Osho World Online Hindi Magazine :: June 2012
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नक्सलवाद: रिवोल्यूशन या रिएक्शन

नक्सलाइट पुराने ढांचे के प्रति एक क्रोधपूर्ण प्रतिक्रिया है। वह क्रोध उस सीमा पर पहुंच गया है, जहां वह यह नहीं देखता है कि क्या करना है, क्या छोड़ देना है

प्रश्न: ओशो, क्या नक्सलवादियों की क्रांति की दिशा सही है?

नहीं, मैं यह नहीं मानता। मैं इसलिए नहीं मानूंगा कि नक्सलाइट सिर्फ एक प्रतिक्रिया, रिएक्शन है - क्रांति, रिवोल्यूशन नहीं। रिवोल्यूशन और रिएक्शन में बड़ा फर्क है। नक्सलाइट पुराने ढांचे के प्रति एक क्रोधपूर्ण प्रतिक्रिया है। वह क्रोध उस सीमा पर पहुंच गया है, जहां वह यह नहीं देखता है कि क्या करना है, क्या छोड़ देना है। वह अंधा हो गया है। अंधा क्रोध भी खतरनाक साबित हो सकता है। जितना अंधा कन्फर्मिस्ट खतरनाक होता है, उतना ही अंधा रिवोल्यूशनरी भी। और नक्सलाइट की घटना जो है वह कोई रिवोल्यूशन नहीं है। और कोई फिलॉसफ़ी, दर्शन नहीं है। वह एक तीव्र रिएक्शन है, जो बिलकुल जरूरी था। इसलिए जितने हम जिम्मेवार हैं नक्सलाइट पैदा करने के लिए, उतने वे बेचारे जिम्मेवार नहीं हैं। वे तो बिलकुल निरीह हैं। उनको मैं जरा भी जिम्मा नहीं देता। मैं निंदा के लिए भी उनको पात्र नहीं मानता, क्योंकि निंदा उनकी करनी चाहिए जिनको रिसपोन्सिबिल, जिम्मेवार मानूं। हम इररिसपोन्सिबिल हैं।

हमने पांच हजार वर्ष से जरा भी क्रांति नहीं की है, जरा भी नहीं बदले हैं, एकदम मर गये हैं। तो इस मरे हुए मुल्क के साथ कुछ ऐसा होना अनिवार्य है। लेकिन वह शुभ नहीं है। और उसको अगर हमने क्रांति समझा तो खतरा है। रिएक्शनरी हमेशा उल्टा होता है और आप जो कर रहे हैं उससे उल्टा करता है। रिएक्शनरी वहीं होता है, जहां हमारा समाज होता है। सिर्फ उल्टा होता है। वह शीर्षासन करता है। हम जो यहां कर रहे हैं, वह उसका उल्टा करने लगता है।

जिस जगह आप हैं, उससे गहरा वह कभी नहीं जा सकता है, क्योंकि आपका वह रिएक्शन है। अगर आपने मुझे गाली दी और मैं भी तुरंत गाली देता हूं तो आपकी और मेरी गाली एक ही तल पर होनेवाली है, क्योंकि उसी तरह मैं भी गाली दे रहा हूं तो मैं भी गहरा नहीं हो सकता, गहरा हुआ नहीं जा सकता। गहरे होने के लिए भारत में नक्सलाइट कुछ नहीं कर पायेगा। नक्सलाइट सिर्फ सिम्पटमैटिक हैं - सिम्पटम, बीमारी के लक्षण हैं। बीमारी पूरी हो गयी है और अब नहीं बदलते तो यह होगा। यानी यह भी बहुत है, यह भी मेरी दृष्टि में। लेकिन अगर तुम नहीं बदलते हो और इसके सिवाय तुम कोई रास्ता नहीं छोड़ते हो, अगर क्रांति नहीं आती तो यह प्रतिक्रिया ही आयेगी। अब दो विकल्प खड़े होते हैं मुल्क के सामने--या तो क्रांति के लिए तुम एक फिलॉसफ़िक रूट, वैचारिक आयाम की बात करो और क्रांति को एक व्यवस्था दो और क्रांति को एक सिस्टम दो और क्रांति को एक क्रिएटेड फोर्स बनाओ। अगर नहीं बनाते हो तो अब यह होगा यानी नक्सलाइट जो हैं वे हमारी वर्तमान समाज-व्यवस्था के दूसरे हिस्से हैं। ये दोनों जाने चाहिए। सोसायटी भी जानी चाहिए और उसका रिएक्शन भी जाना चाहिए, क्योंकि यह बेवकूफी ही थी सोसायटी का साथ देना। ये जो घटनाएं हैं, ये इसी के पार्ट एंड पार्सल, सहज परिणाम हैं। आमतौर से ऐसा लगता है कि नक्सलाइट दुश्मन हैं। मैं नहीं मानता कि वे दुश्मन हैं। वे इसी सोसायटी के हिस्से हैं, इसी सोसायटी ने उसे पैदा कर दिया है। इसने गाली दी है तो उसने दुगुनी गाली दी है, बस इतना फर्क पड़ा है। मगर यह माइंड, चित्त इसी से जुड़ा हुआ है। यह सोसायटी गयी तो वह भी गया। अगर यह नहीं गयी, तो वह भी जानेवाला नहीं है। यह बढ़ता चला जाएगा।

अब मेरा कहना यह है कि क्रांतिकारी के सामने दो सवाल हैं। ठीक विचार करनेवाले के सामने दो सवाल हैं। वह यह कि या तो सोसाइटी में क्रांति आये - सृजनात्मक रूप में - और नहीं आ पाती है तो नक्सलाइट विकल्प रह जायेगा। और वह कोई सुखद विकल्प नहीं है। वह सुखद भी नहीं है, गहरा भी नहीं है, जरा भी गहरा नहीं है। वह उसी तल पर है, जहां हमारा समाज है। वह सिर्फ रिएक्शन कर रहा है, वह जरूरी है। यह मैं नहीं कहता कि बुरा है तो गैर-जरूरी है। बुरा है, नहीं हो, ऐसी हमें व्यवस्था करनी चाहिए। और वह व्यवस्था हम तभी कर पायेंगे जब हम पूरी सोसाइटी को बदलेंगे।

नक्सलाइट को हम रोक नहीं पायेंगे, उनको रोकने का सवाल ही नहीं है। पूरी सोसाइटी उसे पैदा कर रही है, इसका जड़ होना उसको पैदा कर रहा है, इसके न बदलने की आकांक्षा उसको पैदा कर रही है, इसका पुराना ढांचा उसको पैदा कर रहा है, यह ढांचा पूरी तरह गया तो इसके साथ नक्सलाइट गया। नक्सलाइट एक संकेत है, जो बता रहा है कि सोसाइटी इस जगह पहुंच गयी कि अगर क्रांति नहीं होती तो यह होगा। और अब यह सोसाइटी को समझ लेना चाहिए। वह पुराना ढांचा तो नहीं बचेगा।

या तो क्रांति आयेगी या यह ढांचा जायेगा। ये दो चीजें आ सकती हैं और अगर आप मर्जी से लायें तो क्रांति आयेगी, अगर आप सोचकर लायें तो क्रांति आयेगी, विचार करके लाएं तो क्रांति आयेगी और अगर आप क्रांति न लायें, इसके लिए जिद में रहें कि नहीं आने देंगे तो यह विचारहीन प्रतिक्रिया आयेगी। यानी मेरा कहना है कि नक्सलाइट एक थाटलेस रिएक्शन, विचारहीन प्रतिक्रिया है।

-ओशो
भारत: समस्याएं व समाधान
प्रवचन नं. 1 से संकलित