Osho World Online Hindi Magazine :: June 2012
www.oshoworld.com
 
ओशो अमृत-पत्र
सत्य के लिए प्रज्वलित प्यास ही पथ है

सत्य की साधना सतत है। श्वास-श्वास जिसकी-साधना बन जाती है, वही उसे पाने का अधिकारी होती है।

सत्य की आकांक्षा अन्य आकांक्षाओं के साथ एक आकांक्षा नहीं है। अंश मन से जो उसे चाहता है, वह चाहता ही नहीं। उसे तो पूरे और समग्र मन से ही चाहना होता है। मन जब अपनी अखंडता में उसके लिए प्यासा होता है, तब वह प्यास ही सत्य तक पहुंचने का पथ बन जाती है। स्मरण रहे कि सत्य के लिए प्रज्वलित प्यास ही पथ है। प्राण जब उस अनंत प्यास से भरे होते हैं, और हृदय जब अज्ञात को खोजने के लिये ही धड़कता है, तभी प्रार्थना प्रारंभ होती है। श्वासें जब उसके लिये ही आती-जाती हैं, तभी, उस मौन अभीप्सा में ही परमात्मा की ओर पहले चरण रखे जाते हैं।

प्रेम-प्यासा प्रेम ही उसे पाने की पात्रता और अधिकार है।

-ओशो
पथ के प्रदीप