ही उसका स्वीकार, सम्मान और ध्यान। ओशो इस आधुनिक युग में सर्वाधिक सार्थक सदगुरु हैं।

-मा आत्मो क्रांति
ऋषिकेश, उत्तराखंड