Osho World Online Hindi Magazine :: June 2012
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समाचार पत्रों में ओशो-वाणी
ज्योति में ज्योति समानी




‘‘ज्योतिष की सर्वाधिक गहरी मान्यताएं भारत में पैदा हुईं। सच तो यह है कि ज्योतिष की गणना के लिए ही सबसे पहले गणित का जन्म हुआ। इसीलिए अंकगणित के अंक भारतीय हैं, पूरी दुनिया की भाषाओं में। एक से लेकर नौ डिजिट, नौ अंक स्वीकृत हो गए, उसका भी कुल कारण इतना है कि वे नौ अंक भारत में पैदा हुए और धीरे-धीरे सारे जगत में फैल गए। जिसे आप अंग्रेजी में नाइन कहते हैं, वह संस्कृत के नौ का ही रूपांतरण है। एट संस्कृत के अष्ट का रूपांतरण है। एक से लेकर नौ तक जगत की समस्त सभ्य भाषाओं में गणित के जो अंक का प्रचलन है, वह भारतीय ज्योतिष के प्रभाव में हुआ।’’ 1 अप्रैल को दैनिक हिंदी पत्र नया इंडिया ने ‘ज्योतिष सर्वाधिक पुराना, सर्वाधिक तिरस्कृत या मान्य?’ शीर्षक के साथ ओशो-प्रवचनों को प्रकाशित किया।

‘विज्ञान व अध्यात्म का संगम चाहते थे ओशो’ शीर्षक के साथ स्वामी आत्मो निनाद का एक आलेख प्रकाशित हुआ है स्वतंत्र भारत पत्र में। लखनऊ के इस पत्र को स्वामीजी ने बताया: ओशो ने ऐसे मनुष्य की कल्पना की थी जो विज्ञान और अध्यात्म को एक साथ लेकर चले। ओशो के पहले विज्ञान और अध्यात्म को अलग और विपरीत माना जाता था। लेकिन ये ओशो ही हैं, जिन्होंने कहा कि अध्यात्म अंदर की दिशा से अस्तित्व की खोज है।

दैनिक हिंदी मिलाप ने अपने 4 अप्रैल के अंक में ‘महावीर की दृष्टि में प्रायश्चित’ शीर्षक के साथ ओशो-प्रवचनों को प्रकाशित किया। और 7 तारीख को राष्ट्रीय सहारा ने ‘निर्विचार चेतना का आनंद’ प्रकाशित किया।

गुरुवार 12 अप्रैल, चंडीगढ़ से आज समाज ने धर्म-समाज स्तंभ में ‘स्वामी विवेकानंद और वेश्या’ पर एक आधे पृष्ठ का ओशो-प्रवचनांश प्रकाशित किया। 13 अप्रैल की दि एशियन एज में स्वामी चैतन्य कीर्ति का एक आलेख छपा जिसका शीर्षक है ‘फ्राम ब्रेथ टु बियांड’।

नई दिल्ली के अंग्रेजी समाचार दि पॉयनियर ने ‘भगवान बुद्ध’ पर ओशो प्रवचनों को प्रकाशित किया। प्रवचनांश का शीर्षक है ‘अंडरस्टेंडिंग योअर डिज़ायर’ जिसे 15 अप्रैल के अंक में पढ़ा जा सकता है।

‘गाड एंड दि गाडलीनेस’, इस शीर्षक के साथ पल्र्स ऑफ मार्केट समाचार ने स्वामी चैतन्य कीर्ति का एक लेख प्रकाशित किया। इसी पत्र के एक अन्य पृष्ठ पर डॉ. कुलदीप धीमान द्वारा लिखित ‘दि अल्टीमेट इकॉनोक्लास्ट’ पुस्तक की समीक्षा आयी। लेखक ने बहुत खुले मन से ओशो का अध्ययन किया है और वर्षों की गहरी शोध के बाद पुस्तक प्रकाशित की है। ये दोनों लेख 16 अप्रैल के अंक में प्रकाशित हुए हैं।

‘ईश्वर तक पहुंचने का मार्ग है ध्यान’ आया 17 अप्रैल को हिंदी समाचार हिंदुस्तान में। पत्र में ओशो बताते हैं: ‘‘आनंद बाहर नहीं है। बाहर आनंद की धुन भी सुनाई पड़ जाये तो बहुत है। जीवन का सब कुछ भीतर है — भीतर, गहरे अंधेरे में दबा हुआ। ध्यान वहां तक पहुंचने का मार्ग है।’’ दिनांक 19 अप्रैल को हिंदी दैनिक आज समाज ने ओशो-उद्धरणों को मुख्य रूप से अपने संस्करण में महत्वपूर्ण स्थान दिया।

21 तारीख को मुंबई की लोकसत्ता पत्र ने मराठी भाषा में ओशो-प्रवचनों का एक कॉलम दिया। बोधिवृक्ष स्तंभ में छपे प्रवचन का शीर्षक था ‘आज, आत्ता या क्षणी!’ इसी दिन दिव्य हिमाचल पत्र ने कबीर-वाणी पर ‘ज्योति में ज्योति समानी’ शीर्षक के साथ ओशो-प्रवचनों को प्रकाशित किया — ‘‘कबीर गुरु का नाम तो लेते ही नहीं। गुरु का नाम होता भी नहीं। गुरु चेतना की एक दशा है। नाम जानना चाहो तो कबीर के गुरु रामानंद थे, लेकिन कबीर उनका नाम कभी भी नहीं लेते हैं। सिर्फ एकाध जगह कहा है: ‘रामानंद चेताये।’ बाकी साधारणतः वे नाम भी नहीं लेते कि कौन गुरु हैं। एक अवस्था है, और गुरु तो एक संबंध है, शिष्य का एक भाव है और शिष्य की एक आंतरिक निकटता है, गुरु शिष्य का एक अनुभव है। तो वे जो कहते हैं बार-बार, गुरु के प्रसाद से मिला, वे यह कह रहे हैं कि मेरे प्रयास से नहीं मिला।’’

लखनऊ 22 अप्रैल, ‘अपनी इच्छा को समझो’ शीर्षक पर ओशो-प्रवचनांश आये हिंदुस्तान पत्र में।

बुद्धवार 25 अप्रैल की आज का आनंद पत्र ने पूरे पृष्ठ पर अनेक शीर्षकों के साथ ओशो के प्रवचनों को प्रकाशित किया। पत्र में ओशो का एक उद्धरण आया है: ‘‘धर्म तभी जीवन की अर्थव्यवस्था बदल सकता है जब राजनीति से भयभीत न हो, भागे न, पलायनवादी, ऐस्केपिस्ट न हो, वह यह न कहे कि हम भाग जाएंगे। जिस दिन धर्म ऐसे साधु पैदा करेगा जो सैनिक भी हो सकते हैं, जिस दिन धर्म ऐसे संत पैदा करेगा जो सत्ता पर भी पैर रख कर जीवन को संचालित कर सकते हैं, तभी हम जीवन को बदलने में समर्थ हो सकते हैं।’’

26 अप्रैल को जयपुर की कामयाब कलम ने ‘अपने स्वयं के विचार जगाओ’ शीर्षक पर एक कॉलम दिया। साथ-ही हैदराबाद की स्वतंत्र वार्ता में ‘सच्चे धार्मिक व्यक्ति को पहचानो’ शीर्षक के साथ सचित्र ओशो-वाणी छपी।

‘‘बुद्ध की वैज्ञानिक दृष्टि’’, इस शीर्षक के साथ ओशो-उद्धरणों को दिया दिल्ली के दैनिक पत्र राष्ट्रीय सहारा ने। इसी पत्र ने ‘ओशो की नजर में तीसरी आंख’ प्रकाशित किया 29 तारीख को। कॉलम में ओशो समझाते हैं: ‘‘चेतना ‘तीसरी आंख’ का भोजन है। वह आंख भूखी है; जन्म-जन्मों से भूखी है। यदि तुम उस पर ध्यान केंद्रित करोगे तो वह जीवंत हो जाती है। उसे भोजन मिल जाता है। एक बार इस कला को जान जाओ तो तुम्हारी चेतना स्वयं ग्रंथि द्वार ही चुंबकीय ढंग से खिंचती चली जाती है।’’

अप्रैल माह में अनेकों दैनिक हिंदी तथा अंग्रेजी समाचार पत्रों ने स्वामी सत्य वेदांत की ‘ओशो: ध्यान और उत्सव के ओजस्वी ऋषि’ पुस्तक को सचित्र प्रकाशित किया।